Thursday, January 31, 2019

हल्दी घाटी के युद्ध की याद और संग्रहालय

हल्दी घाटी में हम सबसे पहले बादशाही बाग में पहुंचे हैं। यह हल्दी घाटी से ठीक पहले खमनोर ग्राम में स्थित है। अब यह सुंदर सजा संवरा उद्यान दिखाई देता है। पर कभी यह युद्ध का मैदान था। 
बादशाही बाग वह जगह है जहां 21 जून 1576 को पहली बार मुगल और महाराणा प्रताप की सेना का आमना सामना हुआ। इस पहली बार के युद्ध में प्रताप की सेना ने मुगलों की सेना को मुश्किल में डाल दिया था। बादशाही बाग में एक पट्टिका लगाकर इसकी जानकारी दी गई है। पार्क में कई तरह के फूल खिले हैं और चिड़ियों का बसेरा है। दोपहर भी सुहानी लग रही है। हरे भरे बाग में कुछ घंटे सैर करने के बाद हमलोग आगे बढ़ चले।

हमारा पड़ाव है हल्दीघाटी संग्रहालय। संग्रहालय के रास्ते में एक जगह सड़क दो तरफ ऊंचेपहाड़ से होकर गुजरती है। यहां देखने में आया कुछ लोग रुक कर मिट्टी काट रहे हैं। पता चला कि काफी लोग हल्दी घाटी की मिट्टी जो देखने में हल्दी के रंग की लगती है यहां से काट कर स्मृति के लिए ले जाते हैं। पर यह क्या अच्छी बात है। इस मिट्टी के काटने से चट्टान खोखली होती जा रही है।

हल्दी घाटी संग्रहालय के के पास दिन भर चहल पहल रहती है। बाहर खाना नास्ता, चाय की दुकाने हैं। कार पार्किंग के लिए काफी जगह है। साथ ही आप यहां ऊंट की सवारी का भी मजा ले सकते हैं। हल्दी घाटी युद्ध की याद में बना यह संग्रहालय यहां के स्थानीय लोगों ने निजी प्रयास से बनाया है। संग्रहालय में प्रवेश के लिए टिकट है। इस टिकट में एक आधे घंटे का शो दिखाया जाता है। हल्दी घाटी के युद्ध पर केंद्रित है यह शो। 

इस शो में हल्दी घाटी की लड़ाई के कथानक को बड़ी ही निष्पक्षता से लोगों को सरल भाषा में समझाने की कोशिश की गई है। वरना इतिहास को लेकर तो पढ़े लिखे लोगों में काफी भ्रम रहता है। इस शो के बाद एक मल्टी मीडिया एग्जबिशन है। यह खास तौर पर बच्चों के लिए काफी रोचक है। इसमें महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े प्रसंगों को बड़ी रोचकता से पिरोया गया है। आमतौर पर लोग हल्दी घाटी में दो घंटे बीताते हैं। यहां पर महाराणा प्रताप समेत हल्दी घाटी के युद्ध के मैदान को विशाल चित्रों में दिखाया गया है। यह सब कुछ देखना काफी रुचिकर लगता है। सैलानियों को यह संग्रहालय आनंदित करता है।
परिसर में हस्तशिल्प वस्तुओं की दुकान भी है। यहां के एक सरोवर के चारों तरफ मूर्तियां और प्रदर्शनी बनी है। एक बड़ी दुकान भी है जहां आप कपड़े और तमाम तरह की सामग्री खरीद सकते हैं।

पर इन सबसे आगे बढ़कर वहां कुछ ग्रामीण परिवेश की वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जो शहरी लोगों के लिए काफी कुछ नया हो सकती हैं। मसलन यहां पर एक गन्ने का रस निकालने वाला बैल कोल्हू लगातार चलता रहता है। आप आर्डर करें और वह बिना बर्फ वाला एक गिलास गन्ने का रस निकाल कर दे देते हैं। जी हां 15 रुपये में एक गिलास। अनादि ने पीया और उन्हें मजा भी आया। संग्रहालय परिसर में एक अच्छी कैंटीन भी है जहां आप पेट पूजा कर सकते हैं।  तो अब चलें आगे... बात करेंगे बहादुर घोड़े चेतक की...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com 
( HALDIGHATI, RAJSTHAN, MAHARANA PRATAP )  




Wednesday, January 30, 2019

हल्दी घाटी जहां अब खिलते हैं सुर्ख गुलाब...


