Wednesday, February 27, 2019

जालंधर का नकोदर चौक और लवली स्वीट्स की मिठास


जालंधर के नकोदर चौक पर स्थित लवली स्वीट्स की मिठाइयों की दुकान पर आप पहुंच जाएं तो दिन भर उनका कुछ स्टाफ लगातार मिठाइयों की पैकिंग में ही व्यस्त दिखाई देता है। सिर्फ जालंधर ही नहीं पंजाब की सबसे ज्यादा बिक्री वाली मिठाइयों की दुकान है लवली स्वीट्स। प्रसिद्ध स्तंभकार खुशवंत सिंह ने भी एक बार अपने साप्ताहिक स्तंभ में लवली स्वीट्स के बारे में लिखा था।

मैं सन 1999 में जब जालंधर पहुंचा तो लवली स्वीट्स के बारे में जाना। तब इनकी मिठाइयां जालंधर के दूसरे मिठाई दुकानों से अपेक्षाकृत सस्ती हुआ करती थीं। तो हम जब भी किसी रिश्तेदार के यहां जाते लवली स्वीट्स से कई किलो मिठाइयां पैक कराते थे। तब हम अक्सर दोस्तों से बाते करते हुए चर्चा करते थे कि लवली स्वीट्स जाकर अगर आप एक ट्रक रसगुल्ले की मांग कर दें तो वे एक घंटे में आपका ट्रक तैयार करा देंगे। आज भी लवली स्वीट्स के मिठाइयों की दरें बाकी दुकानों की तुलना में काफी कम है। वे सस्ती मिठाइयां कैसे बेचते हैं, यह समझना मुश्किल है।

बताया जाता है लवली स्वीट्स ने जालंधर कैंट से अपनी शुरुआत एक छोटी सी मिठाइयों के दुकान से की थी। पर आज वे कई सौ तरह की मिठाइयां बनाते हैं। देसी घी की मिठाइयां, सैकड़ो तरह के लड्डू से आगे बढ़कर शुगर फ्री मिठाइयां भी उनकी सूची शामिल हो गई है। अब उनकी मिठाइयों की दुकान पहले की तुलना में काफी संवर भी गई है।


लवली स्वीट्स अपने मिठाइयों के कारोबार के मुनाफे से लवली आटोज के बिजनेस में उतरा। बजाज आटो और मारूति कारों की एजेंसी। यह कारोबार भी खूब चल निकला तो शिक्षा के कारोबार में आए। जालंधर फगवाड़ा रोड पर लवली प्रोफेशनल यूनीवर्सिटी खोली। ये यूनीवर्सिटी भी खूब चल पड़ी है। निजी क्षेत्र की यूनीवर्सिटी होने के बावजूद फीस वाजिब है। इसलिए पंजाब से बाहर के राज्यों के छात्र भी यहां पढ़ने पहुंचते हैं।


लवली बेक स्टूडियो- अब लवली स्वीट्स वाले एगलेस बेकरी के कारोबार में भी उतर गए हैं। उनके बेकरी उत्पाद और बिस्कुट आदि बिग बाजार के माध्यम से देश भर में बिकने लगे हैं। वे अंडा रहित बेकरी उत्पाद बनाते हैं।

24 घंटे खरीदें मिठाइयां – आप लवली स्वीट्स से 24 घंटे मिठाइयां खरीद सकते हैं। मुख्य शो रुम सुबह 9 से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। इसके बार रात्रि 9 से सुबह 9 बजे तक पड़ोस वाला दूसरा शो रुम खुला रहता है। इतना ही नहीं अब आप लवली स्वीट्स के उत्पाद उनकी वेबसाइट पर जाकर आनलाइन भी खरीद सकते हैं।

जालंधर के जिस नकोदर चौक के पास लवली स्वीट्स है, वहां कई पंजाबी गायकों के दफ्तर भी हैं। पंजाब के बारे में कहा जाता है कि यहां हर ईंट को हटाओ तो एक गायक निकलेगा। हर गांव में कई कई सिंगर होते हैं। कई बार ये लोग अपना पैसा खर्च करके अपना आडियो कैसेट और सीडी निकलवाते हैं। इनमें से कई बाद में हिट हो जाते हैं तो कई गुमनामी में खो जाते हैं। पर गायक बनने का शौक गजब का है पंजाब के लोगों में।
-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( LOVELY SWEETS, JALANDHAR, NAKODAR ROAD)

