Tuesday, May 21, 2019

मुरुड – मछली, मिठाई और नाना पाटेकर

मुरुड में जंजीरा किला के अलावा दूसरा आकर्षण समंदर में बना कासा का किला भी है। पर इस किले तक जाने के लिए आपको आरक्षित बोट का सहारा लेना पड़ेगा। यह किला मुरुड से 9 किलोमीटर की दूरी पर समंदर में है। यहां नाव आने और जाने के लिए 1500 से 2000 रुपये तक किराया हो सकता है। कासा  किला का निर्माण संभाजी के सेनापति दौलत खान ने करवाया था। इसे पद्म दुर्ग भी कहते हैं। यह दुर्ग जंजीरा किले से दिखाई देता है। पर इस किले की सैर के लिए आपको नौ सेना से अनुमति लेनी पड़ती है।


मुरुड में सुबह सुबह सड़क पर टहलने निकल पड़ा हूं। यहां कई पुरानी ब्रिटिश कालीन इमारतें दिखाई देती हैं। समंदर के किनारे लंगर लगाए बहुत सारी मछली पकड़ने वाली नावें भी दिखाई देती हैं। मैं मुरुड के मछली बाजार से गुजरता हुआ पुराने शहर की ओर पहुंच गया हूं।

नाना पाटेकर और मुरुड - मुरुड के स्थनीय लोगों से बातचीत में पता चला कि फिल्मों के मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर मुरुड के रहने वाले हैं। उनका बचपन यहीं गुजरा है। अब भी वे जब मुरुड आते हैं यहां के सभी लोगों से आम लोगों की तरह मिलते हैं। कुछ स्थानीय लोग बताते हैं कि नाना का बचपन यहां गरीबी में बीता। उनका मां दूसरे घरों में कामकाज करती थीं। शायद इसलिए नाना बड़े अभिनेता बनने का बाद भी गरीबों के प्रति काफी हमदर्द हैं।

मुरुड शहर में मुसलमानों की अच्छी आबादी है। यहां बाजार में मुझे जैन मंदिर दिखाई देता है। इसके आगे चलता हूं तो मिठाई की दुकान दिखाई देती है। दो मिठाई की दुकानें हैं और दोनों यूपी के लोगों की हैं। सालों से यहां मिठाइयां बना रहे हैं। मुरुड के बाजार में महंगाई का मीटर ऊंचा नहीं है। समोसे मिठाइयां सस्ती हैं। मैं कुछ मिठाइयां और नमकीन लेकर अपने होटल वापस आ जाता हूं।

अब मुरुड से वापसी – जंजीरा का किला देखने के बाद हमारी मुरुड से वापसी का समय हो गया है। होटल से चेकआउट के बाद हमलोग सड़क पर बस का इंतजार कर रहे हैं। यहां से कहीं भी जाने वाली बस अलीबाग होकर ही जाएगी। एक बस में हमें जगह मिल गई। वापसी में बस तेज चल रही है।

रेवदंडा का किला - रास्ते में रेवदंडा का किले की दीवार नजर आती है। वास्तव में यह किला कुंडलिका नदी के मुहाने पर बना है। यह तीन तरफ से पानी के घिरा है। यह रेवदंडा क्रीक से लगा हुआ है। यहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अलीबाग-मुरुद मार्ग किले से होकर गुजरता है। सन 1524 में इस किले का निर्माण पुर्तगाली कैप्टन सोज ने कराया था। सन 1806 तक यह पुर्तगालियों के कब्जे में था। उसके बाद इस पर मराठों का कब्जा हो गया। वहीं 1818 में इस ब्रिटिश सेना ने कब्जा कर लिया।

तकरीबन दो घंटे के बस के सफर के बाद हम अलीबाग पहुंच गए हैं। शाम के 4 बज गए हैं। हमने दोपहर का खाना नहीं खाया है। अलीबाग बस स्टैंड के सामने कई अच्छे होटल हैं। यह हमने जाते समय ही देख लिया था। इसलिए लंच अलीबाग में ही करना तय कर लिया था। तो बस स्टैंड के सामने अशोका शाकाहारी में वेज बिरयानी और एक थाली आर्डर की गई। छक कर खाया और आगे के सफर पर चल पड़े।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MURUD TO ALIBAUG, NANA PATEKAR ) 


