Sunday, January 13, 2019

बागौर की हवेली और राजस्थान के लोकनृत्य की खुशबू


उदयपुर के गणगौर घाट के पास बागौर की हवेली स्थित है। एक पुरानी हवेली को संरक्षित किया गया है। दिन में आप हवेली देख सकते हैं। वहीं शाम को इस हवेली में लाइव शो होता है। यह लाइव शो होता है राजस्थान के लोकनृत्यों का। इसमें आप राजस्थान के अलग अलग हिस्सों के लोकनृत्य का आनंद ले सकते हैं। अमूमन हर शाम को 7 बजे से एक घंटे का शो होता है। पर ज्यादा सैलानियों की आमद होने पर दो शो होते हैं। एक सात बजे दूसरा आठ बजे।

जिस समय शाम को हमलोग बागौर की हवेली पहुंचे, शाम 7 बजे के शो की सारी टिकटें बुक हो चुकी थीं तो आठ बजे वाले शो का टिकट लेकर हम इंतजार करने लगे। यह शो भी हाउसफुल रहा। शो में बैठने के लिए महल के आंगन में नीचे गद्दे बिछाए गए हैं जहां जगह मिले फैल कर बैठ जाइए। यह शो एक सरकारी आयोजन है।   इसका आयोजन पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर द्वारा किया जाता है। वेस्ट जोन कल्चर सेंटर का दफ्तर भी इसी हवेली के परिसर में है।


इस शो की शुरुआत मंगल धुन और केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारो देस नी...से होती है। इस शो के दौरान आप घूमर , भवाई, कालबेलिया जैसे राजस्थान के लोकनृत्य देख सकते हैं। पर इस शो के फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी के लिए आपको अलग से शुल्क देना पड़ता है।  शो में आने वाले दर्शक एक घंटे के लिए ऐसी दुनिया में पहुंच जाते हैं जहां राजस्थान के अलग अलग इलाके के रंग हैं। आप शो में इस तरह खो जाते हैं कि शो कब खत्म होने को आ गया पता नहीं चलता। इस शो का खास आकर्षण है पपेट शो। यानी कठपुतली नृत्य। शो खत्म होने के बाद आप चाहें तो कठपुतलियां खरीद भी सकते हैं। ये कठपुतलियां 500 रुपये या उससे अधिक मूल्य में उपलब्ध होती हैं।


उदयपुर में लोक नृत्यों का लाइव शो बागौर की हवेली के अलावा लोक कला मंदिर में भी देखा जा सकता है। वहां अमूमन दिन भर हर घंटे एक नया शो शुरू होता है।
अब थोड़ी बात बागौर की हवेली के बारे में। यह गणगौर घाट पर स्थित उदयपुर की पुरानी और कलात्मक हवेलियों में से है जिसे संरक्षित किया गया है।
बागौर की हवेली का निर्माण मेवाड़ राज्य के प्रधानमंत्री अमर चंद बड़वा द्वारा 1751 से 1768 के बीच कराया गया। पर अमरचंद बड़वा के निधन के बाद ये हवेली मेवाड़ के महाराणा के छोटे भाई महाराजा नाथ सिंह के नियंत्रण में आ गई। 1828 से 1884 के बीच इस हवेली के मेवाड़ के कई महाराणाओं ने अपना ठिकाना बनाया।

हवेली के पास पिछौला झील से लगे गणगौर घाट का निर्माण महाराजा नाथ सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा भीम सिंह ने कराया। सन 1878 में महाराजा शक्ति सिंह ने गणगौर घाट के पास त्रिपोलिया ( मतलब नक्काशीदार तीन दरवाजे) का निर्माण कराया। सन 1930 में बागौर की हवेली का अधिग्रहण मेवाड़ राज्य द्वारा कर लिया गया। तब इसका इस्तेमाल राज्य अतिथि गृह के तौर पर होने लगा। 
आजादी के बाद राजस्थान राज्य सरकार ने इसका इस्तेमाल राज्य सरकार के कर्मचारियों के आवास के तौर पर किया। सन 1986 में ये हवेली जर्जर हाल में थी तब इसे पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र को स्थानांतरित किया गया। इस हवेली में कुल 138 कमरे हैं। अब इसे कलाकेंद्र और संग्रहालय के तौर पर विकसित किया गया है।
पढ़ते रहिए उदयपुर पर और भी बातें जारी है...
---vidyutp@gmail.com 

No comments:

Post a Comment