Monday, December 30, 2019

डिगलीपुर से वापसी – एसएस ट्रैवल्स की बस से

जल टेकरी में विजय विश्वास के घर खालिस दूध पीने में अनादि को दिक्कत हुई पर पेड़ से टपका हुआ आम उन्हें काफी पसंद आया। तो आम को चाव से खा लिया। अब हम वापसी की राह पर हैं। जल टेकरी से डिगलीपुर वापसी के लिए हमें बस मिल गई है।
शाम को 5.30 बजे वहां से आखिरी बस चलती है। हम इसी आखिरी बस में सवार हो गए हैं। इस बस में दो लोगों का डिगलीपुर का किराया 48 रुपये है। वापसी में बस खाली खाली है। शहर की ओर जाने वाली सवारियां कम ही हैं। रास्ते में तेज बारिश होने लगी। पर जब हम डिगलीपुर पहुंचे तो बारिश बंद हो चुकी थी।

हमने रात का डिनर उसी फूडीज रेस्टोरेंट में लिया। रात के दस बजे हैं। हमें अब डिगलीपुर से पोर्ट ब्लेयर की वापसी वाली बस लेनी है। इस बस में आरक्षण हमने डिगलीपुर में ही कराया है। सरकारी बस सेवा और आनंद बस सेवा में हमारी इच्छित तारीख में जगह नहीं थी। लोगों एसएस बस काउंटर पर जाने की सलाह दी। इसमें फिर हमें सबसे पीछे की ही तीन सीटें मिल सकीं। पर हम अपनी वापसी और टाल नहीं सकते थे इसलिए मजबूरी में इस सीट को लेना ही पड़ा। 


होटल से चेकआउट के बाद हमलोग डिगलीपुर चौराहा पर पहुंच गए हैं। एसएस ट्रैवल्स की बस जाने के लिए तैयार है। हमें पीछे वाली सीट मिली है। पर इस सीट में तो हैंडल भी नहीं है। आनंद बस की सीट में हर यात्री के बीच में हैंडल था जिस पर हाथ रखने से थोड़ा सहारा मिल जाता था। इस सीट को लेकर हमलोग थोड़े दुखी हैं पर सफर तो करना ही है। ठीक रात 11 बजे बस चल पड़ी है।

कुछ घंटे के सफर के बाद बस रंगत के आसपास एक छोटे से कस्बे में रुकी। लोगों को 15 मिनट का ब्रेक टायलेट आदि जाने के लिए दिया गया। यहां पर लगे माइल स्टोन पर लिखा है बादामी नाला दो किलोमीटर।
इसके बाद बस फिर आगे के सफर पर चल पड़ी। मेरे बगल वाले सहयात्री को बार बार नींच आ रही है और वह मेरे ऊपर गिर पड़ता है। मैं उसे बार बार सीधा करता हूं।

कई घंटे के सफर के बाद रात के साढ़े तीन बजे के आसपास बस कदमतल्ला से पहले एक नाका के पास जाकर रुक गई। बताया कि यह जारवा चौकी है। यहां से बस सुबह साढ़े चार बजे चलेगी। रात के अंधेरे में काफी गाड़ियां लाइन में लगी हैं। हमलोग बाहर निकल कर टहलने लगे। कानवॉय का समय होने पर इस चौकी से बस आगे की ओर चल पड़ी। 

उजाला होने से पहले हमलोग एक बार फिर उत्तरा जेट्टि पहुंच चुके हैं। यहां पर बस से उतरकर फेरी में सवार होना पड़ा। ठीक वही प्रक्रिया जो आते समय में अपनाई गई थी। उत्तरा जेट्टि में भी यात्रियों के बैठने के लिए सुंदर शेड बनाए गए हैं। हमलोग जिस फेरी में बैठे हैं। हमारी बस भी उसी में सवार हो गई है। इस बार हमलोग फेरी की छत पर आकर बैठ गए हैं। 

