Tuesday, April 30, 2019

कॉटन सिटी सोलापुर शहर – और सोलापुरी चादर

महाराष्ट्र का सोलापुर शहर। बड़े पैमाने पर कपास उत्पादन के कारण यह कॉटन सिटी के तौर पर पहचाना जाता है। महाराष्ट्र का एक सीमांत शहर जिसके आगे कर्नाटक राज्य आरंभ हो जाता है। सोलापुर एक औद्योगिक शहर है। यहां आपको देश के हर राज्य के लोग मिल जाएंगे। बाजार में चाक-चिक्य है। देर रात तक सड़कों पर चहल पहल बनी रहती है।

अतीत में जाएं तो सोलापुर शहर  चालुक्य राजाओं के शासन के अधीन था। बाद में यह देवगिरि यादवों के शासन के अधीन आ गया। बाद के दिनों में यह बहमनी और बीजापुर साम्राज्य का हिस्सा बन गया।

सोलापुर मुंबई-हैदराबाद रेलमार्ग औ सड़क मार्ग पर स्थित है। दिल्ली की तरफ से रेल से आएं तो सोलापुर के बाद कर्नाटक का प्रमुख शहर कालबुर्गी इसके बाद आता है। सोलापुर से रेल से तकरीबन 70 किलोमीटर आगे जाने पर कर्नाटक राज्य आरंभ हो जाता है। सोलापुर से बीजापुर और गडग के लिए रेलगाड़ियां जाती हैं। सोलापुर में एयरपोर्ट भी है। यहां से नियमित उड़ाने हैं। जल्द ही इसे इंटरनेशनल एयरपोर्ट में बदला जा रहा है।

कर्नाटक का हिस्सा बनना चाहता था सोलापुर - सोलापुर शहर की खास बात है कि भले ये शहर महाराष्ट्र का हिस्सा है पर यहां के लोग मे मराठी से जादा तेलुगू और कन्नड़ भाषा बोलते है। देश के आजाद होने के बाद सोलापुर के लोग कर्नाटक में शामिल होना चाहते थे। यहां पर महादेवी लिगाडे नाम की कन्नड लिंगायत महिला ने सोलापुर कर्नाटक मे जोडने के लिए लंबा आंदोलन भी किया था। इस विवाद के बीच केंद्र सरकार ने ने महाजन आयोग का गठन किया। बाद में महाजन आयोग ने सोलापुर को कर्नाटक में जोड़ने पर ही अपनी रिपोर्ट दिया। पर इस पर अमल नहीं हो सका। क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने इस रिपोर्ट को नहीं माना।

कपास उत्पादन का बड़ा केंद्र - सोलापुर कपास और अन्य कृषि उत्पादों के व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। सोलापुर एक बड़ा औद्योगिक केंद्र भी है। सूती वस्त्र के उत्पादन की बात करें तो यह यह मुंबई के बाद दूसरा प्रमुख केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में कपड़ा मिलें और पावर लूम हैं। इन लूमो कारण सोलापुर मजदूरों का बड़ा शहर है। कई राज्यों से लोग यहां रोजगार की तलाश में आते हैं।
सोलापुर चादर और तौलिया की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। देश के कई शहरों, कस्बों और गांव में सोलापुरी चादर मशहूर हैं। वैसे यह शहर बीड़ी और सिगरेट के उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। हाल में सोलापुर में वेस्ट एनर्जी से विद्युत उत्पादन का प्लांट लगाया गया है। इस प्लांट औद्योगिक कचरे से निपटान के लिए नजीर पेश की है।

सोलापुर बस स्टैंड से आगे बढ़ने पर चौराहे पर छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा लगी है। इस प्रतिमा के कारण यह शिवाजी चौराहा कहलाता है। इसी सड़क पर सिद्धेश्वर मंदिर की तरफ आगे चलने पर एक चौराहे पर डाक्टर अंबेडकर की विशाल प्रतिमा नजर आती है। एक चौराहे पर अहिल्याबाई होल्कर भी सुंदर प्रतिमा लगी है। हिंदू समाज की महान गौरव अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा इस क्षेत्र के तमाम शहरों में देखने को मिलती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        (SOLAPUR, MAHARASTRA, KARNAKTA, COTTON BELT )


Sunday, April 28, 2019

सोलापुर नगर के देवता सिद्धेश्वर महादेव


तुलजापुर भवानी के दर्शन करने के बाद बस स्टैंड वापस लौट आया हूं। पर यहां से सोलापुर की बस के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा। सवारियां ज्यादा हैं पर बसें कम। लगभग एक घंटे इंतजार के बाद बस मिल पाई। भीड़ ज्यादा थी पर जगह मिल गई। शटल बस ने एक घंटे में सोलापुर बस स्टैंड पहुंचा दिया। अब हमारी मंजिल है सिद्धेश्वर मंदिर।