नाथद्वारा में मत्था टेकने के बाद हमलोग आगे चल पडे हैं। मिराज पराठे के शो रुम से दो अलग अलग किस्म के पैक पराठों के पैकेट खरीद लिए। कहीं तो रास्ते में काम आ जाएगा। कुछ ऐसा ही सोच कर। अब हमलोग हल्दी घाटी की राह पर हैं। नाथद्वारा हाईवे छोड़ कर हमारे ड्राईवर ग्रामीण सड़क पर चल पड़े हैं। वही हल्दी घाटी जहां ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। अब यह पर्यटन स्थल बन गया है।


पर हल्दी घाटी की शुरुआत से ही हमें रास्ते में चैत्री गुलाब के शोरूम दिखाई देने लगे। सड़क के दोनों तरफ कई शो रुम। यहां गुलाब का शर्बत, गुलाब का इत्र, गुलकंद आदि बिक्री हो रही है। हमलोग ऐसे ही एक स्टॉल पर रुक गए। हमें पता चला कि हल्दी घाटी में बड़े पैमाने पर गुलाबों की खेती होती है। हम इस खबर से वाकिफ नहीं थे। पूरा देश जिस हल्दी घाटी को युद्ध के मैदान के रूप में जानता है अब वहां लाल गुलाब खिलते हैं। यहां अब इन गुलाबों का बड़ा कारोबार बन चुका है।

ये गुलाब यहां चैत्र महीने में खिलते हैं इसलिए इन्हें चैत्री गुलाब कहते हैं। हल्दीघाटी में ज्यादा आबादी सैनी भाई लोगों की है जो गुलाब की खेती करते हैं। इसके बाद सभी लोगों ने अपने घरों प्लांट लगा रखा है जहां गुलाब के अर्क निकालते हैं। हमारी मुलाकात दिनेश भाई से होती है जो गुलाब का अर्क निकालने का कारोबार करते हैं। वैसे तो उनका नाम दिनेश सैनी है पर हल्दीघाटी में आने वाले ज्यादातर गुजराती सैलानियों के असर से वे खुद को दिनेश भाई लिखते हैं।
दिनेश भाई बताते हैं कि आप फागुन चैत के महीने में हल्दीघाटी पहुंचेंगे तो आपको चारो तरफ गुलाब ही गुलाब दिखाई देंगे। यहां ज्यादर घरों में भट्टियां लगी हैं जो गुलाब के फूलों से अर्क निकालने का काम करते हैं।

उनके स्टॉल पर हल्दीघाटी के गुलाब से बना गुलाब शरबत, गुलकंद, परफ्यूम और गुलाब जल उपलब्ध है। यही चार उत्पाद यहां हर दुकान पर मिलते हैं। सबकी दरें भी करीब करीब एक जैसी हैं। दिनेश भाई हमें गुलाब का शरबत पिलाते हैं और इसके निर्माण की कहानी बताते हैं। हालांकि अब यहां के दुकानदार खस शर्बत, पुदीना शर्बत और दूसरे उत्पाद भी बनाने लगे हैं। यहां आपको डाइबिटिज में कारगार आजवाइन का अर्क भी मिलता है। दिनेश भाई रसीला पान और ठंडई शर्बत भी बनाते हैं। ( दिनेश भाई, खमनोर, हल्दीघाटी, जिला उदयपुर राजस्थान – मोबाइल नं - 8890717070 )

यहां गुलाब जल बनाने के लिए विशाल तांबे के पात्रों का इस्तेमाल किया जाता है। आसवन विधि से गुलाब का अर्क इकट्ठा किया जाता है। गुलाब जल के बारे में काफी लोग जानते हैं। पर नियमित गुलकंद खाना भी सेहत के लिए काफी अच्छा माना जाता है। हमने उनसे गुलाब शर्बत और परफ्यूम खरीदा। वैसे अगर आप हल्दी घाटी से कुछ खरीदकर साथ नहीं ले जा रहे हैं तो कोई बात नहीं। बाद में आप ये उत्पाद डाक, कूरियर आदि से भी आर्डर करके सीधे अपने घर के लिए मंगा सकते हैं। तो अब आगे चलें...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
(HALDIGHATI, ROSE, GULABJAL, GULKAND, DINESH SAINI, KHAMNOR )

Monday, January 28, 2019

करोड़ो वैष्णव भक्तों की आस्था के प्रतीक श्रीनाथ जी

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नाथद्वारा के मनमोहक बाजार से गुजरते हुए हमलोग श्रीनाथजी के मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंच गए हैं। राजस्थान का लोकप्रिय तीर्थ स्थल श्रीनाथद्वारा पुष्टिमार्गीय वैष्‍णव सम्‍प्रदाय की प्रधान (प्रमुख) पीठ है। यहां नंद नंदन श्री कृष्ण यानी श्रीनाथजी का भव्‍य मन्‍दिर है जो देश विदेश के करोडों वैष्‍णवों की आस्‍था का प्रमुख स्‍थल है। सालों भर देश के कोने कोने और विदेशों से श्रद्धालु नाथद्वारा पहुंचते हैं। नाथद्वारा आचार्य महाप्रभु की देश में कुल 84 बैठकों में से सबसे प्रमुख बैठक है। इसलिए श्रद्धालु में यह बड़ी आस्था का केंद्र है। 


यहां बाल रूप में विराजते हैं कान्हा -  श्रीनाथ जी भगवान श्रीकृष्ण के सात वर्ष की अवस्था के रुप हैं। यानी यहां कान्हा बाल रुप में विराजते हैं। श्रीनाथ जी का श्रंगार सालों भर अलग अलग मौसम के अनुसार किया जाता है।

