Friday, March 22, 2019

बठिंडा का किला मुबारक और गुरुद्वारा


बठिंडा के होटल में सुबह 4.30 बजे  ही जगकर स्नान करके तैयार होकर मैं 5.30 बजे सुबह होटल से बठिंडा की सड़क पर निकल पड़ा। दिसंबर की सुबह में 5.30 बजे बाहर निकलना कुछ लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। मैं लोगों से किला मुबारक का रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ रहा हूं।

बठिंडा पंजाब के बहुत पुराने शहरों में से है। भाटी राजा राव भाटी ने तीसरी सदी में लाखी के जंगलों में इस शहर को बसाया था। इसी दौरान भाटी राजाओ ने किला मुबारक का निर्माण कराया। कुछ इतिहासकार इस किले को पहली सदी का बना हुआ मानते हैं। इसके निर्माण में कुषाण कालीन ईंटों का इस्तेमाल हुआ है।

पंजाब के प्रमुख नगर बठिंडा शहर का पुरातन एवं ऐतिहासिक किला मुबारक जिसे रजिया सुल्तान किले के नाम से भी जाना जाता है, की हालत पिछले कई वर्षों से काफी खस्ता है। इसके कई बुर्ज खतरनाक घोषित कर दिए गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और पंजाब सरकार के प्रयास से इस किले की मरम्मत की कोशिश की जा रही है। किले के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है कि बरसात के समय किले के द्वार के आसपास न खड़े हों। दीवारों के गिरने का खतरा है।

सन 1004 में महमूद गजनी ने बठिंडा के किला मुबारक पर कब्जा कर लिया। बाद में यह किला मोहम्मद गोरी के कब्जे में भी रहा। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इस किले को जीत लिया। पर इस पंजाब के किले का इतिहास आगे भी रोचकता भरा है। 

रजिया सुल्तान कैद रही यहां - सन 1239 में भारत की पहली महिला शासक रजिया सुल्तान को इसी किले में उसके गवर्नर अल्तुनिया ने कैद करके रखा गया था। इसलिए किला मुबारक को रजिया सुल्तान से जोडकर भी देखा जाता है। रजिया यहां कई महीने तक यहां कैद में रहीं। बाद में हरियाणा के कैथल में रजिया पर हमला हुआ जिसमें वे मारी गईं। रजिया की कब्र कैथल में ही है।

किला मुबारक का प्रवेश द्वार काफी बड़ा और भव्य है। किले के अंदर कुछ मध्यम दूरी तक मार करने वाली तोपों का भी संग्रह देखा जा सकता है। किला मुबारक में सुबह सैर करने वालों की भी जमघट लगती है। किले की दीवारों की चौड़ाई इतनी ज्यादा है लोग उस पर सुबह की सैर करते हुए नजर आते हैं।

दसवीं पातशाही का गुरुद्वारा - सिखों के दसवें सिख गुरू गुरू गोबिंद सिंह इस किले में 1705 के जून माह में आए थे और इस जगह की सलामती और खुशहाली के लिए प्रार्थना की थी। किले के अंदर उनकी याद में दो गुरुद्वारे बने हुए हैं। यह पंजाब के प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारों में एक है। सुबह 5 बजे से ही इस गुरुद्वारा में दर्शन के लिए शहर के श्रद्धालु आने लगते हैं।

मैंने भी सुबह-सुबह गुरुद्वारे में मत्था टेका। शहर के काफी लोग सुबह सुबह यहा पहुंच चुके हैं। यहां लंगर में चाय और नमकीन मिली। कुछ देर गुरुद्वारे के आत्मीय वातावरण में गुजारने के बाद मैं होटल वापस लौट आया। चेकआउट करके रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंच गया। बठिंडा रेलवे स्टेशन साफ सुथरा है। 
बठिंडा से दिल्ली वापसी - हमारी ट्रेन 12482 श्रीगंगा नगर दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस है। यह समय पर चल रही है। सुबह 8.10 बजे यह बठिंडा पहुंच गई है। बठिंडा से पहले इसका अबोहर, मलोट और गिदड़बाहा में इसके ठहराव हैं। मौड़, मानसा, जाखल, नरवाना, जींद में रुकती हुई ट्रेन रोहतक पहुंच गई है। इसके बाद सांपला, बहादुरगढ़ में रुकने के बाद ट्रेन के पहिए पुरानी दिल्ली की ओर दौड़ रहे हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(QUILA MUBARAK, BATHINDA, PUNJAB, GURUDWARA 10th GURU )  


3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व जल दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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