सिद्धेश्वर मंदिर सोलापुर शहर के मध्य में स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर है। यह मंदिर एक विशाल सरोवर के बीच बना हुआ है। ठीक वैसे ही जैसे अमृतसर का स्वर्ण मंदिर। मुंबई से सोलापुर के बीच एक ट्रेन चलती है जिसका नाम सिद्धेश्वर महादेव के नाम पर सिद्धेश्वर एक्सप्रेस रखा गया है। मंदिर परिसर का मुख्य मंदिर भगवान श्री सिद्धरामेश्‍वर को समर्पित है। इसका नक्काशीदार गुंबद सफेद रंग का है। यहां श्री मल्लिकार्जुन स्वामी और भगवान विष्णु की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।

इस मंदिर का निर्माण श्रीशैलम के श्री मल्लिकार्जुन के प्रतापी भक्त, श्री शिवयोगी सिद्धारामेश्वर महाराज ने कराया। श्री सिद्धारामेश्वर को उनके गुरु ने सोलापुर लौटने और यहां शिव लिंग की स्थापना का आदेश दिया था। उन्होंने अपने गुरु के आदेश का पालन किया और सोलापुर में इस मंदिर का जीर्णोद्वार कराया। श्री सिद्धारामेश्वर ने कुल में 68 शिव लिंग स्थापित किए थे। वे 12वीं सदी के संत थे। उनको लिंगायत धर्म के छह आचार्य में से एक माना जाता है। सोलापुर के लोग मानते हैं कि इस संत के जन्म से शहर की समृद्धि हुई। उन्हें सोलापुर का ग्रामदेवता भी माना जाता है। मंदिर परिसर में ही श्री शिवयोगी की समाधि बनी हुई है।

मंदिर परिसर में चांदी की मढ़ी हुई नंदी प्रतिमा स्थापित है। परिसर में विठोबा और रूक्मिणी मंदिर भी हैं। मंदिर के अंदर कई अति सुंदर नक्काशी भी देखी जा सकती है। अगर रात्रिकाल में मंदिर परिसर में पहुंचते हैं तो मंदिर रात की रोशनी में काफी सुंदर नजर आता है। सिद्धेश्वर मंदिर सोलापुर में वार्षिक गड्डा यात्रा, पिछले 900 वर्षों से मनाया जाता है। यात्रा में सात अलग अलग नंदी ध्वज के साथ सात समुदायों के लोग चलते हैं।

मंदिर में अन्नदानम – सिद्धेश्वर मंदिर परिसर  में श्रद्धालुओं के लिए अन्न श्रेत्र का संचालन किया जाता है। यहां दोपहर और शाम को भक्तों के लिए भोजन परोसा जाता है। साफ सुथरे डायनिंग हॉल में कुरसी टेबल पर भोजन परोसने का इंतजाम है। आप चाहें तो मंदिर के ट्रस्ट में दान दे सकते हैं। मंदिर परिसर में पुस्तक और धार्मिक वस्तुओं की एक विशाल दुकान भी है।

सिद्धेश्वर सरोवर में पानी नहीं – सिद्धेश्वर मंदिर विशाल सरोवर के बीच में बना है। हालांकि इसमें जलस्तर काफी कम हो गया है। इस झील का क्षेत्रफल 36 एकड़ का है जबकि इसका कैचमेंट एरिया 75 एकड़ का है। अधिकतम गहराई 11 मीटर तक है। अब मंदिर तक पहुंचने के लिए स्थायी सड़क बना दी गई है। पर कभी यहां नाव से पहुंचा जा सकता था। मंदिर के सरोवर में पानी की इन दिनों काफी कमी है। सिद्धेश्वर मंदिर तालाब सुधार समिति इस सरोवर को जीवन दान देने की कोशिश में लगा है। सरोवर के कायाकल्प के बाद मंदिर परिसर का सौंदर्य काफी बढ़ जाएगा।  

मंदिर का समय – सिद्धेश्वर मंदिर सुबह छह बजे से रात्रि नौ बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुला रहता है। मंदिर परिसर में वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त इंतजाम है। मंदिर का प्रबंधन श्री सिद्धेश्वर देवस्थानम पंच कमेटी, सोलापुर देखता है।

कैसे पहुंचे – सोलापुर बस स्टैंड से सिद्धेश्वर मंदिर की दूरी तीन किलोमीटर है। शेयरिंग आटोरिक्शा से या फिर पैदल टहलते हुए भी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए आवास का निर्माण कराया गया है। यहां फेमिली रूम और डारमेटरी उपलब्ध है। आप कुछ घंटों के लिए कमरा चाहते हैं तो वह भी उपलब्ध है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
( SIDHESHWAR TEMPLE, SOLAPUR ) 



Friday, April 26, 2019

छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी - तुलजापुर भवानी मंदिर

महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में स्थित तुलजापुर भवानी को छत्रपति शिवाजी की कुल देवी माना जाता है। महाराष्ट्र के लोगों की मां तुलजापुर भवानी में असीम आस्था है। तुलजा भवानी महाराष्ट्र के प्रमुख साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है। यह देश के 51 शक्तिपीठों में से भी एक देवी मानी जाती हैं।

