Saturday, June 29, 2019

260 स्तंभों वाली अहमदाबाद की विशाल जामी मसजिद


अहमदाबाद की जामा मस्जिद देश की विशालतम और सुंदरतम मसजिदों में से एक है। भद्रा फोर्ट के आगे तीन दरवाजा के पास स्थित यह मस्जिद शहर की सबसे बड़ी मसजिद है। इस मसजिद का निर्माण 1424 में अहमदशाह प्रथम के शासन काल में हुआ। इसके निर्माण में पीले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। मसजिद का आंगन काफी विशाल है। इसके तीन तरफ विशाल बरामदे बने हैं।इस मसजिद को देखकर भोपाल की ताज उल मसजिद याद आती है।
जामी मसिद 75 मीटर लंबा और 66 मीटर चौड़े भूखंड में बना है। इसमें अंदर जाने के लिए तीन प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। आंगन में वजू करने के लिए विशाल हौज भी बना हुआ है।


मसजिद में कुल 260 स्तंभ - जामी मसजिद के मुख्य प्रार्थना कक्ष में कुल 260 स्तंभ हैं जिसके सहारे इसकी छत टिकी हुई है। ये खूबसूरत स्तंभ इसे दूसरी मसजिदों से काफी अलग करते हैं। वहीं इसके तीन तरफ बने विशाला बरामदों में कुल 152 स्तंभ हैं। इसके कुछ स्तंभों पर कलश, वृक्ष जैसी आकृतियां बनी है। इसलिए लोग इसे हिंदू शैली से प्रभावित मानते हैं। इतना ही नहीं इस मसजिद का केंद्रीय गुंबद कमल के फूल के आकार का है। गुजराती पुस्तक गुजरात नु पाटनगर अहमदाबाद में दावा किया गया है कि इस मसजिद के निर्माण में हिंदू शैली का इस्तेमाल हुआ है। इसके मुख्य नमाज कक्ष में कुछ इस तरह इंतजाम किया गया है कि सूर्य की रोशनी अंदर तक पहुंचती है।

सन 1819 में आए एक भूकंप में इस मसजिद की दो मुख्य लंबी मीनारें ध्वस्त हो गईं। फिर भी मसजिद की भव्यता में कोई कमी नहीं आई है। जामी मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षेण ( एएसआई ) द्वारा संरक्षित स्मारकों की सूची में है।

महिलाओं को नमाज पढ़ने का अधिकारपंद्रहवीं सदी की इस मसजिद में महिलाओं को नमाज पढ़ने का अधिकार मिल गया था। इस मसजिद में महिलाओं के लिए विशेष हिस्सा बनवाया गया है जिसे मुलाखाना कहते हैं। ऐसा ही इंतजाम भोपाल की ताजुल मसजिद में भी किया गया है। 

सभी धर्म के लोगों का स्वागत  - मसजिद को देखने किसी भी धर्म के लोग जा सकते हैं। बस आपके लिए जरूरी है कि सिर ढका हुआ हो और पहनावा शालीन हो। आजकल इस मसजिद का इंतजाम सुन्नी मुस्लिम वक्त कमेटी अहमदाबाद देखता है।

कुछ लोगों का दावा है कि शहर के बीचों बीच स्थित अहमदाबाद की जामी मसजिद प्राचीन भद्रकाली मंदिर और कुछ जैन मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई थी। हालांकि इस दावे की पुष्टि नहीं होती। जामी मसजिद के पश्चिमी हिस्से में अहमदशाह प्रथम का मकबरा है। उसके पास ही उसके बेटे और पोते का भी मकबरा है। अगर आप अहमदाबाद में कभी पहुंचे तो इस मसजिद को जरूर देखें। अहमदाबाद की इस जामी मसजिद में नियमित नमाज होती है। यहां दिनभर श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है।


कैसे पहुंचे – शहर के किसी भी इलाके से मानेक चौक, भद्रा फोर्ट या तीन दरवाजा के लिए आटो रिक्शा लें। तीन दरवाजा के पास ही जामी मसजिद का प्रवेश द्वार है। मसजिद के बाहरी इलाके में घना बाजार है। सड़क से गुजरते हुए इस मसजिद की भव्यता का पता नहीं चलता। पर प्रवेश द्वार से अंदर आने पर इसकी विशालता का एहसास होता है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( JAMI MASJID, AHMADABAD, AHAMAD SHAH )



Friday, June 28, 2019

भद्रकाली मंदिर – अहमदाबाद शहर की देवी

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अहमदाबाद शहर की देवी हैं भद्रकाली। भद्रा फोर्ट के पास उनका मंदिर स्थित है। लोगों का मानना है कि यह मंदिर काफी प्राचीन है। जब अहमदाबाद शहर का नाम कर्णावती हुआ करता था, तब से भद्रकाली मंदिर का अस्तित्व है। देवी भद्रकाली को अहमदाबाद शहर का संरक्षक माना जाता है।
भद्रकाली मां का विशाल मंदिर माणक चौक पर हुआ करता था। पर कई आक्रमणों में इस मंदिर को काफी क्षति पहुंची। तब से इस मंदिर की व्यवस्था राजपुरोहितों का परिवार देखता है।