Monday, February 25, 2019

छोड़ आए हम वो गलियां... यादों की अंगनाई में जालंधर

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दस लाख पाठकों का दिल से स्वागत...सैर सपाटा, खानपान, इतिहास, जीवन शैली पर केंद्रित ब्लॉग दानापानी के पाठकों की संख्या 10 लाख के पार हो गई है। सभी पाठकों का दिल से स्वागत... आते रहिए और पढ़ते रहिए...
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जिस शहर में आपने कई साल गुजारे हों वहां एक बार फिर पहुंच जाएं तो यादों की अंगनाई में सैकड़ों स्मृतियां ताजी हो जाती हैं। दिसंबर की ठंडी सुबह मे एक बार फिर जालंधर पहुंच गया हूं। हमारी बस ने सुबह 7 बजे के आसपास जालंधर बस स्टैंड में उतार दिया है। पर इस बार मेरी मंजिल जालंधर नहीं है। मुझे सुल्तानपुर लोधी जाना है। हालांकि कपूरथला सुल्तानपुर लोधी तक जाने वाली बस इसी बस स्टैंड से मिल सकती है पर मैंने शहर में कई सालों बाद सुबह की सैर करना तय किया। बस स्टैंड से निकलकर बीएमसी चौक पहुंच गया हूं। वहां से आगे देश भगत यादगार हॉल। जालंधर प्रवास के दौरान ये मेरी पसंदीदा जगह हुआ करती थी जहां अक्सर दोपहर गुजरा करती थी। इस हॉल में एक अच्छी सी लाइब्रेरी भी है। एक बड़ा सभागार है। प्रांगण में कई बार सेल और बाजार भी लगा रहता है। 
हर रविवार को यहां तमाम छोटी बड़ी संस्थाओं के लोग बैठक करने आते हैं।  बाबा भगत सिंह बिलगा नहीं रहे। उनकी याद में अब देशभगत यादगार हॉल में पट्टिका लगी है। उनकी याद में अब यहां बाबा भगत सिंह बिलगा बुक हाउस खुला है। वे पंजाब के महान क्रांतिकारियों में से एक था। काफी लंबा जीवन जीया। जालंधर के दिनों में इसी देशभगत यादगार हॉल में उनसे मुलाकात हो जाती थी। 22 मई 2009 को बाबा बिलगा का निधन इंग्लैंड के बरमिंघम में अपने बेटे के आवास पर हो गया। उनका जन्म 2 अप्रैल 1907 को हुआ था। उनका 102 साल का जीवन काफी तंदुरुस्ती भरा रहा। हांलाकि वे 102 साल जीने वाली जोहरा सहगल की तरह ही शाकाहारी नहीं थे। गदर पार्टी से जुड़े बाबा बिलगा बुढ़ापे में भी खूब सक्रिय थे। 
यहां से आगे चल पड़ा हूं। कंपनी बाग चौराहे पर जीपीओ के सामने अब जालंधर का प्रेस क्लब बन गया है। हमारे जमाने में यहां प्रेस क्लब नहीं था। पैदल चलता हुआ दिलकुशा मार्केट होकर ज्योति चौक पहुंच गया हूं। अब ज्योति सिनेमा की जगह मार्केटिंग कांप्लेक्स बन गया था। यहां से नकोदर चौक वाली सड़क पर बढ़ रहा हूं। इसी रोड पर जालंधर की प्रसिद्ध मिठाइयों की दुकान लवली स्वीट्स है। अब उनका कारोबार मिठाइयों से आगे बढ़कर यूनीवर्सिटी तक चला गया है। जालंधर फगवाड़ा के बीच लली प्रोफेशनल यूनीवर्सिटी मित्तल बंधुओं की है। 

नकोदर चौक से फुटबाल चौक के रास्ते में कुंदन लाल सहगल मेमोरियल हॉल है। महान गायक केएल सहगल जालंधर के रहने वाले थे। उनकी याद में ये मेमोरियल बना है। वैसे जालंधर गजलगो सुदर्शन फाकिर का भी शहर है जिनकी लिखी कई गजलें जगजीत सिंह ने गाई हैं। ( अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें... ये दौलत भी ले लो...ये शोहरत भी ले लो...भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, पर मुझको लौटा दो, बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी  )  18 फरवरी 2008 को इस महान शायर का गुमनामी में ही निधन हो गया। जालंधर पंजाबी के महान लेखक हरनाम दास सहराई का शहर है। प्रेम प्रकाश, जसवंत सिंह विरदी, वरियाम सिंह संधू का शहर है। कभी इन सब लोगों से गुफ्तगू करने का मौका मिला था मुझे इस शहर में।




अब मैं आगे बढ़कर फुटबाल चौक पर पहुंच गया हूं। इसी फुटबाल चौक के बगल में 66 विजय नगर मेरा कई साल तक आवास हुआ करता था। पर फुटबाल चौक नाम क्यों। इसलिए कि इसके बगल में जालंधर की खेल कूद का सामान बनाने वाले इंडस्ट्री है।
बस्ती नौं और बस्ती गुजां में क्रिकेट के बल्ले, फुटबॉल और बैडमिंटन के रैकेट से लेकर खेल के तमाम सामान बनते हैं। तो इसी से जुड़ा चौराहे का नाम है फुटबॉल चौक। चौक के एक कोने में विशाल फुटबाल बनाया गया है। किसी जमाने में यह फुटबाल चौराहे के बीचों बीच था। पर बाद ट्रैफिक की सहूलियत के लिए इसे किनारे कर दिया गया। अगला चौराहा है कपूरथला चौक। यहां से मैं कपूरथला जाने वाली बस में बैठ जाता हूं। अलविदा जालंधर फिर मिलेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
( JALANDHAR, PUNJAB, FOOTBAL CHAUK, KL SAHGAL ) 

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Saturday, February 23, 2019

जोधपुर की मावा कचौरी और नई सड़क , त्रिपोलिया में शॉपिंग

मेहरानगढ़ किला देखकर  लौटने के बाद भूख लग गई है तो हमलोग पहुंच गए हैं नई सडक पर होटल प्रिया में खाने के लिए। उनका मीनू खाने के लिए काफी अच्छा है। थाली में आई हर सामग्री का स्वाद भी बेहतर है। वैसे सामने जनता स्वीट होम में भी ऊपर भोजनालय है। नई सड़क पर दोनो ही खाने के लिए अच्छी जगह है। पर आटो वाले जवाहर ने प्रिया होटल में खाने की सलाह दी। पर अपनी पिछली बार की जोधपुर यात्रा में मैं मावा कचौरी का स्वाद नहीं चख सका था। तो इस बार जाने से पहले जनता स्वीट होम से मावा कचौरी पैक करा लिया। जैसा की नाम से ही जाहिर है मावा कचौरी मीठी होती है। तो प्याज कचौरी का स्वाद तो इस बार कई दफे लिया। दोनों ही जोधपुर की पहचान है। 