मां तुलजा भवानी महिषासुर मर्दिनी का ही एक रूप हैं। मां तुलजाभवानी का मंदिर का स्थापत्य मूल रूप से हेमदपंथी शैली से प्रभावित है। वर्तमान मंदिर का निर्माण 17वीं सदी का बताया जाता है। मंदिर के गुंबद पर अत्यंत सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है।
इस मंदिर में  प्रवेश करने के साथ ही दो विशालकाय महाद्वार नजर आते हैं। इससे आगे चलने पर सबसे पहले कलोल तीर्थ स्थित है, जिसमें 108 तीर्थों के पवित्र जल का सम्मिश्रण किया गया है। इसमें उतरने के बाद थोड़ी ही दूरी पर गोमुख तीर्थ स्थित है, जहां जल तीव्र प्रवाह के साथ बहता है। इसके आगे सिद्धिविनायक भगवान गणेश का मंदिर स्थापित किया गया है।

इससे आगे बढ़ने पर सुसज्जित द्वार में प्रवेश करने के बाद मुख्य कक्ष (गर्भ गृह) में माता की स्वयंभू प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह के पास ही एक चांदी का पलंग स्थित है, जो माता के शयन के लिए है। इस पलंग के उलटी तरफ शिवलिंग स्थापित है, जिसे दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि मां भवानी और शिव शंकर आमने-सामने ही बैठे हुए हैं।



शिवाजी को प्रदान किया था तलवार - तुलजापुर भवानी के बारे में मान्यता है कि शिवाजी की तलवार खुद उन्हें देवी मां ने प्रदान की थी। अभी यह तलवार लंदन के संग्रहालय में रखी है। महाराज छत्रपति शिवाजी भी अपने प्रत्येक युद्ध के पहले माता से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां जरूर आते थे।

मां तुलजा भवानी के बारे में ऐसी जनश्रुति है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति स्वयंभू है। इस मूर्ति की एक और खास बात यह है कि यह मंदिर में स्थायी रूप से स्थापित न होकर चलायमान हैं। साल में तीन बार इस प्रतिमा के साथ प्रभु महादेव, श्रीयंत्र तथा खंडरदेव की भी प्रदक्षिणा पथ पर परिक्रमा करवाई जाती है।

माता को चढ़ाते हैं साड़ी - यहां आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में माता को साड़ी चढ़ाने की परंपरा है। इसलिए मंदिर के आसपास साड़ियों की दुकानें बड़ी संख्या में है। मंदिर में दर्शन करके बाहर निकलने के बाद बड़ी संख्या में प्रसाद की दुकाने हैं। 
मंदिर का प्रबंधन तुलजापुर भवानी मंदिर संस्थानम देखता है। संस्थानम की ओर से मंदिर के पास विशाल भक्त निवास का निर्माण कराया गया है। वैसे मंदिर के पास कई होटल और धर्मशालाएं भी हैं। तुलजापुर बस स्टैंड में भी श्रद्धालुओं के लिए क्लॉकरुम की व्यवस्था है।

दर्शन के लिए टोकन - मंदिर में दर्शन से पहले हर श्रद्धालु को टोकन लेना पड़ता है। इस कंप्यूटरीकृत टोकन में आपकी तस्वीर खींची जाती है, उसके बाद पास जारी कर दिया जाता है। साल का कोई भी दिन हो मंदिर में दर्शन के लिए लंबी लाइन लगती है। तो माता के दर्शन के लिए दो से तीन घंटे का समय तो मानकर ही चलिए। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है।  

माता के ऑनलाइन दर्शन – अब आप तुलजापुर भवानी के ऑनलाइन दर्शन करके भी माता के आशीर्वाद ले सकते हैं। इसके लिए आपको मंदिर से संबंधित वेबसाइट पर जाना होगा। मराठी में तुलजा भवानी के सम्मान में असंख्य गीत रचे गए हैं।

कैसे पहुंचे - तुलजापुर नगर के बस स्टैंड से मंदिर की दूरी एक किलोमीटर है। 
मंदिर के प्रवेश द्वार तक बाजार है। इन बाजारों से घूमते हुए आप मां के मंदिर तक पैदल पैदल पहुंच सकते हैं। मंदिर से पहले रास्ते में तमाम प्रसाद की दुकाने हैं। यहां आप जूते-चप्पल, बैग आदि रखकर दर्शन के लिए आगे बढ़ सकते हैं।


महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठ - महाराष्ट्र में कुल साढ़े तीन शक्तिपीठ माने जाे हैं। सप्तश्रंगगढ़ की माता को आधे शक्ति पीठ की मान्यता है। यह नासिक से 60 किलोमीटर दूर कलवन तालुका में नंदूरी ग्राम में स्थित है। माहुरगढ़ की रेणुका माता, तुलजापुर भवानी और कोलहापुर की महालक्ष्मी को पूरा शक्तिपीठ माना जाता है। माहुरगढ़ नांदेड़ जिले में है। यह नांदेड़ से 100 किलोमीटर और यवतमाल से 70 किलोमीटर की दूरी पर है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  Email- vidyutp@gmail.com

