Friday, May 31, 2019

पावागढ़ के सात दिगंबर जैन मंदिर- कलात्मकता का नमूना

चंद्र प्रभु जैन मंदिर, पावागढ़। 

पावागढ़ की पहाड़ी पर कालिका माता के दर्शन के बाद हमलोग सीढ़ियां उतर रहे हैं। तभी हमारी नजर यहां के जैन मंदिरों पर पड़ती है। वास्तव में पावागढ़ में कई जैन मंदिर हैं। पर ये मंदिर लोगों की नजरों में ज्यादा नहीं आते। इनकी चर्चा कम होती है। तो आइए बात करते हैं इन कलात्मक जैन मंदिरों की।

गुजरात जैन धर्म का बड़ा केंद्र रहा है। इस प्रदेश के गिरनार पर्वत और पावागढ़ पर्वत पर बड़ी संख्या मं जैन मंदिरों का निर्माण हुआ था। गुजरात में जैन धर्म का दिगंबर पंथ ज्यादा शक्तिशाली था इसलिए पावागढ़ के सभी मंदिर दिगंबर पंथ के हैं।

पावागढ़  में कुल सात दिगंबर जैन मंदिर हैं तो 13वीं और 14वीं सदी के बने हुए हैं। ये मंदिर शांतिनाथ, पार्श्वनाथ, सुपार्श्वनाथ लवकुश चरण, चिंतामणि पार्श्वनाथ, आदिनाथ और चंद्रप्रभा को समर्पित हैं। पर इनमें से ज्यादातर जैन मंदिर रखरखाव नहीं होने के कारण बुरे हाल में हैं।
पावागढ़ पहाड़ी पर सुपार्श्वनाथ जैन मंदिर ।

कालिका माता के लिए जाते समय रोपवे के पास दाहिनी तरफ शांतिनाथ जैन मंदिर स्थित है। यह मंदिर भी अच्छे हाल में नहीं है। पर इसकी दीवारों की कलात्मकता देखने लायक है।
पावागढ़ रोपवे के समाप्ति स्थल पर बायीं तरफ चंद्रप्रभा दिगंबर जैन मंदिर स्थित है। एक चबूतरे पर बना छोटा सा जैन मंदिर कलात्मक है। पर यह अच्छे हाल में नहीं है।

सुपार्श्वनाथ जैन मंदिर पावागढ़ पहाड़ी पर स्थित मुख्य मंदिर है। पावागढ़ के जैन मंदिरों में यह सबसे कलात्मक जैन मंदिर दिखाई देता है। इसके मुख्य द्वार के आसपास कई गुंबद बने हुए दिखाई देते हैं। यहां पर बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मंदिर सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है।

लव कुश मंदिर - तेलिया तालाब से आगे कालिका माता मंदिर के रास्ते में लव कुश दिगंबर जैन मंदिर पड़ता है। हालांकि ये मंदिर आकार में बहुत बड़ा नहीं है। पर यह मंदिर सुव्यवस्थित है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम के पुत्र लव कुश को यहीं पर मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। उनकी याद में लव कुश जैन मंदिर बना है।

एक जगह जैन समाज द्वारा बोर्ड लगाकर पावागढ़ के जैन मंदिरों के बारे में जानकारी दी गई है। पर यहां जैन समाज का कोई प्रतिनिधि लगातार मौजूद नहीं होता।

कालिका माता मंदिर जाने के रास्ते में तमाम जगह जैन मूर्तियां भी दिखाई देती हैं। इन जैन मंदिरों की मौजूदगी देखकर लगता है कि पावागढ़ कभी जैन धर्म का बड़ा केंद्र रहा होगा।

आदिनाथ, पार्श्वनाथ और चिंतामणि जैन मंदिर रोपवे के पीछे के रास्ते पर स्थित हैं। पावागढ़ शहर में जैन समाज ने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए 50 कमरों वाली धर्मशाला का भी निर्माण करवा रखा है। इस धर्मशाला के अंदर भोजनशाला भी है। पावागढ़ पहाड़ी के सात जैन मंदिरों के अलावा नीचे चंपानेर गांव में भी दो दिगंबर जैन मंदिर हैं।

तेलिया तालाब और दुधिया तालाब  - पावागढ़ पहाड़ी पर तीन प्रमुख तालाब हैं। इनके नाम तेलिया तालाब चासिया तालाब और दुधिया तालाब हैं। वहीं चासिया तालाब के एक कोने पर लाकुलिश मंदिर स्थित है। यह मंदिर बहुत बुरे हाल में था। इसके अब पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित करने की कोशिश की गई है।