थोड़ी देर में हमलोग गांधी घाट पहुंच गए हैं। एक बार फिर बस में सवार। और बस चल पड़ी है। इधर सड़क काफी खराब है। तो बस की उछल कूद का असर हम पर काफी पड़ रहा है। सुबह के साढ़े छह बजे हमलोग बाराटांग के नीलांबर जेट्टि पहुंच गए हैं। यहां पर हमने एसएस बस को अलविदा कह दिया। अपना सामान उतार कर हमलोग नीलांबर जेट्टि में ही रुक गए। हमारी बस फेरी में सवार हो गई। पर हम फेरी में सवार नहीं हुए। पर ऐसा क्यों। हमने हालांकि टिकट तो पोर्ट ब्लेयर तक का ले रखा है। पर हम अब इस बस में आगे नहीं जाएंगे। दरअसल हमारा कार्यक्रम बाराटांग की लाइम स्टोन गुफाएं देखने का है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( RETURN FROM DIGLIPUR ) 








Saturday, December 28, 2019

कीचड़ से सने पांव और विजय विश्वास की बिल्लियां


मड वाल्केनो देखने के दौरान अनादि के दोनों पांव कीचड़ में फंस गए थे। उनकी चप्पल और उसके ऊपर सीमेंट के रंग का कीचड़ चढ़ चुका था। थोड़ा हमने जंगल के पत्तों से पांव साफ करने की कोशिश की पर सफलता नहीं मिली। उन्ही कीचड़ सने पांव के साथ वे दो किलोमीटर जंगल में पदयात्रा करते बाहर निकले। हमें उम्मीद थी बाहर कहीं पानी मिलेगा तब सफाई हो सकेगी। बाहर निकलते ही एक किसान का घर दिखा। घर के बाहर सुंदर बागीचा और एक तालाब था। 

हमने अनादि को कहा इस तालाब में जाकर अपने पांव साफ करो। अनादि बोले घर वाले से पूछ लेना चाहिए। हमने गृहस्वामी को आवाज लगाई। उन्होंने कहा बाल्टी लेकर तालाब से पानी निकालें और सफाई कर लें। पर हमने अनादि को सलाह दी कि ये जो लकड़ी की सीढ़ियां बनी हैं इससे तालाब में उतर जाओ। आखिरी सीढ़ी पर बैठकर आराम से पांव और चप्पल साफ करो। अनादि सफाई में लग गए। 

तकरीबन आधा घंटा वे सफाई करते रहे। कभी गांव में नहीं रहे अनादि को कीचड़ मिट्टी के स्पर्श का ज्यादा अनुभव नहीं है पर मेरा बचपन तो गांव में गुजरा है। बारिश के दिनों में हमारे गांव की गलियों में घुटने भर कीचड़ हो जाता है। उसमें उतर कर ही रोज घर से दालान तक आना जाना पड़ता था।

हर घर में बिल्लियां पालते हैं लोग
जब तक अनादि अपने पांव और चप्पल साफ कर रहे थे मैं गृहस्वामी विजय विश्वास से बातें करने लगा। उन्होंने चार बिल्लियां पाल रखी हैं। ये बिल्ली क्यों। दरअसल यहां के किसान धान उगाते हैं। घर में रखे धान को चूहे खा जाते हैं। बिल्ली पालने का फायदा है कि वह चूहों को खा जाती है इसलिए बिल्ली धान की संरक्षक है। उनकी चारों बिल्ली आपस में खेल रही हैं। पर उन्होंने दर्जन भर बत्तख और मुर्गियां भी पाल रखी हैं। कई बकरियां भी हैं और गाय भी।

घर के आगे बागीचे में आम, शरीफा, कटहल, केले समेत कई पेड़ हैं। वे कई सब्जियां भी उगा लेते हैं। बताते हैं कि सिर्फ शहर से आलू लाता हूं कभी कभी। खाना बनाने के लिए चूल्हे जलाने को जंगल से लकड़ियां मिल जाती हैं। साल भर के लिए जलावन की लकड़ी का स्टाक कर रखा है। उनके पास एक डोंगी (नाव) भी है। नाव से नाली ( छोटी जलधारा ) से होकर सागर में जाते हैं और मछलियां पकड़ लाते हैं। इन मछलियों को शहर में बेच आते हैं। उम्र के 59 वसंत देख चुके विजय विश्वास किसी नौजवान जैसे दिखाई देते हैं। दो पीढ़ी पहले उनका परिवार बंगाल के उत्तर 24 परगना से यहां जल टेकरी में आया था। 

