Saturday, March 30, 2019

छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस और सेल्फी प्वाइंट

हमलोग सिद्धि विनायक  के दर्शन के बाद मंदिर परिसर में स्ट्रीट फूड का आनंद लेने लगे। गोलगप्पे। खाते खाते गोलगप्पे वाले से पूछा,  भैया,  कहां घर है। जवाब मिला, बनारस। मंडुवाडीह। यहां 40 साल से गोलगप्पे की दुकान लगा रहे हैं। मुंबई मेहनत करने वालों को बरकत देती है। थोड़ा और घूमने के बाद मंदिर परिसर में स्थित सिद्धि विनायक कैफे में पहुंच गए। कैफे का वातावरण सात्विक है। हमलोगों ने शाम का नास्ता लिया। पूरी भाजी और कॉफी। यहां चाय पीतल के ग्लास में पेश की जा रही है। साफ सुथरा सुंदर सा रेस्टोरेंट है जहां हमेशा लोगों की भीड़ लगी रहती है। अब बाहर निकलकर मिठाईवाली दुकान से अपना लगेज लिया। एक टैक्सी वाले बात की छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल (सीएसटीएम) छोड़ने के लिए। उन्होंने इनकार किया पर उनके पीछे खड़े टैक्सी वाले तैयार हो गए।
  टैक्सी वाले का नाम संतोष गायकवाड है। ( फोन नंबर – 98928 34213 ) वे कई दशक से टैक्सी चला रहे हैं मुंबई में। पर वे मुंबई के बड़े अच्छे गाइड हैं। मुंबई के हर दर्शनीय स्थल की खासियत जबानी बताते हैं। वे दिन भर टैक्सी बुक करके मुंबई घुमाते भी हैं। कभी आप मुंबई जाएं तो उन्हें याद कर सकते हैं।रास्ते में मरीन ड्राईव आने पर वे तारपोरवाला एक्वेरियम से पहले एक बड़ा पाव के स्टाल के बारे में बताते हैं। उसका बड़ा पाव इतना प्रसिद्ध है कि बाला साहेब ठाकरे और सचिन तेंदुलकर भी यहां से पैक कराते थे। गाड़ी जाम में फंसी है। मैं उतरकर उस पाव वाले के पास जाता हूं। लोग लाइन में लगे हैं। बड़ा तले जा रहे हैं। हमारे पास समय नहीं है इसलिए बिना स्वाद लिए आगे बढ़ जाता हूं। हमलोग अपनी मंजिल पर पहुंच गए हैं। सीएसएमटी रेलवे स्टेशन जो विश्व विरासत में शुमार है। हर बार कुछ नया दिखाई देता है।यहां तो कई बार आ चुका हूं। पर इस बार यहां नई चीज बन गई है सेल्फी प्वाइंट। हमें टैक्सी ड्राईवर इस सेल्फी प्वाइंट के बारे में पहले ही बता देते हैं। रात की रोशनी में अलग अलग रंग में चमकते सीएसएमटी के भवन के साथ तमाम लोग अलग अलग एंगिल से तस्वीरें खिंचवा रहे हैं। 

दूसरी तरफ बीएमसी की इमारत रोशन है। इस इमारत के आगे एक विशाल प्रतिमा लगी है। अनादि नाम पढ़कर बताते हैं सर फिरोजशाह मेहता (1845-1915)। पारसी, मुंबई के जाने माने वकील, कांग्रेस के नरमपंथी नेता। वे बंबई नगरपालिका के संविधान (चार्टर) के निर्माता थे। साथ ही अंग्रेजी अखबार बांबे क्रानिकल के संस्थापक भी थे।तो अब भूख लग गई है, चलिए चलते हैं भोजन के लिए। सीएसएमटी के बाईं तरफ शिवाला वेज रेस्टोरेंट। ( मोतीवाला हाउस, वालचंद हीराचंद मार्ग, फोर्ट) रेलवे स्टेशन के पास शाकाहारी खाने की मुफीद जगह।हम दो थाली आर्डर करते हैं। एक 170 वाली और दूसरी 140 वाली। वे हमें पहले सूप पेश करते है। फिर खाने में तमाम वेराइटी। सुस्वादु खाना। खाकर हमलोग तृप्त हो गए। 