Sunday, May 19, 2019

देश में एक अजूबा है जंजीरा का किला


भारत देश के कई अजूबों के बारे में आपने सुना होगा। पर क्या आपने जंजीरा के किले के बारे में सुना है। समंदर के बीच में बना यह किला अपने आप में अजूबा है।
एक जनवरी की सुबह हमलोग जंजीरा के किले की तरफ चल पड़े हैं। किले पानी के बीच है इसलिए यहां तक पहुंचने के लिए स्टीमर चलती है। अपने होटल से हमलोग खोरा बंदर पोर्ट पहुंचे हैं। यहां से जाने वाली स्टीमर का किराया 61 रुपये है। इसमें वापसी का भी किराया शामिल है। तीन टिकट लेकर हमलोग स्टीमर का इंतजार करने लगे। हमारे स्टीमर का नाम पुष्पावती है। किले तक जाने में कोई एक घंटे का  समय लग जाता है।



सोलहवीं सदी का अपारजेय किला  चारों तरफ अरब सागर से घिरा जंजीरा का किला 16वीं सदी का बना हुआ है। जंजीरा अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है टापू। इसे कभी जीता नहीं जा सका।
 यहां के लोग इसे मुस्लिम किला कहते हैं, जिसका मतलब अजेय होता है। यह किला मुस्लिम शासक सिद्दी जौहर द्वारा बनवाया गया था। सिद्दी जौहर मूल रूप से अफ्रीका के अबिसिनिया मूल के थे। वे अहमदनगर के शासक के सेनापति थे। पर कहा जाता है कि मूल रुप से राजापुरी के 4 किलोमीटर दूर समंदर में एक टीले पर लकड़ी के किले का निर्माण स्थानीय कोली (मछुआरों) ने समुद्र लुटेरों से बचने के लिए कराया था। पर इस पर मालिक अंबर के सिद्दी सेनापति ने कब्जा कर लिया। बाद में यहां भव्य पत्थर के किले का निर्माण कराया।

22 से खास रिश्ता – यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव 20 फीट गहरी है। जंजीरा के इस किले का निर्माण 22 वर्षों में पूरा हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। साथ ही यहां 22 टन की विशाल तोप भी है।  

माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बाबा के संरक्षण में है। शाह बाबा का मकबरा भी इसी किले में है। इस किले पर कई बार हमले जरूर हुए पर कभी कोई जीत नहीं पाया। किले की कई इमारतें ध्वस्त हो गई हैं। यहां ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी, कान्‍होजी आंग्रे, चिम्‍माजी अप्‍पा और शंभाजी ने हमला कर इस किले को जीतने का काफी कोशिश की थी। इस किले पर 20 सिद्दकी राजाओं ने शासन किया। स्वतंत्रता के बाद 3 अप्रैल 1948 को यह किला भारत सरकार के संरक्षण में आ गया।

तीसरी सबसे बड़ी तोप – इस किले में सिद्दिकी शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं। जंजीरा किले में आप देश की तीसरी सबसे बड़ी तोप देख सकते हैं। इस तोप का वजन 22 टन है। वैसे इस किले में छोटी बड़ी कुल 19 तोपें देखी जा सकती हैं।  

मीठे पानी का तालाब – किले के अंदर तो विशाल तालाब हैं। ये दोनों ही मीठे पानी की झीलें हैं। समंदर के बीच में किला। समंदर का पानी तो खारा होता है। पर किले के अंदर मीठे पानी की झील कैसे है ये देखकर अचरज होता है। पर आप इस झील का पानी यहां पर पी भी सकते हैं। कुछ महिलाएं झील के किनारे इसका पानी लेकर बैठी रहती हैं।

किले का प्रवेश द्वार -  जंजीरा किले की खास बात है कि दूर से इसका प्रवेश द्वार दिखाई नहीं देता। इसलिए इस किले पर हमला करने वाले चकमा खा जाते थे। काफी निकट आने पर इसका द्वार नजर आता है। ऐसा इसलिए है कि हर थोड़ी दूर पर बनी सुरक्षा चौकी की दीवारें आगे की तरफ निकली हैं जिसके कारण प्रवेश द्वार नजर नहीं आता।

वहीं बताया जाता है कि किले से जमीन तक आने के लिए समंदर के नीचे से एक सुरंग वाला रास्ता भी था। यह रास्ता दुश्मन के हमले के वक्त सुरक्षित पलायन के लिए बनाया गया था। सिद्दी राजाओं के शासन काल में यह किला गुलजार हुआ करता था। बड़ी आबादी इस किले के अंदर रहती थी। पर अब यहां शाम के बाद कोई नहीं रहता।   
      