जोधपुर में शॉपिंग और नेशनल हैंडलूम – जोधपुर शहर के पुराने इलाके में शॉपिंग के लिए त्रिपोलिया गेट, नई सड़क जैसे इलाके प्रमुख हैं। यहां पर खासतौर पर बंधेज ( टाई एंड डाई ) खरीदा जा सकता है। मतलब सलवार सूट, साड़ियां और दुपट्टे। रंग बिरंगे लहंगे भी यहां देख सकते हैं। जोधपुरी सूट की अपनी अलग पहचान है। राजस्थान की बेडशीट जोधपुर के बाजारों से आप खरीद सकते हैं।

त्रिपोलिया बाजार के दुकानदारों से आप हल्का मोलभाव कर सकते हैं। पर जोधपुर शॉपिंग के लिए अच्छी जगह है। दुकानदार ग्राहको से ठगी नहीं करते। चीजें वाजिब दाम पर और अच्छी मिलती हैं। सिर्फ कपड़े ही नहीं घर सजाने के लिए हैंडीक्राफ्ट आइटम भी यहां से खरीदे जा सकते हैं।

अगर आप ज्यादा दौड़भाग और मोलभाव नहीं करना चाहते तो नई सड़क पर नेशनल हैंडलूम के शो रुम में पहुंच जाएं। चार मंजिला शोरुम में एक ही छत के नीचे हर तरह की सामग्री मिल जाएगी। यहां कोई मोल भाव नहीं है। एक दाम का शोरुम है। नेशनल हैंडलूम के शोरुम जयपुर अहमदाबाद, सूरत जैसे शहरों में भी हैं। यह निजी क्षेत्र के बड़े नेटवर्क वाला शोरुम है।

और अब दिल्ली वापसी – शॉपिंग के लिए जोधपुर की सड़कों पर घूमते हुए हमलोग काफी थक चुके हैं। शाम गहराने लगी है। इसके साथ ही हमारी ट्रेन का समय भी नजदीक आता जा रहा है। तो इस बार के लिए राजस्थान इतना ही। पर जोधपुर का बाजार तो माधवी को इतना पसंद आया कि वे कह रही हैं कि सिर्फ शॉपिंग के लिए यहां दुबारा आया जा सकता है।

दिल्ली के लिए हमारा टिकट जोधपुर सराय रोहिल्ला सुपर फास्ट एक्सप्रेस में है। यह ट्रेन मंडोर एक्सप्रेस से पहले शाम सात बजे जोधपुर से चलती है। स्टेशन पर पहुंचने के बाद रेलवे स्टेशन के सामने के एक रेस्टोरेंट से खाना पैक करा लिया। ट्रेन के कोच में बैठकर आराम से खाएंगे ऐसा सोचकर। खाना पैक कराने के बाद सरस के मिल्क पार्लर से दही लेने गया तो पता चला कि सरस की दही तो मदर डेयरी और अमूल से सस्ती है। 12 रुपये में 200 ग्राम का कप।

ये क्या है... प्याज कचौरी...
वापसी में हमारी ट्रेन राय का बाग, जोधपुर कैंट को छोड़ती हुई आगे बढ़ रही है। साथिन रोड के बाद गोटान से नागौर जिला आरंभ हो जाता है। पर ये ट्रेन जोधपुर के बाद सीधे मेड़ता रोड ( जिला नागौर ) में ही रुकती है। इस बीच हमलोगों ने खाने पीने का कार्यक्रम शुरू कर दिया है। 

हमारी रेल रेन, डिगाना जंक्शन जैसे स्टेशनों से गुजरती हुई दिल्ली की ओर बढ़ रही है। डिगाना जंक्शन भी नागौर जिले का प्रमुख स्टेशन है। इसके बाद खाटू, छोटी खाटू, डीडवाना जैसे स्टेशनों को पार करती हुई ट्रेन लाडनू होते हुए चुरू जिले में प्रवेश कर जाती है। सुजानगढ़ चुरु जिले का रेलवे स्टेशन है जहां ट्रेन का ठहराव है। इसके बाद रतनगढ और फिर चुरु शहर। महेंद्रगढ़, रेवाड़ी जैसे स्टेशन हमारी नींद के दौरान ही निकल गए। सुबह के 5 बजे हैं,हमारी नींद खुल चुकी और हमारी ट्रेन धीरे धीरे दिल्ली के सराय रोहिला रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर रही है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( RAJSTHAN, JODHPUR, NAI SARAK , TRIPOLIA ) 

Thursday, February 21, 2019

एक राजा की तीस रानियां – एक बार फिर मेहरानगढ़ में

हमलोग मेहरानगढ़ किले के मुख्य प्रवेश द्वार जय पोल पर पहुंच गए हैं। दो साल में दूसरी बार इस किले में मैं पहुंच गया हूं। पिछली बार फतेह पोल से प्रवेश किया था। अपनी पहली यात्रा के बाद इस किले के वैभव और जीवंतता के बारे में काफी कुछ लिख चुका हूं। पर सिटी पैलेस उदयपुर देखने के बाद मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मुझे मेहरानगढ़ का किला सिटी पैलेस उदयपुर से काफी बेहतर लगता है। हालांकि दोनों किले राजपरिवार के ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं। दोनों जगह रोज सैलानियों की भीड़ होती है। मेहरानगढ़ का प्रवेश टिकट 100 रुपये का है तो सिटी पैलेस का 330 रुपये का। पर मेहरानगढ़ किला वास्तु और सौंदर्य में मुझे ज्यादा भव्य प्रतीत होता है। जबकि उदयपुर सिटी पैलेस की बनावट अनगढ़ प्रतीत होती है।