शिवाला में नीचे समान्य और ऊपर एसी डायनिंग हॉल है। हमें कोई जल्दी नहीं है पुणे वाली ट्रेन 10.55 बजे है। शिवाला वेज से डिनर के बाद हमलोग सीएसएमटी रेलवे स्टेशन के अंदर आ गए हैं।
हमें तकरीबन एक घंटा ट्रेन का इंतजार करना है। इस बीच स्टेशन पर हमें मुंबई में 2008 में इस रेलवे स्टेशन पर हुए आतंकी हमले का स्मारक दिखाई देता है। वहां सभी जान गंवाने वाले यात्रियों और रेल कर्मचारियों के नाम लिखे गए हैं। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर विशाल डैने वाले पंखे लगे हैं जो ठंडी हवा दे रहे हैं। हमारी ट्रेन है 51027 फास्ट पैसेंजर। ये पंढरपुर तक जाती है। इसमें स्लिपर क्लास भी है। महज 100 रुपये में रातभर सोते हुए पुणे पहुंच जाएं। दूसरी बार इस ट्रेन से जा रहा हूं। सुबह 4.30 बजे हमलोग पुणे पहुंच गए हैं। यहां से सुबह-सुबह उबर कैब करके हमलोग खराडी की ओर चल पड़े।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  



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(CSMT RAILWAY STN, SHIVALA VEG, COLABA, MUMBAI TO PUNE  ) 

Thursday, March 28, 2019

सिद्धि विनायक मंदिर - गणपति के शरण में

यूं तो मुंबई कई बार आ चुके हैं हम। मुंबई के ज्यादातर स्थलों को देख भी चुके हैं पर सिद्धिविनायक मंदिर जाना नहीं हो सका है। तो इस बार इच्छा है मंदिर जाने की। सिद्धिविनायक मंदिर दादर रेलवे स्टेशन से करीब है। गुजरात एक्सप्रेस से उतरने के बाद सिद्धिविनायक जाने के लिए हमलोग फ्लाईओवर से रेलवे लाइन पार करके दूसरी तरफ आ गए हैं। एक टैक्सीवाले से सिद्धिविनायक जाने की बात की। वह बोला जाम मिलता है मीटर से नहीं 50 रुपये फिक्स किराया लूंगा। हमारे पास चार लगेज भी हैं तो हम तैयार हो गए। दादर से सिद्धिविनायक मंदिर तकरीबन दो किलोमीटर है। थोड़ी देर में हमलोग मंदिर पहुंच गए हैं।

मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले प्रसाद की दर्जनों दुकाने हैं। एक दुकान में सारा लगेज रख दिया। इसके एवज में दुकान महोदय से 100 रुपये का प्रसाद लिया और मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए। दिसंबर 26 साल 2018 बुधवार का दिन है। गणेश जी का दिन।
भक्तों की जल्दी सुनते हैं सिद्धि विनायक
सिद्धि विनायक मतलब प्रथम पूज्य श्रीगणेश का खास रूप। गणपति का यह रूप काफी अलग है। मुंबई का सबसे लोकप्रिय मंदिर है प्रभा देवी स्थित सिद्धि विनायक मंदिर। यहां बड़े बड़े उद्योगपति राजनेता और फिल्म स्टार भी दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मुंबई के सारे मंदिरों की तुलना में यहां सबसे ज्यादा भीड़ होती है। मुंबई ही क्या यह देश के सबसे व्यस्त गणपति के मंदिरों में शामिल है। बुधवार को श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ जाती है। गणेश चतुर्थी जैसे समय में दर्शन में 14 से 20 घंटे भी लग सकते हैं।

ऐसे होते हैं सिद्धिविनायक -  कहा जाता है कि गणेश जी जिन प्रतिमाओं की सूड़ दाईं तरह मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्धि विनायक मंदिर कहलाते हैं। कहते हैं कि सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की अति शीघ्र सुनते और मनोकामना पूरी करते हैं।

मुंबई स्थित सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण 1801 में विट्ठु और देउबाई पाटिल ने किया था। पहले यह छोटा सा मंदिर था। पहले यह ईंटों की बनी हुई कुछ फीट चौड़ी संरचना थी। बाद में इसे भव्य रूप प्रदान किया गया। इस मंदिर के अंदर एक छोटे मंडपम में भगवान गणेश के सिद्धि विनायक रूप की प्रतिमा स्थापित की गई है।


सिद्धि विनायक का यह विग्रह ढाई फीट ऊंचा है। उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है। नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक से भरा कटोरा है। गणपति के दोनों ओर उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि मौजूद हैं जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक है। मस्तक पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है। मंदिर में सूक्ष्म शिल्पाकारी से परिपूर्ण गर्भगृह के लकड़ी के दरवाजों पर अष्ट विनायक को प्रतिबिंबित किया गया है। अंदर की छतें सोने की परत से सुसज्जित हैं।