हमलोग उनके बातें कर रहे थे कि अचानक पेड़ से एक पका आम गिरा। मैंने आम उठाया और अनादि को खाने को दिया। विजय ने चाकू और प्लेट लाकर दी आम खाने के लिए। साथ ही कुछ और पके आम लाकर रख दिए जो आज ही पेड़ से गिरे थे। आम खाकर हम चलने को हुए तो विजय भाई ने रुकने को कहा। रसोई में गए और दो ग्लास गाय का दूध लेकर आए। उसके ऊपर छाली की मोटी परत थी। मैं तो पूरा ग्लास गटक गया पर अनादि को इस दूध को पीने में काफी देर लगी। शहर के लोगों को ऐसा खालिस दूध कहां नसीब हो पाता है। मुझे अपना बचपन याद आ गया जब हमारे घर में भी एक गाय हुआ करती थी और कच्चा गोरस पीया करता था। 

अंदमान  डिगलीपुर शहर से 35 किलोमीटर दूर अपने गांव में विजय विश्वास अपनी जिंदगी से खुश हैं। सरकार पेयजल का टैंकर लेकर रोज गांव में आती है, इसे लोग अपने ड्राम में भर लेते हैं। पर विजय भाई का कोई बैंक खाता नहीं है। मैं उनकी पत्नी से पूछता हूं जन धन खाता क्यों नहीं खोला जीरो बैलेंस वाला। तो वे कहती हैं, पेट सबसे बड़ा बैंक है। सब उसमें ही समा जाता है। हमारी वापसी की बस का टाइम होने वाला है। हम उनसे विदा लेकर चल पड़ते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ANDAMAN, MUD VOLCANO, DIGLIPUR, JAL TEKRI ) 
-         

Thursday, December 26, 2019

अंदमान में अनूठा ज्वालामुखी - मड वाल्केनो


हाथी लेवल से हमलोग अनूठे ज्वालामुखी की ओर चल पड़े हैं। हाथी लेवल में आकर पक्की सड़क खत्म हो गई है। यहां से आगे हमें जंगल में प्रवेश करना है। स्थानीय लोग इसे जोल टेकरी कहते हैं। मतलब जल पहाड़। बांगला उच्चारण में जल जोल जैसा सुना जाता है। हमलोग जंगल में प्रवेश कर चुके हैं। कोई गाइड साथ में नहीं है। हल्की हल्की बारिश का मौसम है।  कुछ लोगों से आने जाने से जंगल में पांव के निशान बने हुए हैं। इससे रास्ते का अंदाज लग रहा है और हमलोग आगे बढ़ते जा रहे हैं सुनसान जंगल में।

मड वाल्केनो को गारामुखी या पंकमुखी हिंदी में कह सकते हैं। जमीन से इसका प्रस्फुटन ज्वालामुखी की तरह ही होता है। बस इसमें अंदर से कीचड़ पानी और गैस आदि निकलती रहती हैं। जमीन के नीचे से लगातार निकलते तरल पदार्थ यानी कीचड़ से एक टीला बन जाता है। इसलिए स्थानीय लोग इस जल टेकरी कहते हैं। यानी पानी से बना पहाड़। 

मड वाल्केनो समान्य ज्वालामुखी जिससे लावा निकलता रहता है। उससे काफी अलग है। धरती के अंदर जगह जगह कई तरह की गैस पाई जाती हैं। मड वाल्केनो इन गैसों के कारण ही बनता है। पर यह भी प्रकृति का अनूठा चमत्कार है। धरती के नीचे लगातार बनने वाले गर्म पानी बनने कारण अंदर की मिट्टी कीचर के रूप में बदलकर फूटकर बाहर निकलने लगती है।

दुनिया में बहुत कम स्थलों पर मड वाल्केनो पाए जाते हैं। एशियाई देशों की बात करें तो पाकिस्तान के बलूचिस्तान में 80 के करीब सक्रिय मड वाल्केनों है। एशिया में इंडोनेशिया, फिलीपींस, ताइवान, इरान और अजर बाइजान में भी मड वाल्केनो पाए जाते हैं। पर भारत में मड वाल्केनों सिर्फ अंदमान निकोबार में ही देखा जा सकता है।

