Saturday, January 5, 2019

तेलियों वाली माता और मोची समाज के सांवरिया

भला भगवान की कोई जाति होती है क्या। आप कहेंगे नहीं। पर हिंदू धर्म की सबसे बड़ी बुराई उसकी जाति व्यवस्था ही है। हम आपस में जातियों में बंटे हुए हैं, पर इतना ही नहीं हमने भगवान को भी जातियों में बांट दिया है। कुछ ऐसा महसूस हुआ उदयपुर की गलियों में घूमते हुए।

तेलियों वाली माता और मोची समाज के सांवरियाये नाम है उदयपुर शहर के कुछ मंदिरों के। वैसे तो उदयपुर शहर के गली गली में मंदिर हैं। पर इनमें से ज्यादातर मंदिर किसी जाति विशेष की मिल्कियत हैं। यानी भगवान भी जातियों में बंटे हुए हैं। 

घंटा घर से सराफा बाजार की तरफ आगे बढ़ते हुए जैन समाज के कई मंदिर हैं। जैन मंदिरों में पूजा पद्धति के हिसाब से विभाजन है। श्वेतांबर, दिगंबर, तेरापंथी आदि। पर तेलियों वाली माता का मंदिर देखकर अचरज हुआ। जरूर इसका निर्माण तेली समाज के लोगों  करवाया होगा। पर थोड़ा आगे चलने पर सांवरिया यानी कृष्ण जी का मंदिर मिला। यह मंदिर गुजराती मोची समाज द्वारा बनवाया गया है। नवरात्र पर यहां विशेष पूजा चल रही है।

ये उदयपुर के भोपालवाड़ी में श्रीगोवर्धन नाथ जी का मंदिर है। यानी कान्हा जी का एक और मंदिर। पर इस मंदिर का निर्माण क्षत्रिय मारवाड़ी गांछा समाज के लोगों ने करवाया है। मतलब मारवाड़ी में क्षत्रिय और उसमें भी गांछा समाज। उदयपुर शहर में इन लोगों की अच्छी संख्या है।

आगे एक शिवजी का मंदिर दिखाई दिया। ये पीपलेश्वर महादेव हैं। इस मंदिर के कर्ताधर्ता क्षत्रिय जी नगर समाज के लोग हैं। मोती चौहट्टा उदयपुर में स्थित इस मंदिर मे लिखा है निजी संपत्ति। यानी ये एक निजी मंदिर है। मतलब दूसरे समाज के लोग यहां पूजा पाठ करने नहीं आते होंगे। मतलब उदयपुर शहर मे क्षत्रिय बिरादरी भी कई उपजातियों में बंटी है और उन सबके अलग अलग मंदिर हैं।
मोती चौहट्टा पर ही हमें सीतारामजी का मंदिर दिखाई देता है। ये मंदिर आदि गौड़ चित्रकार समाज द्वारा निर्मित है। हांलाकि इस मंदिर पर निजी मंदिर जैसा कोई बोर्ड नहीं लगा पर आगे कई और जगह भी निजी मंदिर के बोर्ड दिखाई दे गए।
इसी सडक पर आगे धर्मराज जी का मंदिर दिखाई देता है। मंदिर सुंदर सजा हुआ है। यहां लिखा है कि यह गुर्जर समाज का निजी मंदिर है। आगे जगदीश मंदिर से गणगौर घाट की ओ जाने वाली सड़क पर एक और गिरिधारी लाल जी का मंदिर दिखाई देता है। यहां लिखा हुआ है कि पीपा क्षत्रिय दर्जी समाज का निजी मंदिर है। इनमें से ज्यादातर मंदिर पुराने हैं। कई तो सैकड़ों साल पुराने है।
देश के दूसरे शहरों में भी कई बार मंदिर एक खास समाज के लोग बनवाते हैं। पर वह आमतौर पर सार्वजनिक संपत्ति होती है। साथ उस मंदिर की पहचान तेलियों वाली माता और मोची समाज के सांवरिया जैसी नहीं होती। पर उदयपुर में ऐसा नजारा दिखाई देता है।

उदयपुर शहर में तमाम मुहल्लों के नाम भी अलग अलग जातियों के नाम पर हैं। जैसे तेलीवाड़ा, मोचीवाड़ा आदि। पर ऐसा देश के दूसरे शहरों मे भी दिखाई दे जाएगा। पर ईश्वर को जातियों में बंटा हुआ यहां पहली बार देखने को मिला।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( TEMPLE, CASTE, UDAIPUR ) 

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