Tuesday, July 23, 2019

कलात्मक संग्रह और अलबेले अतीत से साक्षात्कार


मध्य प्रदेश का राजकीय संग्रहालय - भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में ही जनजातीय संग्रहालय के बगल में मध्य प्रदेश का राजकीय संग्रहालय है। इस विशाल संग्रहालय में भी खास तौर पर मूर्तियों का बड़ा संग्रह है। पर सबसे चौंकाने वाली चीज यहां देखी जा सकती है 25 लाख साल पुरानी काष्ठ जीवाष्म का संग्रह। इसे मध्य प्रदेश के मंडला जिले से प्राप्त किया गया है।

इस संग्रहालय में प्रवेश करते ही मेरा पहला साक्षात्कार त्रिमूर्ति से होता है। दसवीं सदी की यह मूर्ति मुरैना जिले के पढ़ावली से लाई गई है। इसके आगे हिंगलाजगढ़ ( मंदसौर ) से प्राप्त गौरी की प्रतिमा के दर्शन होते हैं। दसवीं सदी की इस प्रतिमा में गजब की कलात्मकता है। खास तौर पर गौरी का मुख अत्यंत ममतामयी परिलक्षित होता है। गौरी के बाद गणेश। ये गणेश 11वीं सदी में मंदसौर से प्राप्त हुए हैं। ये नृत्यरत अवस्था में हैं। दसवीं सदी में बनी मां सरस्वती की सुंदर प्रतिमा है। यह मुरैना जिले से मिली थी। जिले के सुहानिया ग्राम से प्राप्त ये प्रतिमा अनूठी है। मां के चार हाथ हैं। उनके दो हाथों में वाद्य यंत्र है। यह सरस्वती की प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक है।

अगली मूर्ति का शीर्षक है स्खलित वासना। ये कब कहां से प्राप्त हुई है ये स्पष्ट नहीं है। पर वासना का भाव और उसके बाद की स्थिति का चित्रण एक नारी मूर्ति के माध्यम से कलाकार ने कहने की कोशिश की है। मूर्ति थोड़ी खंडित है पर उसका संदेश समझा जा सकता है।

सतना जिले का भरहुत कला का बड़ा केंद्र हुआ करता था। भरहुत की कई कलाकृतियां इंडियन म्युजियम कोलकाता की शोभा बढ़ा रही हैं। पर भोपाल के इस संग्रहालय मेंभरहुत में दूसरी सदी इसा पूर्व की बनी यक्षी की प्रतिमा देखी जा सकती है। ये इस संग्रहालय की प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक है। प्रतिमा में यक्षी का सिर्फ मुख भाग है। इसके चारों तरफ सुंदर चक्र बना हुआ है। हाथ में  पुष्प है। गले में गहने हैं। बालों का श्रंगार मोहक है।

भोपाल के राजकीय संग्रहालय में आप उमा महेश्वर, कल्याण सुंदरम, लक्ष्मी समेत तमाम प्रतिमाओं के दीदार कर सकते हैं। संग्रहालय मेंकुल 17 विथिकाएं हैं। जहां आप अलग अलग विषयों पर संग्रह देख सकते हैं। इनमें टेक्सटाइल, डाक टिकट, अस्त्र शस्त्र की दीर्घाएं भी काफी बेहतरीन संग्रह वाली हैं।

1909 में हुई शुरुआत - भोपाल के इस राजकीय संग्रहालय की शुरुआत 1909 में नवाब सुल्तान जहां बेगम ने की थी। तब इसका नाम एडवर्ड संग्रहालय था। स्वतंत्रता के बाद यह वाणगंगा इलाके में स्थापित किया गया। पर 2005 में यह श्यामला हिल्स इलाके में वर्तमान भवन में आ पहुंचा। राजकीय संग्रहालय का भवन दो मंजिला है। इसमें ऊपरी मंजिल पर सिक्का, पेंटिंग और वाद्य यंत्रों की भी गैलरी है। यहां पर आप एक पुरानी प्रिंटिंग प्रेस भी देख सकते हैं।


संग्रहालय में प्रवेश – राजकीय संग्रहालय भोपाल में प्रवेश का टिकट 20 रुपये का है। कैमरा के लिए 100 रुपये का शुल्क है। पंद्रह साल तक के बच्चों का प्रवेश निःशुल्क है। यह संग्रहालय वर्तमान भवन में नवंबर 2005 में स्थानांतरित हुआ। यहां आप दो से तीन घंटे गुजारकर पूरा संग्रहालय देख सकते हैं। प्रवेश द्वार पर पुस्तकों की दुकान भी है। संग्रहालय सुबह 10.30 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार और अवकाश के दिन बंद रहता है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( MP STATE MUSEUM, BHOPAL ) 