( TULJAPUR BHAWANI, SHIVAJI MAHARAJ, SHAKTIPEETH, USMANABAD ) 


Thursday, April 25, 2019

पंढरपुर से तुलजापुर वाया सोलापुर

ये पंढरपुर बस स्टैंड स्थित सुलभ शौचालय परिसर है। 
पंढरपुर में विठोबा के दर्शन करके वापस बस स्टैंड लौट आया हूं। यहां से सोलापुर  लिए हर 15 मिनट पर बस मिलती है। मैं शटल बस में सवार हो गया हूं। शटल बस मतलब रास्ते में कहीं नहीं रुकेगी, कंडक्टर ने बाहर बैठकर सीट नंबर के साथ टिकटे बना दी हैं। जितनी सीट उतने ही सवारी बस अब सीधे सोलापुर जाकर ही रुकेगी। दोनों शहरों के बीच 70 किलोमीटर की दूरी है। बस तेजी से रास्ता नाप रही है। दोपहर में मैं सोलापुर बस स्टैंड में पहुंच गया हूं।

 सोलापुर बस स्टैंड के सामने होटलों मे खाना पानी वाजिब दरों पर है। यहां खाने की थाली की दरें 40 से 60 रुपये के बीच है। सोलापुर बस स्टैंड के सामने एक रेस्टोरेंट में दोपहर का भोजन करने के बाद एक बार फिर नई बस में बैठ गया हूं। ये बस जा रही है तुलजापुर ...





सोलापुर से तुलजापुर की दूरी 45 किलोमीटर है। ये भी नॉन स्टाप बस है। बस स्टैंड से निकलने पर बस हैदराबाद हाईवे पर जा रही है। थोड़ा आगे चलकर बाएं तरफ मुड जाती है एनएच 52 पर जो उस्मानाबाद की ओर जाती हुई सड़क है। यहां से औरंगाबाद की दूरी 300 किलोमीटर लिखी दिखाई देती है। हम मराठावाड़ा के बीड, लातूर, उस्मानाबाद मार्ग पर हैं। वह इलाका जो पानी की कमी के लिए जाना जाता है। तगलवाड़ी में टोल नाका आया जहां से तुलजापुर की दूरी 20 किलोमीटर है। एनएच 52 पर दाहिनी तरफ मोड लेने के बाद बस तुलजापुर शहर की ओर बढ़ चली है।

तुलजापुर महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले की एक तहसील है। इस इलाके में बेर और केले खूब सस्ते मिल रहे हैं। बेर 10 रुपये किलो है तो केले 20 से 30 रुपये दर्जन बिक रहे हैं।
तुलजापुर एक पहाड़ी पर बसा हुआ शहर है। भले ही मराठवाड़ा में पानी की कमी है पर सोलापुर से तुलजापुर की तरफ चलने पर मुझे सडक के किनारे के विशाल झील नजर आती है। सड़क के किनारे हरे भरे खेत भी नजर आते हैं। हाईवे पर कुछ विशाल ढाबे नजर आते हैं।

तुलजापुर से जिला मुख्यालय उस्मानाबाद की दूरी 21 किलोमीटर है। वैसे उस्मानाबाद रेलवे स्टेशन भी है। यहां आप औरंगाबाद, लातूर, हैदराबाद, सोलापुर, पुणे जैसे शहरों से आसानी से पहुंच सकते हैं।

उस्मानाबाद में क्या क्या देखें - उस्मानाबाद जिले में तुलजापुर भवानी के अलावा नालदुर्ग का किला और धाराशिव गुफाएं देखी जा सकती हैं। नालदुर्ग फोर्ट उस्मानाबाद शहर से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं धाराशिव गुफाओं की दूरी उस्मानाबाद शहर से 8 किलोमीटर है। इसके अलावा उस्मानाबाद जिले में परांदा फोर्ट  और तेर जैसे ऐतिहासिक स्थल भी हैं।

उस्मानाबाद इलाके में मौसम गर्म रहता है। वैसे यहां जून से सितंबर तक बारिश का मौसम माना जाता है। पर बारिश कम ही होती है। तो इधर कभी घूमने आना चाहते हैं तो सर्दियों का ही मौसम ठीक रहेगा। दिसंबर के महीने में भी यहां ज्यादा ठंड नहीं है। मराठवाड़ा के बाकी जिलों की तुलना करें तो यहां का मौसम अच्छा रहता है। आप अगर सिर्फ तुलजापुर भवानी के दर्शन करने इधर आना चाहते हैं तो सोलापुर मे ठहरकर इधर आ सकते हैं। लिजिए हमारी बस तुलजापुर के बस स्टैंड में पहुंच चुकी है।

इस सफर को मीलों में मत बांटिए. 
इस कौम को कबीलों में मत बांटिए .
कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है वतन
इसे नदियों तालाबों झीलों में मत बांटिए .

