Friday, February 1, 2019

हल्दीघाटी के युद्ध का हीरो - चेतक

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रण बीच चौकड़ी भर भर चेतक बन गया निराला था...
राणा प्रताप के घोडे से पड़ गया हवा को पाला था...।
श्याम नारायण पांडे की वीर रस की यह कविता हमने बचपन में स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ी थी। अब हम पहुंच गए हल्दी घाटी की उस धरती पर जहां चेतक ने बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति पाई थी। चेतक वैसे तो एक घोड़ा था पर वह भारत के इतिहास के पन्नों का एक हीरो है।

हल्दी घाटी संग्रहालय से 200 मीटर की दूरी पर सड़क के किनारे चेतक की समाधि बनी है। उसी स्थल पर जहां चेतक ने अपने प्राण त्यागे थे। दुनिया में बहुत कम ऐसे स्थल हैं जहां किसी जानवर की समाधि बड़े सम्मान से बनाई गई हो। पर चेतक कोई ऐसा वैसा घोड़ा नहीं था। वह महाराणा प्रताप का बहुत ही प्रिय घोड़ा था। 
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ किले में हुआ था। वे मेवाड़ के महाराजा उदय सिंह के पुत्र थे। सन 1572 में उनका राज्यारोहण हुआ। 18 जून 1576 को हल्दी घाटी जिसे रक्ततलाई कहा जाता था वहां उनका मुगल बादशाह अकबर की सेना से युद्ध हुआ। हालांकि इस युद्ध में अकबर खुद लड़ने नहीं आया था। अकबर की ओर राजस्थान के आमेर के राजपूत राजा मान सिंह महाराणा प्रताप को चुनौती दे रहे थे। वहीं इस युद्ध में महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खां सूरी थे जो अफगान मूल के थे। यानी हल्दी घाटी का युद्ध इस मायने में अनूठा था कि अकबर के सेनापति हिंदू राजपूत थे तो महाराणा प्रताप के सेनापति मुस्लिम अफगान।
इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के स्वामीभक्त घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर महाराणा प्रताप की जीवन रक्षा की। इसके बाद महाराणा जीवन भर मुगलों से छापामार युद्ध लड़ते रहे। 1585 में उन्होंने चावण्ड को अपनी राजधानी बनाई। 1597 में चावण्ड में ही उनका निधन हो गया।

बात चेतक की। चेतक ईरानी मूल का नीले रंग का घोड़ा था। इसे एक काठिवाड़ी व्यापारी लेकर मारवाड आया था। उसके पास चेतक, त्राटक और अटक नामक तीन घोड़े थे। चेतक बहुत ही फुर्तीला घोड़ा था। वह दौड़ता यूं था जैसे हवा से बातें कर रहा हो। चेतक घोड़े की सबसे खास बात थी कि, महाराणा प्रताप ने उसके चेहरे पर हाथी का मुखौटा लगा रखा था। ताकि युद्ध मैदान में दुश्‍मनों के हाथियों को भ्रमित किया जा सके। 

एक बार युद्ध में चेतक उछलकर हाथी के मस्‍तक पर चढ़ गया था। हालांकि हाथी से उतरते समय चेतक का एक पैर हाथी की सूंड में बंधी तलवार से कट गया। अपना एक पैर कटे होने के बावजूद महाराणा को सुरक्षित स्थान पर लाने के लिए चेतक बिना रुके पांच किलोमीटर तक दौड़ा। यहां तक कि चेतक रास्ते में पड़ने वाले 25 फीट के बरसाती नाले को भी एक छलांग में पार कर लिया। जिसे मुगल की सेना नहीं पार कर सकी। पर इसके बाद चेतक निढाल हो गया। 21 जून 1576 को चेतक यहां पर शहीद हो गया।
राजस्थान के उदयपुर शहर में चेतक सर्कल. 

चारों तरफ से घिरे महाराणा को तब उनके भाई शक्ति सिंह ने अपना घोड़ा देकर उन्हें जल्दी से चले जाने को कहा। हालांकि इससे पहले तक शक्ति सिंह मान सिंह के साथ महाराणा प्रताप के खिलाफ लड़ रहे थे।

न सिर्फ पूरा राजस्थान बल्कि पूरा देश चेतक की बहादुरी की याद करता है। उदयपुर में चेतक सर्किल पर चेतक की विशाल प्रतिमा लगी है। सिटी पैलेस में आप चेतक की प्रतिमा देख सकते हैं। तो दिल्ली से उदयपुर जाने वाली एक ट्रेन का नाम भी चेतक एक्सप्रेस है।

साल 1972 में बजाज ने जब अपने स्कूटर का नया मॉडल लांच किया तो उसका नाम रखा चेतक। तो अब चेतक शब्द बहादुरी, बांकापन और फुर्ती का प्रयाय बन चुका है।
-- विद्युत प्रकाश मौर्य
( UDAIPUR, CHETAK, MAHARANA PRATAP HORSE, HALDI GHATI WAR)

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