Friday, November 15, 2019

एक बार फिर अदभुत अंदमान की ओर


तीन साल बाद यानी साल 2016 के बाद 2019 में एक बार फिर अंदमान जाने का कार्यक्रम बन गया। इस बार बेटे अनादि और उनकी मां माधवी भी साथ हैं। 23 मई की रात को 17वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे आए जिसमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से जीती। रात 1.30 बजे तक दफ्तर में सुबह का अखबार निकालने में अपनी भूमिका निभाने के बाद घर आया। अनादि और माधवी पैकिंग करके तैयार थे, मैंने भी अपनी पैकिंग पूरी की। मुझे किसी भी यात्रा के लिए पैकिंग करने में महज आधे घंटे का वक्त लगता है। 

रात 2.30 बजे टैक्सी बुक कर हम दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल दो (टी2) के लिए चल पड़े। इस बार हमने में  गो एयर के विमान की सेवाएं ली है। उड़ान का समय सुबह 5.45 बजे का है। सुबह 4 बजे के आसपास चेकइन की प्रक्रिया पूरी कर हम विमान का इंतजार करने लगे। सुबह 5.05 बजे प्रवेश आरंभ हुआ। एयरब्रिज के बजाए हमें विमान तक बस से ले जाया गया। गोएयर के ए 320 विमान में हमें 30 ए, बी, सी सीट मिली है। यानी सबसे आखिरी सीट। सुबह 5.30 के बाद उजाला होने लगा है और हम आसमान में हैं। लगभग ढाई घंटे बाद विमान कोलकाता एयरपोर्ट पर उतर गया। यहां विमान का 35 मिनट का ठहराव है। काफी यात्री कोलकाता में उतर गए। आसपास में कुछ नए चेहरे अवतरित हो गए हैं। पर पायलट और परिचारिकाएं वही रहीं।

जहाज को उड़ा रही हैं कैप्टन अर्शदीप कौर, उनके साथ है कैप्टन ध्रुव आर्य। परिचारिकाएं हैं शहनाज और उनकी साथी। जहाज 850 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से 33 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर रहा है। कोलकाता के बाद हमलोग समंदर के ऊपर यानी पानी के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। मौसम अच्छा है। मेरी पिछली यात्रा की तरह इस बार पानी के ऊपर हम खराब मौसम से गुजर रहे हैं... जैसी कोई चेतावनी जारी नहीं हुई। कोलकाता से पोर्ट ब्लेयर की दूरी विमान ने दो घंटे में तय कर ली है। अनादि आसमान से पोर्ट ब्लेयर की धरती को देखकर रोमांचित हो रहे हैं। पिछली बार मैं उन्हें छोड़कर अकेला ही अंदमान की यात्रा पर आया था। पर इस बार वे अपनी सूची बनाकर लाए हैं कि अंदमान में उन्हें क्या क्या देखना है।

हम पोर्ट ब्लेयर में उतर गए हैं। मेरे लिए तो ये छोटा सा एयरपोर्ट जाना पहचाना सा है। विमान से आगमन टर्मिनल महज 200 मीटर है, पर इतनी छोटी दूरी के लिए बस में बिठाया गया। पर पोर्ट ब्लेयर छोटा हवाई अड्डा है। पर अब इसके नए कलात्मक भवन का निर्माण हो रहा है। बाहर निकलते ही आटो रिक्शा वाले हमारे पीछे पड़ गए है। पर मैं सामान के साथ लांबा लाइन की सड़क पर आ गया। यहां से अबरडीन बाजार की ओर जाने वाली सिटी बस में बैठ गया। दस रुपये प्रति सवारी टिकट है। हमलोग मिडल प्वाइंट पर सागरिका शोरुम के पास उतर गए। थोड़े पूछताछ में ओम गोस्ट हाउस मिल गया। 

हमारा कमरा हमारा इंतजार कर रहा था। हालांकि कमरे का आकार थोड़ा छोटा है, पर एडजस्ट कर लेंगे। सामान रखने के बाद मैं निकल पड़ा डिगलीपुर जाने वाली बस का टिकट पता करने के लिए। इस बार की हमारी यात्रा की प्राथमिकता है डिगलीपुर जाना। पर सरकारी या निजी बस में कल का डिगलीपुर का टिकट नहीं मिला। तो हमें अपने यात्रा कार्यक्रम को थोड़ा बदलना पड़ा। अब हम 25 तारीख को डिगलीपुर जाएंगे। थोड़ी देर में अपना काम निपटाकर मैं वापस लौट आया। अब हम सब निकल पड़े हैं पोर्ट ब्लेयर की सड़कों पर। अब सबसे पहले कहां जाएं तो चलते हैं चाथम शॉ मिल की ओर।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        (ANDAMAN, PORT BLAIR, GOAIR, OM GUEST HOUSE, MIDDLE POINT)

