Sunday, January 20, 2019

नीलंकठ महादेव मंदिर – कुंभलगढ़ का विशाल शिवलिंगम

कुंभलगढ़ किले में कई ऐतिहासिक मंदिर हैं, इनमें महादेव शिव का भी अत्यंत सुंदर मंदिर है। यह मंदिर अपने विशाल शिवलिंगम और नक्काशीदार बरामदे के लिए जाना जाता है। मंदिर का निर्माण पंद्रहवी सदी में कुंभलगढ़ किले के निर्माण के साथ ही हुआ। सन 1457 में महाराणा कुंभा ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।
हनुमान पोल से अंदर प्रवेश करने के बाद दाहिनी तरफ नीलकंठ महादेव का सुंदर मंदिर है। इस मंदिर का काले पत्थर का विशाल शिव लिंगम स्थापित है। किसी में मंदिर में स्थापित शिवलिंगम में यह देश के विशालतम लिंगम में गिना जाता है। नीलकंठ मंदिर के शिवलिंगम की ऊंचाई छह फीट है। मंदिर के गर्भ गृह की कलात्मकता भी अदभुत है।

नीलकंठ महादेव महाराणा कुंभा के अराध्य देव हैं। वे नियमित इस मंदिर में पूजा किया करते थे। यह राजस्थान के अत्यंत सुंदर शिवमंदिरों में से एक है।
नीलकंठ महादेव  का बना मन्दिर अपने ऊंचे-ऊंचे सुन्दर स्तम्भों वाले बरामदे के लिए भी जाना जाता है। इस तरह के बरामदे वाले मन्दिर प्रायः बहुत कम देखने को मिलते हैं। इस मंदिर के भवन में कुल 36 कलात्मक स्तंभों को निर्माण कराया गया है। मंदिर की संरचना दो मंजिलों वाली है। कहा जाता है कि महाराणा कुंभा स्वंत वास्तु शास्त्र के बड़े जानकार थे। उनका वास्तुज्ञान इस मंदिर के निर्माण में खूब झलकता है। मन्दिर की इस शैली को कर्नल टॉड जैसे इतिहासकार ग्रीक (यूनानी)  शैली बतलाते हैं। हालांकि कई विद्वान् उनके इस तर्क से सहमत नहीं हैं।

नीलकंठ मंदिर में आज भी नियमित पूजा अर्चना होती है। आम श्रद्धालु यहां सुबह से शाम यानी सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शन कर सकते हैं। कुंभलगढ़ किले में आने वाले सैलानी अक्सर इस मंदिर के भी दर्शन जरूर करते हैं। आजकल यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। मंदिर के बगल में ही हर शाम को लाइट एंड साउंड शो का भव्य आयोजन होता है।

किले में 360 मंदिर - वैसे कुंभलगढ़ किले के अंदर आप कई हिंदू और जैन मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं। कहा जाता है कि कुंभलगढ़ किले के अंदर कुल 360 मंदिरों का निर्माण हुआ है। इनमें 300 जैन मंदिर और तकरीबन 60 हिंदू मंदिर हैं। किले के अंदर सूर्य मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, मामा देव मंदिर, पीतलिया शाह मंदिर, चारभुजा मंदिर, गणेश मंदिर, बावन देवरी मंदिर, गोलेराव मंदिर आदि के भी दर्शन किए जा सकते हैं।

कुंभलगढ़ से रणकपुर की ओर –
कुंभलगढ़ किले में कई घंटे गुजारने के बाद हमलोग अब रणकपुर की ओर चल पड़े हैं। किले से बाहर निकलने के बाद केलवाड़ा से पहले से रणकपुर के लिए रास्ता बदल जाता है। यह रास्ता बिल्कुल ग्रामीण है। रास्ते में कुछ जगह बच्चे शरीफा बेचते नजर आते हैं। चलते चलते हमें आचनक सड़क के बीचों बीच एक विशाल सांप नजर आता है सड़क पार करता हुआ। अनादि के लिए यह काफी नई बात है। सांप देखना।
पानी निकालने वाली रहंट का आनंद लेते अनादि....

दोपहरी गहरा रही है। हमारे ड्राईवर लंच के लिए हमें अमराई वैली रिजार्ट में ले जाते हैं। सड़क किनारे बहती छोटी सी नदी। उस नदी पर पुल के उस पार बड़ा ही मनोरम रिजार्ट है। यहां एक रहंट चलती हुई दिखाई दी। अनादि के लिए रहंट भी अनूठी चीज है। वे दौड़कर रहंट पर जा बैठे। हमने तो बचपन में गांव में खूब रहंट हांकी है। 