Sunday, July 21, 2019

जनजातीय जीवन की तिलिस्मी दुनिया

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अपना देश रहन सहन के मामले में कितना अनूठा है। भिन्न भाषा भिन्न देश- भारत अपना एक देश। पर देश के रहन सहन के भिन्नता को देखना और समझना हो तो मध्य प्रदेश के जनजातीय संग्रहालय में पहुंचिए।

मध्य प्रदेश का ये जन जातीय संग्रहालय, भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में स्थित है, इसका लोकार्पण भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया था। यह 6 जून 2013 को राजधानी भोपाल का नया आकर्षण बना। संग्रहालय में प्रवेश का टिकट 10 रुपये और फोटोग्राफी के लिए 50 रुपये का शुल्क है। संग्रहालय का प्रवेश द्वार भी जनजातीय समाज की अनूठी आभा लिए हुए प्रतीत होता है।

इस संग्रहालय में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले जनजातीय समूहों की कला संस्कृति परंपरा को देख सकते हैं। यहां उनके जीवन से जुड़े शिल्प चित्रों रहन सहन, रीति रिवाज रिवाजों को चित्रों मूर्तियों एवं प्रदर्शनों के माध्यम से समझा जा सकता है। यहां पर कई तमाम ऐसी वस्तुएं मूल अवस्था में देखी जा सकती हैं जो मूल रूप से आदिवासी संस्कृति में लोगों द्वारा उपयोग किए जाते हैं। खासत तौर पर ये जगह बच्चों और स्कूली छात्रों के देखने के लिए तो लाजवाब है।

यहां पर समय-समय पर यहां पर कई सांस्कृतिक आयोजन, कार्यशालाएं आदि आयोजित की जाती हैं। इसमें लोगों को आदिवासी समाज की मान्यताओं कला संस्कृति के बारे में ज्ञान मिलता है।

यहां पर मध्य प्रदेश की प्रमुख जनजातियां गोंड, भील, कोरकू, बैगा, कोल, भारिया, सहरिया आदि आदिवासियों के जीवन के बारे में जान समझ सकते हैं।
गोंड की बात करें तो उनका मुख्यता निवास बैतूल होशंगाबाद मंडला सागर छिंदवाड़ा बालाघाट और शहडोल जिले में है।

भील आदिवासियों का निवास मुख्यता झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी खरगोन और रतलाम जिले में है। भील अपने आपको वाल्मीकि और एवं एकलव्य का वंशज मानते हैं। इनकी कई उप जातियां जैसे भिलाला पट्टी लिया बारेला एवं राठिया आदि हैं। वहीं टंट्या भील देश के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख सेनानी हुए हैं जो की इसी जनजाति से आते हैं। उन पर भील समाज गर्व करता है।

राज्य में कोरकू जनजाति सतपुड़ा पर्वतमाला क्षेत्र के छिंदवाड़ा बैतूल होशंगाबाद जिले के गांवों में निवास करते हैं। वहीं बैगा जनजाति मंडला, डिंडोरी, शहडोल, उमरिया, बालाघाट एवं अमरकंटक के वन प्रदेशों में रहते हैं। वे लोग छत्तीसगढ़ के भी कई जिलों  हैं। बैगा जनजाति को छोटा नागपुर क्षेत्र की भूमियां जनजाति से निकली एक शाखा माना जाता है।

 कोल मध्य प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। इसकी कुल 22 उपशाखाएं हैं। वहीं भारिया लोग मुख्यतः जबलपुर एवं छिंदवाड़ा जिले में रहते हैं। अब सहरिया जनजाति की करें तो यह मध्य प्रदेश के शिवपुरी, गुना, ग्वालियर, मुरैना, भिंड विदिशा, रायसेन, सीहोर जिलों में निवास करती हैं।

आप संग्रहालय में इन जाजातियों के आवास उनके द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले उपकरण, उनके खेल तमाशे आदि के बारे में जान सकते हैं। यह सब कुछ यहां पर बड़े रोचक ढंग से पेश किया गया है।

संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद प्रतीत होता है मानो आप किसी तिलस्मी दुनिया में पहुंच गए हों। शहरी लोगों को यह किसी कल्पना लोक सा प्रतीत होता है। कई लोगों को यहां आकर लगता है कि हम अपने ही देश की सांस्कृतिक के बारे में कितना कम जानते हैं।

अब आपने पूरा संग्रहालय घूम लिया है तो चलते चलते आप यहां से कुछ खरीददारी भी कर सकते हैं। यहां पर चिन्हारी नामक एक सोवनियर शॉप भी है जहां आप कई तरह के आदिवासी प्रतीक और वस्त्र आदि खरीद सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( TRIBAL MUSEUM, BHOPAL ) 