अलग अलग दिन अलग अलग सवारियां - मंदिर का मुख्य आकर्षण मां काली की हर रोज बदलने वाली सवारियां हैं। वे अलग अलग दिन शेर, हाथी, नंदी, कमल आदि पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देती हैं। रविवार को माता जी शेर पर , सोमवार को नंदी पर, मंगलवार को मोर पर, बुधवार को खड़ी मुद्रा में, गुरुवार को कमल पुष्प पर सवार होती हैं। शुक्रवार को माता हाथी पर सवार होती हैं।


साल में दो बार अन्नकूट - मंदिर साल मे दो बार अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा शारदीय और चैत्र दोनों ही नवरात्रि के बाद यहां विशाल भंडारे का आयोजन होता है। हर साल जनवरी के अंतिम सप्ताह मे देवी भागवत का आयोजन मंदिर प्रबंधन की ओर से किया जाता है। मंदिर में हर रविवार को माई के भोग प्रसाद का वितरण भी किया जाता है।

नगर के तमाम व्यापारी अपने नए कार्य की शुरुआत करने से पहले मां भद्रकाली का आशीर्वाद लेने आते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी हर साल नए वर्ष मां भद्रकाली का आशीर्वाद लेने आते थे।

दर्शन का समय   मंदिर भक्तों के दर्शन के लिए सुबह 6 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक खुला रहता है। सुबह की आरती 8.30 बजे और रात्रि की आरती 9.00 बजे होती है। मंदिर की व्यवस्था रामबली प्राग तिवारी ट्रस्ट और बृजलाल अवस्थी और उनका परिवार देखता है।  ( http://www.bhadrakalimaa.com/ )
भद्रकाली मंदिर के भवन का आकार बड़ा नहीं है। दरअसल भद्र फोर्ट के विशाल द्वार से लगे आजमखानी सराय के भवन के एक कमरे में मंदिर स्थापित है। मंदिर को देखकर ये प्रतीत होता है कि प्राचीन भद्रकाली मंदिर कहीं और रहा होगा। आजम खान सरायका निर्माण 1637 में हुआ था। आजम खान मुगल शासकों का गवर्नर था। बताया जाता है कि मराठा शासन के समय इस सराय के एक कमरे में मां भद्रकाली की मूर्ति स्थापित की गई।  

मंदिर के आसपास बाजार - भद्रकाली मंदिर के आसपास दिन भर सुंदर बाजार सजा रहता है। यहां पर खास तौर पर आर्टिफिशियल जूलरी और महिलाओं के उपयोग की जाने वाली सामग्री की दुकानें सजी रहती हैं। भरी दोपहरी में भी यहां ग्राहकों की भीड़ रहती हैं। पर शाम को यही बाजार बदल जाता है। शाम को यहां स्ट्रीट फूड के स्टाल लग जाते हैं। पूरे अहमदाबाद शहर के लोग यहां अलग अलग किस्म का स्वाद लेने के लिए पहुंचने लगते हैं।

यूको बैंक की बिल्डिंग - भद्रकाली मंदिर और तीन दरवाजा के बीच यूको बैंक की ऐतिहासिक बिल्डिंग है। स्वतंत्रता से पूर्व के इस भवन के एक हिस्से को संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। इस भवन के बेसमेंट को बैंक प्रबंधन ने बाद में रिस्टोर किया और उसे संग्रहालय का रूप दिया है। अगर आपकी बैंकिंग में रूचि है तो इसे देख सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( BHADRA KALI TEMPLE, AHMADABAD )  

Wednesday, June 26, 2019

अहमदाबाद का विशाल भद्रा फोर्ट और तीन दरवाजा


जाली मसजिद देखने के बाद टहलते हुए हमलोग भद्रा फोर्ट के पास पहुंच गए हैं। यह पुराने अहमदाबाद शहर का सिटी सेंटर है। भद्रा फोर्ट के ऐतिहासिक किले के हिस्से को देखने के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। पर यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इमारत है। यहां मौजूद स्टाफ आपका पहचान पत्र देखने और रजिस्टर में नाम पता दर्ज करने के बाद अंदर जाने की अनुमति दे देता है।


भद्रा फोर्ट पुराने अहमदाबाद शहर का प्रमुख आकर्षण है। इसका निर्माण 1411 ई में हुआ। यह दीवारों से घिरे पुराने अहमदाबाद शहर का प्रमुख आकर्षण है। इसका निर्माण अहमदशाह प्रथम ने कराया था। साल 2014 में इसके बेहतर रखरखाव के लिए अहमदाबाद नगर निगम और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसकी मरम्मत कराई गई।