अमराई वैली में खाना थोडा महंगा है। 400 रुपये का बूफे है। इसमें शाकाहारी मांसाहारी सब कुछ है। पर हमने वेज बिरयानी ले ली है। रिजार्ट में एक गिफ्ट शॉप भी है। खाने के बाद हमलोग फिर आगे बढ़ चले हैं। कुंभलगढ़ से रणकपुर की दूरी 50 किलोमीटर से ज्यादा है। हमारी गाड़ी हरी भरी वादियों में उड़ान भर रही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( KUMBHALGARH TO RANAKPUR, AMRAI VALLY RESORT, FOOD ) 




Friday, January 18, 2019

कुंभलगढ़ 36 किलोमीटर लंबी दीवारों से घिरा किला

कुंभलगढ़ देश के तमाम किलों में काफी अलग है। यह राजस्थान के राजसमंद जिले के जंगल में स्थित विशाल किला है। इस किले की दीवार 36 किलोमीटर लंबी है। यह चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार है। घने जंगलों के बीच स्थित इस किले का इस्तेमाल मेवाड़ वंश के शासक मुगलों के हमले के दौरान छुपने के लिए किया करते थे। यहां हमेशा पहुंचना मुश्किल कार्य रहा है।


आप कुंभलगढ़ का किला देखने पहुंचे हैं तो तीन से चार घंटे का समय रखिए। किले के मुख्य प्रवेश द्वार हनुमान पोल से किले के शीर्ष तक पहुंचने के लिए अच्छी खासी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।  टिकट घर के पास चाय नास्ते की दुकान और खाने पीने के लिए एक रेस्टोरेंट भी है। हनुमान पोल के पास ही बाहरी वाहनों के लिए पार्किंग भी है। राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म प्रेम रतन धन पायो में आपने कुंभलगढ़ किले को देखा होगा। चलिए अब किले की चढ़ाई करते हैं।

मौर्य वंश के शासकों ने बनवाया था किला - कुंभलगढ़ किले का निर्माण चित्तौड़गढ़ किले की तरह ही मौर्य वंश के शासकों ने करवाया था।ईसा पूर्व पहली -दूसरी शताब्दी में मौर्य वंश के शासक संप्रति जो जैन धर्म को मानते थे, उन्होंने इस किले का निर्माण कराया था। संप्रति सम्राट अशोक के दूसरे बेटे थे।

पर यह किला सैकड़ो सालों तक लोगों की नजरों से ओझल रहा। पंद्रहवीं सदी में मेवाड़ वंश के शासकों की इस किले पर नजर गई। फिर इसका पुनर्निमाण मेवाड़ शासक महाराणा कुंभा द्वारा 1448 में कराया गया। पर इस किले के कई हिस्सों को अलग अलग मेवाड़ शासकों ने अपने शासन काल के दौरान बनवाया। राणा कुंभा ने  1443 से 1458 के बीच प्रसिद्ध वास्‍तुकार मंडन के पर्यवेक्षण में इसका निर्माण करवाया। मेवाड़ शासकों  ने किले को अभेद्द बनाने के लिए कई प्रवेश द्वार बनवाए। इसके साथ ही पानी के लिए जलाशय का निर्माण कराया गया।किले में संकटकालीन द्वार, कई मंदिरों का भी निर्माण कराया गया है।

यह दुर्ग समुद्र तल 1087 मीटर की ऊंचाई पर है। किले का व्यास 30 किलोमीटर में फैला हुआ है। मेवाड़ शासक महाराणा सांगा का बचपन इस दुर्ग में गुजरा। महाराणा प्रताप ने भी मेवाड़ पर शासन के दौरान इस दुर्ग को अपना निवास स्थान बनाया।

चीन की दीवार के बाद सबसे लंबी दीवार - कुम्भलगढ़ किले को देश का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता है। कुम्भलगढ़ किले कि दीवार जो कि 36 किलोमीटर लम्बी तथा 15 फीट चौड़ी है। किले की दीवार पर की चौड़ाई इतनी है कि इस पर घोड़े दौड़ाए जा सकते हैं। कहा जाता है कि किले की दीवार पर एक साथ दस घोड़े दौड़ सकते हैं। किले की चीन की दीवार के बाद दुनिया की सबसे लंबी दीवार है।

महाराणा प्रताप की जन्म स्थली -  कुंभलगढ़ किले में ही महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। वही महाराणा प्रताप का जिन्होने आजीवन संघर्ष किया और मुगलों के साथ लोहा लिया। किले के मध्य में महाराणा प्रताप की जन्म स्थली देखी जा सकती है।

सबसे ऊंचाई पर बादल महल - किले में आप बादल महल देख सकते हैं, जो इस किले का प्रमुख आकर्षण है। सन 1884 से 1930 के बीच राणा फतेहसिंह ने बादल महल का निर्माण कराया था।