Saturday, July 20, 2019

एक बार फिर भोपाल में – राजा भोज की नगरी

कई साल बाद दिल्ली से भोपाल की राह पर हूं। इस बार एक शादी का न्योता आया है। शादी भोपाल में है इसलिए जाने से इनकार नहीं कर सका। क्योंकि इसी बहाने भोपाल जाने का मौका मिल रहा है। मेरा आरक्षण हरिद्वार एलटीटी सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन में है। यह ट्रेन निजामुद्दीन स्टेशन से रात 12.10 बजे चलती है। हरिद्वार से आकर ये निजामुद्दीन में आधे घंटे रुकने के बाद चलती है। इसलिए यह रात 12.10 में निजामुद्दीन से चल ही पड़ती है। दफ्तर का काम खत्म करके मैंने दफ्तर की कैब से निजामुद्दीन स्टेशन जाना तय किया। पर नोएडा सेक्टर 63 से रात 11 बजे निकलने के बाद एनएच 9 पर रात में भीषण जाम में फंस गया।

एनएच पर भीषण जाम 
जाम से निकलने की ड्राईवर ने पूरी कोशिश कर रहा था पर यूपी गेट तक काफी जाम था। लगा कि अब ट्रेन नहीं पकड़ पाउंगा। फिर क्या 1100 रुपये पानी में चले जाएंगे।

हाईवे पर जाम में धीरे धीरे सरकते हुए यूपी गेट पर 11.40 हो गए। पर यूपी गेट के बाद हमारी गाड़ी बीच में बने सुपरफास्ट लेन में चल पड़ी अब कोई जाम नहीं था। मैं 11.55 बजे निजामुद्दीन स्टेशन पर था। तेजी से दौड़ता अपनी ट्रेन की तरफ भागा। अपने कोच में अपनी सीट पर पहुंचा ही था कि ट्रेन चल पड़ी।

हरिद्वार एलटीटी एक्सप्रेस का के कोच बिल्कुल नए हैं। हमारे कंपार्टमेंट में सिर्फ दो यात्री हैं। ऐसा लग रहा है कि ट्रेन में नहीं बल्कि अपने घर में ही सो रहा हूं। आगरा और झांसी के बाद इस ट्रेन का ठहराव सीधे भोपाल में ही है। ट्रेन अपने नीयत समय पर सुबह 10.30 बजे भोपाल पहुंच गई। भोपाल रेलवे स्टेशन पर 1999 के बाद पहली बार बाहर निकल रहा हूं। वैसे तो इस बीच भोपाल से गुजरना कई बार हुआ है। मैं हमिदिया रोड वाली साइड में बाहर निकला हूं, क्योंकि हमने जो होटल बुक किया वह हमिदिया रोड पर ही है। हमिदिया रोड मतलब पुराने भोपाल का इलाका।


पर स्टेशन से बाहर निकलते ही सबसे पहले नास्ता। नास्ते में क्या। जाहिर है भोपाल में नास्ता तो पोहा ही होगा। दिल्ली की बनिस्पत भोपाल में ठंड कम है। मेरे कई कपड़े यहां के मौसम के लिए बेकार लग रहे हैं। होटल के कमरे में जाकर स्नान करके तैयार हो गया। शाम को मुझे एक शादी में जाना है तो दिन भर समय है भोपाल शहर घूमने के लिए। भोपाल के कई स्थलों को पहले से ही देख चुका हूं तो इस बार कुछ नए स्थलों को सूचीबद्ध किया है। पिछले 20 सालों में भोपाल काफी कुछ बदल चुका है। 

देश की सुंदर राजधानियों में से एक - 
पिछले 15 सालों से शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार के बाद अब राज्य में कांग्रेस सरकार की वापसी हो गई है। कमलनाथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। सुंदरता की बात करें तो भोपाल देश के सुंदर राजधानी शहरों में से एक है। ताल तलैया के इस शहर में मेरी पहली मंजिल है जनजातीय संग्रहालय। इस संग्रहालय की दूरी हमिदिया रोड से पांच किलोमीटर है। मैं एक आटो रिक्शा वाले बात करता हूं। वे वाजिब दाम पर हमें संग्रहालय तक छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHOPAL, MP, RAIL, HWR LTT AC EXPRESS ) 


Friday, July 19, 2019

अहमदाबाद में सफल है बीआरटी कॉरीडोर


दिल्ली में बीआरटी कारीडोर को लेकर खूब हो हल्ला हुआ था एक मार्ग पर लागू हुई पर वह सफल नहीं हो सकी। पर अहमदाबाद में ये खूब सफल है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में भी बीआरटी सफल है।  बीआरटी मतलब बस रैपिड ट्रांसपोर्ट।
अहमदाबाद शहर में मनपा द्वारा बीआरटीएस को संचालित किया जाता है। इन बसों का किराया भी आम बसों की तरह है। इसकी ज्यादातर बसें एसी (वातानुकूलित) हैं।