Wednesday, November 13, 2019

दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन-गोपालगंज से पटना


गोपालगंज के बसडीला में रात को रामचंद्र चाचा जी के घर सोने से पूर्व चाची ने कहा था कि सुबह 4 बजे घर के बाहर से ही पटना की सीधी बस मिल जाएगी। बस स्टैंड जाने की कोई जरूरत नहीं है। 
तो हमलोग चार बजे सुबह के बाद तैयार होकर घर से बाहर निकल हाईवे एनएच 27 पर खड़े हो गए। थोड़ी देर में बस आई। हाथ देने पर रोक दिया। अतुल कंपनी की बस सासामूसा से चलती है। टू बाई टू एसी बस का पटना का किराया 210 रुपये है। कंपनी मेड बॉडी वाली बस का इंटिरियर शानदार है। बस में वीडियो फिल्म पर गाना चल रहा है - दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन...

सुबह का उजाला होने लगा है। पटना जाने वाली बस में कुछ हंसते-मुस्कराते चेहरे नजर आए। मैं खिड़की के पास वाली एक सीट पर बैठ गया। बस गोपालगंज बाजार में बस स्टैंड में पहुंची। पांच मिनट रुकने के बाद आगे बढ़ चली है। अगला पड़ाव है थावे। थावे में माता का प्रसिद्ध मंदिर है। थावे के बाद हम पहुंचे हैं मीरगंज।

मीरगंज गोपालगंज जिले का प्रमुख शहर है जो पिछले कुछ सालों में व्यापारिक केंद्र बनकर उभरा है। मीरगंज से चलकर हमारी बस अब सीवान पहुंच गई है। बबुनिया मोड़ होते हुए सीवान शहर से बस आगे निकल गई। अब पटना जाने वाली बसें सीवान से छपरा होकर नहीं जाती हैं। राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सड़कों नए संजाल के कारण कई वैकल्पिक सड़के बन गई हैं।

बस का अगला पड़ाव है मलमलिया। यहां रास्ते में हनुमान गढ़ मंदिर दिखाई देता है। यह इस इलाके का प्रसिद्ध मंदिर है। बस सारण जिले में प्रवेश कर चुकी है। अगले पड़ाव हैं मधुरी और बहरौली बाजार। इसके बाद आता है मशरक। मशरक सारण जिले का प्रमुख बाजार और छपरा थावे रेल मार्ग का प्रमुख स्टेशन है।

परसा और राहुल सांकृत्यायन - मशरक के बाद हम पहुंच गए हैं तरैया। और तरैया के बाद अमनौर। अमनौर के बाद सोनहो और उसके बाद परसा बाजार। परसा में मुझे परसा थाना और परसा के इंटर कॉलेज के भवन नजर आए हैं। पर परसा से गुजरते हुए महापंडित राहुल सांकृत्यायन की खूब याद आई। ये पूरा इलाका महान घुमक्कड़ विद्वान राहुल जी का कार्यक्षेत्र रहा है। परसा में राहुल जी एक मठ में मंहथ बनकर रहे। इसी क्षेत्र में उन्होने किसानों के लिए आंदोलन किया। अपनी पुस्तक संघर्ष के साथी में उन्होंने सारण जिले के तमाम लोगों को याद किया है। परसा, अमनौर और तरैया के लोग आज भी राहुल सांकृत्यायन को याद करते हैं।


अमनौर और परसा के बाद दरियापुर नामक कसबा आया। और इसके बाद आया शीतलपुर। शीतलपुर मेरे लिए पूर्व परिचित नाम है। अब नयागांव, परमानंदपुर जैसे गांव हमारे जाने पहचाने हैं। ये सोनपुर छपरा रेल मार्ग के रेलवे स्टेशन हैं, जिनसे होकर मैं अनगिनत बार गुजरा हूं। अब बस सोनपुर पहुंच गई है।