-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vidyutp@gmail.com 
( PANDHARPUR TO TULJAPUR VIA SOLAPUR ) 
        






Tuesday, April 23, 2019

विट्ठलस्वामी मंदिर के प्रवेश द्वार पर संत नामदेव की समाधि

पंढरपुर में विट्ठल स्वामी मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर मराठी के जाने माने संत नामदेव की समाधि है। मराठी में नामदेव को संत शिरोमणि कहा जाता है। उनके नाम पर मंदिर के मुख्यद्वार को संत नामदेव द्वार कहा जाता है। विट्ठल स्वामी के दर्शन करने आने वाले भक्त संत नामदेव की समाधि पर श्रद्धा से सिर झुकाने के बाद ही आगे बढ़ते हैं।


संत नामदेव महाराष्ट्र में जन्मे महान संत-कवि थे। उन्हें ब्रह्मविद्या को आमजन के लिए सुलभ बनाकर पेश किया। मूर्तिपूजा, कर्मकांड, जातपात पर उनके विचारों के कारण उन्हे कबीर का पूर्ववर्ती संत माना जाता है। संत नामदेव का जीवन काल 1270 से 1350 के बीच था।

संत नामदेव अपनी उच्चकोटि की आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए ही विख्यात हुए। पर वे चमत्कारों के सर्वथा खिलाफ थे। वह मानते थे कि आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है। उनका संदेश था कि परमात्मा की बनाई हुई इस भूमि संसार की सेवा करना ही सच्ची पूजा है।

माना जाता है कि संत नामदेव का जन्म कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन  संवत 1192 ( 26 अक्तूबर 1270) में पंढरपुर में एक सूचिक (दर्जी) परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम दामाशेटी और माता का नाम गोणाई देवी था। हालांकि सातारा जिले में कृष्णा नदी के किनारे बसा नरसी बामणी उनका पैतृक गांव है। संत नामदेव का परिवार विट्ठलस्वामी का परमभक्त था। बचपन से ही नामदेव का संतों के संग उठना बैठना शुरू हो गया था। बच्चों को इकट्ठा करके वे भजन गाने लगते थे। उनका छोटी उम्र में विवाह हो गया। पत्नी का नाम राजाबाई था। नामदेव को परिवार के लोगों ने व्यापार में लगाने की कोशिश की पर उनका मन तो भक्ति में रमा था। 

संत नामदेव ने विसोबा खेचर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। विसोबा खेचर का जन्म पैठण में हुआ था, जो पंढरपुर से 50 कोस दूर ओंढ्या नागनाथ नामक प्राचीन शिव क्षेत्र में पड़ता है। इसी मंदिर में इन्होंने संत शिरोमणि श्री नामदेव को शिक्षा दी और अपना शिष्य बनाया। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और उम्र में उनसे पांच साल बड़े थे।

नामदेव और संत ज्ञानेश्वर का साथ - संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव उत्तर भारत की साथ-साथ यात्रा शुरू की थी। ज्ञानेश्वर मारवाड़ में कोलदर्जी नामक स्थान तक नामदेव के साथ गए। वहां से लौटकर उन्होंने पुणे के पास आलंदी में 1296 ईस्वी में समाधि ले ली।

संत नामदेव और पंजाब - ज्ञानेश्वर के वियोग से नामदेव का मन महाराष्ट्र से उचट गया और वे पंजाब की ओर चले गए। पंजाब के गुरुदासपुर जिले के घोभान में आज भी नामदेव जी का मंदिर मौजूद है। नामदेव ने पंजाबी में भी पद्य रचना की। उनकी बाणी में सरलता है। श्री गुरु अर्जुन देवजी ने उनकी बाणी का संकलन श्री गुरु ग्रंथ साहिब में किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 61 पद, 3 श्लोक, 18 रागों में संकलित है।

संत नामदेव के अभंग - संत नामदेव ने मराठी में पदों की रचना की जिसे अभंग (भक्तिगीत ) कहा जाता है। मराठी में श्रद्धालु उनके पदों को श्रद्धा से गाते हैं। उनके पद समानता और भक्ति का संदेश देते हैं। संत नामदेव ने 80 साल की आयु में पंढरपुर में 1350 ई में विट्ठलस्वामी के मंदिर के आगे समाधि ले ली।


संत गोरा कुम्हार और नामदेव - महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में कई संत हुए हैं जिन्होंने अपना संदेश आमफहम जुबान में अपनी बातें रखी। इस कड़ी में तेरहवीं सदी के संत गोरा कुम्हार का नाम आता है। कुम्हार का काम करते समय भी वह निरंतर पांडुरंग के भजन में लीन रहते थे। उनका जन्म महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गांव में हुआ था। उन्हें लोग गोराई काका भी कहते थे। उनका जीवन काल 1267 से 1317 तक माना जाता है। गोरा पंढरपुर वारकरी में जाते थे। उन्हें संत नामदेव का आशीर्वाद मिला था।