भद्रा फोर्ट वास्तव में अहमदशाह द्वारा बनाए गए किले का मुख्य प्रवेश द्वार है। आकार में यह काफी विशाल है। इस पर कई निगरानी टावर बने हुए हैं। इसके निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। अहमदाबाद शहर का नाम अहमदशाह प्रथम के नाम पर रखा गया था। उसका शासन काल 1411 से 1442 तक रहा। मिराती ए अहमदी नामक ग्रंथ में इसका नाम अराक फोर्ट मिलता है। पर पास में बने भद्रकाली मंदिर के नाम पर इसे भद्रा फोर्ट भी कहा जाता रहा।

वैसे अहमदशाह द्वारा बनाए गए किले में कुल आठ दरवाजे हुआ करते थे। इसमें तीन दरवाजों का आकार काफी बड़ा था। मानेक चौक पर स्थित भद्रा फोर्ट का मुख्य दरवाजे के दो तरफ विशाल गोल संरचना बनी है। बीच में किले में प्रवेश के लिए द्वार है। हालांकि इसमें अंदर जाने पर आगे का रास्ता अब बंद दिखाई देता है। द्वार के पास से ऊपर जाने के लिए घुमावदार सीढ़ियां बनी हुई हैं। मुख्य द्वार पर लकड़ी का विशाल दरवाजा लगा है। ये द्वार इतना बड़ा है कि इससे हाथी और ऊंट भी आसानी से प्रवेश कर सकते हैं।

अंदर के पीर की दरगाह भी है। हजरत मियां पीर अली शहीद की दरगाह है यहां जहां लोग मन्नत मांगने आते हैं। भद्र फोर्ट को छत पर जाने के बाद अहमदाबाद शहर का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। भद्रा फोर्ट की उंचाई से अहमदाबाद जिला पंचायत की विशाल गोल इमारत नजर आती है। यहां से आप आसपास के बाजारों का नजारा कर सकते हैं। किले की छत पर कुछ छोटे छोटे कमरे बने हुए हैं जो संभवतः संतरियों के रहने के लिए होंगे। किले के मुख्य द्वार के ऊपर 1849 में डायल वाली विशाल घड़ी लगवाई गई। इसमें दूर से ही शहर के लोग समय देख सकते थे। तो एक तरह से यह घंटाघर का काम भी करने लगा था। 
ब्रिटिश सरकार ने 1817 में अहमदाबाद शहर पर कब्जा कर लिया था। तब फोर्ट के इलाके का इस्तेमाल जेल के तौर पर भी किया जाने लगा था।

सामने तीन दरवाजा - भद्र फोर्ट से कोई 400 मीटर दूरी पर सामने तीन दरवाजा नजर आता है। इसमें तीन मेहराबदार द्वार हैं। इनका निर्माण भी 15वीं सदी में ही कराया गया था। इसके नाम पर ही ये इलाका तीन दरवाजा कहलाता है।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( BHADRA FORT, AHAMDABAD, TEEN DARWAJA )




Monday, June 24, 2019

अहमदाबाद शहर की पहचान - सीदी सैय्यद जाली मसजिद


जलाराम में नास्ते करने के बाद हमलोग चल पड़े हैं अहमदाबाद शहर घूमने। पिछली यात्रा में साबरमती,गांधीनगर, कांकरिया झील आदि सब कुछ देखा था। इस बार हमारी पहली मंजिल है सीदी सैय्यद जाली मसजिद। कालूपुरा पुलिस स्टेशन से रीलिफ रोड पर सीधे चलते हुए हमलोग जाली मसजिद के पास पहुंच गए हैं। जाली मसजिद भद्रा रोड पर इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के दफ्तर के पास स्थित है। पर आखिर जाली मसजिद क्यों। पिछले कुछ सालों में यह जाली मसजिद पूरी दुनिया में अहमदाबाद शहर की पहचान बन चुकी है।

अहमदाबाद शहर के ठीक बीचों-बीच लाल दरवाजा के पास बनी ये मस्जिद भारतीय-अरबी नक्काशी का बेजोड़ नमूना है। जाली मस्जिद को 1573 में बनवाया गया था। गुजरात सल्तनत (1407-1573) के आखिरी सुल्तान शम्स-उद-दीन मुजफ्फर शाह तृतीय के दौर में इस मस्जिद का निर्माण हुआ। मुजफ्फर शाह के जनरल सुलतान अहमद शाह बिलाल झाजर खान के सहयोगी सीदी सैय्यद ने इस मस्जिद को बनवाया था। सीदी सैय्यद यमन से गुजरात आया था। वह गरीबों का रहनुमा हुआ करता था।  इसी सीदी सैय्यद ने 1572 में ये मस्जिद बनवानी शुरू की थी। 1573 में ये मस्जिद बनकर तैयार हो गई।