यह मंदिर 17वीं शताब्दी में बनाया गया था। भगवान की मूर्ति काले मार्बल से काट कर बनाई गई थी। श्रीनाथ जी के मंदिर के देश प्रमुख धनी मंदिरों में गिना जाता है। श्रीनाथ जी की मूर्ति यहां मथुरा के पास गोवर्धन से लाई गई थी। कहा जाता है कि औरगंजेब मथुरा के आसपास के मंदिरों पर हमले करवा रहा था, तब 1665 में श्रीनाथ जी  को नाथद्वारा लाया गया। मेवाड़ के महाराजा महाराणा राज सिंह ने श्रीनाथ जी की मूर्ति को यहां स्थापित कराया। बनास नदी के किनारे 1672 में निर्मित मंदिर में मूर्ति की स्थापना की गई। तब से श्रीनाथ जी का यहां निवास करते हैं।


श्रीनाथ जी के मंदिर में दर्शन का समय सीमित है। पूरे 24 घंटे में मंदिर महज साढ़े तीन घंटे के लिए अलग अलग समय पर खुलता है। इसलिए आप समय के अनुरूप यहां दर्शन के लिए पहुंचे।

मंदिर में दर्शन का समय
मंगल दर्शन – 5.30 से 6.30
श्रंगार दर्शन – 7.15 से 7.45
राजभोग – 11.15 से 12.05
उत्थापन – 3.45 से 4.00
आरती – 5.15 से 6.00

मंदिर में प्रवेश से पहले आपको कैमरा, मोबाइल आदि को काउंटर पर जमा कर देना पड़ता है। परिसर के अंदर फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है। आप श्रीनाथ जी के मंदिर की परिक्रमा भी कर सकते हैं। मंदिर की गौशाला और आसपास के अन्य मंदिर भी देख सकते हैं।

मंदिर का भोग प्रसाद - नाथद्वारा मंदिर के भोग प्रसाद में 15 से ज्यादा व्यंजनो वाला देसी प्लेट तैयार किया जाता है। टोकरी नुमा प्लेट में मिट्टी की कोटरी में रबड़ी दही, खीर, पुड़ी, सब्जियां और कई व्यंजन। देशी का घी का बना हुआ मंदिर का प्रसाद। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तरह ही श्रीनाथ जी के मंदिर में भी विशाल रसोई घर संचालित होता है। यहां आने वाले श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा से मंदिर का प्रसाद ग्रहण करते हैं। आप अलग से रबड़ी की प्लेटें भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा नाथद्वारा में मंदिर मार्ग पर तीन दुकाने अधिकृत हैं जहां से मंदिर का प्रसाद पैसा देकर खरीदा जा सकता है।  

श्रीनाथ जी मंदिर के प्रवेश द्वार पर हमारी मुलाकात उदयलाल प्यारे लाल जी (मो. 97847-85548 ) से हुई। वे मंदिर के ढाई हजार पंडों में से एक हैं। वे आवाज लगा रहे थे कि मंदिर के भोग लगाया हुआ प्रसाद किसी चाहिए तो मैं लाकर दूंगा। हमने उन्हें एक प्लेट प्रसाद के लिए 50 रुपये सेवा शुल्क के तौर पर दिया। वे अंदर गए वापस आए तो विशाल प्लेट लेकर आए।

एक जगह टेबल जगह बनाकर हमलोग प्रसाद जीमने लग गए। जय श्रीनाथ जी। प्रसाद छककर तृप्त हुए तो पंडित जी से फिर मुलाकात हो गई। तो उनके साथ एक सेल्फी हो जाए। मंदिर के पंडा उदय लाल बताते हैं कि मंदिर की ओर से उन्हें प्रसाद बिना शुल्क के मिलता है। जितना भक्तों से मिल जाए वह उनकी आय होती है।

पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीमद् वल्लभाचार्य - शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद के व्याख्या और पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीमद् वल्लभाचार्य जी का जन्म  वैशाख कृष्ण एकादशी विक्रम संवत 1535 (ईस्वी सन 1478) में हुआ। उनके पिता लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लम्मागारू थे। उनका मूल ग्राम आंध्र प्रदेश के खम्मण के निकट कांकडवाड़ था। ये तैलंग ब्राह्मण थे और कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अन्तर्गत भारद्वाज गोत्र के थे।


पूरे देश में महाप्रभु वल्लभाचार्य की कुल 84 बैठकें हैं। इनमें सबसे ज्यादा बैठकें उत्तर प्रदेश के मथुरा वृंदावन के आसपास हैं। उनकी बैठकें गुजरात और बिहार में भी हैं। बिहार में हाजीपुर शहर के हेलाबाजार में उनकी एक बैठक है। 
नाथद्वारा की गलियों में घूमते हुए अगर आप शाकाहारी हैं तो जम कर खाए पीएं। रबड़ी, पूड़ी सब्जी, लस्सी, आईसक्रीम और भी बहुत कुछ मिलता है यहां। फिलहाल तो रबड़ी पर ही हाथ साफ किया जाए। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(SRINATHJI TEMPLE NATHDWARA, RAJSTHAN, VAISHNAVA MAT)