मुंबई का सबसे अमीर मंदिर - अब मंदिर का प्रबंधन सिद्धि विनायक ट्रस्ट देखता है। आज यह मुंबई का सबसे धनी मंदिर है। अरबों रुपये मंदिर के खाते में फिक्स्ड डिपोजिट में जमा है। यह मंदिर मुंबई के लोगों के दिल के बहुत करीब है। 

मंदिर परिसर में फूलमाला और प्रसाद की सौ से ज्यादा दुकाने हैं। जहां से आप प्रसाद लेकर मंदिर में दर्शन के लिए जा सकते हैं। वैसे आप मंदिर के काउंटर से भी प्रसाद खरीद सकते हैं।

सात किलो का मोदक - मंदिर का मुख्य प्रसाद मोदक है। यहां पर कुछ दुकानों में सवा किलो का मोदक मिलता है तो यहां सात किलो का एक मोदक भी खरीदा जा सकता है।

मुख दर्शन और गर्भ गृह दर्शन- मंदिर में दो तरह के दर्शन हैं। मुख दर्शन और गर्भ गृह दर्शन। जिन लोगों को कम समय में दर्शन करना हो वे मुख दर्शन कर सकते हैं। इसमें गणपति के दर्शन दूर से होते हैं। जबकि गर्भ गृह में जाकर दर्शन करने में लंबी लाइन में लगना पड़ता है। समान्य दिनों में भी कम से कम दो घंटे का समय लग सकता है। मंगलवार और बुधवार को दर्शन में और भी ज्यादा समय लग सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vidyutp@gmail.com
( MUMBAI, SIDDHI VINYAK TEMPLE, PRABHA DEVI, DADAR ) 

Tuesday, March 26, 2019

सूरत से मुंबई गुजरात एक्सप्रेस से


सूरत से मुंबई की हमारी ट्रेन गुजरात एक्सप्रेस 11 बजे दिन में है। हमलोग एक घंटे पहले प्लेटफार्म पर पहुंच गए हैं। हालांकि इससे पहले भी कुछ ट्रेनें मुंबई के लिए हैं पर उनमें कनफर्म टिकट मिलना मुश्किल था। प्लेटफार्म नंबर दो पर ट्रेन आएगी। सूरत रेलवे स्टेशन की खास बात है कि यहां एक प्लेटफार्म से दूसरे पर जाने के लिए अंडरपास बने हुए हैं। मतलब सीढियां चढ़ने या उतरने की जरूरत नहीं है। बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगों के लिए बैटरी रिक्शा का इंतजाम है जो किसी भी प्लेटफार्म पर आपको पहुंचा देता है। इससे पहले एक बार मैं सूरत से मुंबई मार्ग की ट्रेन ले चुका हूं। वह ट्रेन थी प्लाइंग रानी एक्सप्रेस जो सुबह सुबह सूरत से मुंबई जाती है।
हम जिस ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं उसका नाम गुजरात एक्सप्रेस (22954 ) है। यह अहमदाबाद से मुंबई सेंट्रल के बीच चलती है। ज्यादातर स्टेशनों पर रुकती हुई आगे बढ़ती है। पर यह गुजरात के तमाम शहरों को मुंबई से जोड़ने वाली लोकप्रिय ट्रेन है। इसमें सेकेंड सिटिंग क्लास है। ट्रेन में सेकेंड सिटिंग के नौ कोच हैं। जबकि तीन वातानुकूलित कोच हैं। ट्रेन में 9 अनारक्षित कोच भी हैं। पर अक्सर ट्रेन भरी हुई रहती है। इसमें डी3 और डी5 में हमारी तीन सीटें हमारी आरक्षित हो गई हैं लेकिन दो सीटें एक कोच में है तो तीसरी दूसरे कोच में। मैं व्हेर इज माई ट्रेन एप पर देख रहा हूं। ट्रेन समय पर आ रही है। जिस कोच में दो सीटें हैं वहां माधवी और वंश को बिठाकर मैं एक सीट वाली अगले कोच में चला गया हूं।
सूरत से मुंबई के बीच गुजरात एक्सप्रेस के कोच में खाने पीने का बाजार चलता रहता है। मानो ट्रेन न हो कोई स्ट्रीट फूड का चलता फिरता रेस्टोरेंट हो। अमरुद वाले, मूगफली वाले, चिकी वाले, खम्मम ढोकला वाले लगातार आ जा रहे हैं। तो बीच बीच में हम भी कुछ लेकर खाते रहे। थोड़ी देर बाद जुगाड़ करके हम तीनों एक ही कोच में पहुंच गए। इस जुगाड़ में सफर के दौरान बनाया जनसंपर्क काम आया। इसके अब गुजरात में आ गए हैं तो ढोकला और खम्मम न खाएं तो भला क्या गुजरात से गुजरना।
दिसंबर का महीना है लेकिन ट्रेन में ठंड बिल्कुल नहीं लग रही है। सूरत के बाद ट्रेन नवसारी, बिलिमोरा, वलसाडा, उदवादा, वापी, भिलड होती हुई आगे बढ़ रही है। मुंबई जाने के लिए लोकप्रिय ट्रेन होने के कारण गुजरात एक्सप्रेस में हमेशा अच्छी खासी भीड़ चलती है। हमारा टिकट पहले वेटिंग था जो कई दिनों के बाद कनफर्म की स्थिति में आया है। हालांकि हर स्टेशन पर लोग चढ़ते उतरते रहते हैं पर लोगों की भीड़ हमेशा बनी रहती है। इस बीच ट्रेन में कुछ गाना गाने वाले भी पहुंचते हैं।
गुजरात एक्सप्रेस में उमरगाम रोड गुजरात का आखिरी रेलवे स्टेशन है। इसके बाद आने वाले दहानु रोड के बाद महाराष्ट्र शुरू हो गया है। यह महाराष्ट्र का पालघर जिला है। गुजरात एक्सप्रेस का समय मुंबई सेंट्रल में 3.55 बजे शाम को है। पर हमें इस बार सेंट्रल नहीं जाना है। हमलोग दादर रेलवे स्टेशन पर ही उतर जाएंगे। बोरिवली के बाद ट्रेन 3.40 बजे दादर पहुंच गई है। बायीं तरफ आखिरी प्लेटफार्म पर हमलोग उतर गए हैं।  तो एक बार फिर महानगरी में ...