हमने एक दिन ओधव से कालूपूरा तक बीआरटीएस बस में सफर किया। बीआरटीएस में बैठने के लिए सड़क के बीच में स्टेशन बनाए गए हैं। आने वाली बस का टिकट पहले काउंटर से लेना होता है। बस के दरवाजे काफी चौड़े हैं। ये दरवाजे बस में दाहिनी तरफ हैं। आटोमेटिक दरवाजे खुलने के बाद लोग इसमें प्रवेश कर जाते हैं। यह काफी कुछ मेट्रो रेल की तरह है। डेडिकेटेड बस कारिडोर होने के कारण ये बसें आपको मंजिल तक आटो या टैक्सी की तुलना में जल्दी पहुंचा देती हैं। इसलिए ये स्थानीय लोगों में लोकप्रिय भी हैं।

साल 2017 में यह तय किया गया कि अहमदाबाद बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) एवं अहमदाबाद म्युनिसिपल ट्रान्सपोर्ट सर्विस (एएमटीएस) रूटों पर चलने वाली बसों की खेप में अब इलेक्ट्रिक बसों को शामिल किया जाएगा। इससे प्रदूषण का स्तर कम होगा।

अहमदाबाद शहर में चल रहे बीआरटीएस को साल 2013 में दुनिया का सबसे अच्छा सतत परिवहन के रूप में चयन किया गया।  यहां का बीआरटीएस परफेक्ट प्लानिंग की एक बेहतरीन मिसाल है। अहमदाबाद में बीआरटीएस के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए पहले की तरह 40 मिनट के बजाए 11 मिनट में यह दूरी तय की जा सकती है।

एयरपोर्ट पर बापू की जीवन यात्रा - अहमदाबाद से अब चला चली की वेला है। हमारी फ्लाइट अल सुबह 5 बजे है। वैसे कालूपुरा से एयरपोर्ट की दूरी 8 किलोमीटर के आसपास है। हमने रात के ढाई बजे ही ओला कैब बुक कर लिया है। ओला वाले समय पर आ भी गए हैं। रात में सड़क खाली है। हमलोग बमुश्किल 15 मिनट में सरदार बल्लभ भाई पटेल एयरपोर्ट पर हैं। यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। हमारी उड़ान डोमेस्टिक टर्मिनल एक से है। साढ़े तीन बजे हमलोग चेकइन करके वेटिंग लाउंज में इंतजार करने लगे हैं।

एयरपोर्ट पर गुजरात के प्रतीक तस्वीर के तौर पर चंपानेर के सात कमान की विशाल तस्वीर लगी है। इसके साथ ही यहां बापू के जीवन की पूरी विकास यात्रा को चित्रों में दिखाया गया है। हो भी क्यों नहीं हर गुजराती को गर्व है कि बापू उनके हैं। वही बापू जिन्होंने सत्य के प्रयोग से पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। एक ऐसा गुजराती जो अपने कार्यों से विश्व नागरिक बना। बापू की जीवन यात्रा देखते हुए हमारी नजर गिर वन के जंगलों पर पड़ती है। एयरपोर्ट पर जंगल का सुंदर नजारा त्रिआयामी तरीके से निर्मित किया गया है। यहां पर गिर वन में गुर्राता हुआ शेर भी है। यहां खादी और गुजराती हस्तशिल्प के लिए गर्वी गुर्जरी की दुकाने भी हैं। पर वे सुबह सुबह होने के कारण बंद हैं। यहां चाय 60 रुपये की और 25 रुपये वाला थेपला 100 रुपये का बिक रहा है।

थोड़ी देर में हमारे विमान में प्रवेश का समय हो गया है। साल 2019 की हमारी पहली उड़ान है जेट एयरवेज से। यह बोइंग 737 विमान है। इसको उड़ा रहे हैं कप्तान सुमित्र अग्री। थोड़ी देर में हम गुजरात के आसमान में हैं। दिल्ली अब एक घंटे दूर है। सुबह 7 बजे विमान दिल्ली के टी-3 पर उतर गया। पर शायद ये हमारी जेट एयरवेज से आखिरी उड़ान साबित हुई। क्योंकि मई 2019 में जेट एयरवेज पूरी तरह जमीन पर आ चुकी थी।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( BRTS, ADI, SVP AIRPORT, BAPU, JET AIRWAYS )