Sunday, January 27, 2019

श्रीनाथ जी के शहर नाथद्वारा की ओर

एकलिंगी महादेव के दर्शन के बाद हमलोग नाथद्वारा शहर की ओर चल पड़े हैं। शानदार हाईवे पर गाड़ी दौड़ रही है। रास्ते टोल प्लाजा आया। उसके बाद हमलोग नाथद्वारा शहर के करीब पहुंच गए हैं। खूबसूरत आरावली पर्वत श्रंखला के बीच स्थित नाथद्वारा राजस्थान के राजसमंद जिले में पड़ता है। यह छोटा सा कस्बा और विधानसभा क्षेत्र है। पर यह उदयपुर शहर से तकरीबन 40 किलोमीटर है। ज्यादातर लोग उदयपुर से नाथद्वारा जाते हैं। पर आप सीधे नाथद्वारा आना चाहते हैं माउली जंक्शन से उतरकर नाथद्वारा पहुंच सकते हैं।


नाथद्वारा के मार्ग पर हमें मिराज का शोरुम दिखाई देता है। हमने टीवी पर मिराज पराठा का विज्ञापन देखा था। पर मिराज सभी तरह के उत्पाद बनाते हैं। यह नाथद्वारा की प्रसिद्ध कंपनी है। नाथद्वारा और उदयपुर शहर में उनके कई कंपनी शोरूम है। अब मिराज कंपनी की ओर से ही नाथद्वारा में विशाल शिव की प्रतिमा का निर्माण कराया जा रहा है। तैयार होने पर यह देश की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा होगी।

नाथद्वारा शहर में हाईवे छोड़कर हम शहर में प्रवेश कर गए हैं। यह एक छोटा सा कस्बा है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी पार्किंग में लगाकर हमें मंदिर जाने को कहा। हम देखकर रहे हैं कि शहर के बाहरी इलाके में चौड़ी सड़कों और विशाल पार्किंग का निर्माण कार्य जारी है। पार्किंग से मंदिर की दूरी आधा किलोमीटर है। पर इस आधा किलोमीटर के रास्ते में बड़ा ही सुंदर बाजार है। अक्तूबर के महीने में यहां गर्मी लग रही है। तो हमने नींबू पानी पीया फिर आगे बढ़े।

नाथद्वारा राजस्थानी कपड़ों की शापिंग लिए अच्छी जगह है। शाकाहारी खाने पीने के लिए भी बेहतरीन जगह है। यहां आप सड़कों पर घूमते हुए कई तरह के स्वाद ले सकते हैं। खासतौर पर रबड़ी और मिठाइयां। यहां आप मिट्टी के बरतन और लकड़ी के खिलौने भी खरीद सकते हैं।

क्या क्या देखें – देश भर से लोग नाथद्वारा श्रीनाथजी के दर्शन के लिए आते हैं पर यहां और देखने लायक स्थल हैं। नाथ द्वारा में आप श्रीनाथ जी के मंदिर के अलावा लालबाग,विट्ठलनाथ जी का मंदिर, द्वारिकाधीश जी का मंदिर, गणेश टेकरी और मंदिर गौशाला आदि भी देख सकते हैं।

नाथद्वारा के पास ही नंदसमंद बांध है। नंदसमंद बांध आकार और पानी की क्षमता में काफी बड़ा है। इसके अलावा यहां एक छोटा सा बगीचा भी है। नाथद्वारा शहर को पीने के पानी की सप्लाई इसी नन्द समंद बांध से की जाती है। इस बांध से कुछ पानी राजसमन्द झील को भी छोड़ा जाता है।

पिचवाई कला है शहर की पहचान-  नाथद्वारा शहर की एक और पहचान है नाथद्वारा चित्रकारी। राजसमंद जिले का यह छोटा सा शहर कलाकारों की पेंटिंग परंपरा और स्कूल के कारण भी जाना जाता है। नाथद्वारा पेंटिंग्स विभिन्न उप-शैलियों के हैं जिनमें से पिचवाई पेंटिंग प्रमुख है। इसमें दीवारों पर सुंदर कलाकृतियां बनाई जाती हैं।

नाथद्वारा में रहने के लिए धर्मशालाएं और सस्ते होटल भी उपलब्ध हैं। मंदिर की ओर संचालित गेस्ट हाउस में ऑनलाइन बुकिंग भी होती है। नाथद्वारा में रुककर भी उदयपुर शहर की सैर की जा सकती है। मंदिर प्रशासन की और से ऐसी बस सेवा का संचालन किया जाता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email:vidyutp@gmail.com
(NATHDWARA , SRINATHJI TEMPLE , MIRAJ PARATHA )
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Saturday, January 26, 2019