भीमा नदी का पानी और प्रदूषण विट्ठलस्वामी मंदिर के नामदेव महाद्वार के सामने बाजार से गुजरते हुए आप भीमा नदी के तट पर पहुंच जाते हैं। यहां पर ग्वालियर के सिंधिया राजघराने द्वारा निर्मित द्वारकाधीश का मंदिर है। आगे इंदौर के होल्कर घराने द्वारा बनवाए गए प्रचीन मंदिर हैं। इस मार्ग पर सुंदर बाजार सजा रहता है। यहां खाने पीने और पूजन-प्रसाद आदि की दुकाने हैं।


मैं भीमा नदी के तट पर पहुंच गया हूं। पर नदी तट पर लगे एक बोर्ड को देखकर भारी निराशा होती है। नगरपरिषद के बोर्ड पर लिखा है कि चंद्रभागा नदी के पानी को कपड़े धोकर, शौच कर या किसी और तरीके से गंदगी फैलाकर दूषित न करें। पर लोग मानते कहां हैं। नदी के तट पर गंदगी का आलम है। नदी तट पर भी कुछ मंदिर बने हैं। नदी में कुछ सजी धजी नावें तैयार हैं। ये नावें लोगों को चंद्रभागा नदी ( भीमा ) की सैर कराती हैं।


-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BHIMA RIVER, WATER, NAMDEV SAMADHI , GORA KUMHAR, SANT GAYANESHWAR)

Monday, April 22, 2019

पंडरपुर का बिठोबा मंदिर - रुक्मणि के साथ पूजे जाते है कृष्ण



भीमा ( चंद्रभागा) नदी के तट पर है कान्हा मंदिर 

महाराष्ट्र के शहर पंढरपुर में विट्ठलस्वामी यानी भगवान कृष्ण का प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर है। पंढरपुर सोलापुर के पास भीमा नदी के तट पर बसा शहर है। इस शहर का एक नाम पंढारी भी है। महाराष्ट्र के लोग इस शहर को भू बैकुंठ मानते हैं। यहां पर भीमा नदी को चंद्रभागा नदी के नाम से भी जाना जाता है। विट्ठल स्वामी को स्थानीय लोग प्यार से बिठोबा और रुक्मिणी को रखुमाई भी कहते हैं। पंढरपुर बस स्टैंड से मंदिर का मार्ग एक किलोमीटर का है। रास्ते में तमाम बड़ी बड़ी धर्मशालाएं बनी हैं। 

बिठोबा के मंदिर में दर्शन के लिए सालों भर भीड़ रहती है। तकरीबन 30 घंटे दर्शन  में लग जाते हैं। मंदिर के आसपास क्लॉक रुम बने हैं। यहां आप अपने बैग और जूते आदि जमा करके दर्शन के लिए पंक्ति में लग सकते हैं। बिठोबा के मंदिर में दो तरह के दर्शन है। गर्भ गृह दर्शन के अलावा समय कम हो तो मुख दर्शन भी किया जा सकता है।

मंदिर के गर्भगृह में विट्ठल और रुक्मिणी की प्रतिमाएं है। यह देश का प्रमुख मंदिर है जहां कृष्ण राधा के साथ नहीं बल्कि अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ पूजे जाते हैं। काले पत्थर की बनीं ये मूर्तियां काफी सुंदर हैं। विट्ठल मतलब नटवर नागर कन्हा। मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरी के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। मंदिर का परिसर बहुत विशाल है। इसमें चारों तरफ से चार द्वार बने हैं। मंदिर के निर्माण में पत्थरों का ज्यादा काम हुआ है।

दिन भर में पांच बार पूजा - पंढरपुर के मुख्य मंदिर में बड़वा परिवार के ब्राह्मण पुजारी पूजा-विधी करते हैं। इस पूजा में पांच दैनिक संस्कार होते हैं। सबसे पहलेसुबह लगभग तीन बजेभगवान को जागृत करने के लिए एक अरती हैजिसे काकड आरती कहा जाता है। इसके बाद पंचामृत पूजा की जाती है। आखिरी पूजा रात्रि दस बजे होती है। इसके बाद भगवान सोने के लिए चले जाते हैं।
विट्ठल स्वामी के मंदिर में संगीत की परंपरा है। मंदिर परिसर में साधक सितार लिए ईश्वर की अराधना में लीन रहते हैं। आते जाते लोग उनके सामने श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।

पंढरपुर की यात्रा और वारकरी  - पंढरपुर वारी एक वार्षिक यात्रा है जो हिंदू महीने ज्येष्ठ और आषाढ़ के समय विट्ठल स्वामी मंदिर के लिए निकाली जाती है। इस यात्रा में शामिल होने वाले वारकरी कहलाते हैं। विठोबा के सम्मान में पंढरपुर के लिए तीर्थयात्रियों की यह यात्रा निकलती है। इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु पंढरपुर पहुंचते हैं। तब पूरे शहर में श्रद्धालुओं का रेला उमड़ता है।