मकाई कोठार - पावागढ़ में रोपवे से चढ़ते समय हमें तीन गुंबद वाला गोदाम दिखाई देता है। इसका नाम मकाई कोठार है। यह सैनिकों के लिए अनाज रखने के लिए बनवाया गया था। मकई कोठार में आजकल कुछ नहीं रखा जाता है। पर आपको ये लिफ्ट से चढ़ते और उतरते समय दिखाई देता है।

कालिका माता मंदिर, पावागढ़ के जैन मंदिर के दर्शन के बाद हमलोग उड़न खटोले के पास लौट आए हैं। हमारे पास वापसी का टिकट है। काफी श्रद्धालु उड़न खटोले के बजाए सीढ़ियां चढ़कर भी कालिका माता तक पहुंचते हैं। वे अगर वापस उड़न खटोले से जाना चाहें तो वापसी का टिकट 85 रुपये में उपलब्ध है। 
-- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( DIGAMBAR JAIN TEMPLE OF PAWAGARH, CHAMPANER) 

Wednesday, May 29, 2019

शक्तिपीठ है चंपानेर का कालिका माता मंदिर


वडोदरा का रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड तो आसपास हैं। एयरपोर्ट की दूरी भी रेलवे स्टेशन से महज 4 किलोमीटर है। एयरपोर्ट रोड से आगे बढ़कर हमारी बस चंपानेगर के रास्ते पर दौड़ रही है। वडोदरा से चंपानेर की दूरी 45 किलोमीटर के करीब है। 

चंपानेर पावागढ़ गुजरात के पंचमहल जिले में पड़ता है। यहां वडोदरा या फिर गोधरा से आसानी से पहुंचा जा सकता है। वडोदरा से बस एक घंटे में पावागढ़ पहुंचा देती है। बीच में हालोल नामक शहर आता है। कभी हलोल भी विशाल और समृद्ध शहर हुआ करता था। यहां पर हमारी बस बस स्टैंड के अंदर जाकर थोड़ी देर रुकती है फिर वह पावागढ़ के मार्ग पर चल पड़ती है। चंपानेर का बस स्टैंड छोटा सा है। कोई चहल पहल नहीं है। ऐसा लग रहा हम किसी ठंडे शहर में आ गए हैं।

गुजरात का चंपानेर-पावागढ़ शहर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह अतीत में हिंदू, मुस्लिम और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। इसे यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में सन 2004 में सम्मिलित किया गया था। यहां पर बडे स्तर पर उत्खनन के बाद मिले जैन और इस्लामिक सांस्कृतिक धरोहर वाले स्थल देखे जा सकते हैं। पर हम पहले कालिका माता के मंदिर जाएंगे। पहले जीप फिर उड़न खटोले का सफर है। हमने उड़न खटोले का टिकट बस स्टैंड में बने काउंटर से ही ले लिया है।

पावागढ़ बस स्टैंड से कालिका माता मंदिर तक जाने के लिए शेयरिंग जीप चलती है। यह जीप कालिका माता मंदिर के प्रवेश द्वार तक ले जाती है। हमलोग एक जीप में बैठ गए जो तुरंत ही भर गई। बस स्टैंड से आगे का रास्ता पहाड़ों पर चढ़ाई वाला है। पर रास्ते में मनोरम नजारे दिखाई देते हैं।

जीप हमें मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले उतार देती है। यहां से मंदिर तक जाने के दो तरीके हैं। आप उड़न खटोला से जाएं या फिर सीढ़ियां चढ़ते हुए। पदयात्रा का रास्ता काफी लंबा है। हमलोग उड़नखटोला का टिकट ले चुके हैं। उड़न खटोला में प्रवेश के लिए भी लंबी लाइन लगी है।

कालिका माता मंदिर के लिए ये उड़न खटोला यानी रोपवे का मार्ग 774 मीटर का है। यह तकरीबन 300 मीटर की ऊंचाई पर ले जाती है। एक केबिन में छह लोग बैठ सकते हैं। रोपवे के ऊपरी तल की ऊंचाई 835 मीटर है। कालिका माता तक पहुंचने के लिए उड़न खटोला सेवा का टिकट बस स्टैंड से भी मिल जाता है। रोपवे से उतरने के बाद भी तकरीबन आधा किलोमीटर का सीढ़ीदार रास्ते का सफर है मंदिर तक का। इस रास्ते में दोनों तरफ दुकानें सजी हैं। कालिका माता के मंदिर के करीब पहुंचने के बाद एक बार फिर तीन मंजिले मकान के बराबर सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।