क्यों नाम पड़ा जाली मसजिद - इस मस्जिद के पश्चिमी ओर की खिड़की पर संगमरमर पत्थदर को काट काट कर बनी जालियों पर अदभुत काम किया गया है जिसके कारण यह पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मस्जिद में लगी जाली में अनूठी कलाकारी की गई है। इन जालियों में पत्थर पर ताड़ के वृक्ष, पत्ते, बेल-बूटे की बारीक नक्काशी का काम है। अपनी इसी अनूठी और महीन कारीगरी के कारण यह विश्वभर में चर्चित हो गई है।

कुल दस जालियां - मसजिद आकार में बहुत बड़ी नहीं है पर यह अपनी जालियों का कारण ही प्रसिद्ध हो गई है। इस मस्जिद में कुल 10 जालियां हैं। इनमें से सात जालियों में पत्थर पर वृक्ष एंव पत्तियों की नक्काशी की गई है। जबकि तीन जालियां खुली हुई हैं। 12 स्तंभों पर टिकी मस्जिद के द्वार पर दो मीनार और अंदर 15 गुंबद बने हुए हैं। मस्जिद के पास ही सीदी सैय्यद की मजार बनी हुई है। उनका निधन 24 दिसंबर 1576 को हुआ था। जाली मसजिद में नियमित नमाज पढ़ी जाती है। किसी भी धर्म को मानने वाले मसजिद के अंदर जा सकते हैं। पर सिर ढकना जरूरी है।

आईआईएम के लोगो की प्रेरणा - कहा जाता है कि आईआईएम, अहमदाबाद का लोगो बनाने की प्रेरणा इसी मस्जिद की जाली से मिली थी। जब अंग्रेज़ भारत में काबिज हो गए तो उन्होंने इस मस्जिद की एक जाली निकाल ली थी और उसे ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखवा दिया था। पर वे बाकी जालियां नहीं निकलवा सके।

ब्रिटिश काल में इस मसजिद का इस्तेमाल एक दफ्तर के तौर पर किया जाता था। पर अब यह आस्था का केंद्र है। मसजिद के बाहर वजू करने के लिए छोटा सा हौज बना है। यहां पर कबूतर मंडराते नजर आते हैं। मसजिद की देखभाल अहमदाबाद सुन्नी मुस्लिम वक्फ कमेटी करती है।

जापान के पीएम को दिखाई मसजिद - बुलेट ट्रेन की आधा‍रशिला रखने के लिए जब जापान के पीएम शिंजो आबे सितंबर 2017 में अहमदाबाद आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें शहर की प्रसिद्ध सीदी सैय्यद मस्जिद लेकर आए थे। इस दौरान वह खुद जापानी पीएम के गाइड भी बने थे।

इस्लामिक विरासत के कारण अहमदाबाद बना हेरिटेज सिटी
जाली मसजिद समेत अहमदाबाद शहर की अन्य प्रमुख इस्लामिक विरासत को पेश कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और गुजरात सरकार की ओर से यूनेस्को द्वारा अहमदाबाद को विश्व विरासत का शहर घोषित करने का दावा किया गया था। कई साल से चल रही दावेदारी के बाद जुलाई 2017 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी के 41वें सेशन में इसे भारत के पहले वैश्विक धरोहर वाले शहर के रूप में मान्यता दी गई। विश्व धरोहर शहर बनने में सैकड़ों वर्षों से इस्लामिक, हिंदू और जैन समुदायों के एक धर्मनिरपेक्ष सह-अस्तित्व वाली पहचान मुख्य आधार बनी। तो आइए हम इस गंगा-जमुनी तहजीब को बचाए रखें।

-       विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( JALI MASJID, AHMADABAD ) 

Saturday, June 22, 2019

वडोदरा से अहमदाबाद डीएमयू से और जलाराम के पराठे



वडोदरा से हमलोग अहमदाबाद की राह पर हैं। अगर आप रेलवे स्टेशन के पास होटल बुक करते हैं तो यही लाभ है कि सुबह सुबह भी बिना आटो टैक्सी बुक किए अगली ट्रेन पकड़ सकते हैं। सुबह सुबह 5.55 बजे वडोदरा से डीएमयू ट्रेन अहमदाबाद के लिए जाती है। हम इसमें बिना आरक्षण के सफर करने वाले हैं। 

हम टिकट काउंटर पर पहुंच गए हैं। पर वहां जानकारी मिलती है कि ट्रेन अहमदाबाद से दो स्टेशन पहले वटवा में ही खत्म हो जाएगी। खैर हमने वटवा तक का ही टिकट ले लिया और प्लेटफार्म नंबर पांच चलने को तैयार डीएमयू में जाकर बैठ गए। वटवा के बाद मणिनगर फिर अहमदाबाद जंक्शन आता है। यह अहमदाबाद से आठ किलोमीटर पहले का स्टेशन है।

