Sunday, March 17, 2019

क्या सिंधु नदी घाटी सभ्यता हिंदू सभ्यता थी...

सवाल यह उठता है कि क्या सिंधु घाटी सभ्यता हिंदू सभ्यता थी। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के हड़प्पा कालीन नगर कालीबंगा से मिट्टी का शिव लिंगम भी मिला है जो हमें यह सोचने को विवश कर देता है उस समय लोग शिवलिंगम की आराधना करते होंगे।
कालीबंगा से खुदाई में मिट्टी का बना शिवलिंगम भी मिला है। यह मंदिरों में स्थापित होने वाले शिवलिंगम जैसा ही है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह हिंदू सभ्यता रही होगी और लोग तब शिव की उपासना करते थे। कालीबंगा से हाथी दांत की बनी कलात्मक वस्तुएं भी मिली हैं। जो इस ओर इंगित करती हैं यह अत्यंत समृद्ध नगर था।
सिंधु घाटी सभ्यता के शहर कालीबंगा में एक छोटा सा संग्रहालय बना है। इसका टिकट महज 5 रुपये का है। पर यह बेशकीमती संग्रहालय है। यह भारतीय पुरातत्व के जोधपुर मंडल के तहत आता है। सन 1983 में कालीबंगा में पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना की गई। तीन साल तक जीर्णोद्धार के बाद 18 मई 2017 को यह संग्रहालय दोबारा दर्शकों के लिए खोल दिया गया है। हालांकि रोज कालीबंगा की ऐतिहासिक विरासत को देखने 100-200 लोग भी नहीं आते।

जैसे ही काली बंगा के इस संग्रहालय के अंदर आप प्रवेश करते हैं। आप कई हजार साल पहले के इतिहास पन्नों पर पहुंच जाते हैं। कालीबंगा के इस संग्रहालय में कुल तीन गैलरियां हैं। यहां पर 1961 से 1969 तक कुल नौ सत्रों में हुई खुदाई से मिली वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। ये खुदाई प्रो बी बी लाल, प्रो वीके थापर और प्रो जेपी जोशी की अगुवाई में हुई।
तांबे के हथियार और मूर्तियां
कालीबंगा में उत्खन्न से प्राप्त अवशेषों में मिट्टी और पत्थर के अलावा तांबे (धातु) से निर्मित औजारहथियार और मूर्तियां मिली हैं। इनसे यह प्रकट होती है कि यहां का मानव प्रस्तर युग से ताम्र युग में प्रवेश कर चुका था। यहां खुदाई में मिट्टी और तांबे के बहने गहने मिले हैं। इन गहनों कलात्मकता नजर आती है। इससे तब के लोगों के सौंदर्यबोध का भी पता चलता है। इसमें मिली तांबे की काली चूड़ियों की वजह से ही इस स्थल को कालीबंगा कहा गया।



मिट्टी की बनी मुहरें और लेख  - कालीबंगा से सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता की मिट्टी पर बनी मुहरें मिली हैंजिन पर वृषभ व अन्य पशुओं के चित्र और अनजान लिपि में अंकित लेख है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। वह लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती थी। इस लिपि को पढ़ने में सफलता मिले तो इस नगर के बारे में और जानकारी मिल सकती है। 



बैल, बंदर और पक्षियों की मूर्तियां - पशुओं में बैलबंदर व पक्षियों की मूर्तियां मिली हैं जो पशु-पालन और कृषि में बैल का उपयोग किया जाना प्रकट करता है। इतना ही नहीं यहां पत्थर से बने तोलने के बाट मिले हैं। इससे पता चलता है कि बाटों का उपयोग यहां तिजारत में हुआ करता होगा।

यहां से मिट्टी के विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े बर्तन भी प्राप्त हुए हैं । इन बर्तनों पर बड़ा ही सुंदर चित्रांकन भी किया हुआ है। यह प्रकट करता है कि बर्तन बनाने हेतु 'चारुका प्रयोग होने लगा था जो चित्रांकन में कलात्मक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति करता है।

मिट्टी के घर और जल निकासी के लिए नालियां - मोहनजोदडो से अलग कालीबगां के घर कच्ची ईंटो के बनाए जाते थे। यहां  के लोग घर बनाने के लिए सूर्य की रोशनी में पकाई गई मिट्टी के ईंटों का भी इस्तेमाल करते थे। यहां के मकानों में दरवाजेचौड़ी सड़केंकुएंनालियां आदि पूर्व योजना के अनुसार निर्मित मिलते हैं। यह तत्कालीन मानव की नगर-नियोजनसफाई-व्यवस्थापेयजल व्यवस्था के बेहतरीन होने पर प्रकाश डालते हैं। संग्रहालय में पकी हुई मिट्टी की नालियां दिखाई देती हैं, जिनका इस्तेमाल घर से जल निकासी के लिए होता होगा।



खेती बाड़ी के लिए हल - कालीबंगा से प्राप्त हल से अंकित रेखाएं भी प्राप्त हुई हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि यहां का मानव कृषि कार्य भी करता था। इसकी पुष्टि बैल व अन्य पालतू पशुओं की मूर्तियों से भी होती हैं। यहां से बैल और बारहसिंघा की अस्थियों भी प्राप्त हुई हैं।

बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने  - कालीबंगा से खुदाई में बैलगाड़ी के खिलौने भी मिले हैं। मिट्टी की बनी हुई सिटियां भी मिली हैं जिन्हें बजाया जा सकता है। धातु और मिट्टी के खिलौने भी मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की तरह यहां से प्राप्त हुए हैं। इससे पता चलता है कि बच्चों के मनोरंजन के यहां के लोग ऐसे खिलौने का निर्माण किया करते होंगे। कलात्मक खिलौने शतरंज से खेल के लिए बने पासे और गोटियां आदि कालीबंगा की समृद्धि की गवाही देते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( KALIBANGA, HANUMANGARH, RAJSTHAN ) 




Friday, March 15, 2019

काली बंगा मतलब काली चूड़ियां – ईसा पूर्व 4000 का संपन्न नगर

हम राजस्थान के कालीबंगा में पहुंच गए हैं। पीलीबंगा से कालीबंगा की कुल दूरी 7 किलोमीटर है। रावतसर मार्ग पर कालीबंगा गांव के लिए मोड़ आता है। वहां पर बसें उतार देती हैं। अगर आपके पास निजी वाहन नहीं है तो कालीबंगा के ऐतिहासिक अवशेष देखने के लिए आपको पैदल चलना पड़ेगा। चौराहे पर कालीबंगा का संकेतक लगा है। मैं पैदल चल पडा हूं। तभी एक आटो रिक्शा आता दिखा। मैंने हाथ दिखाया, उन्होंने रोक कर बिठा लिया। पर कालीबंगा संग्रहालय के सामने उतरने पर जब मैं उन्हें पैसे देने लगा तो बिना लिए चलते बने। दरअसल इस आटो को एक परिवार रिजर्व करके ले जा रहा था, और उन्होंने हमे लिफ्ट दे दी थी। 


कालीबंगा आजकल जहां मिट्टी के टीले दिखाई देते हैं, उन्हें देखकर अचरज होता है कि यहां ईसा पूर्व 4000 साल पहले विशाल और संपन्न नगर हुआ करता था। हां आज का यह छोटा सा गांव पर कभी समृद्ध शहर हुआ करता था। पर आसपास लोग इस समृद्ध विरासत को लेकर ज्यादा जागरुक नहीं है। सन 1947 में देश विभाजन के बाद सिंधु घाटी सभ्यता के दो अवशेष स्थल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में चले गए। पर आजादी के बाद हमें कालीबंगा के बारे में पता चला। आखिर इस कालीबंगा का मतलब क्या है। पंजाबी में 'वंगा' का अर्थ चूड़ी होता है, इसलिए काली वंगा अर्थात काली चूडियां।

सन 1952 से पहले कालीबंगा के इतिहास पर ज्यादा कुछ मालूम नहीं था। पर 1952 में यहां हुई खुदाई के बाद यहां 2600 ई. पूर्व से लेकर 1900 ई. पूर्व के मध्य विशाल और समृद्ध नगर होने के अवशेष मिले। कालीबंगा में हड़प्पा सभ्यता के बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं। काली बंगा एक छोटा नगर था। यहां एक दुर्ग मिला है।

प्राचीन सरस्वती नदी घाटी जिसे वर्तमान में घग्घर नदी माना जाता है उसके क्षेत्र में सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन कालीबंगा की सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा को 4000 ईसा पूर्व से भी अधिक प्राचीन नगर माना जाता है। पर इसकी खोज का श्रेय 1952 ई में अमलानंद घोष को जाता है।

1922 में आरडी बनर्जी के नेतृत्व में हुई खुदाई में मोहनजोदाड़ो औ हड़प्पा का पता चला था जो अब पाकिस्तान में हैं। बाद में इस सभ्यता के समकालीन 100 नगरों के होने का अनुमान लगाया गया था। उनमें से दो समृद्ध नगर भारत में मिले हैं। एक गुजरात में लोथल और दूसरा राजस्थान में कालीबंगा। 
कालीबंगा मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा के बाद तीसरा सबसे समृद्ध नगर माना जाता है। कालीबंगा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक संग्रहालय का निर्माण कराया है। इसी संग्रहालय के पीछे कालीबंगा का उत्खनन स्थल है। तकरीबन दो वर्ग किलोमीटर में फैले इस उत्खनन स्थल में आजकल सिर्फ मिट्टी के टीले नजर आते हैं। पर यहीं पर कभी समृद्ध नगर हुआ करता था।

विशाल दुर्ग और उन्नत शहर - सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य केन्द्रो से काफी अलग कालीबंगा में एक विशाल दुर्ग के अवशेष मिले हैं। इससे पता चलता है कि यहां के रहने वाले नागरिकों ने अपने लिए सुरक्षात्मक उपाय किए थे। कालीबंगा में तीन टीलों के अवशेष मिले हैं। एक बड़ा टीला है जबकि दो छोटे टीले हैं। यहां किले मिट्टी की कच्ची ईंटो से बनाए गए थे।

काली बंगा के लोगों में खेती करने का ज्ञान होना, दुर्ग बना कर सुरक्षा करना, यज्ञ करना आदि उस समय की उन्नति के भाव को दर्शाता है। लोगों के रहने वाले घर 4 से 5 कमरों वाले थे। उनमें कुछ छोटे कमरे भी थे। घर के बाहर चबूतरा भी हुआ करता था। नगर के चारों ओर चौड़ी दीवारें और खाई बनी थी।  जाहिर है कि यहां रहने वाले लोग प्रागैतिहासिक काल में हड़प्पा सभ्यता से कई दृष्टि से उन्नत थे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(KALIBANGA, HANUMANGARH, RAJSTHAN, HARAPPA ) 

