Tuesday, May 7, 2019

संत तुकाराम का गाथा मंदिर – देहु रोड, पुणे

पुणे शहर में मराठी को दो महान संतों के स्मृति स्थल हैं। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम। एक दिन में हम इन दोनों संतों के स्मृति स्थलों का दर्शन करेंगे। 
आलंदी में संत ज्ञानेश्वर की पवित्र धरती पर कुछ घंटे गुजारने के बाद हमलोग अब मराठी के एक और महान विभूति संत तुकाराम की स्मृतियों को नमन करने निकल पड़े हैं। पुणे के देहु रोड में संत तुकाराम की याद में विशाल गाथा मंदिर बना है। तो हमारी अगली मंजिल है देहु रोड। आलंदी के भीड़ चीरते हुए हमारी एक्टिवा आगे बढ़ रही है। आलंदी से गाथा मंदिर देहु रोड जाने के लिए हमलोग एक बार फिर गूगल मैप्स के भरोसे हैं। 

गूगल बाबा जैसे जैसे वह रास्ता बताते जा रहे हैं। हम वैसे ही चलते जा रहे हैं। पर हमें अब थोड़ी भूख भी लगी है। पर को ढंग का रेस्टोरेंट नजर नहीं आ  रहा है।  एक रेस्टोेंरेट में रूके तो उसकी मीनू जमा नहीं तो आगे चल पड़े।  आलंदी से कुछ किलोमीटर चलने बाद दाहिनी तरफ की सड़क देहु रोड का रास्ता बता रही है। यहां कोने में येवले अमृत तुल्य चाय का पार्लर नजर आया। वैसा ही पार्लर जैसा कोल्हापुर में दिखाई दिया था। इस रास्ते में हमें आलंदी में श्री गजानन महाराज संस्थान का अतिथि गृह नजर आता है।

हमें भूख लग रही है तो हमें न्यू चौधरी ढाबा में खाने के लिए रुक जाते हैं। इस पंजाबी ढाबा में बैठने के लिए खाट लगी है। यह किसी लाइन होटल जैसा है। इस तरह खाट पर बैठकर खाना अनादि के लिए कुछ नया अनुभव रहा। ये ढाबे वाले जम्मू के रहने वाले हैं, पर पुणे में आकर ढाबा चला रहे हैं। 


खाने के बाद हमारी एक्टिवा एक बार फिर फर्राटे भर रही है। पुणे नासिक रोड को पार करने के बाद हमलोग देहु में पहुंच गए हैं। देहु से बायीं तरह गाथा मंदिर का रास्ता बताया जा रहा है। यह पुणे का बाहरी इलाका है। आबादी का घनत्व कम है। हरे भरे खेत नजर आ रहे हैं। पर इनमें प्लाटिंग करके धीरे धीरे आवासीय कालोनियां खड़ी होती नजर  रही हैं। हमलोग देहु रोड पहुंच गए हैं। 





सत्रहवीं सदी के महान संत कवि - तुकाराम 

महान संत तुकाराम को समर्पित गाथा मंदिर इंद्रायणी नदी के तट पर ही बना हुआ है। संत तुकाराम (1598-1650) सत्रहवीं शताब्दी एक महान संत कवि थे जो भारत में लंबे समय तक चले भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे। तुकाराम का जन्म पुणे जिले के देहू नामक ग्राम में 1598 में हुआ। उनका निधन 19 मार्च 1650 को देहु में ही हुआ।

इनके माता-पिता का नाम कनकाबाई और बोलोजी था। यह तीन भाई थे- सावजी, तुकारामजी और कान्हजी। तुकारामजी का बारह व़र्ष की आयु में विवाह हो गया। वधु का नाम रखुमाई था पर विवाह के बाद मालूम हुआ कि बहू को दमे की बीमारी है। इसलिए माता-पिता ने तुरंत ही इनका दूसरा विवाह जीजा बाई से करा दिया।

 तुकाराम पर 17 साल की उम्र में घर की जिम्मेवारी आ गई। उनकी दुकान थी और पारिवारिक कारोबार था। पर उसमें उनका मन कभी नहीं रमा। अपनी सरलता के कारण व्यापार में लोगों से ठगे जाते थे। अपनी कमाई से वे दीन दुखियों की मदद करने लग जाते थे। धीरे धीरे तुकाराम कारोबार छोड़कर दिन रात विट्ठल भक्ति में लीन रहने लगे। उन्होंने भगवान की भक्ति में अभंग की रचना की। संत तुकाराम को भी अपने समकालीन ब्राह्मणों का विरोध झेलना पड़ा। तब के पंडित नहीं चाहते थे गैर ब्राह्म्ण जाति के तुकाराम अभंग की रचना करें। तुकाराम के बारे में जहां तक ज्ञात है कि वे कुनबी (कुर्मी ) जाति से आते थे। हालांकि उनके परिवार वाले दुकानदारी करते थे। उनका परिवार बिठोबा (पंढरपुर) का भक्त था। सदा भक्ति में लीन रहने वाले तुकाराम महान संत बने। तुकाराम कहा जाता है कि संत तुकाराम को विट्ठल स्वामी ने बाल रुप में दर्शन दिए थे।

वारकरी संप्रदाय के शिखर संत -  तुकाराम यानी तुकोबा महाराष्ट्र वारकरी संप्रदाय के ही शिखर संत माने जाते हैं। दुनिया भर के भक्ति साहित्य में भी उनकी जगह असाधारण है। उनके अभंग का अंगरेजी भाषा में भी अनुवाद हुआ है। उनका काव्य और साहित्य रत्नों का खजाना माना जाता है।

संत तुकाराम की याद में देहू में इंद्रायणी नदी के तट पर विशाल गाथा मंदिर का निर्माण कराया गया है। यह मंदिर तीन मंजिला है। मंदिर को अष्टकोणीय वास्तु के अंतर्गत निर्मित किया गया है। मंदिर सात एकड़ के परिसर में है। इसका प्रांगण 35 हजार वर्ग फीट का है। मंदिर का शिखर 125 फीट ऊंचा है। मंदिर की दीवारों पर संत तुकाराम की वाणी ( अभंग) को लिखा गया है। यहां दीवारों पर संत तुकाराम के 4000 अभंग लिखे गए हैं। मंदिर के आंतरिक हिस्से में फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है।

गाथा मंदिर के पास इंद्रायणी नदी के तट पर सुंदर घाट  का निर्माण कराया गया है। गाथा मंदिर सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए भक्त निवास भी बना है। मंदिर प्रबंधन की ओर से गुरुकुल का भी संचालन किया जाता है। 

सन 1936 में संत तुकाराम की जीवन गाथा पर मराठी में फिल्म बनी। इसे प्रभात फिल्म कंपनी ने बनाया था। इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। वहीं 1965 में हिंदी में संत तुकाराम फिल्म बनी। इसमें साहू मोदक और अनीता गुहा की भूमिकाएं थीं।
n विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vidyutp@gmail.com 
( SANT TUKARAM, DEHU ROAD, INDRAWATI RIVER, PUNE ) 

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