नैरो गेज का कोच - वडोदरा रेलवे स्टेशन पर नैरो गेज का कोई अस्तित्व नहीं है। पर वडोदरा के नैरोगेज की समृद्ध विरासत को याद दिलाने के लिए स्टेशन के बाहर नैरोगेज का एक पैसेंजर कोच स्थापित किया गया है जो आते जाते लोगों को दिखाई देता है।

अहमदाबाद डीएमयू समय पर चल पड़ी है। यह सारे स्टेशनों पर रुकती है पर इसकी गति तेज है। किसी एक्सप्रेस ट्रेन जैसी है। सफर में हमारी मुलाकात गुजराती लोगों से होती है। एक सज्जन मिले कंप्यूटर के प्रोफेसर हैं। आगे आनंद में उतर गए। हमारी ट्रेन नाडियाड जंक्शन पर कुछ ज्यादा ही रुक गई। यहां लिखा है कि कपडवंज, मोडासा और भादरण के लिए रेलगाडी बदलें। 

पर आजकल नाडियाड भादरण नैरो गेज रेल मार्ग बंद हो चुका है। इस मार्ग को ब्राडगेज में बदलने का काम जारी है। पर अभी नैरो गेज के कोच स्टेशन पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। आगे एक स्टेशन दिखाई दिया गैरतपुर। वटवा स्टेशन पर ट्रेन खत्म हो गई। यह अहमदाबाद शहर का बाहरी औद्योगिक क्षेत्र है। स्टेशन पर कोई खास सुविधा नहीं है। पास सड़क से संपर्क भी नहीं है।

कोई आधा किलोमीटर पैदल चलने के बाद सड़क पर हम पहुंचे। यहां से आटो रिक्शा बुक किया कालूपुरा रेलवे स्टेशन के लिए। दरअसल हमने जो होटल बुक किया है, वह अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के पास है। आटो रिक्शा अहमदाबाद शहर के व्यस्त सड़कों से आगे बढ़ रहा है। हम मणिनगर से होकर गुजर रहे हैं। मणिनगर रेलवे स्टेशन की इमारत नजर के समाने है। 

मणिनगर विधानसभा क्षेत्र भी है। कुछ देर के सफर के बाद अहमदाबाद रेलवे स्टेशन की बिल्डिंग आ गई। पर हमारा होटल स्टेशन के आधे किलोमीटर की दूरी पर है। रीलिफ रोड पर होटल नियाग्रा। जाकरिया मसजिद से आगे और कालूपुरा पुलिस स्टेशन से पहले है ये होटल। रेलवे स्टेशन के सामने रीलिफ रोड व्यस्त बाजार वाला इलाका है। पर तमाम मध्यम दर्जे के होटल इसी रोड पर हैं। होटल ने पहली मंजिल पर हमें बड़ा कमरा दे दिया है। सामान जमाकर हमलोग नास्ता करने के लिए निकल पड़े। 


आसपास के लोगों ने बताया कि जलाराम ठीक रहेगा। रीलिफ रोड पर जलाराम अहमदाबाद का लोकप्रिय और पुराना भोजनालय है। सुबह के नास्ते में उनके पराठे शानदार हैं। पराठे के साथ दही। बिल्कुल पंजाबी पराठे हैं जी। हमारे जैसे लोग दो पराठा खा लें तो दिन भर कुछ खाने की जरूरत ही नहीं। वैसे जलाराम में दोपहर का और रात का खाना भी मिलता है। यह अहमदाबाद खरीददारी करने आने वाले व्यापारियों की भी पहली पसंद है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( VADODRA TO ADI, VATVA, MANINAGAR, HOTEL NAIGRA, JALARAM RESTAURANT ) 

आगे पढ़िए: सीदी सईद की जाली मसजिद 

Thursday, June 20, 2019

गुजरात में पंजाबी स्वाद और जगदीश फरसाण


बात वडोदरा शहर के खाने पीने की। सयाजीगंज में अपने प्रूडेंट होटल के पास हमने एक सुंदर रेस्टोरेंट देखा। टेस्ट ऑफ पंजाब। क्या गुजरात में पंजाब जी हां। सही है। जैसे जसबीर जस्सी का गाना आया था दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी...तो गुजरात में पंजाबी खाने का रेस्टोरेंट क्यों नहीं हो सकता। 

