Sunday, March 10, 2019

एक बार फिर मुक्तसर की पवित्र धरती पर...


फरीदकोट शहर के सरदार अवतार सिंह बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। रात हो चुकी है। मुझे मुक्तसर की बस लेनी है। फरीदकोट से मुक्तसर की दूरी 45 किलोमीटर है। फरीदकोट का बस स्टैंड काफी बड़ा है पर लोगों ने बताया मुक्तसर वाली बस गेट से ही मिलेगी। मेरे साथ कुछ और लोग मुक्तसर वाली बस का इंतजार कर रहे हैं। थोडी देर में एक बस आई। फरीदकोट से मुक्तसर का रास्ता कोटकपूरा होकर है। हालांकि बस कोटकपूरा में रूकी नहीं। राज्य सरकार की सड़क कोटकपूरा मुक्तसर टोल वे बस गुजर रही है। ये सड़क नेशनल हाईवे जैसी बनी है। मुक्तसर में रात को नौ बजे पहुंचा गया हूं। मुक्तसर मैं तीसरी बार पहुंचा हूं।


 पहली बार 1999 में अमर उजाला के साथियों के संग आया था। दूसरी बार ज्ञानचंद शाक्य के बुलावे पर आया था। पर अब मेरे पास उनका नंबर नहीं है। कुछ साथियों से तलाशने की कोशिश की पर नंबर नहीं मिला।अपनी पिछली मुक्तसर यात्रा में उनके घर रुका था। उनसे काफी आत्मीयता थी। अगर उनसे बात हो जाती तो आज मुक्तसर में किसी होटल में रुकने की जरूरत नहीं पडती।

मेरे मोबाइल का चार्जिंग केबल गुम हो गया है। मुक्तसर में एक मोबाइल शॉप से केबल खरीदा। उनसे किसी होटल के बारे में पूछा तो उन्होंने गुरुद्वारा साहिब जाने की सलाह दी। मुक्तसर बस स्टैंड के सामने कुछ होटल हैं। एक होटल में गया उसने कमरे का किराया 450 रुपये बोला। कमरा मुझे कुछ खास पसंद नहीं आया। मैं लोगों से दरबार साहिब का रास्ता पूछकर आगे बढ़ गया। यह सोचकर कि गुरुद्वारा साहिब में सस्ता निवास मिल जाएगा। मुक्तसर का दरबार साहिब काफी विशाल है। इसके कई अलग अलग प्रवेश द्वार हैं। पूछते पूछते मुक्तसर गुरुद्वारा से स्वागत कक्ष पर पहुंच गया हूं। यहां पर अतिथि निवास बना है। मैं कलगीधर निवास के स्वागत कक्ष पर पहुंचा। पर प्रबंधक महोदय नदारद हैं। थोड़ी देर उनका इंतजार किया। वे नहीं आए पर दूसरे संगतों से पता चला कि कोई कमरा खाली नहीं है। बाहर खुले में सोने का विकल्प बचा है। दिसंबर की ठंड में ये मेरे लिए मुश्किल है। बाहर आकर किसी होटल के बारे में पूछता हूं।
पास में पूछता हुआ सिटी होटल पहुंच गया। वहां सिंगल रूम 500 रुपये का है। पर वह भी खाली नहीं है। होटल वाले बस स्टैंड जाने की सलाह देते हैं। वे बताते हैं कोटकपूरा रोड पर कुछ होटल हैं पर वे महंगे हैं। मुझे तो बस रात को सोना भर है। खाना दिन में कई बार थोड़ा थोड़ा खा चुका हूं। रात के नौ से ज्यादा बज रहे हैं। बाजार धीरे धीरे बंद हो रहा है।
एक बार फिर बस स्टैंड की ओर वापस लौट रहा हूं। यह सोचकर की उसी बस स्टैंड के पास वाले होटल में ठहर जाउंगा। पर एसआरएस सिनेमा के बाद गली में होटल उपकार पीजी हाउस का बोर्ड नजर आता है। मैं जाकर कमरे के बारे में पूछता हूं। सरदार जी कहते हैं कमरा खाली है पर हमारे पास स्टाफ नहीं है। थोडी मैं मदद करूंगा थोडी आप कमरे की चादरें बदली होंगी। किराया 350 रुपये टीवी के साथ। मैं तुरंत तैयार हो गया। सड़क से लगा बॉलकोनी वाला सुंदर कमरा हाजिर था। मैं आराम से सो गया। इस होटल के साथ अच्छा सा वेज नॉन वेज रेस्टोरेंट भी है। साथ ही वे टिफिन सर्विस भी चलाते हैं। 

अगली सुबह 5 बजे ही जगकर गुरुद्वारा साहिब मत्था टेकने पहुंच गया। पहले सरोवर के किनारे किनारे पूरे गुरुद्वारे की परिक्रमा की। फिर लंगर में चाय पी। सरदी में चाय तो अच्छी लगती है। मत्था टेकने के बाद हलवा प्रसाद मिला। प्रसाद पाकर निहाल हुआ और बस स्टैंड पहुंच गया आगे की यात्रा के लिए।

मुक्तसर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा पर पूर्व में  लिखे आलेख पढ़े 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( MUKTSAR SAHIB, UPKAR PG HOUSE )


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