-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email – vidyutp@gmail.com
-        ( SURAT, MUMBAI, RAIL, GUJRAT EXPRESS )

Sunday, March 24, 2019

दिल्ली से डायमंड सिटी सूरत की उड़ान

दिल्ली से सूरत की उड़ान है हमारी। भला सूरत क्यों। दरअसल जाना तो मुंबई या पुणे था लेकिन सूरत की फ्लाइट सस्ती मिल रही थी इसलिए सूरत का ही टिकट ले लिया। इंडिगो की उड़ान है सुबह सुबह टी-2 से। टी-2 से उतरना-चढ़ना कई बार हो चुका है। बाहर से टी-2 भव्य नहीं लगता पर अंदर सब ठीक-ठाक है। एयरपोर्ट के बुक स्टाल पर देख रहा हूं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पर भी किताब आ गई है। बिक भी रही है। क्रिसमस का मौका है तो एयरपोर्ट के लांउज में सुंदर क्रिसमस ट्री सजा है। लोग उसके साथ सेल्फी ले रहे हैं। 
नियत समय पर बोर्डिंग पास लेकर हमलोग इंतजार कर रहे हैं। यहां एयर ब्रिज से प्रवेश नहीं है। हालांकि टी-2 पर एयरब्रिज की सुविधा है। पर तमाम सुबह की फ्लाइट के लोगों को बस से ले जाते हैं। हालांकि एयरब्रिज बोर्डिंग का समय बचाता है।
 जो इंडिगो का विमान सूरत तक उड़ान भर रहा है यह आगे बेंगलुरू जाने वाला है। विमान तकरीबन डेढ़ घंटे बाद अपने सही समय पर सूरत में उतर गया। इसे कैप्टन रोहित वर्मा उड़ा रहे थे। को-पायलट हैं अरविंद पाटिल। क्रू मेंबर हैं रोहिणी, आसमां, पूजा और प्राची। सबका धन्यवाद। सुबह-सुबह सूरत एयरपोर्ट से हमलोग बाहर निकल आए हैं। बाहर खिली-खिली धूप पसर रही है।