टेस्ट ऑफ पंजाब का डेकोरेशन बड़ा सुंदर है। इसे पंजाब के ग्राम्य परिवेश वाला लुक देने की पूरी कोशिश की गई है। बाहर एक विशाल ट्रक की पेंटिंग लगी है। अंदर की दीवारें भंगड़ा और गिद्दा के नृत्य से गुलजार हैं। कहीं खाट लगा है तो कहीं मचिया। खाने पीने के बरतन परंपरागत है। दीवारों  पर मिट्टी का लेप लगा है। तो यहां बैठना भी आनंद दायक है। और खाने पीने का स्वाद भी मजेदार। इन सबके बाद खाने पीने की दरें भी किसी समान्य रेस्टोरेंट जैसी ही हों तो खाने का आनंद और भी बढ़ जाता है। रेस्टोरेंट बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के मिनिरल वाटर भी पेश करता है।

इससे पहले की वडोदरा यात्रा में हमने स्टेशन के पास इंदिरा भवन और गायत्री भवन में खाने का मजा लिया था। इस बार भी हम उन रेस्टोरेंट में गए। वे रेलवे स्टेशन के सामने ही हैं।

 न्याय मंदिर के आसपास हमने स्थानीय गुजराती व्यंजनों का आनंद लिया। यहां पर होटल लारीलप्पा में भी पंजाबी थाली ही मिलती है। मतलब वडोदरा में आप पंजाबी थाली कई जगह आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

अरबी के पत्ते का पकौड़ा - जैसा घर में अरबी के पत्ते का सब्जी हम बिहार में बनाते हैं, वैसी सब्जी हमें वडोदरा के एमजी रोड के बाजार में बिकती हुई दिखाई दी। दुकानदार ने हमें टेस्ट करने का भी आफर दिया। हमने पहले की यात्रा में दाबेली खूब खाई पर इस बार सेव को मसाले के साथ मिलाकर अलग तरह के चाट का आनंद भी लेने का मौका मिला। वडोदरा रेलवे स्टेशन के आसपास आप कई तरह के खाने पीने का स्वाद ले सकते हैं।  

बड़ौदा शहर और जगदीश फरसाण - जगदीश फरसाण की बात करें। जगदीश फरसाण वडोदरा की प्रसिद्ध नमकीन वाली दुकान है। पूरे वडोदरा शहर में उनकी कई दुकाने हैं। इनमें से कई तो रेलवे स्टेशन के आसपास ही हैं। यहां पर किस्म किस्म के लड्डू भी बिकते हुए दिखाई दिए। वे तमाम तरह के नमकीन और भाखरवाडी का निर्माण करते हैं। उनके उत्पाद उनके नाम पर बिकते हैं। खट्टा मीठा, सोलापुरी मिक्स, मद्रासी मिक्स सब कुछ। जो आप मांगे मिल जाएगा। जगदीश फरसाण सिर्फ वडोदरा ही नहीं सूरत, भरूच, आनंद समेत गुजरात के तमाम शहरों में हैं। अब उनका ऑनलाइन कारोबार भी शुरू हो चुका है। (http://jagdishfarshan.com/) जगदीश फरसाण का कारोबार 1938 में आरंभ हुआ। इसके संस्थापक राजा रतनलाल केशवलाल कानदोई थे। बड़ौदा में एक छोटी सी जगह से शुरू हुआ उनका कारोबार अब बड़ा रुप ले चुका है। गुजराती में फरसाण नमकीन या स्नैक्स को संदर्भित करता है।

फरसाण गुजराती व्यंजनोंराजस्थानी व्यंजनों और सिंधी व्यंजनों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन्हें विशेष अवसरों पर और मेहमानों के स्वाद के लिए तैयार किया जाता है। इसका आप चाय के साथ भी आनंद ले सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि फरसाण सिंधी का शब्द है। यह फारस से बना लगता है। तो कभी वडोदरा आएं तो खरीदें नमकीन चिवडा और भाखरवाड़ी।अभी बस इतना ही। पढ़ते रहिए दानापानी,  आगे चलेंगे अहमदाबाद. 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( JAGDISH FARSAN, VADODARA ) 

Tuesday, June 18, 2019

वडोदरा का न्याय मंदिर और बाजार


दिन भर महल घूमने के बाद शाम को हमलोग एक बार फिर घूमने के लिए तैयार हैं। पर अनादि तैयार नहीं हैं। वे होटल में ही आराम फरमाना चाहते हैं। तो मैं और माधवी निकल पड़ते हैं  वडोदरा के बाजार में घूमने के लिए । स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां का मुख्य बाजार न्याय मंदिर के आसपास है। हमलोग शेयर्ड आटो से न्यायमंदिर पहुंच जाते हैं। ये न्याय मंदिर क्या है। दरअसल न्याय मंदिर का मतलब वडोदरा की अदालत। यह विशाल और खूबसूरत इमारत है जो रात की रोशनी में दमक रही है।