कैसे पहुंचे – जंजीरा किला पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक राजापुरी से होकर और दूसरा खोरा बंदर से होकर। खोरा बंदर वाला रास्ता निकट का है। किला देखकर आने जाने में कोई तीन से चार घंटे का वक्त लग जाता है। इसलिए अपने साथ पानी की बोतल और खाने पीने की कुछ सामग्री जरूर रखें। किला सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। शुक्रवार के दिन यह दोपहर दो बजे तक बंद रहता है। 


जंजीरा किले के करीब जब स्टीमर पहुंचती है तो वहां सवारियों के नाव में स्थानांतरित किया जाता है। किले के प्रवेश द्वार तक स्टीमर नहीं जा पाती। प्रवेश द्वार पर आपका सामना किले के गाइडों से होता है। आप चाहें तो इन गाइड के बिना भी पूरे किले का मुआयना कर सकते हैं। पूरे किले को घूमने में कम से कम दो घंटे का वक्त लग जाता है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
-        ( WONDERS OF INDIA, MURUD JANJIRA FORT )

Friday, May 17, 2019

मुरुड के समुद्र तट पर बज उठा: लॉलीपॉप लागे लू...


महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले का छोटा सा शहर मुरुड में हमलोग 31 दिसंबर को पहुंचे हैं। नए साल का जश्न मनाने के लिए यहां सैलानियों की काफी भीड़ है। शहर के सभी होटल हाउसफुल हैं। हमारी बुकिंग काफी पहले से थी इसलिए हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।

दत्त मंदिर से लौटकर हमलोग मुरुड के समुद्र तट पर हैं। अस्ताचल गामी सूरज धीरे धीरे अपने घर जाने को है। समंदर के पानी पर उनकी रश्मियों की लालिमा छाने लगी है। तो इस समय हमें क्या करना चाहिए। समंदर की रेत पर चार पहिया वाली बाइक दौड़ने को तैयार है। हमने ऐसी एक मोटर बाइक किराये पर ले ली है और उसे बालू पर दौड़ाने लगे हैं। कभी बाइक को अनादि ने दौड़ाया तो कभी माधवी ने।


इस बाइक के अलावा यहां घोड़े से खींचने वाली साइकिल का विकल्प भी मौजूद है। इस पर सवारी करना किसी शाही सवारी जैसा आनंद देता है। बाइक राइड और दूसरे तरह की राइड से मन भर गया तो अब कुछ खाने पीने चलते हैं।

मुरुड का समुद्र तट नए साल 2019 के स्वागत के लिए तैयार है। यहां 25 दिसंबर से एक जनवरी तक मुरुड जंजीरा पर्यटन महोत्सव और फूड फेस्टिवल चल रहा है। समुद्र तट पर मेला लगा हुआ है। मेले में दुकानदार अलग अलग शहरों से आए हैं। उनसे बातचीत में पता चला कि महाराष्ट्र के अलग अलग शहरों में ऐसे मेलों का रिवाज है। ये मेले सालों भर अलग अलग शहरों में चलते रहते हैं। मुरुड का मेला खत्म होने पर ये दुकानदार आगे किसी और शहर के मेले में चले जाएंगे। मेले में दुकान लगाने वाले कई दुकानदार उत्तर प्रदेश के अलग अलग शहरों के भी हैं।




मेले में खाने पीने की भी अनगिनत दुकानें लगी हैं। पर इस बार की महाराष्ट्र यात्रा में जो नया व्यंजन मुझे पसंद आया वह है दाबेली। हमने कुछ दिन पहले दाबेली खाई तो हमने अनादि को दाबेली खाने को कहा। इधर दाबेली 10 से 15 रुपये में मिलती है। इसका मूल आधार तो पाव है। वही पाव जो बड़ा पाव के साथ होता है। पर इसमें बड़ा की जगह पाव पर चटनी, सेव और मसाले सजाए जाते हैं। कभी आप भी गुजरात महाराष्ट्र में हो खाकर देखिएगा।

रात का डिनर हमने मुरुड के एक शानदार थ्री स्टार होटल में करने का तय किया। पर वहां का खाना ऊंची दुकान फीकी पकवान रही। बुरा तो कुछ नहीं पर तारीफ करने लायक भी कुछ नहीं इसलिए उसका नाम नहीं ले रहा। खाने के बाद हमलोग मुरुड के समंदर तट पर एक बार फिर पहुंच गए हैं। मंच सजा है। संगीत की महफिल सजी है। गीत संगीत का दौर जारी है। सामने कुर्सियां लगी हैं। हमलोग भी कुर्सियों पर काबिज हो गए हैं। मंच से मराठी गाने, हिंदी गाने के बाद हमें सुखद आश्चर्य हुआ जब वहां भोजपुरी गाना भी बजने लगा... लॉलीपॉप लागे लू... संगीत भाषा की दुरियां पाट देता है।
और ये रही 2018 की आखिरी सेल्फी...