अरावली की पहाड़ियों से घिरा होने के कारण यह कुंभलगढ़ का किला बहुत ही दुर्गम स्थल पर था। किले से पहाडों की तलहटी में होने वाली छोटी से छोटी हलचल को भी दूर से ही देखा जा सकता था। उंचाई पर चौकसी कर रहे विश्वसनीय दूत दूर की गतिविधियों की सूचना अपने राजा को पहुंचा सकते थे। किले की सबसे ऊंचे भवन से आसपास का बड़ा भव्य नजारा दिखाई देता है। पर किले के आसपास आज भी दूर-दूर तक जंगल दिखाई देते हैं।

कुंभलगढ़ किले के द्वार – कुल नौ द्वार मिलते हैं किले में। ओरठा पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, नीबू पोल, चौगान पोल, पगड़ा पोल, गणेश पोल।

वैसे तो कुंभलगढ़ का किला हमेशा अजेय रहा है। पर महाराणा प्रताप के समय एक बार थोड़े समय के लिए इस पर मुगलों का कब्जा हो गया था। कुंभलगढ़ किला भारत के उन स्थलों मे शामिल है जो यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किए गए हैं। यह फोर्ट्स ऑफ राजस्थान की सूची में शामिल है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email: vidyutp@gmail.com
(FORTS OF RAJSTHAN, KUMBHALGARH, WORLD HERITAGE SITE )




Thursday, January 17, 2019

देश के सबसे अनूठे और अदभुत किले कुंभलगढ़ की ओर

पहले दिन उदयपुर के स्थानीय स्थलों की सैर के बाद दूसरे दिन हम कुंभलगढ़ और रैणकपुर की राह पर हैं। कुंभलगढ़ यानी देश का सबसे अनोखा और अदभुत किला। वह कैसे ये आगे जानेंगे। ये एक दिन का टूर है। इसके लिए एक दिन पहले बुकिंग करा ली जाए तो अच्छा है। हमने यही किया भी। कई टूर आपरेटर से बात की। दिन भर के लिए 2500 तो किसी ने 2600 मांगा। लेक पिछोला पर वाकिंग ब्रिज के पास गड़िया देवरा मंदिर के सामने एक ट्रैवल एजेंट का दफ्तर है। उनका नाम है –यशवंत वैष्णव ( 9116419467 ) वे टैक्सी, बाइक रेंट पर उपलब्ध कराते हैं। अच्छे सलाहकार भी हैं और मददगार भी। तो उन्होंने हमें स्विफ्ट डिजायर एसी टैक्सी उपलब्ध कराई 2100 रुपये में। हालांकि इसमें उनका कमीशन शामिल है पर ये दर वाजिब है।

तो सुबह 8.30 बजे तैयार होकर हमलोग निकल पडे हैं। टैक्सी हमारे होटल के पास आकर खडी है। टैक्सी वाले का नाम शंकर उर्फ बिटटू ( 9784303065)  है। शंकर न सिर्फ उदयपुर बल्कि पूरे राजस्थान के बारे में जानकारी रखने वाले तेजतर्रार ड्राईवर हैं। दुनिया के दर्जनों देश के हजारों टूरिस्टों को घूमा चुके हैं। उनके साथ घूमना रोचक अनुभव है। ढेर सारी बातें बड़े रोचक अंदाज में सुनाते हैं। उन्हें भी चुपचाप रहने वाले टूरिस्ट पसंद नहीं हैं। तो दिन भर उनका साथ यादगार रहा है।


उदयपुर शहर से बाहर निकल कर हमलोग हाईवे  पर इसवाल गांव में पहुंचे हैं। यहां एक दुकान पर हमलोग नास्ते के लिए रुके। संगम मिष्टान भंडार से हमलोगों ने समोसा, पकौड़ा, नमकीन, मिल्क केक जैसी तमाम चीजें कुछ खाई तो कुछ रास्ते के लिए पैक करा ली। पूरा रेस्टोरेंट इसवाल गांव का एक परिवार चलाता है। खाने पीने की दरें वाजिब हैं, स्वाद अच्छा है।

पेट पूजा के बाद अब हमलोग आगे चल पड़े हैं। उदयपुर से कुंभलगढ़ की दूरी 100 किलोमीटर के आसपास है। कुछ बसें भी जाती हैं। पर बेहतर तरीका अपनी टैक्सी बुक करके जाना है। कुंभलगढ़ का रास्ते पर राजस्थान के ग्रामीण परिवेश के दर्शन होते हैं। विजयादशमी का दिन है। कुछ गांव में यात्रा निकली है। हमारे ड्राईवर गाड़ी रोक कर यात्रा के आगे सिर झुकाने जाते हैं।

एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ बरसाती नदियां। हमें कुछ साइकिल सवार दिखाई देते हैं। वे समूह में साइकिल से कुंभलगढ़ की तरफ जा रहे हैं। उनके पीछे उनकी बस भी है।