तो सुनसान जंगल में कोई एक किलोमीटर चलने के बाद हमें पहले मड वाल्केनों के दर्शन हुए। जंगल के बीच एक ऊंचा टीला दिखाई दिया। यहां पर छोटे छोटे पानी के बुलबुले निकल रहे थे। पर यह पंकमुखी ज्यादा बड़ा नहीं था। हमलोग फिर आगे बढ़ लिए। हमने जंगल से छोटे छोटे डंडे ले लिए हैं अपनी सहायता के लिए। थोडी देर में दूसरे नंबर का पंकमुखी नजर आया। इसे देखने के बाद हमलोग फिर आगे बढ़ चले। फिर थोड़ा चलने पर तीसरे नंबर का मड वाल्केनो आया। इसे भी थोड़ा निहारने के बाद हमलोग फिर आगे बढ़े।

तकरीबन जंगल में दो किलोमीटर चलने के बाद हमलोग चौथे नंबर के पंकमुखी तक पहुंच गए हैं। यहां पर एक साथ कई मड वाल्केनो हैं। इनसे लगातार कीचड़ निकल रहा है। हमलोग कुछ फोटो लेने और वीडियो बनाने में लग गए। यहां कोई मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहा है।


पर चौथे नंबर के इस मड वाल्केनो में कोई सात अलग अलग पंकमुखी हैं जिनसे लगातार कीचड़ निकल रहा है। कभी कभी इनसे आवाज भी होती है। हम यह सब देखकर आनंदित हो रहे हैं। जो कीचड़ इन वाल्केनो से निकल रहा है उसका रंग सीमेंट जैसा है।

अचानक वीडियो बनाते हुए आनादि का एक पांव फिर दोनों ही पांव कीचड़ में जाकर फंस गए। हालांकि इतनी गहराई नहीं थी कि फंसने जैसी कोई बात हो, उनके पांव बुरी तरह गंदे हो गए। हमने आसपास से पत्ते तोड़कर कीचड़ साफ करने की कोशिश की, पर कोई खास लाभ नहीं हुआ। अब कीचड़ सने पांव के साथ ही हमलोग जंगल से बाहर वापस की ओर लौटने लगे। तो ये मड वाल्केनो का सफर यादगार रहा है। पर आगे कुछ और यादगार अनुभव हमारा इंतजार कर रहे हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUD VOLCANO, DIGLIPUR, ANDAMAN ) 





Tuesday, December 24, 2019

डिगलीपुर से हाथी लेवल - मड वाल्केनो की ओर


मड वाल्केनो मतलब वैसी ज्वालामुखी जिसमें से कीचड़ निकलता हो। अंदमान में दो जगह मड वाल्केनो हैं। बाराटांग में और डिगलीपुर के पास हाथी लेवल में। तो हमलोगों की अगली मंजिल मड वाल्केनो देखने की। स्मिथ – रॉस और कालीपुर बीच से लौटने के बाद माधवी ने थकान के कारण आगे जाने से इनकार कर दिया। तो वे होटल में आराम करने चली गईं। हमलोगों ने दोपहर का भोजन नहीं किया है। पर मन में मड वाल्केनो देखने की उमंग है। ऐसी उमंग की दोपहर का खाना गोल कर दिया। टैक्सी के इंतजार में थोड़ा नास्ता किया। 

हमलोग डिगलीपुर चौराहे के टैक्सी स्टैंड पर पहुंच गए हैं। यहां से शेयरिंग जीप हाथी लेवल तक जाती हैं। जीप के इंतजार के दौरान हमलोगों ने एक-एक प्लेट छोले चाट खाकर थोड़ी सी भूख मिटा ली। यहां पर दुकान में मिनी ट्रैक्टर दिखाई दे गया। इसे पॉवर ट्रेलर भी कहते हैं। यह छोटे किसानों के लिए बेहतर होता है। इस तरह के मिनी ट्रैक्टरों की यहां पर मांग है।

डिगलीपुर से श्यामनगर की तरफ बस भी जाती है। पर थोड़े इंतजार के बाद हाथी लेवल की तरफ जाने वाली जीप आ गई। हमें जीप में जगह मिल गई है। जीप चल पड़ी है। सड़क अच्छी है। पर हल्की बारिश शुरू हो गई है। हमें पीछे वाली सीट मिली है। रास्ते में छोटे छोटे कस्बे आ रहे हैं जहां लोग उतरते जा रहे हैं।