सोनपुर में गंडक का नया पुल पारकर बस हाजीपुर पहुंच गई है। उसी शहर में जहां मैंने अपने जीवन के कई साल गुजारे। पर अभी तो हाजीपुर में रुकना नहीं है। यहां से आगे बढ़ते हुए महात्मा गांधी सेतु पहुंच गई है। महात्मा गांधी सेतु चार लेन का गंगा पर 1984 का बना पुल है। समय से बहुत पहले ध्वस्त हो चुके इस पुल का दो लेन सुपर स्ट्रक्चर तोड़ा जा चुका है। इस पर अब अंग्रेजों के जमाने की तरह लोहे का पुल बनाया जा रहा है। मैं देख रहा हूं कि पुल के एक बार फिर निर्माण का काफी काम हो चुका है। अब इस पुल को एफकान्स ( सपूरजी पालनजी समूह) बनवा रहा है। पटना में पहुंचते ही अगमकुआं के स्टाप पर मैं बस से उतर जाता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        (GOPALGANJ, THAWE, MIRGANJ, SIWAN, MASHRAK, MALMALIA, PARSA, AMNAUR, SONPUR ) 
अगली कडी से चलेंगे अंदमान निकोबार की यात्रा पर.... 

Monday, November 11, 2019

कुशीनगर से गोपालगंज वाया तमकुही राज


कुशीनगर हाईवे पर पहुंच कर आगे के लिए वाहन का इंतजार कर रहा हूं। एक आटो रिक्शा मिला जिसने मुझे कसेया बाजार के बस स्टैंड तक छोड़ दिया। लोगों ने सलाह दी कि यहां से सीधे गोपालगंज की बस का इंतजार करने के बजाय तमकुही राज तक चले जाएं। वहां से दूसरी बस मिल जाएगी। पांच मिनट में कसेया से मुझे तमकुही जाने वाली बस मिल गई। 

अब हम एनएच 27 पर चल रहे हैं। यहा नया नंबर है। यह एनएच 27 सड़क गुजरात के पोरबंदर से शुरू होकर असम से सिलचर तक जाती है। इसकी कुल लंबाई 3507 किलोमीटर है। नए नबंर संयोजन में एनएच 27 देश के सबसे लंबे नेशनल हाईवे में से एक हो गया है। 
एक घंटे से कम समय में बस ने हमें तमकुही राज पहुंचा दिया। मुझे तमकुही पहुंच कर केदारनाथ मिश्र जी की याद आई। एक गांधीवादी शिक्षक जो 1993 में सदभावना रेल यात्रा में हमारे साथ हुआ करते थे। वे इसी तमकुही के रहने वाले थे। ब्रिटिश काल में तमकुही एक छोटा सा राजघराना था। अब यह कुशीनगर जिले का छोटा सा बाजार है। गोरखपुर से पडरौना होकर थावे सीवान जाने वाले रेल मार्ग पर तमकुही रेलवे स्टेशन भी है।

भारी बारिश से तमकुही की सड़क पर जल जमाव हो गया है। पर इसी जल जमाव में छाता लेकर एक सज्जन गोपालगंज -गोपालगंज की आवाज लगा रहे हैं। तो मुझे इंतजार नहीं करना पड़ा। मैं फटाफट बस में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर में आवाज लगाने वाले सज्जन आए। वे दरअसल इस बस से ड्राईवर ही थे। और बस फिर एक बार एनएच 27 पर चल पड़ी है। रास्ते में छोटे छोटे पड़ाव पर सवारियां उतारती जा रही है। सलेमगढ़ उत्तर प्रदेश का आखिरी कस्बा है इस मार्ग पर। 

इसके बाद बस बिहार राज्य में प्रवेश कर गई है। बिहार का पहला कस्बा आया कुचायकोट। यह गोपालगंज जिले का एक छोटा सा बाजार और विधानसभा क्षेत्र भी है। इसके बाद आया फुलवरिया। वही फुलवरिया जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का गांव है। इसके बाद बस सासामूसा बाजार के बाहरी इलाके से होकर गुजरी। कोन्हवा के बाद गोपालगंज शहर के करीब हमलोग पहुंच रहे हैं। पर मुझे गोपालगंज बाजार में नहीं जाना, बल्कि उससे पहले ही बसडीला में उतर जाना है जो गांव बिल्कुल हाईवे पर ही है। 