Wednesday, March 13, 2019

श्रीगंगानगर फूड बास्केट ऑफ राजस्थान


श्रीगंगा नगर उत्तरी राजस्थान का प्रमुख शहर है। आपको पता यह मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह की जन्म स्थली है। जगजीत सिंह से मेरी कई मुलाकाते हुईं जिसमें वे श्रीगंगा नगर को याद करते थे। मुझे लगता है इस शहर के लोग भी उनको याद करते होंगे।

श्रीगंगानगर एक योजनाबद्ध शहर है। इसका नाम बीकानेर के राजा महाराज गंगा सिंह बहादुर के नाम पर पड़ा। इस शहर की योजना में आवासीय ब्लॉक और बाजार को अलग अलग रखा गया था। ये इलाका सतलुज दरिया के पानी से सींचित है। 1925 से 1927 के बीच फिरोजपुर से नहर बनाकर इस इलाके में पानी लाया गया था। 26 अक्तूबर 1927 को गवर्नर जनरल लार्ड इरविन ने 143 किलोमीटर लंबी गंग नहर का उदघाटन किया था। पानी के कारण खेतीबाड़ी अच्छी होती है। इसलिए इसे फूड बास्केट ऑफ राजस्थान कहा जाता है। 

आजादी के बाद इंदिरा कैनाल परियोजना से इलाके और पानी मिलने लगा है। गेहूं, सरसों और कपास इलाके की प्रमुख फसल है। यहां गाजर की खेती भी खूब होती है। मैंने यहां गाजर को साफ करने वाली मशीनें देखीं। लाल रंग का जो गाजर आपके हाथ मेंपहुंचता है उसे उखाड़ने के बाद उसमें लगी मिट्टी और जडों के रेशे को मशीनों से साफ किया जाता है।  

श्रीगंगानगर बस स्टैंड के आसपास सस्ते होटलों की अच्छी संख्या है। वैसे श्रीगंगा नगर का मुख्य बाजार गोल बाजार है। आसपास में दूर दूर से लोग खरीददारी करने यहां आते हैं।
श्रीगंगा नगर जिले में अनूपगढ़ शहर में किला है। इसके पास ही लैला मजनूं की मजार है, जहां जून में मेला भी लगता है। हिंदूमल कोट में भारत पाकिस्तान की सीमा है।

श्रीगंगानगर कालीबंगा वाया पीलीबंगा
श्रीगंगानगर से हमारी अगली मंजिल है कालीबंगा। राजस्थान का हड़प्पाकालीन शहर। वहां पहुंचने के लिए श्री गंगा नगर के बस स्टैंड से हमने पीली बंगा की बस ली है। पीलीबंगा से कालीबंगा की दूरी 6 किलोमीटर है। इससे पहले श्रीगंगा नगर शहर में थोड़ी से पेट पूजा कर चुका हूं। कुछ हल्के पराठे सब्जी के साथ उदरस्थ कर लिए हैं।

श्रीगंगा नगर से पीलीबंगा की अच्छी खासी दूरी है।  कुल 65 किलोमीटर। बस शहर में सुखाड़िया सर्किल से बाहर निकलकर हाईवे पर एनएच 62 पर आ गई है। यह अबोहर सूरतगढ़ हाईवे है। शहर के बाहर हाईवे पर हमें दैनिक भास्कर का प्रिंटिंग प्रेस नजर आता है। रास्ते में कैचिंगा जैसे छोटे ठहराव आते हैं। खेतों में खूब हरियाली दिखाई दे रही है। कैचिंगा में बस ने हाईवे छोड़ दिया और ग्रामीण सड़क पर चल पड़ी। रास्ते में एक चेकिंग स्टाफ ने बस रुकवाई। बस की चेकिंग में दो लोग बिना टिकट निकले। कंडक्टर पर बन आई। उसने भला टिकट क्यों नहीं बनाया था। राजस्थान रोडवेज की बसें बड़े अनुशासन में चलती हैं। आगे गोलूवाला नामक छोटा सा बाजार आया। थोड़ी देर में हम पीलीबंगा बस स्टैंड में पहुंच गए हैं।

पीलीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक शहर है। यहां नगरपालिका है। रेलवे स्टेशन बस स्टैंड के आसपास मुख्य बाजार है। तो अगर आपको कालीबंगा जाना हो तो पीलीबंगा तक ट्रेन से भी आ सकते हैं। दिल्ली से अवध आसाम एक्सप्रेस बठिंडा, मंडी डबवाली, हनुमानगढ़, पीलीबंगा होते हुए सूरतगढ़ फिर लालगढ़ (बीकानेर ) तक जाती है।

पीलीबंगा बस स्टैंड में मैंने अपने बस कंडक्टर को बताया कि हमें कालीबंगा जाना है तो उसने कहा फिर आप इसी बस में बैठे रहिए। दरअसल ये बस श्रीगंगानगर से रावतसर तक जा रही है। बस स्टैंड से बस निकलने के बाद रेलवे क्रासिंग पार करके आगे बढ़ी छह किलोमीटर चलने के बाद उन्होंने हमें एक चौराहे पर उतर जाने को कहा। तो हम कालीबंगा पहुंच गए हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(SRIGANGA NAGAR, RAJSTHAN, PILIBANGA, RAWATSAR, KALIBANGA ) 