न्याय मंदिर के पास ही विशाल झील है। इस झील का  नाम सुरसागर झील है। इस झील के अंदर नीलकंठ महादेव यानी शिव की विशाल प्रतिमा लगी है। यह बाजार के लिहाज से वडोदरा का दिल है। इसके पास ही प्रताप टाकीज है जो वडोदरा का प्रमुख पुराना सिनेमा घर है। हालांकि प्रताप सिनेमा का मल्टीप्लेक्स के दौर में वो गौरव नहीं रहा। पर कभी यह शहर का लोकप्रिय सिनेमाघर हुआ करता था।

इसके आसपास पद्मावती कांप्लेक्स और एमजी रोड का इलाका है। इन बाजारों खूब भीड़ है। पद्मावती कांप्लेक्स के पास एक खाने पीने वाले होटल से टकराया वे लोगों को रोक रोक कर अपने यहां खाने के लिए बुला रहे थे। हमने यहां पर खाना तो नहीं खाया पर इस होटल का नाम दिलचस्प था। नाम था होटल लारीलप्पा।  

हाथी दांत के बने सामान – हमलोग एमजी रोड पर चलते हुए हीरा लाल रतीलाल खंबात वाला की दुकान पर जा पहुंचे हैं। छोटी सी दुकान पर इसको एक ही परिवार के चार सदस्य मिलकर चला रहे हैं। इसके साइन बोर्ड पर लिखा है कि हाथी दांत के बने समान। हालांकि वे और भी कई तरह की आर्टिफिशियल जूलरी बेचते हैं। पर जहां तक मैं जानता हूं कि देश में हाथी दांत के बने सामान की बिक्री अब प्रतिबंधित है। पर वे बताते हैं कि अभी भी गांव के लोगों के पास हाथी दांत के बने सामान हैं। वे लेकर आते हैं तो हम उन्हें खरीद लेते हैं। फिर उस पुरानी जूलरी से नई जूलरी बनाकर बेचते हैं। पूरा परिवार कई तरह की जूलरी बनाने में निष्णात है। कमाल है। आपको गुजरातियों की व्यापारिक बुद्धि और उनकी व्यवहार कुशलता का कायल तो होना ही पड़ेगा।  

झूलेलाल का मंदिर – न्याय मंदिर के आसपास घूमते हुए हमें झूलेलाल साहेब का मंदिर नजर आता है। मतलब है कि यहां सिंधी समाज के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। इसलिए उनका भी मंदिर है।
खादी मेले में दिखाई दे गया तेल निकालने वाला कोल्हू। 

गुजरात और खादी की बात - कीर्ति स्तंभ के पास ही खादी और ग्रामोद्योग की प्रदर्शनी लगी हुई है। यहां पर गुजरात के हर जिले से शिल्पी और खादी  ग्रामोद्योग से जुड़े उत्पाद आए हुए हैं। यहां पर मैंने बिजली से चलने वाला कोल्हू भी देखा। यहां पर सारे स्टाल का मुआयना करने के बाद मैंने खादी के रुमाल समेत ग्रामोद्योग के कुछ उत्पादों की खरीददारी भी की।  प्रदर्शनी में कई तरह की देसी दवाएं भी मिल रही हैं। एक घंटे तक प्रदर्शनी का मुआयना करने के बाद हम आगे के लिए निकल पडे। चलते चलते बड़ौदा बस स्टैंड के अंदर बने मॉल की दुकानों में भी हमने फुटकर शॉपिंग कर डाली।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( NAYAY MANDIR, VADODRA PRATAP TALKEES ) 

Sunday, June 16, 2019

फतेह सिंह संग्रहालय – दुनिया को चित्रों में देखें , महसूस करें


लक्ष्मी विलास पैलेस घूम लेने के बाद हमारी अगली मंजिल है महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय। इसका टिकट हमने पहले से ही ले रखा है। दोनों संग्रहालय का टिकट साथ लेने पर थोड़ा सा डिस्काउंट मिल जाता है। महल से फतेह सिंह संग्रहालय जाने के लिए तकरीबन आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इस रास्ते में खूब हरियाली है। ताड़ के पेड़ हैं। मोर नृत्य करते हुए दिखाई दे रहे हैं। रास्ते में बड़ोदा जिमखाना क्लब और बड़ौदा गोल्फ क्लब दिखाई दे जाते हैं। 



बागनवेलिया के गुलाबी फूलों और बेहद सुंदर पीले फूलों के रास्ते से हम आगे बढ़ रहे हैं। बड़ौदा रियासत अपने संपदा का व्यसायिक इस्तेमाल खूब कर रहा है। महल के परिसर में मैरेज लॉन बना दिया गया है। इसकी शादी विवाह के लिए बुकिंग होती है। परिसर में एक बच्चों का स्कूल भी है। इसमें शहर के संभ्रांत परिवारों के बच्चे पढ़ने आते हैं। पर चलिए संग्रहालय में प्रवेश से पहले हम एक अनूठी चीज पर नजर डालते हैं। वो है रेलवे विरासत से जुड़ी हुई...