चौहान राजाओं की अधिष्ठात्री देवी - गुजरात के पंचमहल जिले में पावागढ़ की पहाड़ी के शीर्ष पर बना यह कालिका माता मंदिर बहुत प्राचीन है। कहा जाता है कि विश्वामित्र ने इस मंदिर की स्थापना की थी। इन्हीं ऋषि के नाम से इस पहाड़ी से निकलने वाली नदी विश्वामित्री कहलाती है। यह नदी वडोदरा शहर से होकर गुजरती है।
कालिका माता पावागढ़ के चौहान राजाओं की अधिष्ठात्री देवी थीं। मंदिर का बड़ा हिस्सा ध्वस्त हो चुका है। मंदिर के पास सदन शाह पीर का स्थान भी है। इसलिए यहां तक मुस्लिम श्रद्धालु भी हर रोज आते हैं। ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के राजा महदजी सिंधिया ने कालिका मंदिर की पहाड़ी की चोटी पर पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनवाईं थीं।

सती के दाएं पांव का अंगूठा गिरा था - पावागढ़ पहाड़ी के शिखर पर बना कालिका माता मंदिर, अति पावन स्थल माना जाता है। यहां सालों भर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कालिका माता का मंदिर देश के शक्तिपीठों की सूची में है। जहां जहां सती के अंग गिरे वहां वहां पर शक्ति पीठ की स्थापना हुई है। कहा जाता है यहां सती के दाहिने पांव का अंगूठा गिरा था।

सुबह से शाम तक दर्शन -  कालिका माता मंदिर का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए सुबह से शाम तक खुला रहता है। मंदिर में दर्शन के लिए हर रोज लंबी लाइन लगी रहती है। नवरात्र के मौके पर तो यहां दर्शन में सुबह से लेकर शाम हो जाती है। समान्य दिनों में भी आपको दर्शन के लिए 4 घंटे का समय लेकर चलना चाहिए।

हर साल पावागढ़ परिक्रमा – पावागढ़ में हर साल पावागढ़ परिक्रमा का आयोजन होता है। कुल 44 किलोमीटर की पदयात्रा में दूर दूर से आए लोग हिस्सा लेते हैं। ये परिक्रमा 4 रात 5 दिनों में पूरी की जाती है। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु रास्ते में पड़ने वाले सभी मंदिरों के दर्शन करते हैं। गुजरात और राजस्थान के श्रद्धालुओं में कालिका माता के प्रति अगाध श्रद्धा है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य-- vidyutp@gmail.com 
( KALIKA MATA TEMPLE, PAWAGARH, CHAMPANER )

Monday, May 27, 2019

मुंबई से वडोदरा और घुमक्कड़ी दिल से


मुंबई से वडोदरा के लिए हमारी ट्रेन रात 11.40 बजे है। हमलोग बबूलनाथ मंदिर में दर्शन के बाद टैक्सी लेकर मुंबई सेंट्रल स्टेशन पहुंच गए हैं। मुंबई सेंट्रल स्टेशन से पहले भी ट्रेन पकड़ चुके हैं इसलिए ये स्टेशन जाना पहचाना सा है। सीएसएमटी की तुलना में यहां भीड़भाड़ कम होती है। ये तय किया कि रात खाना रेलवे स्टेशन परिसर के रेस्टोरेंट में भी लेंगे। वैसे भी शाम को 4 बजे हमने लंच किया था।

प्रतीक गांधी से मुलाकात - फेसबुक पर एक घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों का समूह है घुमक्कड़ी दिल से... मैं इसका हाल में सदस्य बना हूं। इसके एक मोडरेटर हैं प्रतीक गांधी जो मुंबई में ही रहते हैं। कुछ महीनों से मेरा उनसे कई बार संवाद हुआ है। इस बार तय हुआ कि हमलोग मुंबई में मिलेंगे। तो प्रतीक भाई रात 10 बजे के बाद मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर हमलोगों से मिलने पहुंच गए। उनके साथ तकरीब डेढ़ घंटे बातचीत करने का मौका मिला। वे वैसे तो काम शेयर ब्रोकिंग फर्म में करते हैं बहुत बड़े घुमक्कड़ हैं। उनके साथ बातें करके खूब आनंद आया। इस बीच हमने मुंबई सेंट्रल के आईआरसीटीसी की कैंटीन में भोजन किया। इस बार हमारे मीनू में दक्षिण भारतीय स्वाद था। ट्रेन का समय होने लगा है तो हमलोग चले अपने डिब्बे की ओर और प्रतीक भाई अपने घर की ओर। ये कहते हुए कि घुमक्कड़ी दिल से.. मिलेंगे फिर से...