Tuesday, March 12, 2019

मलौट मतलब माल आउट - मुक्तसर से श्रीगंगानगर वाया मलौट-अबोहर

सुबह-सुबह श्री मुक्तसर साहिब के उपकार पीजी हाउस से तैयार होकर निकल पड़ा हूं। बस स्टैंड पास में ही है। यहां से अबोहर जाने वाली बस में बैठ गया। ये प्राइवेट बस है। सवारियां ज्यादा नहीं है। बस चल पड़ी है। अभी उजाला नहीं हुआ है। बसे हरे भरे खेतों बीच सड़क पर सरपट भाग रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो हरियाली के बीच ये काली सड़क बनाकर हमने इस धरती के साथ कोई अन्याय कर डाला हो। बस मलोट की तरफ जा रही है। रास्ते में कुछ ग्रामीण लोग बस में चढ़ते हैं। पर बस में भीड़ नहीं हुई है। 

मुक्तसर से अबोहर का रास्ता मलोट होकर जाता है। मलोट मुक्तसर जिले का प्रमुख शहर है। मलोट के बस स्टैंड में जाकर बस 15 मिनट के लिए रुकती है। सामाने दाना मंडी दिखाई दे रहा है। दाना मंडी मतलब पंजाब का अनाज मंडी। 

मलोट शहर मतलब माल आउट  – बात मलोट शहर की। मलोट मुक्तसर जिले की तहसील है। पर यह जाना जाता है कपास की पट्टी के लिए। प्रति हेक्टेयर उत्पादन के लिहाज से यह देश का सबसे बड़ा कपास उत्पादक इलाका है। यह हरियाणा और राजस्थान से लगा हुआ इलाका है। बात मलोट शहर के नाम की। आखिर इसका नाम मलोट कैसे पड़ा। कई कथाएं हैं। उनमें एक ये भी है कि अंग्रेजों ने मलोट को बड़ा व्यापारिक केंद्र बनाया था। यहां से माल बंदरगाहों को भेजा जाता था। चूंकि माल यहां से आउट होता था इसलिए ये जगह मलोट कहा जाने लगा। इस शहर के नाम की अंगरेजी में स्पेलिंग भी है - MALOUT है ना...




मुक्तसर मलोट अबोहर में लगे पोस्टर बैनर को देखकर लगता है कि यहां विदेश जाकर पढ़ाई करने का क्रेज लोगों में गजब का है। स्टडी इन साइप्रस के साथ दूसरे तमाम देशों में अध्ययन का मौका दिलाने वाले कोचिंग सेंटरों की भरमार है। बाकी पंजाब की तरह ही इस क्षेत्र में भी लोगों में विदेश जाने की ललक बहुत तेज है इसलिए अंगरेजी सीखने वाले कोचिंग सेंटरों की भरमार है।


अबोहर बस स्टैंड पर नास्ता – मलोट से चलने के बाद बस ने मुझे अबोहर शहर पहुंचा दिया है। अबोहर राजस्थान और हरियाणा का सीमावर्ती शहर है। मैं दूसरी बार अबोहर में पहुंचा हूं। सुबह के आठ बजे हैं और नास्ते का समय हो गया है। तो बस स्टैंड के पास पराठे और सब्जी खाना ठीक रहेगा। अबोहर में भी आसपास में अंग्रेजी सीखाने वाले कई कोचिंग संस्थान दिखाई दे रहे हैं। छात्र छात्राओं ने सुबह सुबह पढ़ाई शुरू कर दी है।   

कीन्नू के बाग और गाजर के खेत – अबोहर में नास्ता के बाद मैं श्रीनगंगानगर की बस में बैठ जाता हूं। इस यात्रा में अबोहर में ज्यादा वक्त नहीं दे पा रहा हूं। हालांकि अबोहर का बाजार इस इलाके का प्रमुख बाजार माना जाता है। बस स्टैंड में होंडा के नावी बाइक पर टिफिन सर्विस नजर आती है। रोटी दा टिफिन। ऐसी टिफिन सेवाएं अक्सर बड़े शहरों में देखने को मिलती हैं। बस स्टैंड के पास चाचा स्वीट्स का रेस्टोरेंट है। उनके बोर्ड पर लिखा है 99 रुपये का बूफे। मतलब 99 रुपये में भरपेट खाएं। रोज नई सब्जी और दाल के साथ।

अबोहर से हर थोड़ी देर पर श्रीगंगानगर के लिए बस मिल जाती है। अबोहर से गंगानगर की दूरी 40 किलोमीटर है। एक घंटे का रास्ता है। अबोहर अब पंजाब के फाजिल्का जिले में है। पर अबोहर के लोगों का जुड़ाव राजस्थान के पड़ोसी जिले श्रीगंगानगर से ज्यादा है। अबोहर के बस स्टैंड में राजस्थान रोडवेज और हरियाणा रोडवेज की बसें भी दिखाई दे रही हैं। वहीं अबोहर से दिल्ली की सीधी बसें भी निजी आपरेटर चलाते हैं।
अबोहर से श्रीगंगानगर के रास्ते में खेत....