मेवाड़ के महाराणाओं के अराध्य – श्री एकलिंगी महाप्रभु


श्री एकलिंगी प्रभु का मंदिर उदयपुर शहर से 23 किलोमीटर आगे नाथद्वारा के मार्ग पर स्थित है। यह मेवाड़ के राजाओं के अराध्य देव महादेव शिव का विलक्षण मंदिर है। वैसे इस स्थान का नाम 'कैलाशपुरी' है परन्तु यहां एकलिंग का भव्य मंदिर होने के कारण इसको एकलिंग जी के नाम से ही विख्यात हो गया है।

एकलिंगी महाप्रभु का मंदिर हिंदू भगवान शिव को समर्पित है। यह माना जाता है कि आचार्य विश्वस्वरूपा बप्पा रावल ने इसे 734 ई. में बनवाया था। पर बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा मोकल और महाराणा रायमल ने करवाया। मंदिर के परिसर में ही महाराणा कुंभा द्वारा बनवाया गया विष्णु मंदिर भी देखा जा सकता है।


मेवाड़ के महाराणाओं के अराध्य -  भगवान शंकर एकलिंग महादेव रूप में मेवाड़ राज्य के महाराणाओं और अन्य राजपूतों के प्रमुख आराध्य देव रहे हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां राजा तो भगवान शिव के प्रतिनिधि मात्र रूप में ही शासन किया करते हैं। इसी कारण उदयपुर के महाराणा को दीवाण जी भी कहा जाता है। मेवाड़ राजघराने के राजा किसी भी युद्ध पर जाने से पहले एकलिंग जी की पूजा अर्चना कर उनसे आशीष अवश्य लिया करते थे। यहां मन्दिर परिसर के बाहर मन्दिर न्यास द्वारा स्थापित एक लेख के अनुसार डूंगरपुर राज्य की ओर से मूल बाणलिंग के इंद्रसागर में प्रवाहित किए जाने पर वर्तमान चतुर्मुखी लिंग की स्थापना की गई थी।


इतिहास की घटनाएं हमें बताती हैं कि एकलिंग जी को ही को साक्षी मानकर मेवाड़ के राणाओं ने कई बार यहां ऐतिहासिक महत्व के प्रण लिए थे। एकलिंग का यह भव्य मंदिर चारों ओर ऊंचे परकोटे से घिरा हुआ है। इस परिसर में कुल 108 मंदिर बने हैं। मुख्य मंदिर में एकलिंग (शिव) की चार सिरों वाली 50 फीट की मूर्त्ति स्थापित की गई है। चार चेहरों के साथ महादेव चौमुखी या भगवान शिव की प्रतिमा के चारों दिशाओं में देखती रहती है।

इन्हें विष्णु (उत्तर), सूर्य (पूर्व), रुद्र (दक्षिण), और ब्रह्मा (पश्चिम) का प्रतिनिधित्व करते हैं। मंदिर में शिव के वाहन, नंदी बैल, की एक पीतल की प्रतिमा मुख्य द्वार पर स्थापित है। मंदिर में परिवार के साथ भगवान शिव की मूर्ति अत्यंत सुंदर है। देवी पार्वती और भगवान गणेश, क्रमशः शिव की पत्नी और बेटे, की मूर्तियां मंदिर के अंदर स्थापित की गई हैं। यमुना और सरस्वती की मूर्तियां भी मंदिर में देखी जा सकती हैं। इन छवियों के बीच में, यहां एक शिवलिंग चांदी के सांप से घिरा हुआ है। मंदिर के चांदी दरवाजों पर भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की छवियां भी हैं। नृत्य करती नारियों की मूर्तियों को भी यहां देखी जा सकती है। गणेशजी मंदिर, अंबा माता मंदिर, नाथों का मंदिर, और कालिका मंदिर इस मंदिर के पास स्थित हैं।

कैसे पहुचे - एकलिंगजी मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर उदयपुर के उत्तर में 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां आप नाथद्वारा जाते हुए पहुंच सकते हैं। मंदिर में भीड़ रहती है इसलिए यहां मंदिर में दर्शन के लिए कम से कम दो घंटों का समय जरूर रखें।

मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौंबद है। अंतर के हिस्सों में फोटोग्राफी और मोबाइल फोन लेकर जाना प्रतिबंधित है। मंदिर के प्रवेश द्वार मोबाइल कैमरे जमा कराने के लिए लॉकर की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। मंदिर के आसपास अच्छा खासा बाजार और पूजन सामग्री की दुकाने हैं। मंदिर पास ठहरने के लिए अतिथिशालाएं भी बनी हुई हैं। मंदिर का प्रबंधन उदयपुर का राजपरिवार देखता है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 E-mail : vidyutp@gmail.com
(EKLINGI TEMPLE , UDAIPUR , SHIVA , MEWAR RULARS )
       



Thursday, January 24, 2019

ग्यारहवीं सदी कलात्मकता में खो जाएं -उदयपुर का सासबहु मंदिर

उदयपुर में तीसरे दिन हम एक बार फिर टैक्सी बुक करके सासबहु मंदिर, एकलिंगी मंदिर, नाथद्वारा और हल्दीघाटी दर्शन के लिए निकल पड़े हैं। आज हमारे ड्राईवर बदल चुके हैं। नए टैक्सी ड्राईवर का नाम जगदीश है। वे धीमी गति से सलीके से गाड़ी चला रहे हैं। शहर से बाहर निकलते ही सबसे पहले हम पहुंचे है सास बहु का मंदिर देखने। यह उदयपुर शहर के बाहरी छोर पर अत्यंत कलात्मक और ऐतिहासिक मंदिर है।

