Saturday, April 13, 2019

रंकाला झील की शाम, कोल्हापुरी चप्पल और रंग-बिरंगा कोल्हापुरी फेटा


कोल्हापुर की बात हो और कोल्हापुरी चप्पल और कोल्हापुर फेटे की बात न हो तो चर्चा अधूरी रहेगी। कोल्हापुरी फेटा मतलब पगड़ी। वैसे तो महाराष्ट्र में शादी-विवाह के मौकों पर फेटा बांधने का चलन है। पर कोल्हापुरी फेटे की अपनी शान है। कोल्हापुर शहर में फेटे की कई दुकाने हैं। यहां पर आप तमाम डिजाइन के फेटे 200 से लेकर हजारों रुपये तक के रेंज में खरीद सकते हैं। कोल्हापुरी फेटा फूलदार होता है। इसमें राजस्थान के बांधनी जैसा प्रभाव होता है। इसके बांधने का अपना अलग तरीका होता है। कोल्हापुर के बाजार से फेटा खरीदकर ले जा सकते हैं।


कोल्हापुरी चप्पलों की शान – ये शहर जाना जाता है देश भर में कोल्हापुरी चप्पलों के लिए। लेदर के बने हल्के चप्पल और जूतियां। नगर निगम के पास कोल्हापुरी चप्पलों का बाजार है। यहां पर चप्पलों की कई सौ दुकाने हैं। पीले रंग के हल्के कोल्हापुरी चप्पल पूरे देश में अपनी पहचान रखते हैं। वैसे तो कोल्हापुरी चप्पल 250 रुपये से मिलना आरंभ हो जाता है। पर हाथ की कारीगरी वाले अच्छे कोल्हापुरी चप्पल की कीमत 450 रुपये से आरंभ होती है। यहां आप कोल्हापुरी चप्पल फुटपाथ के दुकानदार से लेकर बड़े शोरूम से खरीद सकते हैं।

 कोल्हापुरी चप्पल अपनी सुंदर कढ़ाई के लिए जाने जाते हैं। इसमें चमड़े की रंगाई के लिए वनस्पति रंगों का इस्तेमाल होता है। चमड़े में डाई का काम स्थानीय स्तर पर होता है। कोल्हापुरी चप्पलों के निर्माण में बेहतर कढ़ाई का काम हाथ से ही हो पाता है। पर आजकल मशीनें तेजी से चप्पल बनाने लगी हैं। काफी लोग यहां से 10 रुपये में छोटा नजरिया चप्पल भी खरीदते हैं। घर के बाहर लगाने के लिए बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला...


साठ के दशक में दुनिया में आए हिप्पी मूवमेंट ने कोल्हापुरी चप्पलों को अमेरिका में खूब लोकप्रिय बनाया। जून 2019 में कोल्हापुरी चप्पल को जीआई प्रमाण पत्र मिल गया। मतलब दुनिया भर में और मशहूरी. कोल्हापुर, सांगली, सतारा, सोलापुर, बीजापुर,  बागलकोट के शिल्पी इन चप्पल के निर्माण के लिए अधिकृत हैं। 

रंकाला लेक पर एक शाम –
महालक्ष्‍मी मंदिर के पश्चिम में स्थित रंकाला झील यहां के स्‍थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों के बीच भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि झील का सौंदर्यीकरण महाराजा छत्रपति शाहू जी ने करवाया था। इसकी चौपाटी पर कुछ सुंदर मीनारें बनी हैं। यह तथ्य मिलता है कि नौवीं शताब्दी में आए एक भूकंप के बाद यहां पानी का सोता निकल आया और यहां एक विशाल झील बन गई। 

कहा जाता है कि झील के बीचों बीच रणक भैरव का मंदिर था जो भूकंप के दौरान अंदर समा गया। इसी रणक भैरव के नाम पर झील को रंकाला कहा जाने लगा। झील का विस्तार साढ़े चार मील में है। इसका कैचमेंट एरिया 700 हेक्टेयर में है। झील की अधिकतम गहराई 15 मीटर तक है।

झील के आसपास चौपाटी और और उद्यान भी बना हुआ है। खास तौर पर रंकाला झील के दो तरफ विशाल चौपाटी बनी है। इस पर सुबह और शाम को लोग टहलते नजर आते हैं। चौपाटी के आसपास का इलाका स्ट्रीट फूड से गुलजार रहता है। मैं देर रात गए रंकाला लेक पर पहुंचा हूं। अंधेरे में झील का विस्तार ठीक से नजर नहीं आ रहा है। पर चौपाटी की पीली रोशनी में युवा दिल धड़क रहे हैं।

झील से लगता हुआ पद्मराजे उद्यान बना हुआ है। झील की चौपाटी पर बैठने के लिए बेंच बनी हुई है। रंकाला झील में दिन में बोटिंग भी की जा सकती है। पर झील का पानी ज्यादा साफ नहीं है। लोगों द्वारा कचरा फेंके जाने के कारण झील के कई हिस्सों में गंदगी नजर आती है। हम शहरों में ऐसी अमूल्य धरोहर को लेकर कब जागरूक होंगे। उदयपुर झील की तरह रंकाला में भी सफाई अभियान चलाने की जरूरत है। तमाम सैलानियों को शिकायत है कि झील की और आसपास के इलाके की सफाई की जरूरत है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( KOLHAPURI CHAPPAL, FETA, RANKALA LAKE EVE ) 

  

4 comments:

  1. रंकाला लेक कोल्हापुरी फेटा और चप्पल सब के बिना कोल्हापुर अधूरा है...एक और चीज़ है जिसका जिक्र अभी तक आपकी कोल्हापुर की पोस्ट में नही हुआ और वो है भाड़ंग...आपने कोल्हापुर का भडांग खाया की नही...

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    1. नहीं खाया जी, अगली बार

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  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति राष्ट्रीय अग्निशमन सेवा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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