हमारी बस अबोहर की से बाहर निकल कर राजस्थान के सीमा में प्रवेश कर रही है। रास्ते में कीन्नू के बाग और गाजर के खेत नजर आ रहे हैं। कुछ कीन्नू से रस निकालने वाले प्लांट भी लगे हैं। अबोहर का इलाका कीन्नू का बड़ा उत्पादक है। श्रीगंगानगर से बस पहले नेशनल हाईवे नंबर 62 पर दौड़ रही है। श्रीगंगा नगर शहर से पहले साधुवली बस पहुंची है। यहां से बस स्टैंड 7 किलोमीटर है। शहर की सीमा शुरू हो गई है। बस स्टैंड से पहले कैंटोनमेंट का इलाका आया। थोड़ी देर में मैं बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। विधानसभा चुनाव का प्रचार चरम पर है। कई उम्मीदवारों का प्रचार गाडियां शहर में घूम रही हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
 (PUNJAB, RAJSTHAN, MUKTSAR, MALOT, ABOHAR, SRIGANGA NAGAR, )  


Sunday, March 10, 2019

एक बार फिर मुक्तसर की पवित्र धरती पर...


फरीदकोट शहर के सरदार अवतार सिंह बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। रात हो चुकी है। मुझे मुक्तसर की बस लेनी है। फरीदकोट से मुक्तसर की दूरी 45 किलोमीटर है। फरीदकोट का बस स्टैंड काफी बड़ा है पर लोगों ने बताया मुक्तसर वाली बस गेट से ही मिलेगी। मेरे साथ कुछ और लोग मुक्तसर वाली बस का इंतजार कर रहे हैं। थोडी देर में एक बस आई। फरीदकोट से मुक्तसर का रास्ता कोटकपूरा होकर है। हालांकि बस कोटकपूरा में रूकी नहीं। राज्य सरकार की सड़क कोटकपूरा मुक्तसर टोल वे बस गुजर रही है। ये सड़क नेशनल हाईवे जैसी बनी है। मुक्तसर में रात को नौ बजे पहुंचा गया हूं। मुक्तसर मैं तीसरी बार पहुंचा हूं।


 पहली बार 1999 में अमर उजाला के साथियों के संग आया था। दूसरी बार ज्ञानचंद शाक्य के बुलावे पर आया था। पर अब मेरे पास उनका नंबर नहीं है। कुछ साथियों से तलाशने की कोशिश की पर नंबर नहीं मिला।अपनी पिछली मुक्तसर यात्रा में उनके घर रुका था। उनसे काफी आत्मीयता थी। अगर उनसे बात हो जाती तो आज मुक्तसर में किसी होटल में रुकने की जरूरत नहीं पडती।

मेरे मोबाइल का चार्जिंग केबल गुम हो गया है। मुक्तसर में एक मोबाइल शॉप से केबल खरीदा। उनसे किसी होटल के बारे में पूछा तो उन्होंने गुरुद्वारा साहिब जाने की सलाह दी। मुक्तसर बस स्टैंड के सामने कुछ होटल हैं। एक होटल में गया उसने कमरे का किराया 450 रुपये बोला। कमरा मुझे कुछ खास पसंद नहीं आया। मैं लोगों से दरबार साहिब का रास्ता पूछकर आगे बढ़ गया। यह सोचकर कि गुरुद्वारा साहिब में सस्ता निवास मिल जाएगा। मुक्तसर का दरबार साहिब काफी विशाल है। इसके कई अलग अलग प्रवेश द्वार हैं। पूछते पूछते मुक्तसर गुरुद्वारा से स्वागत कक्ष पर पहुंच गया हूं। यहां पर अतिथि निवास बना है। मैं कलगीधर निवास के स्वागत कक्ष पर पहुंचा। पर प्रबंधक महोदय नदारद हैं। थोड़ी देर उनका इंतजार किया। वे नहीं आए पर दूसरे संगतों से पता चला कि कोई कमरा खाली नहीं है। बाहर खुले में सोने का विकल्प बचा है। दिसंबर की ठंड में ये मेरे लिए मुश्किल है। बाहर आकर किसी होटल के बारे में पूछता हूं।
पास में पूछता हुआ सिटी होटल पहुंच गया। वहां सिंगल रूम 500 रुपये का है। पर वह भी खाली नहीं है। होटल वाले बस स्टैंड जाने की सलाह देते हैं। वे बताते हैं कोटकपूरा रोड पर कुछ होटल हैं पर वे महंगे हैं। मुझे तो बस रात को सोना भर है। खाना दिन में कई बार थोड़ा थोड़ा खा चुका हूं। रात के नौ से ज्यादा बज रहे हैं। बाजार धीरे धीरे बंद हो रहा है।
एक बार फिर बस स्टैंड की ओर वापस लौट रहा हूं। यह सोचकर की उसी बस स्टैंड के पास वाले होटल में ठहर जाउंगा। पर एसआरएस सिनेमा के बाद गली में होटल उपकार पीजी हाउस का बोर्ड नजर आता है। मैं जाकर कमरे के बारे में पूछता हूं। सरदार जी कहते हैं कमरा खाली है पर हमारे पास स्टाफ नहीं है। थोडी मैं मदद करूंगा थोडी आप कमरे की चादरें बदली होंगी। किराया 350 रुपये टीवी के साथ। मैं तुरंत तैयार हो गया। सड़क से लगा बॉलकोनी वाला सुंदर कमरा हाजिर था। मैं आराम से सो गया। इस होटल के साथ अच्छा सा वेज नॉन वेज रेस्टोरेंट भी है। साथ ही वे टिफिन सर्विस भी चलाते हैं। 