उदयपुर से एकलिंगी मंदिर जाने के रास्ते पर नागदा में स्थित है सास बहु का मंदिर। वैसे इसका असली नाम सहस्त्रबाहु मंदिर है। ग्यारहवीं सदी के आरंभ में बना ये मंदिर विकसित शैली और प्रचूर अलंकरण के लिए जाना जाता है। मंदिर का परिसर 32 मीटर लंबा और 22 मीटर चौड़ा है।

मंदिर का निर्माण कछवाहा वंश के शासक महिपाल ने करवाया था। वह भगवान विष्णु का भक्त था। कहा जाता है कि उसने ये मंदिर अपनी पत्नी और बहु के लिए बनवाया। इसलिए इसका नाम तभी से सास बहू का मंदिर है। मंदिर ऊंचे जगत पर बना हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व में मकरतोरण द्वार है। 

मंदिर पंचायतन शैली में बनाया गया है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ देवताओं का कुल बसता है। हर मंदिर में पंचरथ गर्भ गृह, खूबसूरत रंग मंडप बने हैं। सास बहु यानी सहस्त्र बाहु मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है। हजार हाथों वाले देवता वही तो हैं। परिसर में दूसरा प्रमुख मंदिर शिव का है।

इन मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, बलराम सभी विराजते हैं। प्रवेश द्वार पर मां सरस्वती की मूर्ति है। यह राजस्थान के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। मंदिर की दीवारों पर अंदर और बाहर खजुराहो के मंदिरों की तरह असंख्य मूर्तियां बनी हैं। इन मूर्तियों में कई कामशास्त्र से जुडी हुई भी हैं। कला प्रेमी इस मंदिर को घंटों निहारते हैं। मंदिर में हमारे साथ विदेशी सैलानियों का एक दल आया हुआ है। उनके साथ चल रहे गाइड महोदय अपने सैलानियों को कुछ मूर्तियां दिखाकर कहते हैं ..इन्हें घर में आजमाना खतरनाक हो सकता है। और सैलानियों का दल ठहाके लगाने लगता है। 



 कई बार हमले हुए -  सास बहु मंदिर ने कई हमले झेले हैं। मंदिर का काफी हिस्सा हमले की भेंट चढ़ चुका है। फिर भी जितना हिस्सा बचा है वह भी दर्शनीय है। 1226 में इल्तुतमिश के हमले के दौरान पहली बार नागदा शहर और सहस्त्रबाहु मंदिर काफी तबाह हुआ।



खुलने का समय - मंदिर के चारों तरफ खेत हैं। आसपास में कोई दुकान बाजार नहीं है। यहां सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शन के लिए पहुंचा जा सकता है। कोई पूजा पाठ इस मंदिर में नहीं होता। पर भारतीय पुरातत्व विभाग का स्टाफ यहां तैनात रहता है। मंदिर की कलात्मकता को निहारने के लिए हर रोज विदेशी सैलानी भी पहुंचते हैं।

नागदा कभी मेवाड़ का महत्वपूर्ण शहर हुआ करता था। कुछ समय यह मेवाड़ के शासकों की राजधानी भी रहा। यहां पर एक अति प्राचीन जैन मंदिर भी है।


बाघेला लेक  - सास बहु मंदिर से पहले एक सुंदर झील पड़ती है जिसका नाम बाघेला लेक है। महाराणा मोकल ने अपने भाई बाघ सिंह के नाम पर बाघेला झील का निर्माण कराया था।

कैसे पहुंचे – उदयपुर शहर से सास बहु मंदिर की दूरी 20 किलोमीटर है। यहां निजी वाहन से ही आना श्रेयस्कर है। उदयपुर से नाथद्वारा के मार्ग पर एकलिंगी मंदिर से तीन किलोमीटर पहले यह मंदिर स्थित है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
 (SAS BAHU TEMPLE, NAGDA, UDAIPUR) 


Tuesday, January 22, 2019

कला शिल्प का चमत्कार - रणकपुर जैन मंदिर

शाम के चार बजे हैं और हमलोग पहुंच गए हैं रणकपुर। पार्किंग में गाड़ी लगाने के बाद मंदिर परिसर में दर्शन के लिए चल पड़े। शाम की गुनगुनी धूप में मंदिर काफी सुंदर लग रहा है। ताजमहल की तरह रणकपुर का जैन मंदिर संगमरमर की सुंदर संरचना है।

राजस्थान के रणकपुर का जैन मंदिर न सिर्फ राजस्थान के बल्कि देश के सबसे सुंदर नक्काशी वाले मंदिरों में से एक है। यह राजस्थान के पाली जिले में सादडी के पास स्थित है। रणकपुर उदयपुर जोधपुर मार्ग पर है।