चाचाजी ने जो मुझे लैंडमार्क बताया था मैं बस के चालक महोदय से आग्रह करके वहीं उतर गया। यह संयोग रहा कि मैं रामचंद्र सिंह अंकल के घर के ठीक सामने उतरा हूं। वे बाहर खड़े मेरा ही इंतजार कर रहे थे। कई सालों बाद उनसे मिलना हुआ है। सन 1999 में सीवोटर के लिए बिहार में चुनावी सर्वेक्षण के कार्य के दौरान मैं इधर आया था।

आपको बता दूं कि रामचंद्र सिंह अंकल और मेरे पिता जी दोनों ही उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में मैनेजर रहे। मुझे कई साल रामचंद्र अंकल के साथ रहने का मौका मिला है। सातवीं आठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान शरतचंद्र, चतुरसेन शास्त्री जैसे उपन्यासकारों को पढ़ने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिली। हिंद पाकेट बुक्स की घरेलू लाइब्रेरी योजना का सदस्य मैं उनकी प्रेरणा से बना। बारहवीं कक्षा में आते आते में  उनकी सलाह पर काफी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ चुका था। इस साहित्यिक रुझान के कारण ही शायद मैं पत्रकारिता जैसे पेशे में आ गया। चाचा जी की प्रेरणा से स्कूली जीवन में मैंने शरतचंद्र की श्रीकांत पढ़ी। उस श्रीकांत के कारण ही खूब घूमने की प्रेरणा मिली।

चाचाजी की तीनों बेटियों का विवाह हो चुका है। दोनों बेटे भी बाहर रहकर नौकरी कर रहे हैं। अब चाचा और चाची दोनों गोपालगंज के पास बसडीला में अपने विशाल घर में रह रहे हैं। तो रामचंद्र चाचाजी अब काफी बुजुर्ग हो चुके हैं। इधर के कई सालों में लगातार कई बीमारियों के इलाज के कारण सेहत पहले जैसी नहीं रही। पर उनकी जीजिविषा गजब की है। वही उमंग और उत्साह आज भी चेहरे पर दिखाई देता है। मेरे लिए खासतौर पर सफेद मालदह आम जो पेड़ के पके हुए हैं उन्होंने मंगवाकर रखा है। तो आज की शाम चाचाजी के नाम।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KASEYA, KUSHINAGAR, TAMKUHI RAJ, GOPALGANJ, NH 27  )

Saturday, November 9, 2019

दुनिया भर से लोग पहुंचते हैं कुशीनगर

बुद्ध का जीवन संदेश पूरी दुनिया में प्रसारित हुआ। इसलिए दुनिया के तमाम देशों के लोग कुशीनगर पहुंचते हैं। बुद्ध से प्रेरणा लेने के लिए। इसी क्रम में कुशीनगर में महापरिर्वाण स्थल के आसपास कई देशों के बौद्ध मंदिरों का निर्माण हुआ है। इनमें चीन और म्यांमार के मंदिर प्रमुख हैं। यहां पर बिरला परिवार द्वारा बनवाया गया एक सुंदर मंदिर भी है। 



माथा कौर मंदिर – महापरिनिर्वाण स्थल से थोड़ा आगे जाने पर माथा कौर मंदिर स्थित है। इस मंदिर के परिसर में भी कई स्तूपों के अवशेष हैं। इन स्तूपों के अवशेष को देखकर लगता है कि कभी यहां विशाल स्मारक रहे होंगे। यहां कलचुरि शासकों के समय का एक प्राचीन मंदिर हुआ करता था। अब वह मंदिर नहीं रहा।
यहां पर एक नया बौद्ध मंदिर बनाया गया है। हालांकि वर्तमान मंदिर ज्यादा पुराना नहीं है। सन 1927 में बने इस मंदिर में गौतम बुद्ध की सुनहले रंग की सुंदर प्रतिमा है।
यहां आगे डेढ़ किलोमीटर चलने पर रामाभर स्तूप तक पहुचा जा सकता है। पर फिलहाल मेरे पास समय का अभाव है। मतलब कुशीनगर भी आना हो तो कम से कम पूरा दिन आपके पास होना ही चाहिए। 

चीन और म्यांमार का बौद्ध मंदिर – कुशीनगर में मुख्य स्मारक से पहले चीन का बौद्ध मंदिर बना है। इसी पथ पर आगे म्यांमार द्वारा बनवाया गया विशाल बौद्ध मंदिर है। इसमें सुनहले रंग की विशाल आकृति है। कुछ वैसी ही जैसी म्यांमार ने लुंबिनी में बनवाई है। इस मंदिर के अंदर बुद्ध के शरण में जा रहे बौद्ध भिक्षुओं की प्रतिमाएं हैं। 