अगली सुबह 5 बजे ही जगकर गुरुद्वारा साहिब मत्था टेकने पहुंच गया। पहले सरोवर के किनारे किनारे पूरे गुरुद्वारे की परिक्रमा की। फिर लंगर में चाय पी। सरदी में चाय तो अच्छी लगती है। मत्था टेकने के बाद हलवा प्रसाद मिला। प्रसाद पाकर निहाल हुआ और बस स्टैंड पहुंच गया आगे की यात्रा के लिए।

मुक्तसर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा पर पूर्व में  लिखे आलेख पढ़े 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( MUKTSAR SAHIB, UPKAR PG HOUSE )


Friday, March 8, 2019

पंजाबी के पहले कवि बाबा फरीद की धरती फरीदकोट में


शाम के 5:10 बजे गए हैं। जम्मू तवी अहमदाबाद एक्सप्रेस थोड़ी देर से चल रही है। मैं पंजाब के फरीदकोट रेलवे स्टेशन पर उतर गया। फरीदकोट मतलब बाबा फरीद का शहर। वही बाबा फरीद जिनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। लोगों से बाबा फरीद की मजार का रास्ता पूछता हुआ शहर की तरफ पैदल की चल पड़ा हूं। हालांकि कई साल पहले फरीकोट आया था पर बाबा फरीद की मजार पर नहीं जा सका था।
हजरत ख्वाजा फरीद्दुद्दीन गंजशकर भारतीय उपमहाद्वीप के पंजाब क्षेत्र के एक सूफी संत थे। वे एक उच्चकोटि के पंजाबी कवि भी थे। सिख गुरुओं ने इनकी रचनाओं को सम्मान सहित श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया। गुरुग्रंथ साहिब में बाबा फरीद के 112 श्लोक और 4 शबद लिए गए हैं।


फरीदकोट सुंदर शहर नजर आ रहा है। शहर पुराने गणेश तिपहिया वाहन चलते हैं। शहर के चौराहे पर पंजाबी रणबांकुरों की मूर्तियां लगी है। इसके आगे शहर का घंटाघर आता है। शहर में विक्टोरियन शैली का बना हुआ एक सुंदर टावर नजर आता है। फरीदकोट शहर का बाजार काफी सुंदर है। कपड़े की सैकड़ो सजी संवरी दुकाने हैं। इनके बीच से मैं पैदल चलता हुआ जा रहा हूं। चलते चलते मैं किला मुबारक पहुंच गया हूं। बारहवीं-तेरहवीं सदी में बना यह पंजाब के अति प्राचीन किलों में से एक है।


फरीदकोट के किला मुबारक का निर्माण मूल रूप से राजा मोकल देव ने किया था और बाद में राजा हमीर सिंह ने 1732 में इसका पुन:निर्माण कराया। राजा बिक्रम सिंह और राजा बलबीर सिंह ने इसे और विस्तृत रूप प्रदान किया। कभी किला मुबारक का नाम मोकल नगर भी हुआ करता था। बाबा में बाबा फरीद ने इस धरती को अपने कदमों से पवित्र किया।


किला मुबारक के सामने लोगों से एक बार बाबा फरीद के मजार का पता पूछता हूं। बस यहां से थोडी दूर ही है। बाबा फरीद के मजार को यहां टिल्ला बाबा फरीद जी कहते हैं। यह सिख, हिंदू औ मुस्लिम तीनों की आस्था का केंद्र है। संकरी सड़क पर टिल्ला बाबा फरीद वास्तव में एक गुरुद्वारा है। इसका प्रबंधन सिख समाज करता है। इसमें प्रवेश करते ही गुरुघर, बाबा फरीद की स्मृतियां और लंगर हॉल आदि है।
मुलतान में हुआ था बाबा का जन्म -  बाबा फरीद का जन्म 5 अप्रैल 1173 को गांव खेतवाल जिला मुलतान में हुआ था। 23 सितंबर 1215 को वे इस धरती पर पहुंचे। वे यहीं एक टिला पर रहने लगे। उसी समय राजा मोकलसी द्वारा किले का निर्माण कराया जा रहा था। उसे बेगार करने के लिए मजदूरों की जरूरत थी। बाबा को भी बेगार के लिए लगा दिया गया। पर जब मिट्टी की टोकरी उनके सिर पर रखी गई तो वह एक फीट ऊपर हवा में तैरती नजर आई। राजा मोकलसी यह चमत्कार देख बाबा के चरणों में आ गिरा। बाबा के आशीर्वाद से इस शहर को चोर लूटेरों से निजात मिली। फिर उनके सम्मान में शहर का नाम मोकलहर से बदलकर फरीदकोट कर दिया गया।
बाबा ने जिस पेड़ से अपने मिट्टी वाले हाथ पोछे उस पेड़ की सदियों से पूजा हो रही है। टिला बाबा फरीद में पांच दीपक सदियों से लगातार जल रहे हैं।