किले में आए हैं तो शाही स्वाद का आनंद क्यों न लिया जाए तो किले के रेस्टोरेंट से वाटर लेमन, चॉकलेट मिल्क लेकर किले में बैठकर उसकी चुस्की लेने लगे हम। और शाही वैभव की यादों में खो गए। आज हम लोकतांत्रिक देश में सांस ले रहे हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि हम उन किलों के ऐश्वर्य को करीब से देख पा रहे हैं। भले इसके लिए हमें थोड़ा शुल्क चुकाना पड़ रहा है।

जोधपुर रियासत राठौड़ राजपूतों की रही है। जोधपुर में उनके शासन का काल 1250 से 1949 तक मिलता है। इस वंश के संस्थापक राव शिवजी कन्नौज के राजा जयचंद राठौड़ के पोते थे।

तख्त सिंह का शयन कक्ष -  हमलोग किले में घूमते हुए सबसे ऊपर तख्त विलास तक पहुंच गए हैं। तख्त विलास महाराजा तख्त सिंह (1843-1873 ) का शयन कक्ष हुआ करता था। इस महल के चारों दीवारों और ऊपरी छत पर शानदार चित्रकारी की गई है जो मारवाड़ कलम का सुंदर नमूना है। इनमें ढोला मारू, राग-रागिनियां, महिषासुर मर्दिनी, नृत्य करती अप्सराओं के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। इस शयन कक्ष की छत से विशाल पंखा लटक रहा है। पर इसे चलाकर हवा करने के लिए परिचारिकाएं दूसरे कमरे में बैठती थीं ताकि शयन कक्ष की निजता में खलल न पड़े।

एक राजा और उनकी की तीस रानियां....सुनकर माधवी चौंकती हैं। हां महाराजा तख्त सिंह ने कुल 30 विवाह किए थे। ये किले को घूमाने वाले गाइड सबको बताते हैं। वेबसाइट जेनीडाट काम उनकी पत्नियों की संख्या 34 बताता है। इन बीवियों से उनके कुल 24 बेटे हुए। तो तख्त सिंह बड़े ही रसिया शासक थे। ये उनका शयन कक्ष देखकर भी पता चलता है। तख्त सिंह मान सिंह के निधन के बाद जोधपुर के राजा बने थे। 29 अक्तूबर 1843 को उन्होने गद्दी संभाली थी। इससे पहले वे अहमदनगर के शासक थे। पर वे जोधपुर के राजा अजीत सिंह के ही वंशज थे। तख्त सिंह ने 1857 के विद्रोह के समय ब्रिटिश सरकार के साथ पूरी भक्ति दिखाई थी। 1873 में तख्त सिंह का 54 साल की उम्र में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनका देवल (समाधि) मंडोर में निर्मित है। इसके बाद उनके बेटे जसवंत सिंह द्वितीय जोधपुर के शासक बने। उनके एक भाई प्रताप सिंह इदार रियासत ( साबरकांठा, गुजरात) के शासक बने।

हनवंत सिंह और जुबैदा का मार्मिक अंत -  महाराजा हनवंत सिंह मारवाड़ के आखिरी शासक थे। हनवंत पोलो के अच्छे खिलाड़ी थे।  हनवंत सिंह ने स्कॉटिश बाला सैंड्रा से विवाह किया था जो नहीं चल सका। उन्होंने हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री जुबैदा से भी विवाह किया। शिया मुस्लिम जुबैदा विवाह के बाद मेहरानगढ़ आने पर आर्य समाज के रास्ते हिंदू बनकर विद्यारानी राठौड़ हो गईं। उन्ही जुबैदा के पहले पति के बेटे खालिद मोहम्मद हैं जो फिल्मों के जाने माने लेखक और पत्रकार हुए। 26 जनवरी 1952 को विमान हादसे में हनवंत सिंह और उनकी पत्नी जुबैदा की मौत हो गई। साल 2001 में आई श्याम बेनेगल की फिल्म जुबैदा उनकी जीवन पर आधारित है जिसके लेखक खालिद मोहम्मद हैं।

किले से बाहर निकलते हुए राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र रावणहत्था बजाकर लोगों को मनोरंजन करते नत्थूराम मिल गए। वे जालौर जिले के रहने वाले हैं। नत्थूराम ने उड़ जा काले कांवा.... रावणहत्थे पर सुनाकर विभोर कर दिया... तो आप भी सुनिए...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vu\idyutp@gmail.com
(MEHRANGARH FORT, HANWANT SINGH, TAKHAT SINGH, RATHORE KINGDOM  )

Wednesday, February 20, 2019

जोधपुर का सोजती गेट और जय नारायण व्यास

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जोधपुर में हमारी बुकिंग होटल विक्रम पैलेस में है जो सोजती गेट के पास है। ये होटल हमने कुछ घंटे पहले ट्रेन में चलते चलते ही गोआईबीबो से बुक किया है। रेलवे स्टेशन से आधे किलोमीटर दूर होटल हमलोग पैदल टहलते हुए पहुंच गए। रास्ते में एक जगह नारियल पानी पीया। 25 रुपये में नारियल पानी मतलब जोधपुर सस्ता शहर है। होटल विक्रम पैलेस सोजती गेट इलाके में पुराना मध्यम वर्गीय होटल है। गली के अंदर होने के बावजूद काफी खुला-खुला है। लिफ्ट से हमलोग तीसरी मंजिल पर अपने कमरे में पहुंच गए हैं। 