हमलोग श्यामनगर रोड पर चल रहे हैं। रास्ते में पहला गांव लक्ष्मीपुर आया। इसके बाद अगला गांव है मिलन ग्राम। यहां भी कुछ ग्रामीण लोग जीप से उतर गए। इसके बाद अगला गांव है स्वराज ग्राम। हर गांव के बाहर हम प्लास्टिक के बड़े बड़े पानी की टंकिया देख रहे हैं। दरअसल इन टंकियों में प्रशासन की ओर पीने के पानी की सप्लाई होती है। लोग इन टंकियों से पानी निकालकर अपने घर में ले जाते हैं।

इसके बाद आया राधा नगर और फिर श्यामनगर। श्यामनगर बसों और जीप का आखिरी पड़ाव है। पर अब बस और जीप इससे दो किलोमीटर आगे जल टेकरी तक जाने लगी हैं।

करीब 35 किलोमीटर की दूरी एक घंटे में तय करके हमलोग हाथी लेवल पहुंच गए हैं। इस जगह का नाम हाथी लेवल क्यों है। पता चला कि बहुत साल पहले हाथियों ने यहां स्कूल भवन पर हमला कर दिया था। हाथियों ने उस स्कूल भवन को तोड़तर समतल कर दिया। इसलिए इस जगह का नाम हाथी लेवल पड़ गया।
जीप ने हमें जल टेकरी में उतार दिया है। 

यहां पर एक झोपड़ी में छोटी सी चाय की दुकान है। दुकानदार महोदय से थोड़ी देर रोचक बातें हुईं। उनकी दुकान पर हमने नींबू की चाय पी। इसके दुकानदार ने हमें मड वाल्केनो तक जाने का रास्ता बताया। यूं समझ लिजिए कि वे हमारे लोकल गाइड बन गए। यहां पर सरकार की ओर से सिर्फ एक साइन बोर्ड लगा है। पक्की सड़क यहां पर खत्म हो जाती है। आगे के रास्ते को भी लकड़ी के डंडों से बंद कर दिया गया है। दिन भर में गिने चुने लोग ही यहां पर मड वाल्केनो देखने के लिए आते हैं। हम इस कीचड़ के ज्वालामुखी तक जाने वाले अकेले यात्री हैं। तो चलिए चलते हैं इस अनूठे ज्वालामुखी की ओर...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( MUD VOLCANO, DIGLIPUR, JAL TEKRI ) 

Sunday, December 22, 2019

कालीपुर बीच – कछुओं के प्रजनन के लिए मशहूर


रॉस एंड स्मिथ द्वीप की सैर से एरियल बे जेट्टि में हमारी वापसी हो चुकी है। अपने बोट के साथ रहे अलग अलग राज्य के साथियों को अलविदा कहने के बाद हमलोग कालीपुर बीच पर जाना चाहते हैं। एरियल बे से कालीपुर बीच छह किलोमीटर आगे है। पर यहां के वाहन उपलब्ध नहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि उधर जाने वाली बस आएगी थोड़ी देर में। तो हमलोग बस का इंतजार करने लगे। 

आधे घंटे इंतजार के बाद बस आ गई। बस के कंडक्टर से हमारी बात हुई। उसने बताया है कि वह हमें कालीपुर बीच उतार देगा। साथ ही उसने बताया कि यही बस एक घंटे बाद वापस लौटेगी। आप लोग वापस आकर बस स्टाप पर रहना तो हम आपको डिगलीपुर वापस ले चलेंगे। यह सब जान लेना जरूरी था। नहीं तो हमें वापसी में परेशानी होती। 

हरे भरे टेढ़े मेढ़े ग्रामीण रास्तों से होते हुए बस ने हमें कालीपुर बीच के पास उतार दिया। सड़क से समुद्र तट ढाई सौ मीटर की दूरी पर है। हमलोग पैदल समुद्र तट की तरफ चल पड़े। कालीपुर बीच शिबपुर ग्राम पंचायत में आता है। ये पूरा इलाका बांग्लाभाषी लोगों का है। पर वे लोग यहां हिंदी बोलते हैं।

दरअसल कालीपुर बीच कालीपुर गांव से तीन किलोमीटर पहले पड़ता है। कालीपुर गांव में छोटा सा बाजार है। डिगलीपुर से लोकल मिनी बसें कालीपुर गांव तक जाती हैं। यही बस वापस भी लौटती है। जंगलों से होकर कच्चा रास्ता जा रहा है। अचानक हमें विशाल समुद्र तट के दर्शन होते हैं। यहां पर वन विभाग का सुरक्षा गार्ड तैनात है। कालीपुर बीच पर हमारे अलावा अभी कोई सैलानी नहीं है। हमारी नजरों के सामने विशाल समंदर है। पर उसका तट निर्जन है। मानो यह बीच सिर्फ हमारे स्वागत में ही बना हो।