पंजाबी भाषा के पहले कवि - बाबा फरीद ने अपना संदेश पंजाबी में दिया। इसलिए उन्हें पंजाबी भाषा का पहला कवि भी माना जाता है। सिर्फ 16 साल की उम्र में ही बाबा फरीद को हज के लिए गए।  पंजाबी भाषा में बाबा फरीद का नियंत्रण और प्रवाह देखने के बाद, एक फकीर बाबा ने भविष्यवाणी की, कि वह एक दिन एक महान संत बनेंगे। बाबा फरीद को धर्मशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिल्ली भी गए। बाबा फरीद अरबी, फारसी भाषाओं के ज्ञाता थे लेकिन पंजाबी भाषा से उनको बहुत लगाव था इसलिए उन्होने अपने सभी दोहे पंजाबी में ही लिखे।
साल 1266 में बाबा फरीद का निधन पाकिस्तान के पत्तन शहर में हो गया। हर साल बाबा की याद में फरीदकोट तीन दिवसीय त्यौहार बाबा शेख फरीद आगमन पूर्व मेला 21 सितंबर से 23 सितंबर तक मनाया जाता है।

फरीदा खाकु न निंदीऐ, खाकू जेडु न कोइ ॥
जीवदिआ पैरा तलै, मुइआ उपरि होइ ॥
बाबा फरीद कहते हैं कि मिट्टी की बुराई न करें, क्योंकि उसके जैसा और कोई नहीं। जब तक आप जिंदा रहते हो वह आपके पैरों तले होती है किंतु मृत्यु होने पर मिट्टी तले दब जाते हो।
--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  
(FARIDKOT, BABA FARID, KILA MUBARAK, PUNJABI POET, GURUVANI ) 

Thursday, March 7, 2019

फिरोजपुर शहर और नैरोगेज का लोकोमोटिव

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers

जम्मू तवी अहमदाबाद एक्सप्रेस फिरोजपुर शहर में पूरे एक घंटे रुकती है। जैसे मुझे ये पता चलता है कि ठहराव एक घंटे का है तो मैं प्लेटफार्म नंबर पांच से ट्रेन से उतरकर बाहर आ गया। इस एक घंटे का इस्तेमाल रेलवे स्टेशन देखने के लिए किया जाए। अक्सर जिस शहर में डीआरएम आफिस होता है वहां के स्टेशन माडल स्टेशन होते हैं। पर फिरोजपुर के साथ ऐसा नहीं है। यह एक पुराना सोता हुआ स्टेशन ही नजर आता है। पर बाहर आने के दो फायदे हुए। पहली थोड़ी भूख लगी है तो कुछ खाना पीना और स्टेशन भवन के बाहर विराज रहे नैरो गेज के एक पुराने डीजल लोकोमोटिव से मुलाकात।
फिरोजपुर रेलवे स्टेशन पर पुरानी जल मीनार। 
फिरोजपुर उत्तर रेलवे का मंडल है। यहां डीआरएम बैठते हैं। हिमाचल से लेकर पंजाब के बड़े हिस्से फिरोजपुर डिविजन में आते हैं। पर फिरोजपुर शहर पंजाब एक कोने में स्थित है। हालांकि ये मध्यकालीन शासक फिरोजशाह तुगलक द्वारा स्थापित देश 250 शहरों में से एक है। भारत पाक विभाजन से पहले फिरोजपुर देश का प्रमुख शहर हुआ करता था। पर अब इसका वह रुतबा नहीं रहा। फिरोजपुर से भारत पाक सीमा महज 8 किलोमीटर है।

फिरोजपुर रेलवे स्टेशन का भवन एक मंजिला और साधारण सा है। यात्रियों की आवाजाही ज्यादा नहीं है, शायद इसलिए बड़े भवन की आवश्यकता न महसूस की गई हो।
फिरोजपुर रेलवे स्टेशन के मुख्य भवन के सामने एक नैरो गेज का डीजल इंजन शान से खड़ा दिखाई देता है। हम बात कर रहे हैं जेडडीएम-3 के 150 नंबर लोकोमोटिव की। साल 2015 में 25 अक्तूबर को ये लोकोमोटिव यहां पर दर्शकों के लिए लाकर स्थापित किया गया। तब नरेश चंद्र गोयल फिरोजपुर के डीआरएम थे। हालांकि यहां स्थापित पट्टिका में इसे छोटी लाइन का इंजन लिखा गया है। आमतौर पर छोटी लाइन से मीटर गेज का बोध होता है। पर ये नैरो गेज का लोकोमोटिव है।

यह लोको 700 हार्स पावर का मॉडल 21 मेक का है। इसका वजन 36.80 टन है। इसकी क्षमता 1000 लीटर डीजल की रही है। इसका निर्माण 1971 में 30 मई को चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स में हुआ था। इस हिसाब से यह बहुत पुराना लोकोमोटिव नहीं है। इसकी अधिकतम गति 25 किलोमीटर प्रति घंटा रही है। हालांकि बाद के नैरो गेज डीजल लोकोमोटिव की स्पीड में काफी इजाफा हो गया है। इस लोकोमोटिव ने कालका शिमला रेल मार्ग पर तकरीबन 36 साल अपनी शानदार सेवाएं दीं। साल 2008 में 17 अगस्त को इसे आखिरी बार चलाया गया था। अब यह फिरोजपुर रेलवे स्टेशन के बाहर तैनात है और आते जाते लोग इसे कौतूहल से देखते हैं।
फिरोजपुर रेलवे स्टेशन के बाहर रहने के लिए कुछ होटल और धर्मशालाएं हैं। हालांकि स्टेशन के आसपास बाजार नहीं है। हां कुछ खाने पीने के अति समान्य किस्म के होटल और स्ट्रीट फूड के स्टाल हैं। मैं भी थोड़ी से पेट पूजा करने और लोकोमोटिव को निहारने के बाद वापस प्लेटफार्म नंबर पांच पर पहुंच गया हूं। 
जम्मू तवी साबरमती एक्सप्रेस के खुलने का समय होने वाला  है। मैं फिर से अपने उसी जनरल डिब्बे में पहुंच गया हूं। अपनी उसी पुरानी सीट पर। वही पुराने सहयात्री हैं। ट्रेन में यहां कोई भीड़ नहीं बढ़ी है इसलिए सब खैरियत है। ट्रेन ने सिटी बजा दी है।