वडोदरा एक्सप्रेस (12927 ) से यह हमारा दूसरा सफर है। इससे हमलोग एक बार वडोदरा से मुंबई आए थे। तब हमारा टिकट आरएसी में था। पर इस बार एसी 3 में तीन बर्थ कनफर्म है। ट्रेन समय पर आकर प्लेटफार्म पर लग गई है। हमलोग अपनी सीट पर जाकर बिस्तर लगाकर सो गए। सुबह का सूरज उगने वाला है और हमारी ट्रेन धीरे धीरे वडोदरा रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर रही है। वडोदरा में हमारा होटल पहले बुक है। गोआईबीबो डाट काम से। होटल प्रुडेंट। यह एक तीन सितारा होटल है जो सयाजीगंज में मोनालिसा कांप्लेकेस में है। हमलोग अलकापुरी वाले इलाके में बाहर निकल गए। फिर अपनी गलती का एहसास हुआ तो वापस सयाजीगंज की तरफ आए। 

रेलवे स्टेशन से होटल 200 मीटर की दूरी पर है। होटल से पहले बात कर ली थी, उन्होंने अर्ली चेकइन की अनुमति दे दी थी। होटल का कमरा बड़ा और सुविधाजनक है। सामान फैलाने के बाद स्नान आदि से निवृत होकर हमलोगों ने होटल से नास्ता मंगवाया। नास्ते में पराठे। तो नास्ते के बाद अपनी अगली मंजिल के लिए निकल लिए।  हमारी मंजिल है चंपानेर। होटल से बस स्टैंड पूछते हुए हमलोग आगे बढ़े। वडोदरा का बस स्टैंड रेलवे स्टेशन से महज 100 मीटर की दूरी पर है।

पर यह क्या हमें तो कहीं बस स्टैंड नजर नहीं आ रहा है। एक पांच मंजिला शॉपिंग मॉल सामने है। लोगों ने बताया कि यही बस स्टैंड है। हमलोग मॉल के अंदर प्रवेश कर गए। 

शॉपिंग एरिया के बाद आगे बसों के प्लेटफार्म आ गए। दरअसल वडोदरा जैसा खूबसूरत बस स्टैंड देश में शायद ही कोई दूसरा हो। इसका उदघाटन 2014 में हुआ था। यहां मॉल, सिनेमाघर, बस स्टैंड सब कुछ एक कैंपस में बना हुआ है। सबसे ऊपर की मंजिल पर पीवीआर का सिनेमा घर भी है। आप बस स्टैंड से निकलना ही नहीं चाहेंगे क्योंकि खाने पीने से लेकर खरीददारी के लिए बेहद साफ सुथरे और सुंदर स्टोर यहां बने हुए हैं। 

नीचे बाइक और कार पार्किंग। आधार तल  पर कई साफ सुथरे चमचमाते रेस्टोरेंट और नास्ता घर। मिठाइयों की दुकानें। जबकि पहली मंजिल पर रहने के लिए रियायती होटल और डॉरमेटरी बनाए गए हैं। शॉपिंग मॉल में दुकानें  भी ऐसी की खरीदने के लिए जी ललचाए। प्रवेश और निकास पर सुरक्षा के चाकचौबंद इंतजाम भी किए गए हैं। ऐसे बस स्टैंड से दूसरे राज्यों को भी सीख लेनी चाहिए।   


वडोदरा बस स्टेशन का निर्माण गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम और रियल्टी फर्म क्यूब कंस्ट्रक्शन के बीच एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत हुआ था। यह 114 करोड़ की लागत से निर्मित हुआ है। यह पांच मंजिला टर्मिनस 2.4 लाख वर्ग फुट में फैला हुआ है। तो हमने चांपनेर पावागढ़ के लिए बस ले ली है। आगे की बातें अगले पोस्ट में...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( VADODRA, BUS STAND, PAWAGARH ) 
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Saturday, May 25, 2019

मुंबई का बबूलनाथ मंदिर – प्राचीन शिव मंदिर


गेटवे ऑफ इंडिया पर हमलोग रात 8 बजे पहुंचे हैं। हमारी ट्रेन रात 12 बजे मुंबई सेंट्रल से है। हमने एक टैक्सी वाले से बात की। हमें बबूलनाथ मंदिर जाना है। मुंबई में टैक्सी वाले मीटर से चलते हैं। तो हमलोग एक टैक्सी में बैठ गए। उन्होंने हमें बबूलनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर छोड़ दिया।
मंदिर के गेट पर पूजा के फूलों की दुकान है। यहां पर जूते चप्पल उतारे। उसी दुकान पर अपना सारा लगेज भी छोड़ दिया और हमलोग मंदिर में दर्शन के लिए चल पड़े।

बबूल वृक्ष के देवता के रूप में शिव
बबूलनाथ मंदिर मुंबई शहर का सबसे पुराना और प्रसिद्ध शिव मंदिर है। यह एक छोटी सी पहाड़ी बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण 1780 में हुआ था। यह मंदिर मुंबई के गिरगांव चौपाटी के पास एक छोटीसी टेकरी (पहाड़ी) पर बना है। यहां शिव की बबूल के पेड़ के देवता के रूप में पूजा होती है। यह मंदिर मुंबई के पॉश इलाके मालाबार हिल्स के पास स्थित है।