मंच के पीछे खाना पीना चल रहा है। पॉप कार्न, मकई का भुट्टा... हमने भी भुट्टा खाया। चाय कॉफी का दौर चल रहा है। मुरुड पुलिस और स्वयंसेवी संगठनों का वालंटियर्स तैनात हैं किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए। लोग समंदर के किनारे स्काई लैलटर्न उड़ा रहे हैं। चीन से आई ये कंदील मोमबत्ती चलाने के बाद हवा में उड़ने लगती है। काफी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद कहीं नीचे गिर जाती है। और ये लिजिए रात के 12 बज गए हैं। साल 2019 शुरू हो चुका है। थोड़ी देर समंदर के किनारे गुजारने के बाद हमलोग अपने होटल वापस लौट आए।

मुरुड में क्या देखें – तो आइए जान लेते हैं कि मुरुड में क्या क्या देखें। आप  दत्त मंदिर , मुरुड समुद्र तट, कासा किला, जंजीरा किला, , मुरुड शहर का मछली बाजार, कासिद समुद्र तट, रेवदंडा का किला देख सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MURUD FORT, NEW YEAR 2019 ) 

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Wednesday, May 15, 2019

मुरुड का दत्ता मंदिर जिसमें समाहित हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश


मुरुड जंजीरा के कई आकर्षण हैं, पर उनमें से दत्त मंदिर भी एक है। ये मंदिर बाजार से एक किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ी पर है। यहां से शहर और समंदर का सुंदर नजारा दिखाई देता है।
यह मुरुड जंजीरा का सबसे प्राचीन मंदिर है। यह तकरीबन 350 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित है। मुरुड के दत्त मंदिर का स्थापना 1853 में हुई। इसकी स्थापना स्वामी ब्रह्मेंद्र ने की थी। ब्रह्मेंद्र स्वामी को स्थानीय लोग सिद्ध पुरुष मानते हैं। वे हिमालय से रामेश्वरम तक यात्रा करते हुए यहां पधारे थे। देश भर घूमने के बाद उन्होंने परशुराम क्षेत्र में अपना ठिकाना बनाया।

दत्त मंदिर में तीन सिर वाली मूर्ति स्थापित है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है। कोंकण क्षेत्र में तमाम स्थलों पर आपको दत्त मंदिर मिलते हैं। इसका मतलब है कि इस मंदिर में त्रिदेव समाहित हैं।
दत्त मंदिर के पहले पुजारी फाफे गुरुजी थे। कोंकण क्षेत्र के मंदिरों में दत्त मंदिर का बड़ा सम्मानित स्थान है। सन 1853 से ही इस मंदिर की देखभाल एक ट्रस्ट के जिम्मे है। मंदिर एक छोटी पहाड़ी (टेकरी ) पर स्थित है। इसलिए मंदिर तक जाने के लिए रास्ते का निर्माण कराया गया।


सन 1907 में मंदिर समिति ने एक बार फिर मंदिर परिसर का विकास करवाया। इसमें मुरुड के हिंदू समाज के लोगों ने अपना बढ़ चढ़ कर योगदान किया। एक बार फिर 1926-27 में लोगों ने मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार कराया।
दत्त मंदिर के आसपास हरे भरे पेड़ लगे हैं। खास तौ पर शाम या सुबह में आप मंदिर जाएं तो यहां से मुरुड शहर, समंदर का नजारा, कासा किला और जंजीरा किला सब कुछ देख सकते हैं। ऊपर से प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर नजारा किया जा सकता है।

अब मंदिर के आसपास के इलाके का भी सौंदर्यीकरण  कर दिया गया है। मंदिर तक जाने के लिए मोटर वाहन वाला रास्ता सन 2000 के बाद स्थानीय लोगों के प्रयास से बन सका है। मंदिर के पास वाहन की पार्किंग के लिए पर्याप्त इंतजाम है।

हर साल दत्त जयंती के मौके पर यहां तीन दिवसीय मेला लगता है। दत्त यात्रा का आयोजन होता है जिसमें दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं। इस मौके पर मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए भंडारा का भी आयोजन होता है।