कुंभलगढ़ से पहले केलवाड़ा बाजार कुंभलगढ़ से ठीक पहले हमलोग केलवाड़ा कस्बे में पहुंच गए हैं। केलवाड़ा से कुंभलगढ़ किले की दूरी सात किलोमीटर है। केलवाड़ा में रहने के लिए कुछ होटल और खाने पीने की दुकानें भी हैं।
अब हमारी टैक्सी कुंभलगढ़ किले की तरफ बढ़ रही है। पहला गेट आया हल्ला पोल। इस गेट के बाद हमलोग किले के मुख्य द्वार पर पहुंच गए हैं। टैक्सी पार्किंग में चली गई। हमने किले में प्रवेश का टिकट खरीदा। भारतीय सैलानियों के लिए 40 रुपये का टिकट है। विदेशी सैलानियों के लिए 600 रुपये का।

कुंभलगढ़ किले में लाइट एंड साउंड शो भी होता है। पर इसे देखने के लिए आपको रात में कुंभलगढ़ किले के आसपास ही किसी होटल या रिजार्ट में रुकना होगा। तो लगे हाथ यह भी जान लिजिए , अब कुंभलगढ़ के आसपास कई दर्जन रिजार्ट बन गए हैं। रहने के लिए कॉटेज भी उपलब्ध है। यहां रहकर जंगल सफारी का भी आनंद लिया जा सकता है। यहां रामदा समूह से लेकर कई और समूह ने अपने रिजार्ट बना डाले हैं। हर साल कुछ नए रिजार्ट खुल रहे हैं। इससे कुंभलगढ़ का वास्तविक सौंदर्य कम हो रहा है। पर सैलानियों की आमद हर साल बढ़ रही है। तो चलें किले के अंदर...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( KUMBHALGARH FORT, KELWADA, ISWAL, BITTU TAXI )          
   


Tuesday, January 15, 2019

शाकाहारी सैलानियों का स्वर्ग –मलेशिया का पेनांग

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आप सैर सपाटा के लिए विदेश जाना चाहते हैं, पर आप चाहते हैं कि आपको वहां भी शाकाहारी भोजन मिल जाए, लोगों से संवाद करने में कोई परेशानी न हो और देखने के लिए ढेर सारे आकर्षण हों तो आपके लिए मलेशिया का पेनांग बेहतरीन स्थल हो सकता है। सिंगापुर की तरह पेनांग में भी एक लिटल इंडिया बसता है।  वैसे सैलानी जो प्रकृति के करीब जाना चाहते हैं यानी इको टूरिज्म का आनंद लेना चाहते हैं उनके लिए पेनांग अच्छी जगह हो सकती है।

पेनांग प्रांत के टूरिज्म मंत्री मि यो सून हिन कहते हैं कि आप सालों भर पेनांग आ सकते हैं। यहां कभी गर्म मौसम नहीं होता। अधिकतम तापमान 30-32 डिग्री से ज्यादा नहीं जाता है।

पेनांग का स्पाइस कनवेंशन सेंटर 

पेनांग में लंबे समुद्र तट के अलावा पर्वतीय क्षेत्र और सुंदर और वन आकर्षक ग्रामीण क्षेत्र देखे जा सकते हैं। आप यहां समंदर के बीच टापू पर बने रिजार्ट में अपना ठिकाना बना सकते हैं। तो जार्ज टाउन के प्राचीन इलाके के हेरिटेज होटलों में भी ठहर सकते हैं।

पेनांग में इतने सारे होटल बन चुके हैं कि यहां एक साथ लाखों पर्यटक आकर प्रकृति का आनंद ले सकते हैं। यहां दुनिया का विशालतम कन्वेंशन सेंटर बना है जो सोलर पावर से जगमता है। यहां एक साथ 16 हजार से ज्यादा लोग बैठक कर सकते हैं। बॉलीवुड स्टार अनिल कपूर और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पेनांग जा चुके हैं।

शाकाहारियों के लिए बहार – पेनांग में जगह जगह शाकाहारी रेस्टोरेंट हैं। आपको यहां परंपरागत दक्षिण भारतीय थाली जो केले पत्ते पर परोसी जाती है मिल जाएगी। साथ ही यहां आपको उत्तर भारत का समोसा भी मिल जाएगा। पेनांग में बड़ी संख्या में तमिल लोग रहते हैं। सैकड़ो साल पहले गए तमिल परिवारों ने अपनी विरासत को बचा रखा है। वहीं पेनांग की सड़कों पर कई उत्तर भारतीय रेस्टोरेंट भी खुल गए हैं।   

विश्व विरासत शहर - जार्ज टाउन- साल 2008 में पेनांग के मुख्य शहर जार्ज टाउन को विश्व विरासत शहर का दर्जा मिला। सात लाख से ज्यादा आबादी वाल जार्ज टाउन मलेशिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। 1786 में स्थापित यह शहर पूर्वी एशिया का पहला ब्रिटिश सेटलेमेंट शहर बना। 1957 में मलेशिया को ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद जार्ज टाउन शहर देश के आधुनिक इतिहास का प्रमुख गवाह बन गया। जार्ज टाउन की गलियों में घूमते हुए आप स्ट्रीट फूड का आनंद ले सकते हैं। साल 2010 में पेनांग को एशिया में रहने योग्य 10 बेहतरीन शहरों में चुना गया।