सूरत एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन 18 किलोमीटर है। हालांकि शहर जाने के लिए शटल बस सेवा है, पर वह देर से आएगी। यहां प्रीपेड टैक्सियां महंगी हैं। ओला उबर की दरें भी 300 से ज्यादा आ रही हैं।
हमलोगों ने एक आटो वाले से बात की। वह 200 रुपये पर तैयार हुआ रेलवे स्टेशन छोड़ने के लिए। आटो में बैठने के बाद पता चला कि सूरत एयरपोर्ट से आधा किलोमीटर चलने पर हाईवे आ जाता है जहां से आपको सिटी बसें भी मिल सकती हैं।
आटो वाला थोड़ा चालाक है। रेलवे स्टेशन के पास छोड़ने के बाद मुझसे 200 की जगह 250 मांगने लगा। काफी हुज्जत के बाद माना। अब हमलोगों को सुबह के नास्ते के लिए एक शाकाहारी रेस्टोरेंट की तलाश है।


स्टेशन के पास हमलोग पूछते हुए महालक्ष्मी गुजराती भोजनालय पहुंचते हैं। नाम गुजराती है पर सुबह सुबह यहां दक्षिण भारतीय नास्ता मिल रहा है।
यहां मसाला डोसा, पेपर डोसा और उत्पम मिल रहा है। हमें तो यही चाहिए था। खाने पीने की दरें भी वाजिब हैं। तो नास्ता इस तरह कर लिया गया कि दोपहर तक खाने की कोई खास जरूरत न रहे। पेट पूजा के बाद हमलोग सूरत रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ चले। ट्रेन आने में अभी वक्त है तो हमें स्टेशन पर थोड़ा इंतजार करना होगा। 



हीरों की नगरी सूरत सूरत हीरों की नगरी है। भले ही यहां हीरे की खान नहीं है। पर हीरों को तराशने का काम यहां बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए इसे डायमंड सिटी के नाम से जाना जाता है। देश के जाने माने हीरा तराशने वाले फर्म सूरत से ही हैं। सूरत के हीरा कारोबार में हजारों लोग काम करते हैं। साल 2011 में शहर की जनसंख्या 45 लाख से अधिक थी।



सूरत वह शहर है जहां मुगल काल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कारखाना लगाकर तिजारत शुरू किया था। तो यह उद्योग व्यापार की पुरानी नगरी है। आज सूरत की प्रसिद्धि साड़ियों के निर्माण और हीरों के कारण है। देश के कई प्रसिद्ध हीरों के ब्रांड सूरत में अपना प्रोसेसिंग प्लांट संचालित करते है। सूरत रेलवे स्टेशन पर लगे कुछ म्यूरल्स हीरों के निर्माण प्रक्रिया की दर्शाते हैं।


आबादी में सूरत गुजरात का सबसे बड़ा शहर है। बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों से आए हुए मजदूर यहां पर फैक्टरियों में श्रमिक के तौर पर काम करते हैं। 

हरिपुरा कांग्रेस : आपको पता है कांग्रेस का 51 वां अधिवेशन 1938 में सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में हरिपुरा में हुआ था। ये हरिपुरा कहां है। उत्तर है सूरत शहर के पास ही हरिपुरा एक गांव हुआ करता था। अब यह सूरत शहर का बाहरी हिस्सा हो गया है। कांग्रेस अधिवेशन के लिए हरिपुरा को बड़े ही कलात्मक ढंग से सजाया गया था। 
जब शिवाजी ने सूरत को लूटा: गुजरात में सूरत और अहमदाबाद की गिनती अमीर शहरों में होती थी . छत्रपति शिवाजी ने 3 अक्तूबर 1670 को सूरत पर चढ़ाई कर तीन दिन तक लूटा था। नगर से ढेर सारा सोना लूटने के बाद एक पत्र लिखा कि अगर इस लूट से बचना चाहते हो तो 12 लाख रुपये सालाना देना स्वीकार करो।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com
-        (SURAT, GUJRAT, DIMOND CITY, HARIPURA CONGRESS )


Friday, March 22, 2019

बठिंडा का किला मुबारक और गुरुद्वारा


बठिंडा के होटल में सुबह 4.30 बजे  ही जगकर स्नान करके तैयार होकर मैं 5.30 बजे सुबह होटल से बठिंडा की सड़क पर निकल पड़ा। दिसंबर की सुबह में 5.30 बजे बाहर निकलना कुछ लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। मैं लोगों से किला मुबारक का रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ रहा हूं।

बठिंडा पंजाब के बहुत पुराने शहरों में से है। भाटी राजा राव भाटी ने तीसरी सदी में लाखी के जंगलों में इस शहर को बसाया था। इसी दौरान भाटी राजाओ ने किला मुबारक का निर्माण कराया। कुछ इतिहासकार इस किले को पहली सदी का बना हुआ मानते हैं। इसके निर्माण में कुषाण कालीन ईंटों का इस्तेमाल हुआ है।