अरावली पर्वत की घाटियों के मध्य स्थित रणकपुर में ऋषभदेव का चतुर्मुखी जैन मंदिर है। चारों ओर जंगलों से घिरे इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। 

मुख्‍य मंदिर प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित चौमुख मंदिर है। यह मंदिर चारों दिशाओं में खुलता है। चारों ओर द्बार होने से कोई भी श्रद्धालु किसी भी दिशा से भगवान आदिनाथ के दर्शन कर सकता है। हल्के रंग के संगमरमर का बना यह मन्दिर बहुत सुंदर लगता है।  इस मंदिर का निर्माण 1439 में हुआ था। संगमरमर से बने इस खूबसूरत मंदिर में 29 विशाल कमरे हैं जहां 1444 खंबे निर्मित हैं। मंदिर में 1444 खंभे है कमरों का निर्माण इस तरह किया गया है कि मुख्य पवित्र स्थल के दर्शन में बाधा नहीं पहुंचती है। इन खंबों पर अति सुंदर नक्काशी की गई है और छत का स्थापत्य देखकर  तो लोग चकित रह जाते हैं।

यहां संगमरमर के टुकड़े पर भगवान ऋषभदेव के पदचिन्ह भी है। यह पदचिन्ह भगवान ऋषभदेव तथा शत्रुंजय की शिक्षाओं की याद दिलाते हैं।
यह मन्दिर लगभग 40,000 वर्गफीट में फैला है।  रणकपुर के जैन मन्दिर को धर्म और आस्था के साथ शिल्प का चमत्कार कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यह उत्तर भारत के श्वेताम्बर जैन मंदिर में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस मंदिर परिसर में  दो और मंदिर है जिनमें भगवान पार्श्वनाथ और नेमिनाथ की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित की गई हैं। यहां राजस्थान की जैन कला और धार्मिक परंपरा का अपूर्व प्रदर्शन दिखाई देता है।

मंदिर का निर्माण - रणकपुर जैन मंदिर का निर्माण चार जैन श्रद्धालुओं आचार्य श्यामसुंदर जी, धरनशाह, राणा कुंभा तथा देपा ने कराया। धरनशाह राणा कुंभा के मंत्री थे। धरनशाह ने धार्मिक प्रवृतियों से प्रेरित होकर भगवान ऋषभदेव का मंदिर बनवाने का निर्णय लिया। मंदिर के निर्माण के लिए धरनशाह को राणा कुंभा ने जमीन प्रदान की। उन्होंने मंदिर के समीप एक नगर बसाने का भी सुझाव दिया। राणा कुम्भा के नाम पर ही इसे रणपुर कहा गया जो आगे चलकर रणकपुर नाम से जाना जाने लगा।

मंदिर के पास श्रद्धालुओं के रहने के लिए अतिथिशाला बनी हुई है। भोजनालय का भी इंतजाम है। हालांकि ज्यादातर श्रद्धालु उदयपुर या जोधपुर से आते हैं और दर्शन करके वापस लौट जाते हैं।

रणकपुर जैन मंदिर के आंतरिक भाग में घूम रहा था कि एक सुंदर सी लड़की हमारे पास आई और अंगरेजी में पूछा क्या मैं आपको इस मंदिर की विशेषताओं के बारे में बताउं। मैंने पूछा आपका परिचय। उसने कहा मैं मंदिर के एक पुजारी की बेटी हूं। मुंबई रहकर 10वीं में पढ़ रही हूं। अभी छुट्टियों इधर आई हूं। वे इस गाइड के लिए कुछ शुल्क की भी आकांक्षी थीं। मंदिर के तमाम पुजारी भी ऐसा करते हैं। उनका लक्ष्य खासतौर पर विदेशी नागरिक होते हैं जो ज्यादा पैसे दे सकें। क्योंकि गाइड शुल्क कुछ तय नहीं है। यहां भी आडियो गाइड हो तो अच्छा रहेगा।

मंदिर में आंतरिक हिस्से में फोटोग्राफी के लिए शुल्क देना पड़ता है। मंदिर के अंदर निक्कर बारमूडा पहनकर नहीं जा सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए यहां पायजामा किराये पर उपलब्ध है। सौ रुपये सुरक्षा राशि देकर पायजामा मिलता है। वापस करने पर 80 रुपये लौटा दिए जाते हैं। मंदिर परिसर में पेयजल और शौचालय आदि का इंतजाम है।

कैसे पहुंचे – रणकपुर की दूरी उदयपुर से 96 किलोमीटर है। यह जोधपुर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। आप जोधपुर से भी रणकपुर पहुंच सकते हैं। जोधपुर से रणकपुर की दूरी 155 किलोमीटर है। एक बात और . उदयपुर मेवाड़ है तो जोधपुर मारवाड.  रणकपुर मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
-        ( PALI, RAJSTHAN, RANAKPUR, JAIN TEMPLE, SHEWTAMBAR )