इस मंदिर के सामने एक बुद्ध सरोवर भी बना हुआ है। म्यांमार के मंदिर का वातावरण मनोरम है। इस मंदिर से थोड़ा आगे विपरीत दिशा में बिड़ला धर्मशाला है। इसी परिसर में बिरला परिवार द्वारा बनवाया गया मंदिर भी है।



पथिक निवास होटल में लंच - बिरला मंदिर के बगल में यूपी टूरिज्म का पथिक निवास होटल है। बारिश जारी है। मुझे भूख लगी है। दोपहर के भोजन के लिए मैं पथिक निवास के रेस्टोरेंट में गया। यहां पर वेज बिरयानी का आर्डर किया। मैं पूरी तरह भींग चुका हूं। जबकि बिरयानी आ रही है, खुद को सुखाने की असफल कोशिश कर रहा हूं। 

मेरे आर्डर करने के बाद बिरयानी आने में एक घंटे का वक्त लग गया। इस सरकारी रेस्टोरेंट में खूब चहल पहल है। हर टेबल भरी हुई है और वेटर काफी व्यस्त हैं। खाने पीने वालों में कई सरकारी कर्मचारी नजर आ रहे हैं। पर किसी सरकारी रेस्टोरेंट को इतना चलता हुआ देखकर खुशी हो रही है। 



इस बीच मैं अपने आगे की यात्रा के बारे में सोचता हूं। मुझे पता चल चुका है कि कुशीनगर से गोपालगंज महज दो घंटे का ही रास्ता है। तो मैं गोपालगंज में रामचंद्र चाचा जी फोन करके उन्हें अपने आने की जानकारी देता हं। वे कहते हैं आ जाओ मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। तो पेट पूजा के बाद मैं निकल पड़ा हूं। एक बाइक वाले सज्जन ने नेशनल हाईवे तक लिफ्ट दे दी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( KUSHINAGAR, BUDDHA, UP, PATHIK NIWAS  )   

Thursday, November 7, 2019

कुशीनगर – यहां बुद्ध इस दुनिया को छोड़ गए


कुशीनगर तथागत बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली है। यह गोरखपुर के पास उत्तर प्रदेश का एक जिला है। इसकी सीमा गोरखपुर, देवरिया, नेपाल और बिहार से लगती है। बौद्ध ग्रंथों में इस स्थल का नाम कुशीनारा भी मिलता है।
कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम के दो पुत्र लव कुश थे उनमें से कुश के द्वारा बसाया हुआ नगर कुशीनगर है। 

हर साल दुनिया भर से लाखों पर्यटक और श्रद्धालु यहां आते हैं। यहां का मुख्य आकर्षण अनूठे डिजाइन वाले महापरिनिर्वाण मंदिर में लेटे हुए बुद्ध की विशालकाय मूर्ति है। कुशीनगर के स्मारकों को तीन वर्गों में बांट कर देखा जा सकता है। तथागत का महापरिनिर्वाण स्थल, मध्य स्तूप, मठाकुआर कोट और रामभर स्तूप के आसपास का इलाका।

नेशनल हाईवे से दो किलोमीटर अंदर जाने के बाद बायीं तरफ कुशीनगर का मुख्य स्मारक है। इस रास्ते में कई अच्छे आवासीय होटल बने हुए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित इस स्मारक में जाने के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। कई एकड़ में फैले विशाल हरे भरे उद्यान के बीच महापरिनिर्वाण स्तूप स्थित है। बुद्ध की विशाल लेटी हुई प्रतिमा के चारों तरफ कई स्तूप बने हुए हैं।

बुद्ध की विशाल लेटी हुई प्रतिमा 2.74 मीटर ऊंचे चबूतरे पर बनी है, जिसे एक मंदिर का स्वरूप प्रदान किया गया है। यह मूर्ति 1876 की खुदाई में प्राप्त हुई थी। यहां बुद्ध चिर निद्रा में लेटे हैं। यह मूर्ति 6.10 मीटर लंबी है। इसे बलुआ पत्थर से निर्मित किया गया है। उनके चेहरे पर एक स्थायी शांति का भाव है। उनकी लेटी प्रतिमा वाले मंदिर के ठीक पीछे विशाल स्तूप है। वैसे मंदिर के चारों तरफ कई स्तूपों के अवशेष देखे जा सकते हैं। ये सारे स्तूप उन्नीसवीं सदी में उत्खनन के दौरान मिले हैं।

