Sunday, March 3, 2019

काली बेई नदी और गुरुनानक देव जी

सुल्तानपुर लोधी का गुरुद्वार बेर साहिब काली बेई नदी के किनारे स्थित है। काली बेई एक नदी है जो पंजाब के होशियारपुर जिले की मुकेरियां तहसील के ग्राम घनोआ के पास से ब्यास नदी से निकली है और यह दुबारा 'हरि के छम्ब' में जाकर ब्यास नदी में ही मिल जाती है। काली बेईं का सिख धर्म के लिए बड़ा धार्मिक महत्व है।
कहा जाता है कि एक सुबह जब वह सूर्योदय से पहले गुरुनानक देव जी काली बेई नदी में स्नान कर रहे थे, तो गुरूजी काली बेईं में अचानक गायब हो गए और नदी से 2 किलोमीटर की दूरी पर फिर से निकल आए। इसके उनके द्वारा कहा पहला कथन यह था कोई भी हिन्दू या कोई भी मुसलमान नहीं है। यानी सभी लोग एक समान है। यहां पर गुरुद्वारा संत घाट बना है।

काली बेई नदी के तट पर मेरी बात गुरुद्वारे के एक रागी से होती है। उन्होंने मुझे समझाया सिख का मतलब ये नहीं कि जो पगड़ी बांधता है सिर्फ वही सिख है। जिसने भी गुरुनानक देव के वचनों से सिख लिया वह सभी सिख हैं। इसलिए मेरी नजर में आप भी सिख हो सकते हैं।

काली बेई नदी को गुरुनानक देव जी के साथ जोड़कर पवित्र नदी के तौर पर देखा जाता है। पर काली बेई का पंजाब के दोआबा क्षेत्र में काफी महत्व भी है। 160 किलोमीटर लंबी इस नदी के किनारों पर 93 गांवों की 50 हजार एकड़ से अधिक जमीन पर खेती होती थी।
संत सींचेवाल की मुहिम और काली बेई की सफाई - 
काली बेई नदी की चर्चा हो तो संत बलबीर सिंह सींचेवाल का चर्चा न हो ऐसा भला कैसे हो सकता है। बाबा जी ने इस नदी को निर्मल बनाने में बड़ा योगदान किया है।

सींचेवाल धुन का पक्के एक ऐसे संत हैं जिन्होंने आस-पास के गांवों में सड़कें बनवाकर उनकी तस्वीर बदली तो पंजाब में दम तोड़ती नदी काली बेई को फिर से जीवित कर 93 गांवों के लोगों के जीवन में उजाला किया। पर्यावरण के प्रति इनके कार्यो को देखते हुए टाइम पत्रिका ने इन्हें दुनिया के 30 पर्यावरण नायकों की सूची में शामिल किया तो सरकार ने 2017 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो अभियान उन्होंने अकेले शुरू किया था, आज उसकीचर्चा दुनिया भर में हो रही है। कई देशों के लोग सुल्तानपुर लोधी आकर उनके प्रयोगों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

कपूरथला के गांव सीचेवाल में दो फरवरी 1962 को जन्मे बलबीर सिंह 1981 में कॉलेज छोड़ने के बाद से ही समाज सेवा में जुट गए। उनके गांव के रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे। उन्होंने खुद फावड़ा लेकर रास्तों को समतल बनाना शुरू किया। साल 2000 में जालंधर की  एक सभा में कई लोगों ने काली बेई नदी की बदहाली पर चिंता जताई। यह वह समय था जब छह से ज्यादा नगरों और 40 गांवों के लोग इस नदी में कूड़ा फेंकते थे। सभा में संत सीचेवाल ने कहा कि सिर्फ चिंता करने से कुछ नहीं होगा। अगर सब लोग चाहते हैं कि इस मरती हुई नदी को जिंदा करना है तो सुबह से ही काम पर लगते है। 

अगले दिन वे अपना फावड़ा और ट्रैक्टर लेकर सहयोगियों के साथ काली बेई के तट पर पहुंच गए और सफाई में जुट गए। उनके प्रयासों को देख लोग नदी को साफ करने में और भी लोग जुड़ते चले गए। एक दिन ऐसा आया जब नदी एक बार फिर जीवित और पवित्र दिखाई देने लगी। नदी से निकलने वाले गंदे पानी के लिए सीचेवाल ने एक मॉडल तैयार किया। काली बेई के सफाई के इस मॉडल का अनुकरण दूसरे राज्यों ने भी किया है।

विद्युत प्रकाश मौर्य Email – vidyutp@gmail.com
(SULTANPUR LODHI, KALI BAI RIVER, GURUNANK DEV JI, BER SAHIB GURUDWARA )

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