Wednesday, May 15, 2019

मुरुड का दत्ता मंदिर जिसमें समाहित हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश


मुरुड जंजीरा के कई आकर्षण हैं, पर उनमें से दत्त मंदिर भी एक है। ये मंदिर बाजार से एक किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ी पर है। यहां से शहर और समंदर का सुंदर नजारा दिखाई देता है।
यह मुरुड जंजीरा का सबसे प्राचीन मंदिर है। यह तकरीबन 350 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित है। मुरुड के दत्त मंदिर का स्थापना 1853 में हुई। इसकी स्थापना स्वामी ब्रह्मेंद्र ने की थी। ब्रह्मेंद्र स्वामी को स्थानीय लोग सिद्ध पुरुष मानते हैं। वे हिमालय से रामेश्वरम तक यात्रा करते हुए यहां पधारे थे। देश भर घूमने के बाद उन्होंने परशुराम क्षेत्र में अपना ठिकाना बनाया।

दत्त मंदिर में तीन सिर वाली मूर्ति स्थापित है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है। कोंकण क्षेत्र में तमाम स्थलों पर आपको दत्त मंदिर मिलते हैं। इसका मतलब है कि इस मंदिर में त्रिदेव समाहित हैं।
दत्त मंदिर के पहले पुजारी फाफे गुरुजी थे। कोंकण क्षेत्र के मंदिरों में दत्त मंदिर का बड़ा सम्मानित स्थान है। सन 1853 से ही इस मंदिर की देखभाल एक ट्रस्ट के जिम्मे है। मंदिर एक छोटी पहाड़ी (टेकरी ) पर स्थित है। इसलिए मंदिर तक जाने के लिए रास्ते का निर्माण कराया गया।


सन 1907 में मंदिर समिति ने एक बार फिर मंदिर परिसर का विकास करवाया। इसमें मुरुड के हिंदू समाज के लोगों ने अपना बढ़ चढ़ कर योगदान किया। एक बार फिर 1926-27 में लोगों ने मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार कराया।
दत्त मंदिर के आसपास हरे भरे पेड़ लगे हैं। खास तौ पर शाम या सुबह में आप मंदिर जाएं तो यहां से मुरुड शहर, समंदर का नजारा, कासा किला और जंजीरा किला सब कुछ देख सकते हैं। ऊपर से प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर नजारा किया जा सकता है।

अब मंदिर के आसपास के इलाके का भी सौंदर्यीकरण  कर दिया गया है। मंदिर तक जाने के लिए मोटर वाहन वाला रास्ता सन 2000 के बाद स्थानीय लोगों के प्रयास से बन सका है। मंदिर के पास वाहन की पार्किंग के लिए पर्याप्त इंतजाम है।

हर साल दत्त जयंती के मौके पर यहां तीन दिवसीय मेला लगता है। दत्त यात्रा का आयोजन होता है जिसमें दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं। इस मौके पर मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए भंडारा का भी आयोजन होता है।

सन 1935 से 1949 के बीच दत्त मंदिर की एक भक्त आनंदी बाई पेडणेकर ने मुरुड में दत्त मंदिर धर्मशाला का निर्माण करवाया।

कैसे पहुंचे – मंदिर पहुंचने के दो तरीके हैं। पहला वाहन से और दूसरा ट्रैकिंग करते हुए। अगर आपके पास समय है और ट्रैकिंग करने का शौक है तो पैदल चढ़ाई करते हुए मंदिर तक पहुंचे। ट्रैकिंग का मार्ग सड़क मार्ग से थोड़ा छोटा है। इस यात्रा में 350 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। मुरुड बस स्टैंड से आटो रिक्शा से अपने वाहन से मंदिर पहुंचा जा सकता है। अगर आप बाहर से आए हैं तो जाने और आने के लिए आटो रिक्शा आरक्षित कर लें।

हमलोग शाम को आटो रिक्शा आरक्षित करके दत्त मंदिर पहुंचे हैं। मंदिर परिसर में हमने आधा घंटा से ज्यादा गुजारा। आसपास के पेड़ पर चढ़कर अपने बचपन को याद किया। हमारे आटो के ड्राईवर ने हमें दूर मरुड डैम दिखाया जहां से शहर को पानी मिलता है। सुंदर शाम की सुमधुर यादें लेकर हम फिर लौट चले नीचे की ओर।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 E-mail vidyutp@gmail.com
(MURUD, DUTTA MANDIR)    


2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 112वीं जयंती - सुखदेव जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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