सभी जातियों के पुजारी - साल 2014 में पंढरपुर के विठ्ठल−रखुमाई मंदिर ने नई मिसाल कायम की। राज्य में ऐसा पहली बार हुआ जबकि इतने बड़े धार्मिक स्थल पर सभी जातियों के पुजारियों की नियुक्ति की गई। इस तरह का कार्य करने वाला यह राज्य का अनूठा मंदिर बन गया। ऐसा करके समाज में समरसता का संदेश देने की कोशिश की गई। यही संत नामदेव का सच्चा संदेश भी तो है।मंदिर में अलग अलग जातियों के दस पुजारियों की नियुक्ति की गई। इसमें 5 ब्राह्मण के अलावा गुरव, दर्जी और कसार जाति के पुजारी नियुक्त किए गए। सरकार के इस कदम से लोगों ने काफी खुशी जताई।  

( अगली कड़ी में पढ़े - पंढरपुर और संत नामदेव और गोरा कुम्हार के बारे में ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(PANDHARPUR,  BITHOBA TEMPLE, KRISHNA, SANT NAMDEV  ) 


Sunday, April 21, 2019

कोल्हापुर से पंढरपुर- सितार, सरोद, तानपुरा का शहर मिरज

कोल्हापुर से सुबह-सुबह महाराष्ट्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पंढरपुर के लिए चल पड़ा हूं। विठोबा की नगरी में जाने की सालों पुरानी इच्छा पूरी हो रही है। होटल से सुबह 4.30 बजे ही स्नानादि से निवृत होकर चेकआउट कर दिया है। बस स्टैंड के लिए एक आटो भी मिल गया। सुबह 5 बजे पंढरपुर जाने वाली बस मिल गई है। ये एमएसआरटीसी की 2 बाई 2 बस है। इसमें पंढरपुर का किराया 315 रुपये है। सफर चार घंटे से ज्यादा का हो सकता है। 

कोल्हापुर से पंढरपुर वाया मिरज 190 किलोमीटर के आसपास है। हालांकि कोल्हापुर से पंढरपुर की सीधी बसें ज्यादा नहीं है। पर कोल्हापुर से मिरज और फिर मिरज से पंढरपुर भी जाया जा सकता है।

 कोल्हापुर से मिरज की दूरी 48 किलोमीटर है। रास्ते में शिरोली नामक कस्बा आया। मैं सूरज उगने से पहले मिरज बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। यहां पर बस पांच मिनट डिपो में रूकी रही।

शास्त्रीय संगीत का शहर मिरज -  मिरज सांगली जिले का एक शहर है। इस शहर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा रही है। मिरज सितार के लिए जाना जाता है। यहां सितार, सरोद और तानपुरा का निर्माण होता है। यहां गंधर्व महाविद्यालय का मुख्यालय है। शास्त्रीय संगीत की महान हस्तियां पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर और बाल गंधर्व का संबंध मिरज से है।


बस मिरज से आगे चल पड़ी है। शिरढोण के बाद नागज से बस गुजर रही है। यहां पर पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाले तमाम विंड टरबाइन चलते हुए दिखाई दे रहे हैं।

बस संगोला पहुंची है। यह सोलापुर जिले का कस्बा है। यहां बस स्टैंड में बस तकरीबन दस मिनट रुक रही। इसके बाद चलने के बाद पंढरपुर चलकर ही रूकी। 

पंढरपुर का बस स्टैंड काफी बड़ा है। परिसर में अहिल्याबाई होल्कर और शिवाजी के विशाल चित्र लगे हैं। बस स्टैंड परिसर में जो सुलभ शौचालय का भवन बना है वह तीन मंजिला है जो दूर से कोई विशाल सरकारी दफ्तर या होटल सा नजर आता है।

मैं पंढरपुर यानी बिठोबा की नगरी में पहुंच गया हूं। बस स्टैंड से निकलकर एक रेस्टोरेंट में सुबह के नास्ते के लिए बैठ गया। नास्ते में पूरी और सब्जी। नास्ता करके पैदल मंदिर की तरफ चल पड़ा। मंदिर मार्ग पर दोनों तरफ कई धर्मशालााएं बनी हुई नजर आ रही हैं।



कैसे पहुंचे - पंढरपुर रेल नेटवर्क से भी जुड़ा है। पुणे से दौंद जंक्शन से पंढरपुर का मार्ग बदलता है। कुरदावदी से पंढरपुर की दूरी 53 किलोमीटर है। मुंबई से रोज एक फास्ट पैसेंजर ट्रेन पंढरपुर के लिए चलती है। सोलापुर से पंढरपुर की दूरी 132 किलोमीटर है। सोलापुर से भी पंढरपुर के लिए हर रोज दो रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। दरअसल पंढरपुर कुरदावदी-मिरज रेल मार्ग पर स्थित है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(PANDHARPUR, MIRAJ, SANGLI, BITHOBA TEMPLE ) 
पंढरपुर बस स्टैंड में महारानी अहिल्याबाई होल्कर की विशाल तस्वीर। 