पर सामान रखने के तुरंत बाद खाने के लिए निकल पड़े। क्योंकि रात के 9 बजने वाले हैं। दिन में मेन कोर्स में कुछ नहीं खाया तो भूख लग रही है। आसपास के लोगों ने सलाह दी कि आप दिनेश भाटी रेस्टोरेंट में खाने जाएं। नगर निगम भवन के पीछे यह एक शाकाहारी भोजनालय है। यहां स्थानीय लोग ज्यादा खाने आते हैं। भाटी रेस्टोरेंट का खाना अच्छा था। पर इस खाने के बाद भी रात 12 बजे तक पुराने जोधपुर शहर में स्ट्रीट फूड का बाजार लगता है जिसमें स्थानीय लोग स्वाद लेने आते हैं। तो सोजती गेट के पास हमें नरगिसी कोफ्ता वाले मिल गए। तो मटका कुल्फी और नरगिस कोफ्ता का भी स्वाद लिया गया। उसके बाद आकर हमलोग होटल में सो गए।

अगली सुबह मैं सोजती गेट के आसपास सुबह की सैर पर निकला। सोजती गेट की इमारत में लंबोदर गणेश जी का मंदिर स्थित है। इन्हे गढ़ गणपति भी कहते हैं। गेट के बाहर जय नारायण व्यास की विशाल प्रतिमा लगी है। वे 1952 से 1954 के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। राजस्थान के इस सम्मानित नेता के नाम पर जोधपुर में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय भी बना है। स्वतंत्रता सेनानी व्यास ने अपना कैरियर पत्रकारिता से शुरू किया था। उन्होंने मुंबई से अखंड भारत नामक दैनिक समाचार पत्र निकाला था।

बात सोजतिया दरवाजा की। त्रिपोलिया रोड पर स्थित सोजती गेट जोधपुर शहर का हेरिटेज द्वार है। इसके आसपास जोधपुर का पुराना शहर है। तो इस दरवाजे का निर्माण नगर की सुरक्षा के लिए जोधपुर के मारवाड़ शासक महाराजा अभय सिंह ने अपने शासन काल में 1724 से 1749 के बीच कराया था। इसके आसपास जोधपुर शहर की कई हेरिटेज बिल्डिंग हैं। इसके आसपास पुराने भवनों में कई मध्यमवर्गीय होटल भी हैं।

जोधपुर शहर सुबह सुबह जाग जाता है। मैं टहलने के बाद जोधपुर की प्याज कचौरी, मीठी चटनी और ढोकला और चाय पैक कराकर माधवी और वंश के लिए होटल के कमरे में ही लेकर आ जाता हूं। ताकि वे लोग नास्ता करने के बाद शहर में निकल सकें।

हमारी राजस्थान यात्रा का आज आखिरी दिन है। तो हमने आज का दिन जोधपुर शहर में शॉपिंग के लिए तय कर रखा है। मैं जोधपुर शहर घूम चुका हूं। पर माधवी-वंश को सिर्फ मेहरानगढ़ का किला दिखा देना चाहता हूं उसके बाद बाजार में घूमेंगे। पिछली बार जिस आटो वाले ने हमें जोधपुर घुमाया था उसे ही फोन किया। जवाहर ( 8890724798 ) तुरंत आटो लेकर हाजिर हो गए। मैंने कहा चलिए मेहरानगढ़ फोर्ट की ओर।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( JODHPUR, SOJTI GATE, JAI NARAYAN VYAS ) 

Monday, February 18, 2019

गुजरात के अंबाजी से जोधपुर वाया आबू रोड

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गुजरात में मां अंबा भवानी के दर्शन के बाद अब वापस लौटना है। यह हमारी छोटी सी गुजरात यात्रा थी। हमारा अगला पड़ाव है जोधपुर। यह अंबाजी मंदिर के मुख्य द्वार के पास से ही आबू रोड रेलवे स्टेशन के लिए शेयरिंग टैक्सियां चलती हैं। भरेगी तो चलेगी के हिसाब से। हमने टैक्सी में जगह ले ली है, पर टैक्सी के भरने में थोड़ा वक्त लगा। सामान टैक्सी की छत पर जमा दिया है। टैक्सी वाले तीन की सीट पर चार लोगों को बिठा रहे हैं। मतलब गुजरात और बिहार में कोई अंतर नहीं। पर सफर ज्यादा लंबा नहीं है इसलिए थोड़ा समझौता किया जा सकता है। एक बार फिर राजस्थान में प्रवेश करके हमलोग आबू रोड रेलवे स्टेशन के बाहर पहुंच चुके हैं। यहां से जोधपुर बस से भी जाया जा सकता है। पर हमने रेल का सफर सुविधाजनक रहेगा यह सोचकर रेल से जाना तय किया है। 