समुद्र तट के बालू के बीच हमें कई तरह के जीवों के अवशेष और सीप दिखाई दे रहे हैं। पर यहां से कुछ भी उठाकर ले जाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अंदमान के समुद्र तट पर जो कुछ भी बिखरा हुआ दिखाई देता है उसे उठाकर अपने साथ ले जाना अपराध है। इसके लिए आप एयरपोर्ट पर पकड़ लिए जा सकते हैं।

कछुओं के प्रजनन के लिए मशहूर – कालीपुर बीच कछुओं के लिए जाना जाता है। यहां सर्दियों के दिनो में खास तौर पर कछुएं अपनी संतति बढ़ाने के लिए प्रजनन करते हैं। कालीपुर बीच विश्व के उन प्रसिद्ध गिने चुने द्वीपों में शुमार है जहां कई दुर्लभ प्रजाति के कछुए प्रजनन करते हैं। इनमें ओलिव रीडली, लेदर बैक, हॉक्सबिल और ग्रीन टर्टल मशहूर हैं। आमतौर पर रात में कछुए अंडे देते हैं। इन्हे सुबह में समंदर में छोड़ दिया जाता है। दूर दूर से सैलानी टर्टल नेस्टिंग देखने के लिए भी यहां पहुंचते हैं।

वन विभाग ने यहां पर कछुओं के प्रजनन के लिए खास इंतजाम भी किए हैं। अगर उनके प्रजनन काल के दौरान यहां पहुंचे हैं तो आपको कछुए देखने को मिल सकते हैं। कछुआ कितना महंगा और कितना महत्वपूर्ण जीव है यह तो बताने की जरूरत नहीं है। ये इलाका मायाबंदर वन विभाग के तहत आता है। यहां पर लगे साइन बोर्ड में सी टर्टल के बारे में जानकारियां भी दी गई हैं। यहां पर दिसंबर और जनवरी महीने में आने पर आपको कछुए प्रजनन करते हुए दिखाई दे जाएंगे।

कालीपुर बीच से वापस लौटकर हमलोग सड़क पर खड़े हो गए हैं। यहां पर नया नया पंचायत भवन बना हुआ दिखाई दे रहा है। प्रशासन की ओर शौचालय भी बनवाया गया है। पर उसमें ताला लगा हुआ है। मजबूरी में आपको निस्तारण के लिए खुले में जाना पड़ता है। थोड़ी देर में वही बस वापस आ गई है। इसमें हम सवार हो गए हैं। डिगलीपुर का टिकट ले लिया है। संयोग से बस में सीट भी मिल गई है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
(KALIPUR BEACH, TURTLES NESTING ) 









Friday, December 20, 2019

स्मिथ द्वीप पर तीन घंटे – जन्नत की सैर


स्मिथ एंड रॉस द्वीप। यहां आकर लगा कि यहां आने का फैसला कितना सही था। अंदमान के तमाम द्वीपों के बीच स्मिथ एंड रॉस का सौंदर्य कुछ अलग है। यह हैवलॉक जैसे भीड़ भाड़ से दूर एक शांत द्वीप है। ऐसा द्वीप जहां कोई आबादी नहीं है। सिर्फ सैलानियों को दिन में आने की अनुमति है। स्मिथ और रॉस दो अलग अलग द्वीप हैं। पर दोनों मिलते हैं। एक छोटी सी मुलाकात की तरह। एक रेतीला रास्ता दोनों द्वीपों को जोड़ता है।

लगभग 15 मिनट के सफर के बाद हमलोग स्मिथ आईलैंड पर पहुंच गए हैं। हमारे नाविक का नाम सुब्रतो चक्रवर्ती है। स्मिथ आईलैंड पर उतरते ही एक अलग तरह की खुशी का एहसास हो रहा है। बगल वाले रॉस आइलैंड पर हमें नहीं जाना। वहां जाने के लिए अलग से अनुमति लेनी पड़ती है। रॉस पर वन्य जीव और मैंग्रोव भी हैं। हमारे नाव वाले ने हमें समझा दिया है कि आपलोग रॉस की ओर मत जाना नहीं तो जुर्माना भरना पड़ सकता है।