Friday, April 19, 2019

सज्जा कोठी या सदर महल – यहां शिवाजी करते थे गुप्त बैठकें


पन्हाला गढ़ का खास आकर्षण है सज्जा कोठी। वास्तव में इसका निर्माण एक वाच टावर की तरह कराया गया है। पन्हाला गढ़ की यह इमारत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसका लंबाई चौड़ाई 36-36 फीट और ऊंचाई 72 फीट है। ऊपर जाने के लिए बाहर से सीढ़ियां बनी हैं। इसके ऊपरी तल से पन्हाला का सुंदर विस्तार नजर आता है। शिवाजी इसका इस्तेमाल अपनी गुप्त बैठकों के लिए करते थे। 1660 में शिवाजी इसी इमारत से विशालगढ के लिए रवाना हुए थे। यहीं पर शिवाजी ने संभाजी को पन्हाला दुर्ग की जिम्मेवारी सौंपी थी। इसकी ऊंचाई से जोतिबा मंदिर और कोल्हापुर शहर भी नजर आता है। इस इमारत को देखने के लिए हमेशा सैलानियों की भीड़ लगी रहती है।

प्राचीन शिव मंदिर – राजवाड़ा के सामने स्थित शिवमंदिर का निर्माण छत्रपति शाहूजी महाराज ने करवाया था। इस मंदिर के अंदर महारानी ताररानी की चरण पादुका रखी हुई है।

शत्रु संहारक बाघ दरवाजा – पन्हालागढ़ के उत्तरी प्रवेश द्वार का नाम बाघ दरवाजा है। इसकी बनावट ऐसी है कि शत्रु को यहां आसानी से कब्जे में लिया जा सकता है। दरवाजे पर गणेजी की मूर्ति बनी हुई है। यहां तोप रखने की और सैनिकों के विश्राम करने जगह भी बनी हुई है।

दौलती बुर्ज से दूर तक नजर – पन्हाला कोर्ट इमारत के पास दौलती बुर्ज है। इस बुर्ज से 25 मील दूर तक की आवाजाही पर नजर रखी जा सकती है। इसका नाम दौलती बुर्ज यूं पड़ा कि यहां जितने शत्रुओं के टुकड़े किए जाते राज्य की दौलत में उतना ही इजाफा होता था।


तीन दरवाजा या कोंकणी दरवाजा – पन्हाला के पश्चिम की तरह का प्रवेश द्वार तीन दरवाजा है। इसे कोंकणी दरवाजा भी कहते हैं। इसमें पांच मेहराबें और तीन दरवाजे हैं। दरवाजे के मेहराब पर तीन शेरों की आकृति खुदी हुई है। सैनिकों के पानी पीने के लिए यहां एक कुआं बना है जिसका नाम विष्णु तीर्थ है। पन्हाला में आप चार दरवाजा और हरिहरेश्वर विट्ठल मंदिर भी देख सकते हैं।

अंधार बाव मतलब अंधेरी बावड़ी तीन दरवाजा के पास ही दो बावड़ियां हैं जिनके नाम अंधार बाव और श्रंगार बाव है। अंधार बाव मतलब अंधेरी बावड़ी। इसमें तीन मंजिलें पर सामने से एक ही मंजिल नजर आती है। इसके सबसे नीचली मंजिल में कुआं है। बीच की मंजिल से बाहर निकले का एक गुप्त मार्ग है। इस बावड़ी के आसपास नगर परिषद ने सुंदर बागीचा विकसित किया है। इसके आसपास मनोरंजन का पूरा साजो सामान है। कोल्हापुर से काफी लोग पन्हाला पिकनिक मनाने पहुंचते हैं।  



इस बागीचे का पास खाने-पीने की दुकानें हैं। यहां आप ज्वार की रोटी, झुणका भाखरी आदि खा सकते हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए कई तरह खेल तमाशे हैं।
तो चलिए वापस लौट चलते हैं। पन्हाला गढ़ से अगर आप सार्वजनिक वाहन से कोल्हापुर जाना चाहते हैं तो शाम 6.30 बजे के बाद कोई बस या जीप नहीं मिलती है।


कैसे पहुंचे – पन्हालागढ़ की दूरी कोल्हापुर से 24 किलोमीटर है। आप टाउन हाल से जीप से या फिर बस स्टैंड से चलने वाली बसों से यहां पहुंच सकते हैं। या फिर कोल्हापुर आसपास घूमने के लिए दिन भर के लिए टैक्सी आरक्षित कर सकते हैं। अगर आपके पास समय है तो पन्हाला गढ़ में रात्रि विश्राम भी कर सकते हैं। यह एक यादगार अनुभव हो सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( SHIVAJI, PANHALA FORT, KOLHAPUR )