पंजाब के प्रमुख नगर बठिंडा शहर का पुरातन एवं ऐतिहासिक किला मुबारक जिसे रजिया सुल्तान किले के नाम से भी जाना जाता है, की हालत पिछले कई वर्षों से काफी खस्ता है। इसके कई बुर्ज खतरनाक घोषित कर दिए गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और पंजाब सरकार के प्रयास से इस किले की मरम्मत की कोशिश की जा रही है। किले के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है कि बरसात के समय किले के द्वार के आसपास न खड़े हों। दीवारों के गिरने का खतरा है।

सन 1004 में महमूद गजनी ने बठिंडा के किला मुबारक पर कब्जा कर लिया। बाद में यह किला मोहम्मद गोरी के कब्जे में भी रहा। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इस किले को जीत लिया। पर इस पंजाब के किले का इतिहास आगे भी रोचकता भरा है। 

रजिया सुल्तान कैद रही यहां - सन 1239 में भारत की पहली महिला शासक रजिया सुल्तान को इसी किले में उसके गवर्नर अल्तुनिया ने कैद करके रखा गया था। इसलिए किला मुबारक को रजिया सुल्तान से जोडकर भी देखा जाता है। रजिया यहां कई महीने तक यहां कैद में रहीं। बाद में हरियाणा के कैथल में रजिया पर हमला हुआ जिसमें वे मारी गईं। रजिया की कब्र कैथल में ही है।

किला मुबारक का प्रवेश द्वार काफी बड़ा और भव्य है। किले के अंदर कुछ मध्यम दूरी तक मार करने वाली तोपों का भी संग्रह देखा जा सकता है। किला मुबारक में सुबह सैर करने वालों की भी जमघट लगती है। किले की दीवारों की चौड़ाई इतनी ज्यादा है लोग उस पर सुबह की सैर करते हुए नजर आते हैं।

दसवीं पातशाही का गुरुद्वारा - सिखों के दसवें सिख गुरू गुरू गोबिंद सिंह इस किले में 1705 के जून माह में आए थे और इस जगह की सलामती और खुशहाली के लिए प्रार्थना की थी। किले के अंदर उनकी याद में दो गुरुद्वारे बने हुए हैं। यह पंजाब के प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारों में एक है। सुबह 5 बजे से ही इस गुरुद्वारा में दर्शन के लिए शहर के श्रद्धालु आने लगते हैं।

मैंने भी सुबह-सुबह गुरुद्वारे में मत्था टेका। शहर के काफी लोग सुबह सुबह यहा पहुंच चुके हैं। यहां लंगर में चाय और नमकीन मिली। कुछ देर गुरुद्वारे के आत्मीय वातावरण में गुजारने के बाद मैं होटल वापस लौट आया। चेकआउट करके रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंच गया। बठिंडा रेलवे स्टेशन साफ सुथरा है। 
बठिंडा से दिल्ली वापसी - हमारी ट्रेन 12482 श्रीगंगा नगर दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस है। यह समय पर चल रही है। सुबह 8.10 बजे यह बठिंडा पहुंच गई है। बठिंडा से पहले इसका अबोहर, मलोट और गिदड़बाहा में इसके ठहराव हैं। मौड़, मानसा, जाखल, नरवाना, जींद में रुकती हुई ट्रेन रोहतक पहुंच गई है। इसके बाद सांपला, बहादुरगढ़ में रुकने के बाद ट्रेन के पहिए पुरानी दिल्ली की ओर दौड़ रहे हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(QUILA MUBARAK, BATHINDA, PUNJAB, GURUDWARA 10th GURU )  


Wednesday, March 20, 2019

हनुमान गढ़ से बठिंडा वाया मंडी डबवाली

राजस्थान के शहर हनुमानगढ़ से अब मुझे बठिंडा जाना है। हनुमानगढ़ शहर में दो बस स्टैंड हैं। एक सिटी में दूसरा रेलवे स्टेशन के पास। किला देखने के बाद मैं सिटी बस स्टैंड पहुंच गया हूं। पर यहां पता चला कि बठिंडा जाने वाली बस रेलवे स्टेशन के बस स्टैंड से मिलेगी। तुरंत एक लंबी दूरी की बस जो रेलवे स्टेशन के पास वाले बस स्टैंड जा रही थी उसमें बैठ गया। 