सन 1935 से 1949 के बीच दत्त मंदिर की एक भक्त आनंदी बाई पेडणेकर ने मुरुड में दत्त मंदिर धर्मशाला का निर्माण करवाया।

कैसे पहुंचे – मंदिर पहुंचने के दो तरीके हैं। पहला वाहन से और दूसरा ट्रैकिंग करते हुए। अगर आपके पास समय है और ट्रैकिंग करने का शौक है तो पैदल चढ़ाई करते हुए मंदिर तक पहुंचे। ट्रैकिंग का मार्ग सड़क मार्ग से थोड़ा छोटा है। इस यात्रा में 350 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। मुरुड बस स्टैंड से आटो रिक्शा से अपने वाहन से मंदिर पहुंचा जा सकता है। अगर आप बाहर से आए हैं तो जाने और आने के लिए आटो रिक्शा आरक्षित कर लें।

हमलोग शाम को आटो रिक्शा आरक्षित करके दत्त मंदिर पहुंचे हैं। मंदिर परिसर में हमने आधा घंटा से ज्यादा गुजारा। आसपास के पेड़ पर चढ़कर अपने बचपन को याद किया। हमारे आटो के ड्राईवर ने हमें दूर मरुड डैम दिखाया जहां से शहर को पानी मिलता है। सुंदर शाम की सुमधुर यादें लेकर हम फिर लौट चले नीचे की ओर।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 E-mail vidyutp@gmail.com
(MURUD, DUTTA MANDIR)    


Monday, May 13, 2019

अलीबाग से मुरुड की ओर वाया कासिद बीच...


अलीबाग में हमारी बस से काफी लोग उतर गए हैं। तो बस खाली खाली लग रही है। अलीबाग डिपो में बस ने ईंधन लिया। हमने भी आसपास से थोड़े फल खरीदे। वैसे आपको पता है अलीबाग को महाराष्ट्र का गोवा कहते हैं। अलीबाग रायगढ़ जिले के कोंकण क्षेत्र में स्थित महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर बसा एक छोटा सा शहर है। 

आम और नारियल के बाग - सत्रहवीं शताब्दी में इस जगह का शिवाजी महाराज के काल में काफी विकास हुआ। सन 1852 में इसे 'तालुकाघोषित किया गया। तीन तरफ से पानी से घिरे होने के कारण अलीबाग में बहुत सारे सुंदर तट हैं। सन 2011 में अलीबाग शहर की जनसंख्या 20 हजार से ज्यादा थी। तो यहां अली नामक एक इजरायली आकर बस गया था। उसके विशाल आम और नारियल के बाग थे। उसी के नाम पर इस जगह को लोग अलीबाग कहने लगे। मुंबई से काफी संख्या में लोग अलीबाग घूमने आते हैं। 


कई अमीर लोगों ने अलीबाग के आसपास रिसार्ट भी बनाए हैं। इसी अलीबाग में हीरा व्यापारी नीरव मोदी ने अपना 100 करोड़ का बंगला बनाया था जिसे अवैध पाए जाने पर ध्वस्त किया गया। अलीबाग में सैलानियों को आकर्षित करने के लिए उत्सवों का भी आयोजन होता रहता है। अलीबाग पहुंचने के लिए  निकटतम रेलवे स्टेशन पेण (PEN)  है।



अब अलीबाग से हमारी बस आगे के सफर पर चल पड़ी है। एक तरफ समंदर और दूसरी तरफ सड़क। अलीबाग से मुरुड की सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं है पर रास्ता हरा भरा है। सीधी सपाट सड़क नहीं है। रास्ते में काफी तीखे मोड़ हैं। इसलिए बस 45 किलोमीटर का सफर दो घंटे में तय करती है।

अलीबाग से थोड़ी दूरी तय करने पर चौल नामक गांव आया। इसके बाद रेवदंडा का किला दिखाई दिया। यह किला घायल अवस्था में है। हमारी बस रेवदंडा बस स्थानक में भी थोड़ी देर के लिए जाकर रुकी। इसके बाद कोलाई फिर बोलीनाका। बोलीनाका में अच्छा खासा बाजार है। इसके आगे कासिद बीच आया। यहां काफी लोग समुद्र तट पर मस्ती करते नजर आए।






कासिद में समुद्र तट के आसपास कुछ होटल भी हैं। मुरुड आने वाले सैलानी यहां रुक कर भी समंदर का नजारा करते हैं। कई लोग कहते हैं कि सारे समुद्र के तट तो एक ही जैसे है। पर कई लोगों को हर समुद्र तट कुछ अलग लगता है। तो कासिद बीच भी काफी लोगों का पसंदीदा समुद्र तट है। हमारी बस सरपट भाग रही है। अब कासिद के बाद आया नंदी गांव। नंदी गांव से मुरुड आठ किलोमीटर रह गया है।