सैकड़ों साल में महादेव भक्त यहां बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मुख्य मंदिर का संगमरमर का बना हुआ है। इसमें स्थापित शिवलिंगम का सौंदर्य अदभुत है। मंदिर का शिखर दूर से दिखाई देता है। मंदिर के खंबों पर सुंदर नक्काशी है।
कहा जाता है कि जहां बबूलनाथ का मंदिर स्थित है वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। तब यहां चरवाहे अपनी गायों को लेकर चराने आया करते थे।

उन्नीसवीं सदी के शुरुआत में जब कई चरवाहे इस जमीन पर अपने पशुओं को चराने लेकर आते थे। पशुओं को चरने के लिए वे खुरपी द्वारा उनके लिए घास भी खोदते थे और जब भी कभी खुरपी की धार कम हो जाती थी तो वे उसे वहां एक पत्थर पर घिस दिया करते थे। उन्हीं चरवाहों में से एक स्वप्न में शिवजी आए और उन्होंने बताया कि यहां शिवलिंगम विराजमान है। जब स स्थल की खुदाई की गई तो यहां शिवलिंगम निकला।

 तो बबूलनाथ का यह मंदिर स्वंभूशिवलिंगम है। लोग इस शिवलिंगम के चारों तरफ चबूतरा बनाकर पूजा करने लगे। बाद में मुंबई के लोगों इस मंदिर में आस्था बढ़ने लगी। जन सहयोग से यह मंदिर विशाल रूप में परिणत हो गया। मंदिर परिसर में शिव परिवार के पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी की प्रतिमाएं जयपुर के कारीगरों से बनवा कर यहां स्थापित कराई गईं।
मंदिर परिसर में एक पुराना विशालकाय पीपल का पेड़ और एक प्राचीन कुआं भी है। सीढ़ियों के रास्ते से मंदिर जाने पर मंदिर के मुख्य द्वार से पहले गणेश जी की विशाल प्रतिमा है। 

सोमवार और महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में भक्तों की काफी भीड़ उमड़ती है। सावन के एक महीने मंदिर में उत्सव जैसा माहौल रहता है। मंदिर में पर्यावरण बचाने के लिए पॉलीथीन बैग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।


मंदिर में जाने के लिए लिफ्ट - मंदिर में जाने के लिए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लिफ्ट लगाई गई है। इस लिफ्ट के इस्तेमाल के लिए मामूली सा शुल्क देना पड़ता है। आप चाहें तो मुख्य द्वार से पैदल चलते हुए सीढ़ियों को रास्ते से भी मंदिर तक पहुंच सकते हैं। लिफ्ट कारण स्थानीय लोग इस मंदिर को लिफ्ट वाले बाबा भी कहते हैं।
बबूलनाथ मंदिर की जमीन को लेकर 1880 से 1900 तक पारसी समुदाय के साथ अदालत में मुकदमा भी चला। मंदिर के एक शिलापट्ट में इस मुकदमे की जानकारी दी गई है।
कैसे पहुंचे – मुंबई में कहीं से भी बबूलनाथ मंदिर पहुंचना आसान है। यह मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से काफी नजदीक है। मुंबई सेंट्रल से मंदिर की दूरी ढाई किलोमीटर है। इसका निकटतम रेलवे स्टेशन चर्नी रोड है, जहां मंदिर पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। मंदिर गिरगांव चौपाटी और मालाबार हिल के बीच में स्थित है। बबूलनाथ मंदिर के पास हैंगिग गार्डन और कमला नेहरु पार्क भी स्थित है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BABULNATH TEMPLE, SHIVA TEMPLE, MUMBAI ) 


 

Thursday, May 23, 2019

अलीबाग से मुंबई – समंदर में फेरी का सुहाना सफर


हमलोग पुणे से मुरुड जंजीरा सड़क मार्ग से आए थे, पर वापसी में हमलोग जल मार्ग से मुंबई जाएंगे। यह एक रोमांचकारी अनुभव होने वाला है। दरअसल अलीबाग से मुंबई जलमार्ग के रास्ते से सड़क की तुलना में काफी नजदीक है। अगर आप अलीबाग से गेटवे ऑफ इंडिया सड़क मार्ग से जाएं तो 5 घंटे लग जाएंगे जबकि समंदर के रास्ते से जाएं तो दो घंटे में पहुंच जाएंगे।