हनुमानगढ़ में सिटी और रेलवे स्टेशन के बीच कुछ किलोमीटर खाली जगह है। रेलवे स्टेशन के पास छोटा सा बस स्टैंड है। यहां थोड़ी पूछताछ करने पर पता चला कि यहां से सीधी बठिंडा की कोई बस नहीं मिलेगी। आप मंडी डबवाली जाएं, वहां से दूसरी बस बठिंडा की मिल जाएगी। मंडी डबवाली हरियाणा में है। यानी राजस्थान से हरियाणा फिर पंजाब में प्रवेश करना होगा। एक दिन बाद चुनाव है इसलिए बसें कम हैं। मंडी डबवाली की ढेर सारी सवारियां बस का इंतजार कर रही हैं। एक निजी बस आई। सब लपक लिए। चूंकि मुझे मंडी डबवाली तक जाना है इसलिए जगह मिल गई। आगे की सीट पर।

बस में साथ बैठे लोग चुनाव पर चर्चा कर रहे हैं। आगे मानकसर गांव आया। फिर सांगरिया। सांगरिया राजस्थान का हनुमान गढ़ जिले का विधान सभा क्षेत्र भी है। यहां स्वामी केशवानंद भारती एग्रीकल्चर कालेज है। इसके बाद हरियाणा की सीमा शुरू हो जाती है। यहीं पर सिरसा जिले का चौटाला गांव है जो हरियाणा के राजनीतिक परिवार चौधरी देवीलाल का गांव है। मंडी डबवाली मैं शाम के साढ़े सात बजे पहुंचा हूं। हालांकि मंडी डबवाली  ज्यादा देर रुकने का मौका नहीं मिला। बस स्टैंड में उतरने के तुरंत बाद ही बठिंडा वाली बस मिल गई। यहां से बठिंडा की बस हमेशा मिलती रहती है। तो हम हरियाणा से एक बार फिर पंजाब में प्रवेश कर रहे हैं।

रात के साढ़े आठ बजे हैं और मैं बठिंडा के बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। हालांकि कई साल पहले एक बार बठिंडा आना हुआ था जब यहां प्रकाश पंचम केंद्रीय विद्यालय में पदस्थापित हुआ करते थे। इस बार मैंने बठिंडा में प्रवेश करने से थोड़ी देर पहले ही मोबाइल एप से गोआईबीबो डाट काम से होटल डीआई रेसीडेंसी में एक कमरा बुक किया है। यह होटल रेलवे स्टेशन के बिल्कुल पास में है। बस स्टैंड से एक शेयरिंग आटो रिक्शा में बैठकर रेलवे स्टेशन पहुंच गया हूं। होटल तलाश करने में परेशानी नहीं हुई। स्वागत कक्ष पर मौजूद लोगों ने ऑनलाइन बुकिंग सुनकर तुरंत मेरा कमरा मुझे उपलब्ध करा दिया। होटल का कमरा शानदार है। गर्म पानी से नहाकर दिन भर की थकान दूर की। इसके बाद सड़क पर निकल आया हूं।

बठिंडा के स्टेशन रोड पर एक चना सूप वाले हैं। वहां एक सूप पीने के बाद थोड़ी देर और रेलवे स्टेशन के आसपास टहलने के बाद एक शाकाहारी भोजनालय में खाने के लिए जाकर बैठ गया। शाकाहारी थाली 100 रुपये की। खाना बहुत शानदार तो नहीं लगा पर कुछ बुरा भी नहीं है। भोजन के बाद कमरे में एक बेहतरीन नींद, क्योंकि सुबह खूब जल्दी जग जाना है। तो सुबह की बातें अगली पोस्ट में।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(HANUMANGARH, MANDI DABWALI, BATHINDA, BUS TRAVEL  ) 

  


Tuesday, March 19, 2019

तीसरी सदी का बुलंद इतिहास - हनुमान गढ़ का भटनेर दुर्ग

दोपहर के बाद पीलीबंगा से मैंने हनुमानगढ़ की बस ले ली है। बस में बैठने से पहले गाजर का जूस पी लेना ठीक रहेगा। राजस्थान में हनुमानगढ़ जिला और जिला मुख्यालय शहर है। हनुमानगढ़ शहर में बस प्रवेश करने के बाद  रेलवे स्टेशन के पास उतार देती है। मैं टहलता हुआ रेलवे स्टेशन पहुंच जाता हूं। स्टेशन का बाहरी हिस्सा बड़े करीने से सजाया गया है।