पेनांग हिल फनीकुल रेलवे – पेनांग में पहाड़ी पर चढ़ने के लिए फनीकुलर रेलवे का आनंद ले सकते हैं। इसका ट्रैक दो किलोमीटर है। फनीकुल रेलवे इस तरह की रेल होती है जो एक ट्रैक पर चढ़ती और उतरती है। इसे एक गरारी की सहायता से संचालित किया जाता है। पेनांग की यह रेल जार्ज टाउन इलाके में है जो 1923 से संचालन में है। इसका निर्माण ब्रिटिश काल में पहाड़ी से नजारे देखने के लिए कराया गया था।

मंदिर, मस्जिद और चर्च – मलेशिया के पेनांग प्रांत की आबादी 17 लाख के आसपास है। यह एक बहुलतावादी संस्कृति वाला प्रांत है। यहां पर मलय,चीनी और तमिल लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। बड़ी संख्या में यहां पर इंडियन मलय लोग रहते हैं। ये वैसे लोग हैं जो कई पीढ़ियों पहले भारत से रोजी रोजगार की तलाश में वहां चले गए थे। इसलिए पेनांग में कई सारे मुरगन मंदिर ( भगवान कार्तिकेय ) का मंदिर है। भारत से बाहर दुनिया का सबसे बड़ा मुरगन मंदिर यहां स्थित हैं। उत्तर भारतीय लोगों ने यहां कुंज बिहारी मंदिर का भी निर्माण कराया है।

कैसे पहुंचे – पेनांग मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर से 4 घंटे के सड़क मार्ग की दूरी पर है। क्वालालंपुर, बैंकांग, सिंगापुर जैसे शहरों से पेनांग के लिए सीधी विमान सेवा है। अगर आप भारत से पेनांग जा रहे हैं तो सिंगापुर, बैंकाक के साथ पेनांग घूमने की योजना बना सकते हैं। सिंगापुर पेनांग जल मार्ग से पानी के जहाज से भी जाया जा सकता है।
जार्ज टाउन मलेशिया का हेरिटेज होटल, होटल पेंगा...

कितने दिन रूकें – पेनांग कन्वेंशन एंड एक्गबिशन ब्यूरो के सीईओ अश्विन गुनशेखरन कहते हैं कि पेनांग की खुशूब को महसूस करने के लिए आप 4 रातें और पांच दिन का कार्यक्रम बना सकते हैं। ठहरने खाने पीने के लिहाज से पेनांग यूरोपीय देशों की तुलना में सस्ता है। यहां एक आदमी के लिए चार दिनों का रहने खाने पीने का पैकेज 150 से 400 डॉलर तक का हो सकता है।

पेनांग ऐसा क्षेत्र है जहां परिवार के साथ कुछ दिन गुजारा जा सकता है। विवाह उत्सव का आयोजन किया जा सकता है या फिर हनीमून के लिए जाया जा सकता है। साल 2018 में मलेशिया सरकार ने भारतीय लोगों के लिए 15 दिनों के लिए वीजा फ्री कर रखा है।
जहां तक देखने और घूमने की बात है तो आप यहां 40 से ज्यादा पर्यटक स्थलों की सैर कर सकते हैं। संग्रहालय के अलावा यहां का नया आकर्षण मलेशिया का सबसे बड़ा डायनासोर पार्क है जहां 200 से ज्यादा डायनासोर से मुलाकात की जा सकती है। पेनांग में आप लंबे स्काईवाक से शहर का नजारा कर सकते हैं।



एजुकेशन और आईटी का हब - पेनांग पिछले कुछ दशक में मलेशिया का एजुकेशन हब बन चुका है। यहां 50 से ज्यादा प्राइवेट इंजिनयरिंग,मेडिकल और मैनेजमेंट के कॉलेज खुल चुके हैं। इसके साथ ही पेनांग में आईटी इंडस्ट्रिया भी आ चुकी हैं। दुनिया भर के कंप्यूटरों में लगने वाले इंटेल का प्रोसेसर पेनांग में ही बनता है।   

-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
-        ( ज्यादा जानकारी के लिए देखें - www.pceb.my )