Thursday, July 18, 2019

अहमदाबाद की पतंगबाजी और जान का खतरा


अहमदाबाद के जिस कालूपुरा इलाके में हम ठहरे हैं वहां पर पतंगों का थोक बाजार है। आपको तो पता होगा कि अहमदाबाद पतंगबाजी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। दीपावली खत्म होने के बाद गुजराती लोग पतंगबाजी में खो जाते हैं। ये सिलसिला दो महीने तक चलता रहता है। जनवरी में यहां काइट फेस्टिवल का आयोजन होता है।

खतरनाक हुआ पतंगबाजी का शौक - हम जिस मौसम में अहमदाबाद पहुंचे हैं यहां पतंगबाजी जोरों पर हैं। बचपन में थोड़ी बहुत पतंगे हमने भी उड़ाई हैं पर इसमें मुझे कुछ खास रुचि नहीं है। अहमदाबाद की सड़कों पर घूमते हुए हमें कई सारी बाइक या स्कूटी के आगे स्टील की ऊंचे फ्रेम लगवाए हुए लोग दिखाई दिए। कौतूहल वस मैंने एक जगह पूछ लिया कि ये क्यों लगवा रखा है। तो बाइक वाले ने बताया कि ये पतंग की डोर से बचने के लिए है।

 दरअसल पतंग उड़ाने में माझा लगे हुए धागे का इस्तेमाल होता है। इस धागे में सीसा का इस्तेमाल होता है। ऐसा इसलिए की सामने वाली की डोर को काटा जा सके। पर यह डोर लोगों का गरदन काट देती है। पतंग के धागे जब सड़कों पर टूट कर गिर जाते हैं तो ये आते जाते बाइक और साइकिल वालों की गरदन में कई बार फंस जाते हैं। बाइक वाला तेज गति से चलता है जब तक वह रुके तब इस धागे से गरदन कट जाती है। अहमदाबाद में ऐसे कई बाइक चलाने वालों की पतंग के धागे से मौत हो चुकी है। अब लोगों ने इन धागों के वार से बचने के लिए एक देसी तरीका निकाला है। हैंडल में कमान नुमा मोटा तार लगवा लेते हैं। यह तार धागे को गरदन तक आने से रोक लेता है। पर सारे लोगों ने ऐसा उपाय नहीं किया है। तो जान पर खतरा तो अभी भी बरकरार है।

मकर संक्रांति के दिन छह मौत - इस साल सिर्फ मकर सक्रांति के दिन की बात करें तो गुजरात में मकर सक्रांति पर्व के दिन पतंगबाजी का मजा कुछ लोगों के लिए जानलेवा साबित हुआ। प्रदेश में 14 जनवरी के दिन पतंग के मांझे से गला कटने पर छह लोगों की मौत हो गई। वहीं विभिन्न दुर्घटनाओं में प्रदेश में कुल 500 से अधिक लोग घायल हो गये है। जिसमें छत से गिरने के 100 से अधिक मामले शामिल है।

अहमदाबाद में जनवरी में उतरायन महोत्सव के मौके पर हर साल पतंगबाजी की परंपरा की खूब धूम रहती है। राज्य के पर्यटन विभाग ने इस मौके पर खास आयोजन करता है। तब दुनिया भर से लोग यहां पहुंचते हैं। साबरमती नदी के किनारे मेला लग जाता है। इस दौरान सेलिब्रेशन के लिए देश-विदेश में बसे गुजराती यहां आते हैं। पतंग के शौकीनों में इन्हीं मोहल्लों की छत से पतंग उड़ाने का क्रेज रहता है। गुजरात में कई इलाकों में तो लोग पतंगबाजी के लिए अपनी खुली छत को किराये पर भी लगते हैं।

मैं कालूपुरा टावर के पास पतंग बाजार में घूम रहा हूं। दर्जनों दुकानें तीन महीने के लिए पंतग और डोर माझा के दुकान में बदल जाती हैं। पूरे शहर में पतंग      और डोर माझा की सैकड़ो दुकानें गुलजार हो जाती हैं। पर इस पतंगबाजी से हो रही मौत की खबरें सुनकर का कहा जाए...
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों
इस रोशनी में लेकिन कुछ घर जल रहे हैं....
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KITE FESTIVAL, AHMADABAD, GUJRAT )

