Friday, May 3, 2019

आलंदी- मराठी के महान संत ज्ञानेश्वर की पुण्य भूमि


रविवार का दिन है और हमने पुणे में आलंदी जाने का तय किया है। रवि ने सलाह दी कि एक्टिवा से जाइए। तो मैं और अनादि एक्टिवा पर सवार हुए। अनादि ने गूगल मैप ऑन किया और हमलोग खराड़ी से आलंदी की ओर चल पड़े। एक्टिवा का सफर अच्छा रहा क्योंकि आलंदी से पहले इतना ट्रैफिक जाम मिला कि सार्वजनिक परिवहन से आते तो एक दिन में आलंदी, देहु रोड स्थित संत तुकाराम का गाथा मंदिर सब कुछ घूम पाना शायद संभव नहीं हो पाता। रविवार होने के कारण आलंदी में श्रद्धालुओं की भीड़ कुछ ज्यादा ही थी।

तो आपको बताएं कि हम आलंदी क्यों जा रहे हैं। पुणे के पास आलंदी में मराठी के महान संत ज्ञानेश्ववर की समाधि है। वैसे आप पुणे में आलंदी जाना चाहते हैं तो पुणे महानगर के मनपा से सीधी बस मिल जाएगी यहां के लिए। हमलोग एक्टिवा से खराड़ी से येरवडा पहुंचने के बाद जैसा गूगलबाबा ने बताया उसका अनुसरण करते हुए कैंटोनमेंट एरिया होते हुए आलंदी की तरफ बढ़ चले। आलंदी से तीन किलोमीटर पहले सड़क पर काफी जाम मिला। पर जैसे तैसे एक्टिवा को आगे निकालते रहे। 

आलंदी पहुंचने पर इंद्रायणी नदी का पुल पार करते ही दाहिनी तरफ नदी के किनारे बने सुंदर घाट और विशाल मंदिर दिखाई देता है। यहां पर हर तरफ श्रद्धालुओं की भीड़ और मेले जैसा माहौल नजर आ रहा है। एक जगह पार्किंग तलाश कर अपनी एक्टिवा पार्क पर हमलोग मंदिर की ओर बढ़ चले। पर इससे पहले जरा इंद्रायणी नदी के तट पर मुआयना करते चलें। एक नन्ही सी बालिका ने हम दोनों के लालट पर सुंदर सा टीका लगा दिया। ये वही इंद्रायणी नदी का तट है जहां संत ज्ञानदेव और उनके दो भाई और एक बहन का बचपन बीता। यहीं वे क्रूर समाज से लड़ते रहे। इसी नदी के जल में उनके माता-पिता ने रुढ़िवादी ब्राह्मण समाज से लड़ते हुए जल समाधि ले ली थी।
   
संत ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र तेरहवीं सदी के एक महान सन्त थे जिन्होंने मराठी के श्रेष्ठ ग्रंथ ज्ञानेश्वरी की रचना की। वे कुल 21 साल ही इस धरती पर रहे, पर अपने धार्मिक संदेश और रचनाओं से माराठी समाज में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। हालांकि वे ब्राह्मण कुल में जन्में थे पर उनके पिता को और उन्हें जीवन भर महाराष्ट्र के रुढ़िवादी ब्राह्मण विद्वानों से संघर्ष करना पड़ा।

संत ज्ञानेश्वर की गणना भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में होती है। ये संत नामदेव के समकालीन थे और उनके साथ इन्होंने पूरे महाराष्ट्र का भ्रमण कर लोगों को ज्ञान-भक्ति से परिचित कराया और समतासमभाव का उपदेश दिया।

संत ज्ञानेश्वर का समाधि मंदिर - आलंदी में संत ज्ञानेश्वर का समाधि मंदिर है। जहां संत ज्ञानेश्वर ने युवावस्था में ही समाधि ले ली थी। वहां बाद में विशाल मंदिर बनाया गया है। अब देश भर लोग इस मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु पहले इंद्रायणी नदी में स्नान करते हैं फिर मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस समाधि मंदिर का निर्माण 1570 में कराया गया। मंदिर का मुख्यद्वार जिसे महाद्वार कहते हैं 1750 में काशीराव शिंदे ने बनवाया था। इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। समाधि मंदिर के गर्भ गृह में एक शिला है जिसके श्रद्धालु लोग दर्शन करते हैं।

कार्तिक माह में बड़ा मेला - समाधि मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर इंद्रायणी नदी के तट पर ही एक बहुमंजिला ज्ञानेश्वरी मंदिर का निर्माण कराया गया।इस मंदिर में संत ज्ञानेश्वर के संदेशों को प्रदर्शित किया गया है। हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आलंदी में बहुत बडा मेला लगता है। यह दिन संत ज्ञानेश्वर के समाधि का दिन है।

हमलोग मंदिर के रास्ते में एक दुकान पर चप्पल जूते जमा करके दर्शन के लिए समाधि मंदिर की तरफ बढ़ गए। मंदिर में दर्शन के लिए लंबी लाइन है। हमलोग भी तकरीबन दो घंटे लाइन में लगे रहे। दर्शन के बाद हमने देखा मंदिर परिसर में विशाल धार्मिक चर्चा चल रही है। महान संत को नमन करते हुए हमलोग मंदिर से निकलकर बढ़ चले।

मंदिर का समय – संत ज्ञानेश्वर का समाधि मंदिर सुबह 6 बजे से रात्रि 11 बजे तक खुला रहता है। दोपहर में थोड़ी देर के लिए मंदिर बंद होता है। पर सुबह से लेकर दे रात तक मंदिर में श्रद्धालु दर्शन करते हैं।

कैसे पहुंचे – पुणे  रेलवे स्टेशन से आलंदी की दूरी 21 किलोमीटर है। चिंचवड से आलंदी 20 किलोमीटर जबकि देहू रोड से 15 किलोमीटर की दूरी पर है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(ALANDI, SANT GAYANESHWAR SAMADHI MANDIR) 


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