अलीबाग से 22 किलोमीटर दूर मांडवा जेटी से गेटवे आफ इंडिया के लिए फेरी सेवाएं चलती हैं। यह हमने पहले ही पता कर लिया था। पर इस फेरी के लिए टिकट अलीबाग बस स्टैंड के पास से ही फेरी कंपनी के काउंटर से मिल जाता है।
अजंता, ओपोलो, मालदार जैसी कंपनियों की फेरी सेवाएं मंडवा से गेटवे ऑफ इंडिया के लिए चलती हैं। इनमें वातानुकुलित फेरी सेवाएं भी हैं। हमने अजंता फेरी सेवा की तीन टिकटें ले ली हैं। एक टिकट 120 रुपये का है। इसमें बस किराया भी शामिल है। दरअसल अलीबाग बस स्टैंड से मांडवा जेटी तक जाने के लिए फेरी कंपनियां बस सेवा चलाती हैं। यह दूरी 22 किलोमीटर है। इसमें करीब 45 मिनट का वक्त लगता है। 

बस में बैठते ही बस तुरंत भर गई। नया साल मनाकर मुंबई लौटने वाली सैलानियों की बड़ी संख्या दिखाई दे रही है। अलीबाग से मांडवा के रास्ते में समंदर के किनारे कई रिजार्ट बने हैं जहां मुंबई के लोग छुट्टियों में सैर सपाटा के लिए पहुंचते हैं। हमलोग फेरी टर्मिनल पहुंच गए। टर्मिनल का परिसर विशाल है। यहां खाने पीने के रेस्टोरेंट और वाईफाई जैसी तमाम सुविधाएं हैं। फेरी तक जाने के लिए लंबी लाइन लगी है। हमलोग अजंता फेरी की लाइन में लग गए। लाइन धीरे धीरे सरक रही है। इस बीच सूरज ढल रहा है। समंदर में ढलते सूरज का अक्श बड़ा सुंदर नजर आ रहा है।

सूरज ढलने के बाद अंधेरा होने लगा है। पर हम फेरी तक नहीं जा सके हैं। क्योंकि यात्रियों की भीड़ ज्यादा है और फेरी कम। एक जनवरी के कारण यात्रियों की संख्या बढ़ गई तो है तो कंपनी ने कई नई खाली जहाज मुंबई की तरफ से मंगाए हैं। जैसे ही कोई नया जहाज आकर लगता है तुरंत यात्रियों से भर जाता है। तीन जहाज के रवाना होने के बाद चौथे में हमारा नंबर आया। दरअसल एक दो मंजिले जहाज में सिर्फ 75 लोगों के बैठने की कुर्सियां हैं। जहाज में पांच क्रू मेंबर होते हैं। इससे ज्यादा सवारी नहीं ली जा सकती।

हमने जहाज में ऊपरी मंजिल पर जाकर जगह ले ली है ताकि मुंबई शहर का नजारा किया जा सके। जहाज में सामान रखने की पर्याप्त जगह है। अजंता का यह जहाज मुंबई की ओर तेजी से भाग रहा है। इसकी गति 40 किलोमीटर प्रति घंटा से तेज ही होगी। जहाज में हमारे बगल में मुंबई का मुस्लिम परिवार सफर कर रहा है। उनकी तीन साल बेटी जरीना का आज जन्म दिन है। तो जहाज के टैरेस पर उनका केक काटा गया। सबने हैफी बर्थ डे गाया। हमें भी केक मिला और एक अनजान परिवार की खुशियों में हम भी शामिल हो गए। 

मुंबई शहर नजदीक आने पर रंगबिरंगी रोशनी नजर आने लगी। थोड़ी देर में ताज होटल और उसके बाद गेटवे ऑफ इंडिया हमारी दृष्टि में था। रात 8 बजे हमलोग गेटवे ऑफ इंडिया के लॉन में कदम रख चुके थे। यहां पहले कई बार आ चुके हैं हमलोग पर पानी के रास्ते से मुंबई में प्रवेश पहली बार हुआ है।
गेटवे ऑफ इंडिया से अलीबाग के लिए पहली फेरी सुबह 6.15 बजे चलती है। वहीं अलीबाग की तरफ से गेटवे के लिए आखिरी फेरी के लिए बस शाम को 5.30 बजे चलती है। मांडवा से आखिरी फेरी का समय शाम 6.15 बजे का है। ये समय अजंता कंपनी के फेरी के हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( ALIBAUG TO MUMBAI GATE WAY OF INDIA, MANDWA, AJANTA ) 

Tuesday, May 21, 2019

मुरुड – मछली, मिठाई और नाना पाटेकर

मुरुड में जंजीरा किला के अलावा दूसरा आकर्षण समंदर में बना कासा का किला भी है। पर इस किले तक जाने के लिए आपको आरक्षित बोट का सहारा लेना पड़ेगा। यह किला मुरुड से 9 किलोमीटर की दूरी पर समंदर में है। यहां नाव आने और जाने के लिए 1500 से 2000 रुपये तक किराया हो सकता है। कासा  किला का निर्माण संभाजी के सेनापति दौलत खान ने करवाया था। इसे पद्म दुर्ग भी कहते हैं। यह दुर्ग जंजीरा किले से दिखाई देता है। पर इस किले की सैर के लिए आपको नौ सेना से अनुमति लेनी पड़ती है।