Tuesday, July 16, 2019

बापू का कोचरब आश्रम और नन्हा सा चरखा


आटो से अहमदाबाद की सड़कों पर चलते हुए पता चलता है कि हम कोचरब से गुजर रहे हैं। मुझे कुछ याद आता है। मैंने बापू पर पुस्तकें पढ़ते हुए ये जाना था कि कोचरब वही जगह है जहां पर साबरमती से पहले बापू ने आश्रम बनाया था। बस हमने आटो को वहीं थोड़ी देर तक रुकने को कहा। 
आप चाहें तो कोचरब आश्रम को अंदर जाकर घूम सकते हैं। यहां पर वह कमरा देखा जा सकता है जहां पर बापू कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक रहे। कोचरब आश्रम की देखरेख गुजरात का गांधी विद्यापीठ करता है। गांधीजी ने इस विद्यापीठ की स्थापना 1920 में की थी। गांधी विद्यापीठ कोचरब के पास ही है।

1915 में बापू ने शुरू किया सत्याग्रह आश्रम - दरअसल ये अहमदाबाद में गांधी जी और कस्तूरबा का प्रथम निवास है। यहां से सत्याग्रह की शुरुआत हुई और यहीं से साबरमती आश्रम की नीव पड़ी। बापू ने इस पहले आश्रम को नाम दिया था सत्याग्रह आश्रम। जब बापू अफ्रिका से सन 1915 में वापस आए और यहां आकर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की। तब कोचरब ग्रामीण इलाका था। आज व्यस्त शहर का हिस्सा है।

 सन 1915 के मई महीने की 25 तारीख के दिन यहां सत्याग्रह आश्रम की स्थापना हुई। बापू ने जब आश्रम शुरू करना तय किया तो कई मकानों की तलाश करते हुए कोचरब में जीवणलाल बैरिस्टर का मकान किराये पर लेने का निशचय हुआ। पर बापू की इच्छा जानकर बैरिस्टर जीवनलाल देसाई ने अहमदाबाद के कोचरब नामक स्थान में एक सुंदर सा बंगला गांधीजी को उपहार स्वरूप दे दिया था।

दरअसल बापू जब दक्षिण अफ्रिका से भारत आए तो हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में बसने के बारे में सोच रहे थे। स्वामी श्रद्धानंद ने उन्हें हरिद्वार में बसने की सलाह दी। किसी ने देवघर की सलाह दी।

बापू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं -  अहमदाबाद पर मेरी नजर टिकी थी। गुजराती होने के कारण मैं मानता था कि गुजराती भाषा द्वारा मैं देश की अधिक से अधिक सेवा कर सकूंगा। यह भी धारणा थी कि चूंकि अहमदाबाद पहले हाथ की बुनाई का केंद्र था, इसलिए चरखे का काम यहीं अधिक अच्छी तरह से हो सकेगा। साथ ही यह आशा भी थी कि गुजरात का मुख्य नगर होने के कारण यहां के धनी लोग धन की अधिक मदद कर सकेंगे। 

इस आश्रम में शुरुआत में 25 लोग रहते थे। गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक कोचरब के दो मंजिले बंगले में (1915 से 1917 तक) रहे। पर 1917 में इस इलाके में फैली प्लेग की महामारी ने बापू को कोचरब से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया।

नन्हा सा चरखा कोचरब आश्रम में एक स्टोर है, यहां खादी ग्रामोद्योग से जुड़े हुए तमाम समान बिकते हैं। यहां से आप कपड़े, शहद और खाने पीने की वस्तुएं खरीद सकते हैं। अपनी पिछली यात्रा में हमने साबरमती आश्रम के बाहर लकड़ी का बना हुआ नन्हा चरखा खरीदने का मन बनाया था पर खरीद नहीं पाए थे। पर इस बार हमने ये चरखा खरीद लिया। सन 2013  में ये चरखा 100 रुपये का था अब इसकी कीमती 160 रुपये है। यह बारडोली चरखे का छोटा मॉडल है। इसे घर में सजाने के लिए खरीदा जा सकता है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KOCHARAB ASHRAM, CHARKHA, BAPU ) 

Monday, July 15, 2019

सरखेज में शेर अली की दरगाह और चाय वाले पीर

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सरखेज रोजा के पास ही हमें हमारे आटो वाले हजरत ख्वाजा शेर अली बाबा की दरगाह दिखाने ले जाते हैं। वह चिश्ती परंपरा के सूफी संत थे। मुख्य सड़क पर इन महान सूफी संत की दरगाह है। इस दरगाह पर हमेशा स्थानीय लोगों की भीड़ होती है। बड़ी संख्या में लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं। यह दरगाह मुख्य सड़क पर सरखेज पुलिस स्टेशन के सामने स्थित है। परिसर में बाबा शेर अली निजामुद्दीन मगरीबी अल चिश्ती की दरगाह और सुंदर मसजिद है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसका प्रबंधन भी सरखेज रोजा कमेटी ही देखता है।