स्थानीय लोगों से मैं भाटनेर किला जाने का रास्ता पूछता हूं। लोगों ने कहा शेयरिंग आटो में बैठ जाइए जो सिटी बस स्टैंड की तरफ जा रहा हो। सिटी बस स्टैंड के पास ही किला है।


राजस्थान का सबसे संपन्न जिला - क्या आपको पता है कि उत्तरी राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला राजस्थान का सबसे संपन्न जिला है। संपन्न इसलिए की सबसे अच्छी खेतीबाड़ी हनुमानगढ़ जिले में ही है। जमीन की सबसे अधिक कीमतें यहां हैं। जिले में कुल सात तहसीलें हैं। हनुमानगढ़, संगरिया, रावतसर, नोहर, भादरा, टिब्बी और पीलीबंगा। इनमें हनुमानगढ़ तहसील सबसे बड़ी और टिब्बी तहसील सबसे छोटी है।

नए बस स्टैंड से पहले बायीं तरफ सड़क से अंदर जाने पर भटनेर दुर्ग दिखाई देता है। थोड़ा पैदल चलने पर दुर्ग का प्रवेश द्वार नजर आता है। किले में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।

 राजस्थान के हनुमानगढ़ में स्थित 1700 साल पुराना भटनेर का किला भारत के सबसे पुराने किलों में से एक है। इस किले का निर्माण जैसलमेर के भाटी राजपूत राजा भूपत सिंह ने 295 ई में किया था। वास्तव में हनुमानगढ़ का पुराना नाम भटनेर था, जिसका मतलब है भाटी का किला। भाटी राजपूत यदुवंशी हैं और खुद का भगवान कृष्ण का वंशज मानते हैं। प्राचीन दिल्ली मुल्तान व्यापारिक मार्ग पर बने होने के कारण भटनेर का अपना अलग ही सामरिक महत्त्व था।
मरुस्थल से घिरे इस किले का घेरा लगभग 52 बीघा भूमि पर फैला है। इस दुर्ग में अथाह जलराशि वाले कुएं हैं। तैमूर ने अपनी आत्‍मकथा 'तुजुक-ए-तैमूरी' में लिखा है -'मैंने इस किले के समान हिन्दुस्तान के किसी अन्‍य किले को सुरक्षित और शाक्तिशाली नहीं पाया है।'


किले का निर्माण पक्की ईंटों और चूने द्वारा किया गया है। यह इसके स्थापत्य की प्रमुख विशेषता है। उत्तरी सीमा का प्रहरी होने के कारण भटनेर दुर्ग को काफी बाहरी आक्रमण झेलने पड़े। इतने हमले देश के किसी और दुर्ग ने नहीं झेले। सन 1001 ईस्वी में भटनेर दुर्ग को महमूद गजनवी का आक्रमण हुआ। 1398 में भटनेर दुर्ग पर तैमूरलंग ने आक्रमण किया। तैमूर ने चार दिन तक भटनेर दुर्ग को लूटा। हजारों स्त्रियों और पुरुषों का बेरहमी से कत्ल किया।

मंगलवार को जीता तो नाम हुआ हनुमानगढ़ -  सन 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने यह किला भाटियों से जीत लिया था। तब किले पर जाब्ता खां भाटी का कब्जा था। इसी विजय को आधार मान कर, जो कि मंगलवार के दिन हुई थी, इस शहर का नाम हनुमानगढ़ रखा गया। मंगलवार को हनुमान जी का दिन माना जाता है। इस जीत के उपलक्ष में किले में हनुमानजी के एक मंदिर का निर्माण करवाया गया। 

महाराजा सूरतसिंह जी के पुत्र महाराजा दलपतसिंह जी के निधन के बाद उनकी छह रानियां इसी दुर्ग में सती हो गई थी, जिनकी किले के प्रवेश द्वार पर एक राजा के साथ छह स्त्रियों की आकृति बनी हुई है।

आज भटनेर के दुर्ग में अंदर जाने पर कुछ खास दिखाई नहीं देता। किले की मोटी और मजबूत दीवारों के बाद अंदर देखने योग्य कुछ खास नहीं बचा है। किले के प्राचीर से हनुमानगढ़ शहर का नजारा दिखाई देता है। किले में स्थित हनुमान जी के मंदिर के दर्शन के लिए लोग आते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(HANUMANGARH, BHATNER FORT, BAHTI KINGS, HANUMAN TEMPLE )