हमारे ह्वाइट कोरल के पीछे पीछे कुछ और नावें पहुंच गई हैं तो इस निर्जन द्वीप पर थोड़ी रौनक हो गई है। द्वीप पर एक वाच टावर बना है जिस पर चढकर आप दूर समंदर का नजारा कर सकते हैं। इसके अलावा कई बैठने के लिए प्राकृतिक हट (झोपड़ी) बनी हुई हैं। सबसे मजेदार हैं यहां समंदर में नहाने का आनंद। मैं आते ही नहाने वाले स्थान पर जाकर पानी में कूद गया। नहाने में खतरा न हो इसके लिए पानी में एक सीमा रेखा बनाई गई है।

द्वीप पर कुछ पेड़ों के साथ सुंदर हट्स बनाए गए हैं। इन पेड़ों पर आप चढ़ सकते हैं। कुछ दूर तक जंगल में ट्रैकिंग भी कर सकते हैं। यहां जंगली जानवरों का कोई खतरा नहीं है। इन द्वीपों पर पहुंचने वाले सैलानी आते ही मस्ती में डूब जाते हैं।

स्मिथ द्वीप पर वैसे तो हमें तीन घंटे का समय दिया गया है। पर ये समय कब गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। द्वीप पर लेटकर समंदर का नजारा करने के लिए लकड़ी की बेंच लगी हैं। इन सबके लिए आपको कोई अलग से शुल्क नहीं देना पड़ता है। यहां कुछ झूले भी लगे हैं। तो अनादि इस पर बैठकर झूलने लगे।

द्वीप पर एक अस्थायी कैंटीन है। यहां पर नारियल पानी के अलावा खाने की पीने की कुछ चीजें मिलती हैं। बेहतर है कि आप अपने साथ कुछ खाने पीने की चीजें पैक कराकर लाएं। साथ ही पीने के पानी की अपनी बोतल भी साथ लेकर आएं।

बताया जाता है कि पहले कभी स्मिथ आईलैंड पर भी लोग रहते थे। पर अब प्रशासन ने इस द्वीप के गांवों को यहां से हटा दिया है। किसी जमाने में इन द्वीपों पर रात में रहने की अनुमति भी हुआ करती थी। पर अब नहीं है। अगर आप निर्धारित अवधि तीन घंटे से ज्यादा समय तक स्मिथ आईलैंड पर रुकना चाहते हैं तो इसके लिए आपको बोट वाले को वेटिंग चार्च का भुगतान करना होगा।
स्मिथ द्वीप पर एक जगह बोर्ड लगा है कि मगरमच्छ से सावधान रहें। मतलब यहां पानी में मगरमच्छ हैं। तो आप भी सावधान रहिएगा। 

तीन घंटे स्मिथ द्वीप पर गुजारना किसी सपनीली दुनिया के सैर करने जैसा है। समय हो गया है, पर वापस जाने का दिल नहीं कर रहा है। पर जाना तो पड़ेगा। हम सब लोग अपने बोट में सवार हो चुके हैं। इस बार हमारे नाविक ने एक विशाल प्लास्टिक की चादर हम सबके ऊपर तान दी है। इसके साथ ही बोट की गति खूब बढा दी है। समंदर का पानी तेजी से उड़कर बोट में आ रहा है। पर प्लास्टिक की चादर के कारण बचाव हो पा रहा है। वापसी के इस सफर का आनंद भी अलग ही रहा।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  
( SMITH AND ROSS ISLAND ) 

अंदमान की यात्रा को पहली कड़ी से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।     

Wednesday, December 18, 2019

डिगलीपुर से एरियल बे- सुहाने द्वीप की ओर


सुबह का नास्ता करने के बाद हमलोग निकल पड़े हैं रॉस एंड स्मिथ द्वीप की ओर। पर वहां जाने के लिए पहले हमें एरियल बे जाना होगा। एरियल बे डिगलीपुर शहर से 12 किलोमीटर पूरब की तरफ कालीपुर के रास्ते में है। वहां तक जाने के लिए समय समय पर बस जाती है। आटो रिक्शा वाले 100 से 125 रुपये मांगते हैं। हमलोगों ने आटो रिक्शा आरक्षित किया और चल पड़े एरियल बे की ओर। 