Monday, January 14, 2019

उदयपुर की गलियों में पोहा जलेबी का स्वाद

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हमने रहने का ठिकाना उदपुर शहर में लेक पिछोला इलाके में तो बना लिया पर खाने पीने के मुफीद स्थल तलाश करने में थोड़ी दिक्कत आई। वो इसलिए कि पुराने उदयपुर में खाना-पीना महंगा है। स्ट्रीट फूड के विकल्प कम हैं। वैसे तो राजस्थान के सभी शहर खाने पीने के लिए प्रसिद्ध हैं। पर पुराने उदयपुर में खाना पीना महंगा क्यों है। मामला कुछ ऐसा है कि पुराने उदयपुर की गलियों के होटलों में ज्यादातर विदेशी सैलानी ठहरते हैं, तो इस इलाके के समान्य होटलों में भी खाने पीने की दरें महंगी हैं।


कई होटलों में रुफ टॉप रेस्टोरेंट हैं। यहां खाने की थाली 150 से 250 रुपये की है। गुणवत्ता के लिहाज से बात करें तो यह दो गुनी महंगी है। इसलिए उदयपुर में किफायती खाने पीने के स्थल तलाश करने में हमें थोड़ी परेशानी हुई। पहले दिन सुबह सुबह नास्ते के लिए निकले तो जगदीश मंदिर के पास एक साधारण सा रेस्टोरेंट मिला वहां पर एक पराठा 50 रुपये का था। 

हमने तीन पराठे पैक कराए। होटल में आकर खाया। दिन भर घूमने के दौरान करणी माता मंदिर के आधार तल पर छोला भठूरा खाया। एक प्लेट छोटाल भठूरा 80 रुपये का। प्लेट में सिर्फ एक भठूरा. हालांकि भठूरे का आकार बड़ा देखकर महंगाई पर संतोष करना पड़ा।

सज्जन गढ़ पैलेस में भी एक शाही कैफे है। इसमें गार्डन रेस्टोरेंट है। यहां आप चाय काफी का आनंद ले सकते हैं। शाम को वहां बैठना अच्छा लगता है पर यह भी आपकी जेब पर भारी है।

फतेहसागर लेक के सामने कई रेस्टोरेंट एक पंक्ति में हैं। यहां पर शाम को हमने पाव भाजी का आनंद लिया। पर इन रेस्टोरेंट भी खाने पीने की दरें टूरिस्टों को ध्यान में रखकर रखी गई हैं।


विलेज कैफे और कुलदीप – जैसा की कि हमने आपको पहले भी बताया कि पुराने उदयपुर मे खाने पीने की दरे महंगी है। साधारण सी थाली 150 से 250 के बीच है। पर जगदीश मंदिर से वाकिंग ब्रिज के रास्ते में हमें विलेज कैफे का बोर्ड नजर आया। हम सीढ़ियां चढ़कर पहली मंजिल पर पहुंचे। सुरूचिपूर्ण ढंग से सजाए गए साधारण रेस्टोरेंट में 99 रुपये की फिक्स थाली है। इसमें दो चपाती, चावल, दाल, सब्जी और सलाद। खाना साफ सुथरा ताजा और सुस्वादु है। इस कैफे का संचालन कुलदीप करते हैं। वे अत्यंत मृदुभाषी हैं। तो उदयपुर में हर शाम को खाने पीने का हमारा ठिकाना विलेज कैफे ही रहा।

चेतक सर्किल के रेस्टोरेंट- बाद में हमें होटल हेरिटेज हवेली के केयरटेकर नदीम भाई ने बताया कि उदयपुर में खाने पीने के सबसे ज्यादा ढाबे चेतक सर्किल पर हैं। आप कहीं से भी आएं तो चेतक सर्किल पर पहुंच जाएं तो वहां बजट में अपनी पसंद से पेटपूजा कर सकते हैं। पर हमारे होटल से चेतक सर्किल की दूरी डेढ़ किलोमीटर है और हमारे पास आने जाने के लिए कोई वाहन नहीं है।

अगले दिन सुबह सुबह टहलते हुए मैं कई किलोमीटर चलता हुआ घंटा घर होते हुए दिल्ली गेट पहुंच गया। दिल्ली गेट पर पोहा जलेबी खाकर मजा आ गया। दरें भी वाजिब है। यहां पर कई मिठाई की भी दुकाने हैं। दिल्ली गेट पर कुछ अच्छे रेस्टोरेंट भी हैं। उदयपुर बस स्टैंड के आसपास भी वाजिब दरों वाले खाने पीने के रेस्टोरेंट हैं। पर लेक पिछोला के इलाके में जरा संभल कर रहें...