अब हमें इंतजार है 19223 अहमदाबाद जम्मूतवी एक्सप्रेस का। यह ट्रेन हमें जोधपुर तक पहुंचाएगी। हमने पता लगाया कि इसमें दो जनरल डिब्बे आगे दो बीच में और एक पीछे लगता है। हम बीच में खड़े हैं।
आबू रोड रेलवे स्टेशन देखने में अच्छा है। बड़ा रेलवे स्टेशन है। भीड़ ज्यादा नहीं है। स्टेशन परिसर की सफाई अच्छी है। ट्रेन आधे घंटे से ज्यादा लेट है तो स्टेशन पर थोड़ी पेट पूजा। माधवी और वंश ने कैंटीन में खाया। मैं स्टेशन के बाहर निकल कर आया। वहां एक प्याज कचौरी की दुकान से कचौरी खाई। आर्डर करने पर उन्होंने कचौरी को बड़ी सी कैंची से चार हिस्सों में काट दिया और उसपर चटनी उड़ेल दी। 

वैसे आबू रोड प्रसिद्ध है अपनी रबड़ी के लिए। स्टेशन के बाहर कई रबड़ी की दुकानें हैं तो स्टेशन परिसर में भी आबू की रबड़ी की दुकाने हैं। कुछ लोग कहते हैं कि आबू की रबड़ी की गुणवत्ता अब कम हुई है। पर अभी भी लोग यहां की रबड़ी खूब खाते हैं।

तो 3.30 वाली ट्रेन आ गई है शाम को 4 बजे। यहां पर 10 मिनट का ठहराव है। थोड़े संघर्ष के बाद जनरल डिब्बे में हमें बैठने को जगह मिल गई। एक पंजाब जाने वाले भाई ऊपर वाले बर्थ पर सो रहे थे। लाख आग्रह पर बैठने को तैयार नहीं हुए। माधवी और वंश ने उपर वाली बर्थ पर तो मैंने नीचे अपने लिए सीट का इंतजाम किया। चार घंटे से ज्यादा का सफर है। रास्ते में फालना, मारवाड़ जंक्शन, पाली मारवाड़ और लूनी जंक्शन प्रमुख स्टेशन पड़ते हैं। 
एक स्टेशन आया रानी। ट्रेन वहां नहीं रुकी। पर रानी स्टेशन है तो भारतीय रेलवे की पटरियों पर कोई राजा स्टेशन भी होना चाहिए। मारवाड़ जंक्शन पर प्लेटफार्म नंबर एक की चलंत ट्राली से हमने पकौड़े लेकर खाए। शाम गहरा चुकी है।

अगला स्टेशन है पाली मारवाड़। इस शहर के एक सज्जन मेरे पड़ोस में बैठे हैं। उन्होने बताया कि राजस्थान का पाली शहर पूरे देश में मेटल की चूड़ियों के निर्माण के लिए जाना जाता है। पूरे शहर के हर मुहल्ले में मेटल की चूड़ियां बनती हैं। ये चूड़ियां टूटती नहीं हैं और इसमें तमाम रंग और डिजाइन बन जाते हैं। इसलिए इन मेटल की चूड़ियों ने फिरोजाबाद की सीसे की चूड़ियों का बाजार मंदा कर दिया है। 

लूनी जंक्शन से ट्रेन आगे बढ़ चुकी है। रात साढ़े आठ बजे हमलोग जोधपुर पहुंच चुके हैं। मैं दूसरी बार जोधपुर पहुंचा हूं पर अनादि और माधवी पहली बार। रेलवे स्टेशन पर सुंदर नक्काशियों ने मन मोह लिया। तो अब बाहर चलें।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
(AMBAJEE, ABU ROAD, MARWAR, PALI MARWAR, LUNI JN, JODHPUR ) 
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एक बार फिर जनरल डिब्बे में उपर वाली बर्थ पर जगह मिल पाई। 

Saturday, February 16, 2019

गब्बर पहाड़ी पर है अंबाजी का प्राचीन मंदिर


गुजरात के अंबाजी में दूसरा प्रमुख मंदिर है गब्बर मंदिर। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर को शक्ति पीठ का वास्तविक स्थान कहा जाता है। गुजराती में इसे मां अंबाजी मूल स्थान शक्तिपीठ कहते हैं। इसलिए अक्सर अंबा जी के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु गब्बर मंदिर भी जरूर जाते हैं। गब्बर मंदिर पहाड़ी पर है। अगर आप यहां तक पैदल जाना चाहें तो 900 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल चढ़ाई करते हैं।

रोपवे से करें चढ़ाई – पहले गब्बर हिल की चढ़ाई कठिन हुआ करती थी। पर अब श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहां तक जाने के लिए रोपवे का संचालन होता है। साल 2008 में यहां रोपवे की सेवा शुरू की गई। इसी तरह की रोपवे सेवा गुजरात के पावागढ़ की पहाड़ी पर कालिका माता के मंदिर में भी संचालन में है। इसका आने और जाने का टिकट 95 रुपये का है। यह टिकट आपको अंबाजी मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने स्थित टिकट काउंटर से भी मिल जाएगा। अंबाजी मंदिर से थोड़ी दूरी पर ही रोपवे का स्टेशन है। उड़नखटोला की सेवा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक उपलब्ध रहती है। इस उड़न खटोले का संचालन उषा ब्रेको लिमिटेड नामक कंपनी करती है।

