Saturday, December 8, 2018

अलवरी मावा मतलब कलाकंद - इसका जवाब नहीं

राजस्थान का अलवर शहर प्रसिद्ध है अपने कलाकंद या मिल्क केक के लिए। मिल्क केक को यहां अलवरी मावा कहा जाता है। पर आखिर यहां मिल्क केक ही क्यों बनता है। दरअसल राजस्थान का अलवर जिला दूध का बड़ा उत्पादक इलाका है। इतना बड़ा इसे मिल्क सरप्लस इलाका माना जाता है। अब दूध अधिक होता हो तो उससे मिठाई बनाना श्रेष्ठ विकल्प है। तो अलवर में बडे पैमाने पर बनती है मिठाई। उसमें भी सबसे प्रसिद्ध मिठाई मिल्क केक यानी कलाकंद। तो आप अलवर आएं और कलाकंद न खाएं ऐसा कैसे हो सकता है। तो हम पहुंच गए हैं घंटा घर इलाके में। यहां है अलवर की सबसे प्रसिद्ध मिल्क केक वाली दुकानें हैं। 

पहले थोड़ा स्वाद लेते हैं फिर खरीददारी करेंगे। मैं अलग अलग दुकानों पर कलाकंद के भाव पूछता हूं। 280 रुपये किलो है कलाकंद। पर घंटाघर के ठाकुरदास एंड संस में कलाकंद की दरें हैं 320 रुपये किलो। वह भला इसलिए कि ठाकुरदास एंड संस अलवर की सबसे लोकप्रिय कलाकंद की दुकान है। तो मैं भी यहीं से घर के लिए कलाकंद पैक करा लेता हूं।


पर अब बात हो जाए अलवरी मावा की। अलवर का कलाकंद इतना लोकप्रिय है राजस्थान और हरियाणा के कई शहरों में यह अलवर के कलाकंद के नाम से बिकता है। अलवर से गुजरने वाली हर ट्रेन के ठहराव पर भी लोक प्लेटफार्म से कलाकंद खरीद लेते हैं। आखिर अलवर में ही कलाकंद क्यों .. कहा जाता है कि राजस्थान के अलवर के मिल्क केक में जो स्वाद है वह कहीं और नहीं। यहां दूध का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। तो दूध से बनी मिठाइयां भी यहां सदियों से बनती आ रही हैं। कलाकंद मतलब खोआ (मावा) की मिठाई। दूध को देर तक गर्म कर जलाते रहिए तो तैयार होता है मावा। इस मावा में मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है कलाकंद। यानी यह खालिश दूध की मिठाई है। अलवर में आप फीका मावा भी खरीद सकते है। मतलब बिना चीनी का।

अगर आपको चीनी की बीमारी है तो फीका मावा खाए। वैसे तो अलवर शहर में कलाकंद की तमाम दुकाने हैं। पर सबसे ज्यादा दुकान शहर के घंटाघर के आसपास हैं। होप सर्कस और घंटाघर के बीच कलाकंद का बाजार सजा है। पर यहां पर कलाकंद की अलग अलग दरें हैं। पर इन सबके बीच ठाकुरदास एंड संस दुकान ज्यादा प्रसिद्ध है। वे कई पीढ़ियों से कलाकंद बेच रहे हैं। छोटी सी दुकान में दिन भर कलाकंद खरीदने वालों की भीड़ रहती है। अब उनकी दूसरी ब्रांच रेलवे स्टेशन पास के चौराहे पर भी खुल गई है।
पर आप अलवर का कलाकंद खरीदते समय सावधान रहें। कई जगह मिलावटी मावे की मिठाइयां भी बनने लगी हैं। सस्ते में बेचने और ज्यादा कमाई के चक्कर में ऐसा हो रहा है। कई बार स्वास्थ्य विभाग ऐसे मावे को पकड़ता है और उन्हें नष्ट करता है। इसलिए मिठाइयां भरोसेमंद दुकानों से ही खरीदें। अलवर में मावा बनता है तो घी भी बनती है। आप अलवर से देसी घी भी खरीद कर ले जा सकते हैं।
अलवर कलाकंद इस तरह से यहां की कला संस्कृति में रचा बसा है कि इसके नाम से लोक गायक घनश्याम गुर्जर ने गीत गाया है ...अलवरो कलाकंद...
-       ... विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ALWAR MAWA, KALAKAND, MILK CAKE )