उदयपुर में जो सबसे सस्ती चीज नजर आई वह थी छाछ। यहां पर छाछ का भाव महज 7 रुपये लीटर है। यह सभी डेयरियों पर खुले में उपलब्ध है। अगर आपको चाहिए तो वे पॉलीबैग में बांध कर दे देंगे। वैसे यहां दूध भी सस्ता है। भाव देखिए 36 रुपये लीटर। जब दिल्ली में 50 से 55 रुपये लीटर है। हालांकि दही और पनीर के भाव तो दिल्ली जैसे ही हैं। तो उदयपुर आएं तो छाछ पीएं मस्त रहें। 



डांडिया की वो रातें – जब हम उदयपुर मेंहैं तो नवरात्र का समय चल रहा है। रोज रात को जगदीश मंदिर चौराहे पर बड़े स्तर पर डांडिया रास हो रहा है।मेवाड़ युवा संगठन की ओर से आयोजित इस डांडिया रास में हजारों युवक युवतियां हिस्सा ले रहे हैं। हमने भी दो रातें कुछ घंटे तक डांडिया रास देखा। 

डांडिया में हिस्सा लेने के लिए युवतियां रंग बिरंगे परिधानों में तैयार होकर अपने घरों से पहुंच रही हैं। देर रात तक डांडिया रास चलता है। पर सुरक्षा और छेड़छाड़ का कोई खतरा नजर नहीं आता। जगदीश मंदिर के आगे इतनी भीड़ हो जाती हैं कि पांव रखने की जगह नहीं मिलती...पर ये रंगों के खुशबू में डूबी रातें हमेशा याद रहेंगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( UDAIPUR, FOOD, DANDIA, POHA, JALEBI) 




Sunday, January 13, 2019

बागौर की हवेली और राजस्थान के लोकनृत्य की खुशबू


उदयपुर के गणगौर घाट के पास बागौर की हवेली स्थित है। एक पुरानी हवेली को संरक्षित किया गया है। दिन में आप हवेली देख सकते हैं। वहीं शाम को इस हवेली में लाइव शो होता है। यह लाइव शो होता है राजस्थान के लोकनृत्यों का। इसमें आप राजस्थान के अलग अलग हिस्सों के लोकनृत्य का आनंद ले सकते हैं। अमूमन हर शाम को 7 बजे से एक घंटे का शो होता है। पर ज्यादा सैलानियों की आमद होने पर दो शो होते हैं। एक सात बजे दूसरा आठ बजे।

जिस समय शाम को हमलोग बागौर की हवेली पहुंचे, शाम 7 बजे के शो की सारी टिकटें बुक हो चुकी थीं तो आठ बजे वाले शो का टिकट लेकर हम इंतजार करने लगे। यह शो भी हाउसफुल रहा। शो में बैठने के लिए महल के आंगन में नीचे गद्दे बिछाए गए हैं जहां जगह मिले फैल कर बैठ जाइए। यह शो एक सरकारी आयोजन है।   इसका आयोजन पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर द्वारा किया जाता है। वेस्ट जोन कल्चर सेंटर का दफ्तर भी इसी हवेली के परिसर में है।


इस शो की शुरुआत मंगल धुन और केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारो देस नी...से होती है। इस शो के दौरान आप घूमर , भवाई, कालबेलिया जैसे राजस्थान के लोकनृत्य देख सकते हैं। पर इस शो के फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी के लिए आपको अलग से शुल्क देना पड़ता है।  शो में आने वाले दर्शक एक घंटे के लिए ऐसी दुनिया में पहुंच जाते हैं जहां राजस्थान के अलग अलग इलाके के रंग हैं। आप शो में इस तरह खो जाते हैं कि शो कब खत्म होने को आ गया पता नहीं चलता। इस शो का खास आकर्षण है पपेट शो। यानी कठपुतली नृत्य। शो खत्म होने के बाद आप चाहें तो कठपुतलियां खरीद भी सकते हैं। ये कठपुतलियां 500 रुपये या उससे अधिक मूल्य में उपलब्ध होती हैं।


उदयपुर में लोक नृत्यों का लाइव शो बागौर की हवेली के अलावा लोक कला मंदिर में भी देखा जा सकता है। वहां अमूमन दिन भर हर घंटे एक नया शो शुरू होता है।
अब थोड़ी बात बागौर की हवेली के बारे में। यह गणगौर घाट पर स्थित उदयपुर की पुरानी और कलात्मक हवेलियों में से है जिसे संरक्षित किया गया है।
बागौर की हवेली का निर्माण मेवाड़ राज्य के प्रधानमंत्री अमर चंद बड़वा द्वारा 1751 से 1768 के बीच कराया गया। पर अमरचंद बड़वा के निधन के बाद ये हवेली मेवाड़ के महाराणा के छोटे भाई महाराजा नाथ सिंह के नियंत्रण में आ गई। 1828 से 1884 के बीच इस हवेली के मेवाड़ के कई महाराणाओं ने अपना ठिकाना बनाया।