आटो वाले ने हमें एरियल बे जेट्टि के पास उतार दिया है। पर हम यहां सुबह सुबह पहुंचने वाले पहले सैलानी हैं। यहां से स्मिथ आईलैंड पर जाने वाले मोटर बोट का पैकेज रेट है। कुल 10 लोगों को ले जाने वाली बोट का किराया 6000 रुपये है। यानी एक आदमी के छह सौ रुपये। पर यह तभी हो सकता है जब दस लोग हों। हम तो अभी तीन ही लोग हैं। तो हमें और लोगों के आने का इंतजार करना होगा।

अगर आप कम लोगों के लिए बोट लेना चाहते हैं तो पांच लोगों के छोटे बोट का किराया 4000 रुपये है। यानी 800 रुपये प्रति व्यक्ति। यह बड़े बोट की तुलना में महंगा है। पूरी बोट आरक्षित कराने के बजाय हमलोगों ने सोचा कुछ लोग और आ जाएं अच्छा रहेगा। तो हमलोग बैठकर इंतजार करने लगे और सैलानियों के आने का। यहां पर क्रीक बोट एसोसिएशन बना हुआ है। साइन बोर्ड पर पदाधिकारियों ने मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं। ये अच्छी बात है कि किराया को लेकर कोई मोलभाव नहीं है। 

सामने एक शेड वाला बस स्टाप है। वहीं बैठकर हमलोग इंतजार कर रहे हैं। थोड़ी देर में दो बसों और एक टैक्सी में काफी लोग आ गए। बस में तमिलनाडु का एक समूह है। अब इन लोगों के साथ हमारा समूह बन गया। 

द्वीप पर जाने के लिए परमिट : बुकिंग के समय सबको अपना आधार कार्ड दिखाना पड़ता है। हर यात्री की रजिस्टर में नाम पते और आधार नंबर के साथ एंट्री की जाती है। यानी एक तरह का परमिट बनवाना पड़ता है। बोट पर बैठने से पहले पैसेंजर टरमिनल पर परमिट की जांच होती है। 

सामने समंदर में लगे नीले नीले ढेर सारे बोट में से एक बोट हमारा होगा। हमें एक सामूहिक पर्ची मिल गई है जिसमें 10 लोगों के नाम हैं। अब हम सभी दस लोगों को साथ रहना है। आगे चलकर हमलोग पैसेंजर टर्मिनल में पहुंचे। यहां पर बैठने और शौचालय आदि का इंतजाम है। यहां पर हमारी पर्ची की जांच हुई। इसके बाद हमलोग अपनी बोट की ओर बढ़ चले। हमारे बोट का नाम है ह्वाइट कोरल। ये नाम याद रखना है क्योंकि लौटना भी इसी बोट से है। बोट में 12 लोगों के बैठने की कुर्सियां लगी हैं। पर दस से ज्यादा लोग नहीं बिठाए जाते। 

हम अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठ गए और लाइफ जैकेट बांध लिया। हमारे साथ तमिलनाडु रामागति हैं जो आटो कंपनी में एचआर मैनेजर हैं। वे मजेदार बातें कर रहे हैं। और अब बोट चलने को तैयार है। एरियल बे टर्मिनल पर कुछबड़े जहाज दिखाई दे रहे हैं। दरअसल पोर्टब्लेयर से समुद्र के मार्ग से डिगलीपुर आने पर भी जहाज इसी एरियल बे जेट्टि में आकर लगते हैं। रॉस एंड स्मिथ द्वीप के लिए समंदर में तकरीबन सात किलोमीटर का सफर है। बोट ने रफ्तार पकड़ ली है। दोनों तरफ जलधाराएं उड़ रही हैं जो हमें थोड़ा थोड़ा भींगा रही हैं।
कुछ मिनट के सफर के बाद हमें दो द्वीप एक साथ दिखाई देने लगे। एक नाम है स्मिथ तो दूसरे का नाम है रॉस। नीले समंदर के बीच हरे भरे द्वीपों को देखकर लग रहा है मानो हम किसी जन्नत में पहुंच गए हों। तो रॉस और स्मिथ की बातें आगे भी जारी रहेंगी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com  
( SMITH AND ROSS ISLAND, ANDAMAN )