Thursday, June 6, 2019

चंपानेर का सात कमान, गुजरात की पहचान



चंपानेर-पावागढ़ के ऐतिहासिक स्थलों में सात कमान प्रमुख है। यह सात कमान गुजरात राज्य की पहचान बन चुका है। गुजरात के सरदार वल्लभाई पटेल एयरपोर्ट पर सात कमान की विशाल तस्वीर को गुजरात की प्रमुख ऐतिहासिक प्रतीक के तौर पर पेश किया गया है। सात कमान का निर्माण स्थानीय पीले बलुआ पत्थर से किया गया है। यह ऐसे स्थल पर बना है जहां से पूरे पावागढ़ की सुरक्षा को फौज के अधिकारी देख सकते थे।

बारह वर्ग मील में बसा था शहर - प्राचीन चंपानेर नगरी 12 वर्ग मील में बसी हुई थी। पावागढ़ की पहाड़ी पर उस समय एक दुर्ग भी था, जिसे पवनगढ़ या पावागढ़ कहते थे। पर यह दुर्ग अब नष्ट हो गया है। जगह जगह दुर्ग के अवशेष देखे जा सकते हैं। पर वहां प्राचीन महाकाली का मंदिर आज भी विद्यमान है। चांपानेर की पहाड़ी समुद्र तल से 2800 फुट ऊंची है। इसका संबंध ऋषि विक्रमादित्य से बताया जाता है। 
चांपानेर का संस्थापक गुजरात नरेश वनराज का चंपा नामक मंत्री था। चांद बरौत नामक गुजराती लेखक के अनुसार 11वीं शती में गुजरात के शासक भीमदेव के समय में चांपानेर का राजा मामगौर तुअर था। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया। पर 1484 ईस्वी में महमूद बेगड़ा ने इस नगरी पर आक्रमण किया और वीर राजपूतों ने विवश होकर शत्रु से लड़ते-लड़ते अपने प्राण गवां दिए। मुस्लिम शासकों ने इस शहर का नाम मुहम्मदाबाद भी रखा था।


विश्व विरासत स्थल – यूनेस्को ने चंपानेर पावागढ़ पुरात्विक स्थल समूहों को साल 2004 में विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया। गुजरात में इसके अलावा पाटन का रानी का बाव (2014) भी इस सूची में है।

चंपानेर शहर को आजकल आप दक्षिण का भद्रा गेट और पूर्व के भद्रा गेट के बीच महसूस कर सकते हैं। इन दोनों के बीच कई ऐतिहासिक इमारतों के अवशेष मौजूद हैं।


शहर की मसजिद के बाद आगे बढ़ने पर हमें आमिर मंजिल और केवड़ा मसजिद का पथ संकेतक नजर आता है। लेकिन ठहरिए इससे पहले हमें मांडवी यानी सीमा शुल्क गृह की इमारत नजर आती है। यह मुस्लिम शासकों के प्रशासन का प्रमुख दफ्तर था। सीमा शुल्क दफ्तर को गुजराती में मांडवी कहते हैं। मतलब यह तब का कस्टम हाउस था। यहां पर दो पुरानी तोपें भी रखी हुई दिखाई दे जाती हैं। मांडवी यानी चुंगीघर एक समानुपातिक चौरस इमारत है। इसका निर्माण 15वीं सदी में हुआ था। यह चंपानेर किले के मध्य में स्थित है। मराठों का शासन काल में इस इमारत का इस्तेमाल चुंगी संग्रह केंद्र के तौर पर किया जाता था। इसमें कुल 11 कक्ष बने हुए थे।

आगे चलते हुए पुराना चंपानेर शहर की सड़क पर हम पहुंच गए हैं। यहां कुछ गेस्ट हाउस और धर्मशाला बने हुए हैं। ऐसा लग रहा है कि हम किसी गांव में टहल रहे हों। सामने पावागढ़ डाकघर नजर आता है। भले ही आजकल डाकघर की अहमियत कम हो रही हो पर मेरा बचपन से पोस्ट ऑफिस से बड़ा प्रेमपूर्ण रिश्ता रहा है। इसलिए डाकघर का बोर्ड मुझे आह्लादित करता है। मुझे दिगंबर जैन पथिक आश्रम का बोर्ड नजर आता है। यहां पर दो दिगंबर जैन धर्मशालाएं हैं। 

आगे एक बार फिर हम पावागढ़ की पुरानी इमारतों से रुबरु हो रहे हैं। कुछ इमारतें जो खंडहर का रुप ले चुकी हैं। इन इमारतों को देखते हुए हमलोग पूर्व के भद्र गेट से बाहर निकल गए हैं। चंपानेर के इन गेट का निर्माण महमूद बेगड़ा द्वारा सोलहवीं सदी में करवाया गया था। दक्षिण गेट, पूर्व गेट के अलावा हालोल गेट और गोधरा गेट नाम से दो और प्रवेश द्वार हुआ करते थे।
हमें चंपानेर मे बड़ा तालाब और कबूतरखाना देखने भी जाना था। पर वह जामा मसजिद से तीन किलोमीटर आगे है। वहां जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल पाया तो हमें अपना इरादा बदलना पड़ा।

एक बार फिर हमलोग बस स्टैंड पहुंच गए हैं वडोदरा वापसी के लिए। अभी कोई बस खड़ी नहीं है। तो एक आटोवाले कहते हैं कि हम आपको हालोल तक छोड़ देंगे बस वाले किराए में ही। पावागढ़ से हालोल 7 किलोमीटर है। रास्ते में हमें हालोल गेट और पुराने किले के कुछ और अवशेष नजर आते हैं। हमलोग आटो में बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में हालोल पहुंच गए हैं। हालोल बस स्टैंड से हमें वडोदरा जाने वाली बस तुरंत मिल जाती है। हमें जो बस मिली है यह राजस्थान से उदयपुर के भी पीछे से चली है और वडोदरा जा रही है।  
 - vidyutp@gmail.com
( CHAMPANER, HALOL, PAWAGARH, GUJRAT ) 




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