मुरुड में सुबह सुबह सड़क पर टहलने निकल पड़ा हूं। यहां कई पुरानी ब्रिटिश कालीन इमारतें दिखाई देती हैं। समंदर के किनारे लंगर लगाए बहुत सारी मछली पकड़ने वाली नावें भी दिखाई देती हैं। मैं मुरुड के मछली बाजार से गुजरता हुआ पुराने शहर की ओर पहुंच गया हूं।

नाना पाटेकर और मुरुड - मुरुड के स्थनीय लोगों से बातचीत में पता चला कि फिल्मों के मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर मुरुड के रहने वाले हैं। उनका बचपन यहीं गुजरा है। अब भी वे जब मुरुड आते हैं यहां के सभी लोगों से आम लोगों की तरह मिलते हैं। कुछ स्थानीय लोग बताते हैं कि नाना का बचपन यहां गरीबी में बीता। उनका मां दूसरे घरों में कामकाज करती थीं। शायद इसलिए नाना बड़े अभिनेता बनने का बाद भी गरीबों के प्रति काफी हमदर्द हैं।

मुरुड शहर में मुसलमानों की अच्छी आबादी है। यहां बाजार में मुझे जैन मंदिर दिखाई देता है। इसके आगे चलता हूं तो मिठाई की दुकान दिखाई देती है। दो मिठाई की दुकानें हैं और दोनों यूपी के लोगों की हैं। सालों से यहां मिठाइयां बना रहे हैं। मुरुड के बाजार में महंगाई का मीटर ऊंचा नहीं है। समोसे मिठाइयां सस्ती हैं। मैं कुछ मिठाइयां और नमकीन लेकर अपने होटल वापस आ जाता हूं।

अब मुरुड से वापसी – जंजीरा का किला देखने के बाद हमारी मुरुड से वापसी का समय हो गया है। होटल से चेकआउट के बाद हमलोग सड़क पर बस का इंतजार कर रहे हैं। यहां से कहीं भी जाने वाली बस अलीबाग होकर ही जाएगी। एक बस में हमें जगह मिल गई। वापसी में बस तेज चल रही है।

रेवदंडा का किला - रास्ते में रेवदंडा का किले की दीवार नजर आती है। वास्तव में यह किला कुंडलिका नदी के मुहाने पर बना है। यह तीन तरफ से पानी के घिरा है। यह रेवदंडा क्रीक से लगा हुआ है। यहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अलीबाग-मुरुद मार्ग किले से होकर गुजरता है। सन 1524 में इस किले का निर्माण पुर्तगाली कैप्टन सोज ने कराया था। सन 1806 तक यह पुर्तगालियों के कब्जे में था। उसके बाद इस पर मराठों का कब्जा हो गया। वहीं 1818 में इस ब्रिटिश सेना ने कब्जा कर लिया।

तकरीबन दो घंटे के बस के सफर के बाद हम अलीबाग पहुंच गए हैं। शाम के 4 बज गए हैं। हमने दोपहर का खाना नहीं खाया है। अलीबाग बस स्टैंड के सामने कई अच्छे होटल हैं। यह हमने जाते समय ही देख लिया था। इसलिए लंच अलीबाग में ही करना तय कर लिया था। तो बस स्टैंड के सामने अशोका शाकाहारी में वेज बिरयानी और एक थाली आर्डर की गई। छक कर खाया और आगे के सफर पर चल पड़े।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MURUD TO ALIBAUG, NANA PATEKAR ) 


Sunday, May 19, 2019

देश में एक अजूबा है जंजीरा का किला


भारत देश के कई अजूबों के बारे में आपने सुना होगा। पर क्या आपने जंजीरा के किले के बारे में सुना है। समंदर के बीच में बना यह किला अपने आप में अजूबा है।
एक जनवरी की सुबह हमलोग जंजीरा के किले की तरफ चल पड़े हैं। किले पानी के बीच है इसलिए यहां तक पहुंचने के लिए स्टीमर चलती है। अपने होटल से हमलोग खोरा बंदर पोर्ट पहुंचे हैं। यहां से जाने वाली स्टीमर का किराया 61 रुपये है। इसमें वापसी का भी किराया शामिल है। तीन टिकट लेकर हमलोग स्टीमर का इंतजार करने लगे। हमारे स्टीमर का नाम पुष्पावती है। किले तक जाने में कोई एक घंटे का  समय लग जाता है।



