Monday, June 24, 2019

अहमदाबाद शहर की पहचान - सीदी सैय्यद जाली मसजिद


जलाराम में नास्ते करने के बाद हमलोग चल पड़े हैं अहमदाबाद शहर घूमने। पिछली यात्रा में साबरमती,गांधीनगर, कांकरिया झील आदि सब कुछ देखा था। इस बार हमारी पहली मंजिल है सीदी सैय्यद जाली मसजिद। कालूपुरा पुलिस स्टेशन से रीलिफ रोड पर सीधे चलते हुए हमलोग जाली मसजिद के पास पहुंच गए हैं। जाली मसजिद भद्रा रोड पर इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के दफ्तर के पास स्थित है। पर आखिर जाली मसजिद क्यों। पिछले कुछ सालों में यह जाली मसजिद पूरी दुनिया में अहमदाबाद शहर की पहचान बन चुकी है।

अहमदाबाद शहर के ठीक बीचों-बीच लाल दरवाजा के पास बनी ये मस्जिद भारतीय-अरबी नक्काशी का बेजोड़ नमूना है। जाली मस्जिद को 1573 में बनवाया गया था। गुजरात सल्तनत (1407-1573) के आखिरी सुल्तान शम्स-उद-दीन मुजफ्फर शाह तृतीय के दौर में इस मस्जिद का निर्माण हुआ। मुजफ्फर शाह के जनरल सुलतान अहमद शाह बिलाल झाजर खान के सहयोगी सीदी सैय्यद ने इस मस्जिद को बनवाया था। सीदी सैय्यद यमन से गुजरात आया था। वह गरीबों का रहनुमा हुआ करता था।  इसी सीदी सैय्यद ने 1572 में ये मस्जिद बनवानी शुरू की थी। 1573 में ये मस्जिद बनकर तैयार हो गई।

क्यों नाम पड़ा जाली मसजिद - इस मस्जिद के पश्चिमी ओर की खिड़की पर संगमरमर पत्थदर को काट काट कर बनी जालियों पर अदभुत काम किया गया है जिसके कारण यह पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मस्जिद में लगी जाली में अनूठी कलाकारी की गई है। इन जालियों में पत्थर पर ताड़ के वृक्ष, पत्ते, बेल-बूटे की बारीक नक्काशी का काम है। अपनी इसी अनूठी और महीन कारीगरी के कारण यह विश्वभर में चर्चित हो गई है।

कुल दस जालियां - मसजिद आकार में बहुत बड़ी नहीं है पर यह अपनी जालियों का कारण ही प्रसिद्ध हो गई है। इस मस्जिद में कुल 10 जालियां हैं। इनमें से सात जालियों में पत्थर पर वृक्ष एंव पत्तियों की नक्काशी की गई है। जबकि तीन जालियां खुली हुई हैं। 12 स्तंभों पर टिकी मस्जिद के द्वार पर दो मीनार और अंदर 15 गुंबद बने हुए हैं। मस्जिद के पास ही सीदी सैय्यद की मजार बनी हुई है। उनका निधन 24 दिसंबर 1576 को हुआ था। जाली मसजिद में नियमित नमाज पढ़ी जाती है। किसी भी धर्म को मानने वाले मसजिद के अंदर जा सकते हैं। पर सिर ढकना जरूरी है।

आईआईएम के लोगो की प्रेरणा - कहा जाता है कि आईआईएम, अहमदाबाद का लोगो बनाने की प्रेरणा इसी मस्जिद की जाली से मिली थी। जब अंग्रेज़ भारत में काबिज हो गए तो उन्होंने इस मस्जिद की एक जाली निकाल ली थी और उसे ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखवा दिया था। पर वे बाकी जालियां नहीं निकलवा सके।

ब्रिटिश काल में इस मसजिद का इस्तेमाल एक दफ्तर के तौर पर किया जाता था। पर अब यह आस्था का केंद्र है। मसजिद के बाहर वजू करने के लिए छोटा सा हौज बना है। यहां पर कबूतर मंडराते नजर आते हैं। मसजिद की देखभाल अहमदाबाद सुन्नी मुस्लिम वक्फ कमेटी करती है।

जापान के पीएम को दिखाई मसजिद - बुलेट ट्रेन की आधा‍रशिला रखने के लिए जब जापान के पीएम शिंजो आबे सितंबर 2017 में अहमदाबाद आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें शहर की प्रसिद्ध सीदी सैय्यद मस्जिद लेकर आए थे। इस दौरान वह खुद जापानी पीएम के गाइड भी बने थे।

इस्लामिक विरासत के कारण अहमदाबाद बना हेरिटेज सिटी
जाली मसजिद समेत अहमदाबाद शहर की अन्य प्रमुख इस्लामिक विरासत को पेश कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और गुजरात सरकार की ओर से यूनेस्को द्वारा अहमदाबाद को विश्व विरासत का शहर घोषित करने का दावा किया गया था। कई साल से चल रही दावेदारी के बाद जुलाई 2017 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी के 41वें सेशन में इसे भारत के पहले वैश्विक धरोहर वाले शहर के रूप में मान्यता दी गई। विश्व धरोहर शहर बनने में सैकड़ों वर्षों से इस्लामिक, हिंदू और जैन समुदायों के एक धर्मनिरपेक्ष सह-अस्तित्व वाली पहचान मुख्य आधार बनी। तो आइए हम इस गंगा-जमुनी तहजीब को बचाए रखें।

-       विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( JALI MASJID, AHMADABAD ) 

2 comments:

  1. काफी रोचक और तथ्यात्मक जानकारी है, विशेषकर iim अहमदाबाद के लोगो के संबंध में।
    जैसा कि आपके ब्लॉग का नाम है- दानापानी, कुछ खास खान पान का उल्लेख होता तो और मजा आता।

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  2. आगे पीछे के आलेख पढ़े खानपान पर भी मिलेगी सामग्री.

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