तथागत का महापरिनिर्वाण - कुशीनगर में गौतम बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की उम्र में 483 ईस्वी पूर्व में हुई थी। कहा जाता है कि एक ग्रामीण व्यक्ति के घर कुछ खाने के कारण उनके पेट में दर्द शुरु हो गया। बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कुशीनारा की ओर चल दिए। 

रास्ते में उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा, 'आनंद इस संधारी के चार तह करके बिठाओ। मैं थक गया हूं, अब लेटूंगा। उन्होंने हिरण्यवती नदी को पार किया और दो साल के वृक्षों के बीच कुशीनगर में अपने प्राण त्यागे। उनकी मृत्यु के छह दिन बाद उन्हे जलाया गया। उनके शव के अवशेषों का बंटवारा आठ हिस्सों में किया गया।



इन आठ स्थलों पर आठ स्तूप बने। ये स्थल हैं.. 1 कुशीनगर 2. कपिलवस्तु 3 रामग्राम 4 राजगृह 5 वैशाली 6 पावागढ़ 7 बेट द्वीप  8 अल्लकल्प।
बुद्ध की जन्म स्थली लुंबिनी से चलकर उसी दिन उनके महापरिनिर्वाण स्थल पर पहुंचते हुए मन में एक अलग सी अनुभूति हो रही है। कभी कभी ऐसा लग रहा है कि कम से कम आज तो कुशीनगर नहीं आना चाहिए था। एक बार सहज ही ये विश्वास करना काफी मुश्किल होता है  कि हजारों साल पहले एक महामानव इस धरती पर आया था  जिसने विश्व को ज्ञान और करुणा का ऐसा संदेश दिया। पर ये सत्य है। आज पूरी दुनिया शाक्यमुनि के की शिक्षाओं को याद करती है। बुद्ध ने भारत और नेपाल की भूमि का मान बढ़ाया। 

हल्की बारिश के बीच महापरिनिर्वाण स्थल में कुछ घंटे गुजारने के बाद बड़े भरे मन से इस परिसर से बाहर निकल रहा हूं। कुशीनगर में गौतम बुद्ध की याद में काफी कुछ है। तो उनकी कुछ और स्मृतियों के दर्शन क्यों न कर लिए जाएं। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( KUSHINAGAR, BUDDHA, UP, PATHIK NIWAS  )  


Tuesday, November 5, 2019

गोरखपुर से कुशीनगर – भारी बारिश में बसों की हड़ताल


गोरखपुर से मैं कुशीनगर जाना चाहता हूं। सुबह तथागत बुद्ध के जन्मस्थान लुंबिनी से चला हूं और दोपहर तक उनके महापरिनिर्वाण स्थल तक पहुंच जाना चाहता हूं। गोरखपुर रेलवे स्टेशन के सामने वाली सड़क पर दो सौ मीटर की दूरी पर ही बस स्टैंड है। हल्की बारिश में भिंगता हुआ मैं बस स्टैंड पहुंचता हूं। हालांकि यहां का बस स्टैंड आकर्षक नहीं है। बस स्टैंड में यह पूछते हुए कि कुशीनगर की बस कहां से मिलेगी, मैं आखिरी प्लेटफार्म तक पहुंच गया हूं। पर बस स्टैंड में सारी बसें खड़ी हैं। कोई बस जा नहीं रही है। कोई घोषणा भी नहीं हो रही है। थोड़ी देर तक पूछताछ करने पर पता चला कि सरकारी बस के चालकों ने आज अचानक हड़ताल कर दी है। तो लंबी दूरी को छोड़कर छोटी दूरी की सारी बसें आज बंद हैं।

हड़ताल का कारण है टिकट की मशीन। उसकी छपाई साफ नहीं होने के कारण संवाहक से लोगों ने मारपीट कर दी, फिर सभी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। वैसे गोरखपुर से कुशीनगर की दूरी 50 किलोमीटर के आसपास है। यहां सड़क मार्ग से ही पहुंचा जा सकता है। मेरी योजना कुशीनगर जाकर शाम तक गोरखपुर वापस लौटकर हाजीपुर के लिए ट्रेन पकड़ने की है। यह भी सोच रहा हूं कि अगर कुशीनगर से देवरिया की बस मिल गई तो देवरिया से हाजीपुर की रात में चलने वाली किसी ट्रेन में सवार हो लूंगा।
गोरखपुर से आगे कुसुम्ही के जंगल 