सोलहवीं सदी का अपारजेय किला  चारों तरफ अरब सागर से घिरा जंजीरा का किला 16वीं सदी का बना हुआ है। जंजीरा अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है टापू। इसे कभी जीता नहीं जा सका।
 यहां के लोग इसे मुस्लिम किला कहते हैं, जिसका मतलब अजेय होता है। यह किला मुस्लिम शासक सिद्दी जौहर द्वारा बनवाया गया था। सिद्दी जौहर मूल रूप से अफ्रीका के अबिसिनिया मूल के थे। वे अहमदनगर के शासक के सेनापति थे। पर कहा जाता है कि मूल रुप से राजापुरी के 4 किलोमीटर दूर समंदर में एक टीले पर लकड़ी के किले का निर्माण स्थानीय कोली (मछुआरों) ने समुद्र लुटेरों से बचने के लिए कराया था। पर इस पर मालिक अंबर के सिद्दी सेनापति ने कब्जा कर लिया। बाद में यहां भव्य पत्थर के किले का निर्माण कराया।

22 से खास रिश्ता – यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव 20 फीट गहरी है। जंजीरा के इस किले का निर्माण 22 वर्षों में पूरा हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। साथ ही यहां 22 टन की विशाल तोप भी है।  

माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बाबा के संरक्षण में है। शाह बाबा का मकबरा भी इसी किले में है। इस किले पर कई बार हमले जरूर हुए पर कभी कोई जीत नहीं पाया। किले की कई इमारतें ध्वस्त हो गई हैं। यहां ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी, कान्‍होजी आंग्रे, चिम्‍माजी अप्‍पा और शंभाजी ने हमला कर इस किले को जीतने का काफी कोशिश की थी। इस किले पर 20 सिद्दकी राजाओं ने शासन किया। स्वतंत्रता के बाद 3 अप्रैल 1948 को यह किला भारत सरकार के संरक्षण में आ गया।

तीसरी सबसे बड़ी तोप – इस किले में सिद्दिकी शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं। जंजीरा किले में आप देश की तीसरी सबसे बड़ी तोप देख सकते हैं। इस तोप का वजन 22 टन है। वैसे इस किले में छोटी बड़ी कुल 19 तोपें देखी जा सकती हैं।  

मीठे पानी का तालाब – किले के अंदर तो विशाल तालाब हैं। ये दोनों ही मीठे पानी की झीलें हैं। समंदर के बीच में किला। समंदर का पानी तो खारा होता है। पर किले के अंदर मीठे पानी की झील कैसे है ये देखकर अचरज होता है। पर आप इस झील का पानी यहां पर पी भी सकते हैं। कुछ महिलाएं झील के किनारे इसका पानी लेकर बैठी रहती हैं।

किले का प्रवेश द्वार -  जंजीरा किले की खास बात है कि दूर से इसका प्रवेश द्वार दिखाई नहीं देता। इसलिए इस किले पर हमला करने वाले चकमा खा जाते थे। काफी निकट आने पर इसका द्वार नजर आता है। ऐसा इसलिए है कि हर थोड़ी दूर पर बनी सुरक्षा चौकी की दीवारें आगे की तरफ निकली हैं जिसके कारण प्रवेश द्वार नजर नहीं आता।

वहीं बताया जाता है कि किले से जमीन तक आने के लिए समंदर के नीचे से एक सुरंग वाला रास्ता भी था। यह रास्ता दुश्मन के हमले के वक्त सुरक्षित पलायन के लिए बनाया गया था। सिद्दी राजाओं के शासन काल में यह किला गुलजार हुआ करता था। बड़ी आबादी इस किले के अंदर रहती थी। पर अब यहां शाम के बाद कोई नहीं रहता।   
      

कैसे पहुंचे – जंजीरा किला पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक राजापुरी से होकर और दूसरा खोरा बंदर से होकर। खोरा बंदर वाला रास्ता निकट का है। किला देखकर आने जाने में कोई तीन से चार घंटे का वक्त लग जाता है। इसलिए अपने साथ पानी की बोतल और खाने पीने की कुछ सामग्री जरूर रखें। किला सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। शुक्रवार के दिन यह दोपहर दो बजे तक बंद रहता है। 


जंजीरा किले के करीब जब स्टीमर पहुंचती है तो वहां सवारियों के नाव में स्थानांतरित किया जाता है। किले के प्रवेश द्वार तक स्टीमर नहीं जा पाती। प्रवेश द्वार पर आपका सामना किले के गाइडों से होता है। आप चाहें तो इन गाइड के बिना भी पूरे किले का मुआयना कर सकते हैं। पूरे किले को घूमने में कम से कम दो घंटे का वक्त लग जाता है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
-        ( WONDERS OF INDIA, MURUD JANJIRA FORT )