दुपहरिया में दो घंटे का सफर तय करके हमलोग मुरुड पहुंच गए हैं। हमारे होटल का नाम है अंजुम होलीडे होम। यह बस स्टैंड से पहले ही है। मोबाइल के जीपीएस में होटल की लोकेशन देखते हुए हमलोग बस से होटल के बिल्कुल पास उतर गए। होटल के दूसरी मंजिल के कमरे में अपना सामान पटकने के बाद हमारा पहला लक्ष्य है पेट पूजा। 


अंजुम होलीडे होम के पास ही एक चलता हुआ होटल नजर आया बस वहां आर्डर करके बैठ गए। ज्यादा रिसर्च करने का वक्त नहीं है। होटल विनायक का रेस्टोरेंट के अलावा समुद्र तट के किनारे कमरों वाला होटल भी है। यहां हमने एक थाली और एक प्लेट बिरयानी आर्डर की है। थाली में खास किस्म की कोकूम की चटनी भी है। तो यह बिरयानी बहुत मसालेदार है। फिलहाल इसी का स्वाद लिया जाए...


-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( ALIBAUG TO MURUD, ANJUM HOLYDAY HOME ) 
  

Saturday, May 11, 2019

पुणे से अलीबाग वाया लोनावाला-खंडाला-पेण

कई साल पहले फेसबुक पर एक मित्र ने मुंबई के पास मुरुड में समंदर के बीच स्थित जंजीरा किला की तस्वीर साझा की थी। तभी से वहां जाने की इच्छा थी। तो इस बार पुणे से हमने मुरुड जाना तय किया। वैसे दूरी के लिहाज से मुरुड पुणे की तुलना में मुंबई के निकट है। पर हमारी यात्रा पुणे से आरंभ हो रही है। यहां से बस या आरक्षित टैक्सी ही विकल्प है। बसों के बारे में एक दिन पहले ही पता कर लिया था। सभी मुरुड की तरफ जाने वाली बसें स्वारगेट डिपो से चलती हैं। 

पुणे में महाराष्ट्र रोडवेज की सरकारी बसें स्वारगेट के अलावा शिवाजीनदर स्थानक और पुणे रेलवे स्टेशन के बगल में स्थित एक छोटे से स्टैंड से चलती हैं। हमलोग सुबह सुबह उबर टैक्सी से स्वारगेट डिपो पहुंच गए हैं।

सीधे मुरुड जाने वाली बस सुबह सात बजे है। कुल सफर तकरीबन सात घंटे का है। हांलाकि उससे पहले 6.30 बजे अलीबाग तक जाने वाली बस प्रस्थान कर रही है। पर यात्रियों ने सलाह दी कि आप डाइरेक्ट बस में ही बैठें। हालांकि बाद में लगा कि हम अलीबाग तक वाली बस में आ जाते तो थोड़ा समय का सदुपयोग हो जाता है। बात कुछ ऐसी है कि बस चाहे मुंबई से आए या पुणे से या फिर महाराष्ट्र के किसी और शहर से अगर मुरुड जंजीरा जा रही है तो अलीबाग होकर ही जाएगी।
अलीबाग बड़ा बस डिपो है। वहां हर बस दस मिनट रुकने के बाद ही आगे बढ़ती है। हमलोग सुबह सुबह बिना नास्ता लिए घर से निकल पड़े हैं। स्वारगेट डिपो में एक घंटे इंतजार के बाद मुरुड की बस में बैठ गए हैं। तो इससे आधे घंटे पहले वाली बस में अलीबाग तक चले जाते तो वहां दोपहर का लंच करके मुरुड की अगली बस में बैठ जाते।

खैर स्वारगेट से हमारी बस निकल चुकी है। पुणे शहर पर बसों की ट्रैफिक का इतना बोझ है कि स्वारगेट डिपो छोटा पड़ने लगा है। स्वारगेट से निकल कर हमारी बस शिवाजी नगर डिपो पहुंच गई है। शिवाजीनगर डिपो में बस को अंदर जाने और बाहर निकलने में जाम के कारण काफी वक्त लग गया। हमने स्वारगेट जाकर अच्छा किया। क्योंकि हमें बस में मनचाही सीट मिल गई है। हालांकि बस की आधी सीटें ऑनलाइन बुक थीं। पर कंडक्टर महोदय ने हमें आगे की अच्छी सीटें दे दीं।