पर हड़ताल के कारण अब कुशीनगर जाना मुश्किल लग रहा है। मैंने स्थानीय लोगों से पूछताछ शुरू की। लोगों ने बताया कि थोड़ा आगे चल कर जाइए। कुशीनगर चौराहे से निजी अनुबंधित बसें मिल सकती हैं। एक कोशिश करने में क्या हर्ज है। तो मैं अगले चौराहे पर पहुंचा। वहां दो बसें लगी थीं। एक बस के कंडक्टर ने कहा वह गोपालगंज जा रहा है। गोपालगंज मतलब बिहार का गोपालगंज। हां, एक सहयात्री ने बताया। गोरखपुर से गोपालगंज सड़क मार्ग से महज तीन घंटे का रास्ता है। मैंने कंडक्टर को कहा मुझे कुशीनगर तक जाना है। सवारियों की भीड़ देखकर पहले तो उसने कहा कि तमकुही राज से पहले की सवारी नहीं लूंगा। पर मुझे उसने कहा कि आप बस में जाकर बैठ जाइए। मैं एक खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर खूब भरने के बाद बस चल पड़ी।

गोरखपुर शहर का कूड़ा घाट इलाका आया। उसके बाद कैंटोनमेंट इलाका। फिर कुसुम्ही के जंगल। इन जंगलों में एक बुढ़िया माइ का मंदिर है। इस मंदिर तक जाने के लिए पहले रास्ता नहीं था लोग पैदल चलकर जाते थे पर अब अच्छी सड़क बन गई है। गोरखपुर शहर से बाहर निकलने के बाद बस सिकरौली, हाटा, चकनारायणपुर, हेतिमपुर में रुकी। इन कस्बों में कुछ लोग उतरते गए। बारिश लगातार जारी है।

करीब एक घंटे से ज्यादा सफर के बाद बस के कंडक्टर ने मुझे कहा कि कुशीनगर आ गया है उतर जाइए। मुझे हाईवे पर उतार दिया। वहां कोई बस स्टैंड या बाजार नहीं है। कोई यात्री शेड भी नहीं है। दरअसल कुशीनगर जिले का मुख्यालय कसेया बाजार में है। पर महात्मा बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली कुशीनगर कसेया बाजार से तीन किलोमीटर पहले ही है। मैंने जब सड़क के उस पार नजर डाली तो कुशीनगर का विशाल प्रवेश द्वार नजर आया। 

नेशनल हाईवे से कुशीनगर महापरिनिर्वाण स्थली लगभग दो किलोमीटर है। आगे जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल रहा है तो मैं हल्की बारिश में पैदल पैदल ही चल पड़ा हूं। सड़क काफी सुंदर बनी है। अखिलेश यादव के शासन काल में सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ का निर्माण कराया गया है। मैंने बरसाती जैकेट पहन लिया है पर खुद को भींगने से नहीं बचा पा रहा हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( GORAKHPUR, KUSHINAGAR, KASEYA, BUDDHA, BUS STRIKE )

Sunday, November 3, 2019

गोरखपुर रेलवे स्टेशन और मीटर गेज की याद

हल्की बारिश के बीच गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर हूं। वैसे तो 2007 के बाद कभी रेलवे स्टेशन के काउंटर पर जाकर मैंने रेल का आरक्षित टिकट नहीं बनवाया। पर अभी इसकी जरूरत पड़ गई है। तीन दिन बाद मेरे पास पटना से दिल्ली जाने के लिए मगध एक्सप्रेस के एसी 3 के दो कन्फर्म टिकट हैं। वे बेटे और पत्नी माधवी के नाम हैं। अब मुझे भी उसी दिन उनके साथ जाना है। मगध में अब वेटिंग चल रहा है। अगर ऑनलाइन टिकट लिया तो मैं उन लोगों के साथ उस कोच में नहीं जा पाउंगा क्योंकि टिकट कनफर्म नहीं होने पर ईटिकट अपने आप रद्द हो जाता है। तो मैंने गोरखपुर में उसी ट्रेन का एक पेपर टिकट खरीदा। हालांकि बाद में मेरी बर्थ हाजीपुर के जीएम कोटे से कनफर्म हो गई।

