Saturday, June 8, 2019

डभोई का हीरा बा गेट – कलात्मकता का बेहतरीन नमूना

डभोई गुजरात के वडोदरा जिले का एक शहर है। कभी ये शहर बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। पर आज इस शहर की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे हम किसी 100 साल पुराने शहर में आ गए हों।

वडोदरा से डभोई जाने के लिए प्रताप नगर रेलवे स्टेशन से रेलगाड़ियां चलती हैं। प्रतापनगर वडोदरा जंक्शन से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह 5 बजे मैं होटल से निकलकर प्रताप नगर के लिए चल पड़ा हूं। वडोदरा के आटोरिक्शा वाले गलत किराया नहीं मांगते। एक आटोवाले ने मुझे वाजिब किराया पर रेलवे स्टेशन पहुंचा दिया। टिकट लेकर मैं डभोई जाने वाली पैसेंजर ट्रेन में बैठ गया हूं।

 कभी प्रतापनगर से डभोई की लाइन भी नैरो गेज हुआ करती थी। प्रतापनगर से डभोई की पहली पैसेंजर ट्रेन सुबह 7.20 बजे है। सर्दी के दिन में अभी उजाला नहीं हुआ है और ट्रेन चल पड़ी। ट्रेन में मुझे जगह आसानी से मिल गई है। ट्रेन एक घंटे में डभोई पहुंच गई है। वैसे ये पैसेंजर ट्रेन छोटा उदयपुर तक जाती है। पर मैं डभोई उतर कर लोगों से हीरा गेट का रास्ता पूछता हुआ शहर में चल पड़ा हूं।

रास्ते में एक दुकान पर रुककर खम्मण खाने से खुद को रोक नहीं पाया। गुजरात में इससे बेहतर नास्ता कुछ होता भी नहीं है। नास्ते के बाद पैदल ही लोगों से रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ रहा हूं। पतली सड़क के दोनों तरफ प्राचीन इमारतें दिखाई दे रही हैं। रास्ते में एक सफेद रंग का विशाल घंटाघर नजर आता है।

डभोई छठी शताब्दी में गुजरात का समृद्ध शहर था। गिरनार के जैन अभिलेखों में भी डभोई शहर का जिक्र आता है। पर डभोई में किले और सुंदर अलंकरण वाले द्वार का निर्माण 11वीं सदी में राजा सिद्धराज जय सिंह के कार्यकाल (1093 -1133 ई ) में हुआ। 

डभोई का किला हिंदू सैन्य परंपरा के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है। इसकी वास्तुकला शास्त्रों वर्णित शास्त्रीय परंपराओं पर आधारित है। शहर में प्रवेश के लिए कुल चार प्रवेश द्वार बनाए गए थे। इनमें पूर्व का द्वार जिसे हीरा भागोल कहते हैं वह सबसे ज्यादा अलंकृत प्रवेश द्वार था। इस गेट को यह नाम इसके वास्तुकार हीराधर के नाम पर मिला।

हीरा गेट में शिव, लक्ष्मी, विष्णु की सुंदर मूर्तियां बनी हैं। महाभारत कुछ दृश्यों को भी इसमें चित्रित किया गया है। भारतीय संस्कृति के प्रतीक जानवर हाथी की कलात्मक प्रतिमाएं हैं। इस गेट में बनी कई प्रतिमाएं खंडित हो गई हैं। संभवतया ये मुस्लिम आक्रमण के समय हुआ होगा। हीरा गेट तीन मंजिला है। इसमें ऊपर कुछ झरोखे भी बने हुए हैं। हीरा गेट की मूर्तियां खजुराहो जैसी कला शिल्प की याद दिलाती हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्थल है। पर गेट का रखरखाव अच्छा नहीं है। शहर के लोगों के भी इस गेट की कलात्मकता के बारे में ज्यादा नहीं मालूम।  

इसके अलावा डभोई में वडोदरा गेट (पश्चिम), चंपानेर गेट (उत्तर ) और नांदोद गेट (दक्षिण) तीन और प्रवेश द्वार बनाए गए थे। हीरा गेट के आसपास प्रवेश द्वार के अलावा कुछ नहीं बचा है। शहर की बाउंड्री वाल वाली दीवारें दरक चुकी हैं।


डभोई 13वीं सदी में मुस्लिम शासकों के अंतर्गत आ गाया। एक अप्रैल 1731 को डभाई का प्रसिद्ध युद्ध बाजीराव पेशवा और टिंबकराव दाबुद्धे के बीच लड़ा गया था। डभोई गुजराती के प्रसिद्ध भक्तिमार्गी कवि दयाराम की स्थली भी है। यहां पर उन्होने काफी पद्य रचे थे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(DABHOI, GUJRAT, HIRA GATE ) 





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