Thursday, February 21, 2019

एक राजा की तीस रानियां – एक बार फिर मेहरानगढ़ में

हमलोग मेहरानगढ़ किले के मुख्य प्रवेश द्वार जय पोल पर पहुंच गए हैं। दो साल में दूसरी बार इस किले में मैं पहुंच गया हूं। पिछली बार फतेह पोल से प्रवेश किया था। अपनी पहली यात्रा के बाद इस किले के वैभव और जीवंतता के बारे में काफी कुछ लिख चुका हूं। पर सिटी पैलेस उदयपुर देखने के बाद मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मुझे मेहरानगढ़ का किला सिटी पैलेस उदयपुर से काफी बेहतर लगता है। हालांकि दोनों किले राजपरिवार के ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं। दोनों जगह रोज सैलानियों की भीड़ होती है। मेहरानगढ़ का प्रवेश टिकट 100 रुपये का है तो सिटी पैलेस का 330 रुपये का। पर मेहरानगढ़ किला वास्तु और सौंदर्य में मुझे ज्यादा भव्य प्रतीत होता है। जबकि उदयपुर सिटी पैलेस की बनावट अनगढ़ प्रतीत होती है।


किले में आए हैं तो शाही स्वाद का आनंद क्यों न लिया जाए तो किले के रेस्टोरेंट से वाटर लेमन, चॉकलेट मिल्क लेकर किले में बैठकर उसकी चुस्की लेने लगे हम। और शाही वैभव की यादों में खो गए। आज हम लोकतांत्रिक देश में सांस ले रहे हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि हम उन किलों के ऐश्वर्य को करीब से देख पा रहे हैं। भले इसके लिए हमें थोड़ा शुल्क चुकाना पड़ रहा है।

जोधपुर रियासत राठौड़ राजपूतों की रही है। जोधपुर में उनके शासन का काल 1250 से 1949 तक मिलता है। इस वंश के संस्थापक राव शिवजी कन्नौज के राजा जयचंद राठौड़ के पोते थे।

तख्त सिंह का शयन कक्ष -  हमलोग किले में घूमते हुए सबसे ऊपर तख्त विलास तक पहुंच गए हैं। तख्त विलास महाराजा तख्त सिंह (1843-1873 ) का शयन कक्ष हुआ करता था। इस महल के चारों दीवारों और ऊपरी छत पर शानदार चित्रकारी की गई है जो मारवाड़ कलम का सुंदर नमूना है। इनमें ढोला मारू, राग-रागिनियां, महिषासुर मर्दिनी, नृत्य करती अप्सराओं के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। इस शयन कक्ष की छत से विशाल पंखा लटक रहा है। पर इसे चलाकर हवा करने के लिए परिचारिकाएं दूसरे कमरे में बैठती थीं ताकि शयन कक्ष की निजता में खलल न पड़े।

एक राजा और उनकी की तीस रानियां....सुनकर माधवी चौंकती हैं। हां महाराजा तख्त सिंह ने कुल 30 विवाह किए थे। ये किले को घूमाने वाले गाइड सबको बताते हैं। वेबसाइट जेनीडाट काम उनकी पत्नियों की संख्या 34 बताता है। इन बीवियों से उनके कुल 24 बेटे हुए। तो तख्त सिंह बड़े ही रसिया शासक थे। ये उनका शयन कक्ष देखकर भी पता चलता है। तख्त सिंह मान सिंह के निधन के बाद जोधपुर के राजा बने थे। 29 अक्तूबर 1843 को उन्होने गद्दी संभाली थी। इससे पहले वे अहमदनगर के शासक थे। पर वे जोधपुर के राजा अजीत सिंह के ही वंशज थे। तख्त सिंह ने 1857 के विद्रोह के समय ब्रिटिश सरकार के साथ पूरी भक्ति दिखाई थी। 1873 में तख्त सिंह का 54 साल की उम्र में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनका देवल (समाधि) मंडोर में निर्मित है। इसके बाद उनके बेटे जसवंत सिंह द्वितीय जोधपुर के शासक बने। उनके एक भाई प्रताप सिंह इदार रियासत ( साबरकांठा, गुजरात) के शासक बने।

हनवंत सिंह और जुबैदा का मार्मिक अंत -  महाराजा हनवंत सिंह मारवाड़ के आखिरी शासक थे। हनवंत पोलो के अच्छे खिलाड़ी थे।  हनवंत सिंह ने स्कॉटिश बाला सैंड्रा से विवाह किया था जो नहीं चल सका। उन्होंने हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री जुबैदा से भी विवाह किया। शिया मुस्लिम जुबैदा विवाह के बाद मेहरानगढ़ आने पर आर्य समाज के रास्ते हिंदू बनकर विद्यारानी राठौड़ हो गईं। उन्ही जुबैदा के पहले पति के बेटे खालिद मोहम्मद हैं जो फिल्मों के जाने माने लेखक और पत्रकार हुए। 26 जनवरी 1952 को विमान हादसे में हनवंत सिंह और उनकी पत्नी जुबैदा की मौत हो गई। साल 2001 में आई श्याम बेनेगल की फिल्म जुबैदा उनकी जीवन पर आधारित है जिसके लेखक खालिद मोहम्मद हैं।

किले से बाहर निकलते हुए राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र रावणहत्था बजाकर लोगों को मनोरंजन करते नत्थूराम मिल गए। वे जालौर जिले के रहने वाले हैं। नत्थूराम ने उड़ जा काले कांवा.... रावणहत्थे पर सुनाकर विभोर कर दिया... तो आप भी सुनिए...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vu\idyutp@gmail.com
(MEHRANGARH FORT, HANWANT SINGH, TAKHAT SINGH, RATHORE KINGDOM  )

2 comments:

  1. राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र रावणहत्था बजाकर लोगों को मनोरंजन करते है।

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