दरगाह का मुख्य गुंबद हरे रंग का है। इसमें कुल तीन गुंबद हैं। दरगाह का निर्माण बलुआ पत्थर से किया गया है। इसके चारों तरफ की दीवारों में जालियों का सुंदर काम है। दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु चादर और फूल चढ़ाते हैं। शेर अली के बारे में लोगों की मान्यता है कि वे जागृत संत हैं। उनकी ताकत शेर जैसी थी और वे आज भी रात को जागृत हो जाते हैं।

हजरत गंज बक्श के समकालीन - बाबा अली शेर सूफी संत होने के साथ महान योद्धा थे। वे हजरत निजामुद्दीन औलिया के वंशज थे। लोगों में उनका सम्मान सरखेज के दूसरे सूफी संत पीर अहमद गट्टू गंज बक्श के बराबर ही है। शेर अली हजरत गंजू बक्श के समकालीन थे। शेर अली इंतकाल हजरत गंजू बक्श से 12 साल पहले हो गया। वे 1434 ईस्वी में अल्लाह के प्यारे गए। कहा जाता है कि वे 140 साल जीये। इस तरह उनका जन्म का साल 1394 माना जाता है। कहा जाता है कि वे सरखेज में मस्त हालत में रहते थे। वे इबादत में इतना खो जाते थे कि उनके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं होता था। उनके दरगाह पर हर साल उर्स लगता है। तब यहां दूर-दूर से जायरीन पहुंचते हैं। 

सैय्यद सफी बापू की मजार – चाय वाले पीर
सरखेज में ही सैय्यद सफी बापू की मजार है। यह एक अनूठे पीर की मजार है जहां चाय का लंगर लगता है। इसलिए उन्हें चाय वाले पीर भी कहते हैं। वे ज्यादा पुराने नहीं हैं। उनका इंतकाल 2001 में हुआ था। वे यूपी के प्रतापगढ़ से इधर आए थे। इस मजार की खासियत है कि यहां एक तहखाना बना हुआ है। इसमें दूध और चाय पत्ती डाल दी जाती है। इसे एक साल बाद खोला जाता है तो उसमें चाय तैयार होकर मिलती है। इस दौरान यहां विशाल लंगर लगाया जाता है। ये अहमदाबाद में  चाय वाले पीर के नाम से लोकप्रिय हैं।


सरखेज रोजा के वास्तुकार आजम और मुअज्जम
सरखेज से पलाडी रोड पर चलते हुए सड़क के दाहिनी तरफ हमें दो मकबरे दिखाई देते हैं। वासना में स्थित इस मकबरे के बारे में थोड़ी छानबीन करने पर पता चला कि ये आजम और मुअज्जम के मकबरे हैं। भला कौन थे आजम और मुअज्जम। ये दोनों सरखेज रोजा के वास्तुकार थे। आजम के बारे में कहा जाता है कि वे धनुर्धारी योद्धा थे। तो मुअज्जम कला के पारखी थे। उन दोनों के इंतकाल के बाद सरखेज रोजा से थोड़ी ही दूरी पर उनका भी मकबरा बनवाया गया।
हमलोग अब वापसी की राह पर हैं। रास्ते में हमें अहमदाबाद मेट्रो रेल का काम चलता हुआ नजर आ रहा है। जल्द ही अहमदाबाद शहर भी मेट्रो रेल के मानचित्र पर होगा। शहर का विस्तार इतना ज्यादा हो गया है कि यहां मेट्रो की काफी जरूरत है।

मिट्टी हैं तो पल भर में बिखर जाएंगे हम, खुशबू हैं तो हर दौर को महकाएंगे हम

हम रुहे सफर हैं, हमें नामों से न पहचान, कल किसी और नाम से आ जाएंगे हम।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( BABA SHER ALI, SARKHEJ, CHAI WALE PIR, AJAM AND MUAJJAM )  

Saturday, July 13, 2019

गुजरात का ताजमहल है सरखेज रोजा

लोथल से वापस लौटते समय में हमें बागोदरा में बर्ड सेंक्चुरी का पथ संकेतक नजर आता है। बगोदरा से 28 किलोमीटर की दूरी पर नाल सरोवर बर्ड सेंक्चुरी है जो गुजरात का प्रसिद्ध वेटलैंड है। यहां खास तौर पर दिसंबर से फरवरी के बीच जाकर घूमा जा सकता है। यहां पर बर्ड वाचिंग और बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है। नाल सरोवर अहमदाबाद से 64 किलोमीटर दूर साणंद के पास है। पहुंचने का सुगम रास्ता बावला-बगोदरा होकर ही है। तो कभी अगली यात्रा में हम वहां जाने की कोशिश करेंगे।