सबसे लंबा रेलवे प्लेटफार्म -  टिकट बनवाने के बाद में गोरखपुर रेलवे प्लेटाफार्म पर चहलकदमी करने निकल पड़ा। गोरखपुर के नाम रिकार्ड है देश के सबसे लंबे रेलवे प्लेटफार्म का। इससे पहले ये रिकार्ड बिहार के सोनपुर रेलवे स्टेशन के पास था। फिर ये खड़गपुर के पास गया। पर अब गोरखपुर के पास सबसे लंबा रेलवे प्लेटफार्म है। इसकी लंबाई 1.366 किलोमीटर है। इसके नंबर आता है कोल्लम का जहां प्लेटफार्म की लंबाई 1.1880 किलोमीटर है।

गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर एक हथकरघा समिति की कपड़ो की दुकान नजर आती है। एक मुस्लिम बुजुर्ग इस दुकान को चलाते हैं। उनकी दुकान से मैं एक केसरियारंग का तौलिया खरीदता हूं महज 50 रुपये में।

 वे बताते हैं कि रेलवे स्टेशन पर उनकी दुकान 40 साल से भी ज्यादा पुरानी है। गोरखपुर रेलवे स्टेशन का भवन काफी बड़ा है। कुछ पुराने रेलवे स्टेशन की तरह लाल रंग की विशाल इमारत है। पर इन दिनो मुख्य भवन के नवीकरण का कार्य जारी है। इसकी आंतरिक सज्जा में बदलाव किया जा रहा है।

गोरखपुर रेलवे के एक जोन पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय है। यहां पर पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक का कार्यालय है। इसलिए यह रेलवे का बहुत बड़ा केंद्र है। किसी जमाने में पूर्वोत्तर रेलवे के पास मीटर गेज रेलवे लाइन का सबसे बड़ा नेटवर्क हुआ करता था। पर अब मीटरगेज लाइनें तो नहीं रहीं। पर चलिए आपको मीटर गेज की कुछ स्मृतियों से मिलवाते हैं। गोरखपुर रेलवे स्टेशन के परिसर में दो लोकोमोटिव तैनात दिखाई देते हैं। ये भाप इंजन हैं।


दो पुराने लोकोमोटिव – पहले देखते हैं वाईएल 5001 को। ये 1952 से 1956 के बीच का बना हुआ मीटर गेज का स्टीम लोकोमोटिव है। यह ब्रिटेन की कंपनी मेसर्स राबर्ट स्टीफेन हाथोर्न द्वारा निर्मित है। तब इस लोकोमोटिव का इस्तेमाल कम क्षमता वाली गाड़ियों की शंटिंग के लिए किया जाता था। यह लखनऊ के चार बाग लोको शेड का लंबे समय तक हिस्सा रहा। सन 1994 में इसे गोरखपुर लाकर रेलवे कारखाना में रखा गया था। 31 मार्च 2015 को इसे गोरखपुर रेलवे स्टेशन के बाहर स्थापित कर दिया गया।

मीटर गेज का डीजल लोकोमोटिव - अब आइए देखते हैं मीटर गेज के डीजल लोकमोटिव को। गोरखपुर रेलवे स्टेशन के परिसर में ही वाईडीएम 4 श्रेणी का डीजल लोकोमोटिव स्थापित किया गया है। वाईडीएम4 – 6335 इज्जतनगर लोकोशेड का हिस्सा हुआ करता था। डीजल रेल इंजन कारखाना वाराणसी में इस श्रेणी के लोकोमोटिव का निर्माण 1968 से 1990 के बीच किया गया। यह लोकोमोटिव 1973 का बना हुआ है। तब इसकी निर्माण लागात 18 लाख 08 हजार रुपये आई थी। इसका इस्तेमाल मालगाड़ियां खींचने के लिए किया जाता था। कुल 1350 हार्स पावर के इस लोको की अधिकतम गति 96 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। कुल 36 साल की सेवा के बाद ये लोको 2009 में रिटायर हुआ।

गोरखपुर में एक रेलवे म्युजियम भी है। जहां पर कई पुराने लोकोमोटिव देखे जा सकते हैं। यह म्युजियम स्टेशन से एक किलोमीटर आगे कूड़ाघाट रोड पर है। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रहीं। मैं भिंगता हुआ अब बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        (GORAKHPUR, RAILWAY STATION, LONGEST PLATEFORM, STEAM LOCOMOTIVE )