वास्तव में गुजरात-राजस्थान की सीमा पर स्थित अम्बाजी गांव से 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गब्बर पहाड़ियों को अम्बाजी माता का मूल स्थान माना जाता है। तन्त्र चूड़ामणि के एक उल्लेख के अनुसार देवी सती के हृदय का एक भाग इस पर्वत के ऊपर गिरा था। इस पहाड़ पर भी देवी मां का प्राचीन मंदिर स्थापित किया गया है। माना जाता है यहां एक पत्थर पर मां के पदचिह्न बने हैं। पदचिह्नों के साथ-साथ मां के रथचिह्न भी बने हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार यहीं पर हुआ था। इस मंदिर के प्रति आसपास के श्रद्धालुओं की अगाध आस्था है। गुजरात और राजस्थान के कई जिलों के श्रद्धालु यहां सालों भर आते हैं। गब्बर मंदिर की ऊंचाई से अंबा जी का मंदिर बड़ा सुंदर दिखाई देता है।

अगर आप अंबाजी और गब्बर पहाडी स्थित प्रचीन मंदिर दोनों के दर्शन करना चाहते हैं तो अच्छा होगा कि अंबा जी में एक दिन का अपना ठहराव तय करें। अंबाजी में रहने के लिए किफायती दरों पर होटल और कई धर्मशालाएं मिल जाती हैं। आप आबू रोड में रुक कर भी अंबा जी के दर्शन के लिए जा सकते हैं। पर ध्यान रखें कि अगर उत्सव और छुट्टियों का दिन हो तो अंबा जी मंदिर में दर्शन में ही पूरा दिन लग जाता है।
गब्बर हिल पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए इंतजार कक्ष, जन सुविधाएं और प्रसाद की दुकान आदि का इंतजाम है। उपर एक कैफेटेरिया और बच्चों के खेलने के लिए स्थान और प्राथमिक चिकित्सा का इंतजाम भी है।
अंबाजी और गब्बर मंदिर की प्रसिद्धि गुजरात में कुछ इस तरह की है कि सभी प्रमुख दलों के बड़े नेताओं की गुजरात यात्रा की शुरुआत मां अंबा जी के दर्शन और आशीर्वाद लेकर होती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( AMBA JEE TEMPLE, GABBAR HILL, ROPE WAY, BANASKANTHA, GUJRAT ) 
  
  

Thursday, February 14, 2019

अंबाजी मंदिर, गुजरात – बोल मेरी अंबे जय जय अंबे

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गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित मां अंबा भवानी का मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से प्रमुख पीठ माना जाता है। अंबा माता के दर्शन के लिए सालों भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर का परिसर काफी विशाल और भव्य है। इसका गुंबद स्वर्ण जड़ित है।नवरात्र के मौके पर यहां का पूरा वातावरण शक्तिमय रहता है। 


मां अंबा का यह मंदिर बेहद प्राचीन है। पर यहां मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहां मूर्ति की जगह मां का एक श्री यंत्र स्थापित है। इस श्री यंत्र को कुछ इस प्रकार सजाया जाता है कि देखने वाले को लगता है कि मां अम्बे यहां विराजमान हैं। पवित्र श्रीयंत्र की पूजा मुख्य आराध्य रूप में की जाती है। इस यंत्र को कोई भी सीधे आंखों से देख नहीं सकता। साथ ही इसकी फोटोग्राफी का भी निषेध है।

जहां देवी अम्बाजी का मंदिर हैकहा जाता है कि वहां देवी सती के हृदय का एक हिस्सा गिरा था। कुछ लोग कहते हैं कि उदर गिरा था। इसके समीप ही पवित्र अखण्ड ज्योति जलती हैजिसके बारे में कहते हैं कि यह ज्योति कभी नहीं बुझी। वर्तमान यह मंदिर लगभग 1200 साल पुराना बताया जाता है। पर इसका जीर्णोद्धार 1975 में हुआ था।  श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है। मंदिर का शिखर एक सौ तीन फीट ऊंचा है। शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित किए गए हैं।
समान्य दिनों में मंदिर में दर्शन में तीन घंटे का वक्त लग जाता है। यह गुजरात का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। न सिर्फ गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान बल्कि देश के कोने कोने से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद का काउंटर है। परिसर में विशाल यज्ञशाला भी बनी है।

पदयात्रा करते हुए आते हैं लोग
मंदिर में काफी श्रद्धालु विशाल झंडा लिए हुए तो कई बार पदयात्रा करते हुए दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कुछ लोग सिर के बल चलते हुए भी माता के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूजन सामग्री की दर्जनों दुकाने हैं। श्रद्धालु की सुविधा के लिए मोबाइल और बैग जमा करने के काउंटर बने हुए हैं।
बोल मेरी अंबे..जय जय अंबे
नवरात्र और दीवाली के बाद तो मंदिर में श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ उमड़ती है कि कई बार यहां मंदिर के बाहर दो किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती है। श्रद्धालु बोल मेरी अंबे..जय जय अंबे का जयकारा लगाते हुए घंटों पंक्ति में दर्शन के लिए इंतजार करते हैं। मंदिर की व्यवस्था अरासुरी अंबाजी माता देवस्थानाम ट्रस्ट देखता है। अंबाजी के दर्शन के लिए बड़े बड़े उद्योगपति और राजनेता भी अक्सर पहुंचते हैं। हर माह के पूर्णिमा के दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे - अंबाजी मंदिर गुजरात में राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है। यह गुजरात के बनासकांठा जिले में पड़ता है। आप यहां राजस्थान या गुजरात जिस भी रास्ते से चाहें पहुंच सकते हैं। यहां से सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन राजस्थान का  आबू रोड पड़ता है। अंबाजी आबू रोड से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। आबू रोड रेलवे स्टेशन से अंबाजी के लिए हमेशा शेयरिंग जीप की सेवा उपलब्ध है। अंबाजी का मंदिर अहमदाबाद से 180 किलोमीटर दूर है।