बस मुंबई मार्ग पर बढ़ती जा रही है। खरडी, दापोली, पिंपरी चिंचवड,  अकुर्डी होती हुई बस आगे बढ़ रही है। इसके बाद  नगडी आया। यह पुणे का बाहरी इलाका है। निजी आपरेटरों काफी बसें नगडी से आरंभ होती हैं। इसके बाद देहु रोड रेलवे स्टेशन दिखाई दिया। फिर तलेगांव के बाद कामशेत होते हुए हमलोग लोनावाला पहुंच गए हैं। 

लोनावाला एक रेस्टोरेंट के आगे चाय नास्ता के लिए आधे घंटे का ठहराव है। तो यहां हमलोगों ने नास्ते में बड़ा पाव लिया। मगनलाल की चिकी खरीदी और खाई। इसके तुरंत बाद बस आगे चलकर लोनावाला स्थानक में भी जाकर पांच मिनट रुकी। स्थानक के अंदर भी रियायती दरों वाली कैंटीन है।

लोनावाला से बस ने मुंबई पुणे हाईवे का रास्ता छोड़ दिया है। खंडाला प्वाइंट होकर बस आगे बढ़ रही है। खोपोली बस स्टैंड में भी बस कुछ मिनटों के लिए रुकी। खालपुर, वडवल के बाद आया पेण। 

पेण में भी बस स्थानक के अंदर जाकर रुकी। पनवेल कोंकण  रेल मार्ग का पेण रेलवे स्टेशन भी है। बस मुंबई गोवा हाईवे पर वडखल से होकर गुजर रही है। सुहानी हवा के हल्के झोंके आ रहे हैं। वेलकम टू अलीबाग सिटी का बोर्ड नजर आ गया है।  हमलोग पांच घंटे सफर कर अलीबाग पहुंच गए हैं। अलीबाग रायगढ़ जिले का प्रमुख शहर है।

कैसे पहुंचे - मुंबई से अलीबाग की दूरी 96 किलोमीटर है जबकि पुणे से अलीबाग की दूरी 145 किलोमीटर है। अलीबाग से मुरुड की दूरी 45 किलोमीटर है। पर मुंबई से अलीबाग आने का दूसरा सुगम रास्ता गेटवे ऑफ इंडिया से फेरी से है। फेरी सेवा से एक घंटे में मंडावा बीच पहुंचा जा सकता है। वहां से 23 किलोमीटर अलीबाग शहर की दूरी शटल बस से तय की जाती है जो फेरी कंपनियों द्वारा ही संचालित किए जाते हैं। अगर आप रेल मार्ग से अलीबाग-मुरुड पहुंचना चाहते हैं तो पेण सबसे सुगम स्टेशन हो सकता है जहां से आपको अलीबाग के लिए बसें मिल जाएंगी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( Email - vidyutp@gmail.com
(PUNE TO MURUD VIA LONAWALA, KHANDALA, PEN, ALIBAUG ) 


Thursday, May 9, 2019

पांच नदियों का शहर पुणे – इंद्रायणी, मुला, मुथा, पावना और भीमा


अगर पंजाब पांच दरिया का देस है तो पुणे पांच नदियों का शहर है। मुला, मुथा, पावना, इंद्रायणी और भीमा। पर ये पांच नदियां मिलकर आजकल पुणे को समृद्ध नहीं बना पा रहीं हैं। क्योंकि इन जीवन दायिनी नदियों को अमृतजल की कद्र करना भूल गए हैं।

इंद्रायणी नदी के तट पर संत तुकाराम के गाथा मंदिर के दर्शन के बाद हमलोग अब वापसी की राह पर हैं। मोबाइल की जीपीएस लोकेशन बता रही है कि हमें अकुर्डी होकर जाना चाहिए। देहू से कुछ सड़कों को पार करते हुए हमलोग अकुर्डी पहुंच गए। हम मुंबई से पुणे जाने वाली पुरानी सड़क पर हैं। 

अकुर्डी नाम से कुछ याद आता है। हां बजाज। हमारा बजाज। बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर। यहां बजाज का प्लांट है। कभी स्कूटर के लिए जानी जाने वाली कंपनी अब बाइक बनाती है। हाईवे पर बजाज प्लांट का गेट नजर आया।