Sunday, January 20, 2019

महाराणा कुंभा के अराध्य – नीलकंठ महादेव का मंदिर

कुंभलगढ़ किले में कई ऐतिहासिक मंदिर हैं, इनमें महादेव शिव का भी अत्यंत सुंदर मंदिर है। यह मंदिर अपने विशाल शिवलिंगम और नक्काशीदार बरामदे के लिए जाना जाता है। मंदिर का निर्माण पंद्रहवी सदी में कुंभलगढ़ किले के निर्माण के साथ ही हुआ। सन 1457 में महाराणा कुंभा ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।
हनुमान पोल से अंदर प्रवेश करने के बाद दाहिनी तरफ नीलकंठ महादेव का सुंदर मंदिर है। इस मंदिर का काले पत्थर का विशाल शिव लिंगम स्थापित है। किसी में मंदिर में स्थापित शिवलिंगम में यह देश के विशालतम लिंगम में गिना जाता है। नीलकंठ मंदिर के शिवलिंगम की ऊंचाई छह फीट है। मंदिर के गर्भ गृह की कलात्मकता भी अदभुत है।

नीलकंठ महादेव महाराणा कुंभा के अराध्य देव हैं। वे नियमित इस मंदिर में पूजा किया करते थे। यह राजस्थान के अत्यंत सुंदर शिवमंदिरों में से एक है।
नीलकंठ महादेव  का बना मन्दिर अपने ऊंचे-ऊंचे सुन्दर स्तम्भों वाले बरामदे के लिए भी जाना जाता है। इस तरह के बरामदे वाले मन्दिर प्रायः बहुत कम देखने को मिलते हैं। इस मंदिर के भवन में कुल 36 कलात्मक स्तंभों को निर्माण कराया गया है। मंदिर की संरचना दो मंजिलों वाली है। कहा जाता है कि महाराणा कुंभा स्वंत वास्तु शास्त्र के बड़े जानकार थे। उनका वास्तुज्ञान इस मंदिर के निर्माण में खूब झलकता है। मन्दिर की इस शैली को कर्नल टॉड जैसे इतिहासकार ग्रीक (यूनानी)  शैली बतलाते हैं। हालांकि कई विद्वान् उनके इस तर्क से सहमत नहीं हैं।

नीलकंठ मंदिर में आज भी नियमित पूजा अर्चना होती है। आम श्रद्धालु यहां सुबह से शाम यानी सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शन कर सकते हैं। कुंभलगढ़ किले में आने वाले सैलानी अक्सर इस मंदिर के भी दर्शन जरूर करते हैं। आजकल यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। मंदिर के बगल में ही हर शाम को लाइट एंड साउंड शो का भव्य आयोजन होता है।

किले में 360 मंदिर - वैसे कुंभलगढ़ किले के अंदर आप कई हिंदू और जैन मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं। कहा जाता है कि कुंभलगढ़ किले के अंदर कुल 360 मंदिरों का निर्माण हुआ है। इनमें 300 जैन मंदिर और तकरीबन 60 हिंदू मंदिर हैं। किले के अंदर सूर्य मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, मामा देव मंदिर, पीतलिया शाह मंदिर, चारभुजा मंदिर, गणेश मंदिर, बावन देवरी मंदिर, गोलेराव मंदिर आदि के भी दर्शन किए जा सकते हैं।

कुंभलगढ़ से रणकपुर की ओर –
कुंभलगढ़ किले में कई घंटे गुजारने के बाद हमलोग अब रणकपुर की ओर चल पड़े हैं। किले से बाहर निकलने के बाद केलवाड़ा से पहले से रणकपुर के लिए रास्ता बदल जाता है। यह रास्ता बिल्कुल ग्रामीण है। रास्ते में कुछ जगह बच्चे शरीफा बेचते नजर आते हैं। चलते चलते हमें आचनक सड़क के बीचों बीच एक विशाल सांप नजर आता है सड़क पार करता हुआ। अनादि के लिए यह काफी नई बात है। सांप देखना।
पानी निकालने वाली रहंट का आनंद लेते अनादि....

दोपहरी गहरा रही है। हमारे ड्राईवर लंच के लिए हमें अमराई वैली रिजार्ट में ले जाते हैं। सड़क किनारे बहती छोटी सी नदी। उस नदी पर पुल के उस पार बड़ा ही मनोरम रिजार्ट है। यहां एक रहंट चलती हुई दिखाई दी। अनादि के लिए रहंट भी अनूठी चीज है। वे दौड़कर रहंट पर जा बैठे। हमने तो बचपन में गांव में खूब रहंट हांकी है। 

अमराई वैली में खाना थोडा महंगा है। 400 रुपये का बूफे है। इसमें शाकाहारी मांसाहारी सब कुछ है। पर हमने वेज बिरयानी ले ली है। रिजार्ट में एक गिफ्ट शॉप भी है। खाने के बाद हमलोग फिर आगे बढ़ चले हैं। कुंभलगढ़ से रणकपुर की दूरी 50 किलोमीटर से ज्यादा है। हमारी गाड़ी हरी भरी वादियों में उड़ान भर रही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( KUMBHALGARH TO RANAKPUR, AMRAI VALLY RESORT, FOOD )