अंबाजी मंदिर - दर्शन का समय
सुबह की आरती 7.30 से 8.00
सुबह दर्शन 8.00 से 11.30
राजभोग आरती 12.00 से 12.30
दोपहर दर्शन 12.30 से 4.30
शाम की आरती 7.00 से 7.30
शाम का दर्शन 7.30 से 9.00

मां अंबे के दर्शन में हमें भी दो घंटे से ज्यादा वक्त लग गए। मंदिर की लाइन में काफी भीड़ का सामना करना पड़ा। कैमरा, मोबाइल आदि दर्शन के लिए जाने से पहले लॉकर में जमा करा देना पड़ता है। दर्शन से निकलने के बाद मंदिर के काउंटर से प्रसाद खरीदा। इसके बाद आगे के सफर के लिए निकल पड़े।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( AMBA JEE TEMPLE, BANASKANTHA, GUJRAT ) 

Tuesday, February 12, 2019

माउंट आबू से अंबा जी मार्फत गुजरात ट्रैवल्स

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माउंट आबू की दूसरी सुबह मैं सूर्योदय होने से पहले बिस्तर छोड़कर टहलने निकल पड़ा हूं। अकेले ही। टहलते हुए दो किलोमीटर आगे निकल गया हूं। लोअर कोदरा डैम के पास सेंट मेरीज स्कूल तक जाने के बाद वापस लौट आया। इसी दौरान प्रातः अरुण धीरे-धीरे लालिमा बिखेरने लगे हैं। खजूर के पेड़ो के बीच से उनकी लालिमा हमारे पथ को आलोकित करने लगी है। सूरज तो वही है पर इतनी खूबसूरत सुबह हम महानगर में कहां देख पाते हैं। टहलने के बाद वापस होटल लौट आया। स्नान करके तैयार हो गया। अनादि और माधवी नास्ते में पराठे के लिए आर्डर दे चुके थे। विशाल पराठा उदरस्थ करने के बाद हमलोग अगले सफर के लिए तैयार हो गए।

माउंट आबू से आबू रोड की दूरी 35 किलोमीटर है। आबू रोड से गुजरात के अंबाजी की दूरी 22 किलोमीटर है। तो हमें जाना है अब अंबा जी। दो तरीके हैं किसी भी बस से आबू रोड तक जाएं वहां से बस या शेयरिंग टैक्सी से अंबा जी। पर हमने सुविधा के लिए गुजरात ट्रैवल्स की एसी बस बुक कर ली है। इसमें तीन स्लिपर सीटें आरक्षित हैं। बस सुबह 9.30 के आसपास होटल के सामने से गुजरेगी। हमलोग सड़क पर बस का इंतजार कर रहे हैं। वहां एक 15 साल का बच्चा कुरसी लगाकर बैठा है। वह निजी टैक्सी से माउंट आबू पहुंचने वाले लोगों को गाइड की सेवा उपलब्ध कराता है। सैलानियों को होटल भी दिला देता है। वह आने वाली हर टैक्सी को आवाज लगा रहा है होटल गाइड...होटल गाइड। मतलब कमाने के लिए बहुत पढ़ा लिखा होना जरूरी नहीं। बस दिमाग चाहिए।

खैर हमारी बस आ गई। हम अपनी स्लिपर सीटों पर जाकर सो गए। पर थोड़ी देर मे यह खुशी काफूर हो गई। माउंट आबू से आबू से उतरने के क्रम में इस एसी स्लिपर बस में माधवी और अनादि की तबीयत बिगड़ने लगी। वे चक्कर आने के बाद उल्टियां करने लगे। हालांकि मैंने सुबह 7 बजे ही नास्ता किया था अन्नपूर्णा के स्टाल पर इसलिए मुझे उल्टियां नहीं हुई।हमने दो गलतियां की थी। तुरंत नास्ता करके सफर और पहाड़ों पर एसी बस। वही ऊटी से मैसूर वाली गलती। फिर कान पकड़ा आगे से ऐसा नहीं करेंगे।

बस आबू रोड बाइपास में थोड़ी देर रुकने के बाद अब गुजरात सीमा की ओर चल पड़ी है। ये बस माउंट आबू से बड़ौदा जाने वाली है। अब रास्ता पहाड़ी नहीं है। इसलिए माधवी-अनादि थोडा आराम महसूस कर रहे हैं। अबां जी से 7 किलोमीटर पहले छापरी में चेक पोस्ट आया। इसके बाद गुजरात का बनासकांठा जिला शुरू हो गया। एक बोर्ड पर गुजराती में लिखा है - गुजरात मां आपनू स्वागत छे...

थोड़ी देर बाद लगभग 12 बजे बस ने हमें अंबाजी मंदिर से थोड़ा पहले उतार दिया। इस शहर का नाम ही अंबाजी है। देश कुछ शहरों के नाम वहां के प्रमुख मंदिरों के नाम पर ही पड़ गए हैं। सड़क के किनारे एक नींबू पानी के स्टाल पर माधवी और वंश ने शिंकजी पीकर राहत महसूस की। मंदिर दर्शन जाने से पहले हमने अपना सारा बैगेज इसी शिंकजी वाले के स्टाल पर छोड़ दिया और मंदिर के प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ चले। अंबाजी के मंदिर में दर्शन के लिए काफी भीड़ होती है। लोगों ने बताया दो घंटे से ज्यादा वक्त लगेगा।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
 ( MOUNT ABU TO AMBAJEE, GUJRAT TRAVELS )