लोथल से लौटते हुए हमारी अगली मंजिल है सरखेज रोजा। सरखेज रोजा को गुजरात का ताजमहल कहते हैं। यह अहमदाबाद शहर का विशाल और अनूठा स्मारक है।
सरखेज रोजा गुजरात में एक सबसे महत्‍वपूर्ण रोजा समूह है जिसमें कई मस्जिद, मकबरे और महल बनाए गए हैं। इस परिसर में निर्माण कार्य की शुरुआत सुल्तान मोहम्मद शाह ने की थी।

सूफी संत पीर शेख अहमद गट्टू गंज बख्श की मजार 
सुल्तान अहमद शाह, जिनके नाम के उपर से शहर का नाम पडा, के शासन काल के दौरान सरखेज अहमदाबाद के पास एक छोटा सा गांव हुआ करता था। इस गांव में मूल रूप से बुनकर और रंगरेज रहा करते थे। ज्यादा आबादी हिंदू थी। उस गांव में एक मुस्लिम पीर शेख अहमद गट्टु गंज बक्श का आना हुआ। पीर शेख 1398 में गुजरात आए और सरखेज में रहना शुरू किया। उनका समय 1336 से 1446 का था। 

उनका जन्म राजस्थान का नागौर जिले के खाटू में 1336 ईस्वी में हुआ था। वे खाटू के बाबा इसाक मगरीबी के शिष्य थे। कुल 111 साल की उम्र तक जीने के बाद उनका इंतकाल 13 जनवरी 1446 को हुआ। वे उन चार अहमद में से एक थे जिन्होंने 1411 में अहमदाबाद शहर की बुनियाद रखी। उनके इंतकाल पर उनकी याद में सुल्तान मुह्म्मद शाह ने सरखेज में एक मकबरा और सुंदर मसजिद बनवाई। पीर शेख की मजार की सुंदरता अदभुत है। इसमें कुल 16 स्तंभ हैं। इसकी दीवारों पर जालियों में सुंदर नक्काशी है।


महमूद बेगड़ा का मकबरा - सरखेज में सुल्तान महमूद बेगड़ा और उसके परिवार के सदस्यों का भी मकबरा है। सरखेज के मकबरे के निर्माण में इस्लाम, हिंदू और जैन शैली के अलंकरण का काम बहुत ही दक्षता से हुआ है। बाद में कुतुबद्दीन शाह ने भी सरखेज रोजा कांप्लेक्स के निर्माण में योगदान किया। इस परिसर में सुलतान अहमदशाह का भी मकबरा है। बाद में सुल्तान मुहम्मद बेगड़ा ने भी सरखेज कांप्लेक्स के निर्माण में योगदान किया।

मकबरे से झील की तरफ जाएं तो यहां सुंदर झरोखों को निर्माण किया गया है। सरखेज रोजा के निर्माण में बड़ी संख्या में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है इसलिए इसे गुजरात का ताजमहल भी कहते हैं। रोजा में बनी जालियों में सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है। 

सरखेज में विशाल झील - 15वीं शताब्दी में महमूद बेगडा ने इस मकबरे के आसपास निर्माण कार्य को विस्तार दिया। उसने एक समर पैलेस (गर्मियों में रहने के लिए महल ) और बीच में एक विशाल झील का निर्माण करवाया। झील से अतिरिक्त पानी के निकासी के लिए स्युलिस गेट का निर्माण किया गया था। झील के एक कोने पर समर पैलेस का निर्माण कराया गया था। हालांकि इस झील में आजकल पानी बिल्कुल नहीं है। इसलिए झील का सौंदर्य फीका पड़ गया है। वर्षों बाद यह किला और मकबरा जर्जर अवस्था में आ गया था। इसके कई भवनों को क्षति पहुंच रही थी। बाद में गुजरात सरकार और पुरातत्व विभाग ने इस स्थल का रख रखा कर पुनर्निमाण कराया है।

पुस्तकालय और वाचनालाय - सरखेज रोजा कमेटी आजकल सरखेज के इंतजाम देखती है। कमेटी यहां पर एक पुस्तकालय का संचालन करती है। यहां पर दुर्लभ पुस्तकों और चित्रों का संग्रह है। यहां पर पवित्र कुरान की हस्तलिखित प्रति देखी जा सकती है। सरखेज रोजा में होने वाले आयोजनों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई नामचीन हस्तियां शिरकत कर चुकी हैं। 26 जनवरी 2014 को अमिताभ बच्चन सरखेज रोजा में आए थे।

कैसे पहुंचे - सरखेज, अहमदाबाद में मुख्‍य शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कभी यह शहर का बाहरी इलाका हुआ करता था, पर अब शहर का हिस्सा है। सरखेज रोजा घूमने के लिए एक अच्छा स्थल है। यहां लोग पिकनिक मनाने भी आते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SARKHEJ ROJA, AHMADABAD , MASJID )