दुनिया का सबसे छोटा स्टीम लोकोमोटिव
पर फतेह सिंह संग्रहालय में प्रवेश से पहले थोड़ी चर्चा एक अनूठी रेलगाड़ी के बारे में। हमारी नजरों के सामने द फ्लाइंग स्काट्समैन नामक नन्ही सी स्टीम इंजन है। बात सन 1941 की है महाराजा प्रताप सिंह अपने बच्चों के लिए एक तोहफा लेकर आए । यह लंदन मेंचलने वाली ट्रेन द फ्लाइंग स्कॉट्समैन का छोटा रूप था। यह राजकुमारों को महल में घुमाया करता था। इसके लिए लक्ष्मी विलास महल में तीन किलोमीटर का ट्रैक बिछाया गया था। इस मिनिएचर ट्रेन का सफर महल से प्रिंसेज स्कूल तक चलता था।

 अब उस प्रिंसेज स्कूल को ही महाराजा फतेह सिंह म्युजियम बना दिया गया है। महल तक लौटने से पहले इस ट्रेन का मार्ग महल के बागीचे से होकर गुजरता था। इस ट्रेन में कुल तीन डिब्बे हुआ करते थे। इसमें कुल 30 बच्चे बैठ सकते थे।  सन 1941 में महाराजा रंजीत सिंह गायकवाड के तीसरे जन्मदिन पर इस ट्रेन ने अपना पहला सफर किया था। इस ट्रेन का निर्माण 1936 में एसबी एंड सीआर नामक कंपनी ने किया था। यह मूल रूप से हार्वेस्टर लोकोमोटिव का प्रोटोटाइप था। 

ऐसे इंजनों का संचालन लंदन और नार्थ इस्टर्न रेलवे में हुआ करता था। मूल हार्वेस्टर लोकोमोटिव ब्रिटेन के प्रसिद्ध फ्लाइंग स्काट्समैन ट्रेन को खिंचता था। सन 1940 के आसपास ब्रिटेन में फ्लाइंग स्काट्समैन काफी लोकप्रिय ट्रेन हुआ करती थी। यह ट्रेन लंदन से इडिनबर्ग के बीच चलती थी। तो उसके नाम पर ही इस प्रोटोटाईप खिलौना गाड़ी को यह नाम दिया गया।   

पर 1956 में इस ट्रेन के बड़ौदा के आम बच्चों के लिए दे दिया गया। इसकी ट्रैक को महल से हटाकर सयाजीबाग में बिछाया गया। इसका संचालन वजोदरा महानगर सेवा सदन करने लगा। यह 1993 तक सयाजीबाग में बच्चों का मनोरंजन करता रहा। पर 1993 में इसके लोकोमोटिव का बायलर खराब हो गया। तब 2001 में इसके मूल इंजन को फिर से महल में लाकर संरक्षित करके रख दिया गया। तो महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय के पास आने वाले लोग दुनिया के लघुतम स्टीम इंजन का दीदार कर सकते हैं।

तो अब चलते हैं संग्रहालय के अंदर। महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय का भवन दो मंजिला है। खास तौर पर संग्रहालय के अंदर बेशकीमती पेंटिंग का संग्रह है। फतेह सिंह संग्रहालय में राजा रवि वर्मा के अलावा कुछ विदेशी कलाकारों की प्रसिद्ध पेंटिंग का भी संग्रह है। 
अदभुत 3डी पेंटिंग - 
इसमें इटालियन पेंटर ए फीलीसी की चित्रकला देखी जा सकती है। यहां पर आप एक 3डी पेंटिंग भी देख सकते हैं। यह दो अलग अलग सिरों से देखने पर अलग अलग दिखाई देती है। यह बड़े अचरज की बात है कि जिस जमाने में 3डी के बारे में हम नहीं जानते थे, तब कलाकार ने इस तरह की पेंटिंग कैसे बनाई होगी। 

न्यूड मूर्तियों और चित्रकला का विशाल संग्रह - 
इस संग्रहालय में न्यूड मूर्तियों का संग्रह भी बड़ी संख्या में है। पर उनकी कलात्मकता ऐसी है कि वे उत्तेजक नहीं प्रतीत होतीं। यहां आप दुनिया के प्रमुख शहरों को पेटिंग में देख सकते हैं। इसमें स्वीटजरलैंड की झील, समंदर की लहरें आदि को पेटिंग में दिखाया गया है। दुनिया के सुंदरतम शहरों में शुमार वेनिस को पेंटिंग में देख सकते हैं। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी बिल्कुल निषिद्ध है। पर ये संग्रहालय देश के कला प्रेमियों के लिए मक्का है। मूर्ति और चित्रकला के छात्र यहां अध्ययन के लिए पहुंचते हैं।  

-       विद्युत प्रकाश मौर्य   
( MAHARAJ FATEH SINGH, NUDE PAINTINGS  )