इसके बाद हमलोग पिंपरी चिंचवड में  है। यह पुणे का उपनगर है। अब तो उपनगर क्या यह पुणे शहर का हिस्सा बन चुका है। सड़क पर ट्रैफिक खूब है पर हम अपनी एक्टिवा भगाते जा रहे हैं। हम भारत रत्न जेआरडी टाटा उड़ान पुल के पास से होकर गुजर रहे हैं। 


उड़ान पुल मतलब फ्लाईओवर और क्या। मराठी भाषा में हिंदी का इस्तेमाल हम हिंदी वालों से बेहतर है।

आगे आर्मी एरिया आरंभ हो चुका है। हम पुणे के प्रसिद्ध मिलट्री इंजीनियरिंग कॉलेज के पास गुजर रहे हैं। इसके प्रवेश द्वार पर विशाल विजयंत टैंक तैनात है। 1963 में स्वदेश निर्मित विजयंत टैंकों को भारत पाकिस्तान के युद्ध का हीरो माना जाता है। इन टैंको की बदौलत हमने पाकिस्तान से खूब मुकाबला किया था।

अब हम मुला नदी के पुल से गुजर रहे हैं। पुणे शहर के बीच से होकर मुला, मुथा और पवाना नदियां गुजरती हैं। दरअसल पुणे शहर भीमा नदी के बेसिन मे बसा हुआ है। मुला नदी आगे जाकर भीमा नदी में मिल जाती हैं। भीमा नदी आगे जाकर कृष्णा नदी में मिल जाती है और कृष्णा दक्षिण भारत में बंगाल की खाड़ी में। कृष्णा से भीमा नदी का संगम तेलंगाना के महबूब नगर जिले में कर्नाटक की सीमा पर होता है। इस स्थल को निवृति संगम भी कहते हैं।

इंद्रायणी का भीमा में संगम - पुणे के बाहरी इलाके देहू और आलंदी से होकर गुजर रही इंद्रायणी नदी आगे जाकर तुलापुर में भीमा नदी से मिल जाती है। इस इलाके में संभाजी की समाधि और भीमा कोरेगांव जैसे ऐतिहासिक स्थल पड़ते हैं।
पवना का मुला में मिलन – पुणे शहर के अंदर दो अलग अलग स्थलों पर पवना और मुथा नदियों का मुला में संगम होता है। एक बार फिर लौटते हैं मुला मुथा की ओर। मिल्ट्री इंजीनियरिंग कॉलेज के आगे मुला नदी का का पुल आता है। पुल से नदी को देखता हैं। पानी के ऊपर जलकुंभी और घास की परत जमी है। कहीं पानी नजर ही नहीं आ रहा है। यहीं पर थोड़ा पहले बोपोडी में मुला नदी से पवना नदी आकर मिलती है। ये पवना नदी लोनावाला के पास पहाड़ों से निकलती है। यह 60 किलोमीटर लंबी नदी पिंपरी चिंचवड़ होते हुए पुणे शहर में प्रवेश करती है और मुला के प्रेम में खुद की हस्ती को मिटा देती है। पुणे शहर के करीब पहुंचने के बाद पवना नदी भी भारी प्रदूषण का शिकार हो जाती है।  
पुणे शहर में प्रदूषित मूथा नदी। 

मुला में मुथा का संगम -
आगे बढ़िए तो संगमवाड़ी में मुला से मुथा नदी आकर मिलती है। शनिवार वाड़ा के बगल से जो नदी गुजरती है वह मुथा है। पर पुणे शहर के आम लोगों को भी इन सारी नदियों के नाम नहीं मालूम। पश्चिमी घाट से निकलने वाली मुथा नदी पर दो जगह पनशेट और खड़कवासला में बांध बनाया गया है। इस नदी का पानी पुणे शहर वासियों को पीने को मिलता है। मुथा नदी का जल सिंचाई के भी काम आता है। 

पर पुणे शहर में खास तौर पर मुथा और मुला में नदियों में प्रदूषण का स्तर काफी ऊंचा है। शहर का कचरा बड़े पैमाने पर इन नदियों में जाता है। नदी में पानी कम कचरा ज्यादा दिखाई देता है। कभी ये नदियां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती थीं। पर अब इन नदियों को साफ करना बड़ी चुनौती बन गई है। पर हमें इन जीवनदायिनी नदियों को साफ करना होगा। नहीं तो हमें एक दिन इनका रौद्र रुप देखना पड़ेगा।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  Email - vidyutp@gmail.com 
(PUNE, FIVE RIVERS, MULA, MUTHA, INDRAYANI, PAWNA ) 
देहु रोड में इंद्रायणी नदी...