फिरोजपुर पर ये भी पढ़े - यहां घड़ी अपना समय बदल देती है...

-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

(FIROZPUR, NG LOCOMOTIVE, NR DRM, PUNJAB ) 

Tuesday, March 5, 2019

सुल्तानपुर लोधी से फिरोजपुर वाया मक्खू

सुल्तानपुर लोधी से चल पड़ा हूं आगे के लिए। अगली मंजिल है फरीदकोट शहर। ये तय नहीं किया है कि कैसे जाना है। सीधी बस का इंतजार न करके मक्खू तक जाने वाली बस में बैठ गया।

सुल्तानपुर लोधी कपूरथला जिले में है। पर इसके बाद आने वाला कस्बा लोहियां खास जालंधर जिले में है। कभी मैं जालंधर अमर उजाला में संवाददाता हुआ करता था तो जालंधर जिले छोटे छोटे कस्बों में तैनात 13 अंशकालिक संवाददाताओं का प्रभार मेरे जिम्मे था। तब गुरदीप पेंटर हमारे लोहियां खास के संवाददाता था। उनसे मिलने एक बार मैं लोहियां खास आया था। तब हमने सुबह सुबह जालंधर से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन ल थी लोहियां आने के लिए। यह रेल मार्ग वाया कपूरथला सुल्तानपुर लोधी इधर आता है। लोहियां खास पहुंचने पर गुरदीप भाई की याद आई पर उनका भी नंबर इन दिनो हमारे पास नहीं है। बस लोहियां खास में थोड़ी देर रुकने के बाद आगे चल पड़ी। सामन लोहियां खास का रेलवे स्टेशन नजर आया।



लोहियां खास के बाद मक्खू आ गया। फिरोजपुर जिले का छोटा सा कस्बा है। मक्खू के पास हरिके पत्तन है। पंजाब में रिपोर्टिंग के दौरान सन 2000 एक बार हरिके पत्तन आना हुआ था। तब हरिके पत्तन की झील को सेना ने साफ करने का बडा उपक्रम किया था। अपनी सफलता की कहानी मीडिया को सुनाने के लिए सेना ने दिल्ली,चंडीगढ़ और स्थानीय मीडिया को आमंत्रित किया था। तब अमर उजाला जालंधर के ब्यूरो चीफ युसुफ किरमानी ने हरिके पत्तन रिपोर्टिंग करने के लिए मुझे भेजा था। मेरे साथ फोटोग्राफर संजीव कुमार टोनी थे। तब हमने उस झील की सैर भी की थी। लाइफ जैकेट लगाकर झील में बोटिंग की थी। संजीव टोनी ने हमारी फोटो भी खींची थी, पर वे तस्वीरें मुझे कभी मिली नहीं। उस दिन हरिके में एक बड़ा सरकारी कार्यक्रम हुआ था। उस कार्यक्रम में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, राज्यपाल जेएफ रिबैरो भी आए थे। 

हरिके में सतलुज और व्यास नदियों का संगम होता है। यहां पर विशाल झील और वेटलैंड का निर्माण हो गया है। इस विशाल झील से गाद हटाने के काम को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया था। मुझे पता नहीं हरिके पत्तन की वह विशाल झील अब किस हाल में है। हरिके वेटलैंड को उत्तर भारत का सबसे बड़ा वेटलैंड माना जाता है। इसका विस्तार फिरोजपुर जिला, तरनतारन जिले में है। यह थोड़ा सा कपूरथला जिले में भी पड़ता है। इस वेटलैंड का विस्तार 4100 हेक्टेयर क्षेत्र में है। साल कुछ महीने यहां प्रवासी पक्षियों का बसेरा भी होता है।

मक्खू में बस ने यहां रेलवे लाइन के पास उतार दिया। मैंने मोबाइल चेक किया तो पता चला कि मक्खू से फरीदकोट जाने वाली जम्मू तवी अहमदाबाद एक्सप्रेस थोड़ी देर में आने वाली है। तो मैंने आगे की यात्रा ट्रेन से करना तय किया। हालांकि ये ट्रेन मैं सुल्तानपुर लोधी में भी पकड़ सकता था। मक्खू स्टेशन पर टिकट लेकर ट्रेन का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में ट्रेन आई। जनरल डिब्बे  में जगह भी आसानी से मिल गई। मक्खू से फिरोजपुर की दूरी 41 किलोमीटर है। ट्रेन बीच में मुल्लांवाला खास में रुकी। ट्रेन सरपट दौड़ रही है। अगला स्टेशन फिरोजपुर कैंट है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( LOHIAN KHAS, MAKKHU, FIROZPUR, RAIL, JALANDHAR )