हवेली के पास पिछौला झील से लगे गणगौर घाट का निर्माण महाराजा नाथ सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा भीम सिंह ने कराया। सन 1878 में महाराजा शक्ति सिंह ने गणगौर घाट के पास त्रिपोलिया ( मतलब नक्काशीदार तीन दरवाजे) का निर्माण कराया। सन 1930 में बागौर की हवेली का अधिग्रहण मेवाड़ राज्य द्वारा कर लिया गया। तब इसका इस्तेमाल राज्य अतिथि गृह के तौर पर होने लगा। 
आजादी के बाद राजस्थान राज्य सरकार ने इसका इस्तेमाल राज्य सरकार के कर्मचारियों के आवास के तौर पर किया। सन 1986 में ये हवेली जर्जर हाल में थी तब इसे पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र को स्थानांतरित किया गया। इस हवेली में कुल 138 कमरे हैं। अब इसे कलाकेंद्र और संग्रहालय के तौर पर विकसित किया गया है।
पढ़ते रहिए उदयपुर पर और भी बातें जारी है...
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Friday, January 11, 2019

सहेलियों की बाड़ी - यहां सालों भर सावन भादो

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अगर कोई मुझसे ये पूछे कि आपको उदयपुर में सबसे अच्छी जगह कौन  सी लगी, तो मेरा जवाब होगा सहेलियों की बाड़ी। यह उदयपुर में एक ऐसी जगह है जहां पर जाना स्वप्नलोक में जाने सदृश है। यहां शाम को पहुंचना और भी सुखकारी है। तो हमलोग सहेलियों की बाड़ी में शाम को ही पहुंचे हैं। फतेहसागर लेक पर कुछ खाने पीने के बाद हमारा अगला पड़ाव है सहेलियों की बाड़ी। वैसे तो यह नाम से ही रुचिकर लगती है। बाड़ी मतलब यह एक भवन और विशाल उद्यान है। इसमें प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट है।
इसका निर्माण महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने 1710 से 1734 के बीच यानी 18वीं सदी में करवाया था। इस उद्यान के बारे में यह कहा जाता है कि राणा ने इस सुरम्य उद्यान को स्वयं तैयार किया था और इसे अपनी रानी को भेंट किया, जो विवाह के बाद अपनी 48 नौकरानियों के साथ उनके यहां आई थी। तो यहां शाही परिवार की महिलाएं सैर करने आती थीं। उस जमाने में यहां पुरुषों  का प्रवेश प्रतिबंधित था।  'फतेह सागर झील' के करीब स्थित यह जगह अपने ख़ूबसूरत झरनों, हरे-भरे बगीचे और संगमरमर के काम के लिए जाना जाता है।

सहेलियों की बाड़ी के विशाल परिसर में बीच में एक छोटा सा भवन है और उसके चारों तरफ बाग हैं। बाग़ में कमल के तालाब, फ़व्वारे, संगमरमर के हाथी आदि बने हुए हैं। इस उद्यान का मुख्य आकर्षण यहां के फ़व्वारे हैं। इन फव्वारों के बारे में कहा जाता है कि इन्हें इंग्लैण्ड से मंगवाया गया था।

यहां सालों भर सावन भादो सहेलियों की बाड़ी के मुख्य आंगन में प्रवेश करने पर आपको एक सुंदर तालाब दिखाई देता है जिसमें फव्वारे चलते हैं। जब बायीं तरफ आगे बढ़ते हैं तो सावन भादो नामक बाग है। इसका नाम सावन भादो इसलिए है कि यहां सालों भर सावन भादो जैसा मौसम रहता है। यहां फव्वारे कुछ इस तरह लगाए गए हैं जहां जाकर आपको लगता है कि आप बारिश के बीच आ गए हैं। इन फव्वारों की बनावट कुछ इस तरह है कि इसके लिए किसी मोटर या मशीन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। तो सावन भादो के साथ समय गुजारना आपको रुमानी कर देता है। आनंदित कर देता है।

सहेलियों की बाड़ी के पीछे वाले हिस्से में भी एक तालाब है, इसमें कमल के फूल खिलते हैं। साथ ही कई सुंदर कलाकृतियां भी बनी है। परिसर में कई अत्यंत पुराने वृक्ष भी हैं। शाम को बाड़ी के परिसर में कुछ दुकाने भी लगती हैं जहां से आप हस्तशिल्प की वस्तुएं खरीद सकते हैं।  
श्रावण मास की अमावस्या के अवसर पर इस बाड़ी में नगर निवासियों का एक बड़ा मेला भी लगता है। सहेलियों की बाड़ी में कई फिल्मों की शूटिंग हुई है। सुनील दत्त साधना की फिल्म मेरा साया, फिल्म गाइड और हीरा के दृश्य यहां शूट किए गए थे।
कैसे पहुंचे- यह उदयपुर के मुख्य इलाके में सहेली मार्ग पर  न्यू फतेहपुरा में पंचवटी क्षेत्र में है। कहीं से भी पहुंचना काफी आसान है। सहेलियों की बाड़ी सुबह 8 बजे खुल जाती है और रात्रि 8 बजे तक खुली रहती है। इसमें प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com
 ( SAHELION KI BARI, UDAIPUR )