Thursday, December 6, 2018

अलवर शहर का कंपनी गार्डन और स्वामी विवेकानंद

पैदल पैदल अलवर शहर का मुआयना करते हुए  मैं पुरजन विहार पहुंच गया हूं। इसे यहां के लोग कंपनी गार्डन भी कहते हैं। इसका एक और नाम है शिमला। अलवर शहर के बीचों बीच विशाल हरा भरा उद्यान है। पर इस उद्यान की यादें स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हुई हैं।
स्वामी विवेकानंद दो बार अलवर आए थे। वे पहली बार 7 फरवरी 1891 को अलवर पहुंचे थे। इस दौरान वे कई हफ्तों तक यहां रुके। जल्द ही शहर के लोगों  में उनकी प्रसिद्धी फैल गई। वे पुरजन विहार में जहां आजकल शिवाजी की प्रतिमा लगी है। वहीं पर बैठकर रोज प्रवचन करते और शहर के लोग सुनने आते थे। अपने अलवर प्रवास के दौरान ही वे पैदल चलकर सरिस्का के जंगलों में भी गए थे।

स्वामी विवेकानंद 1891 में पहले अलवर प्रवास के दौरान वहां अनेक हिंदू-मुसलमान युवक उनके प्रवचन सुनने आते थे। अलवर राज्य के दीवान भी स्वामीजी के परम-भक्त बन गए। तब उन्होंने अलवर के महाराज मंगल सिंह से स्वामीजी की मुलाकात कराई। कुछ दिन बाद वह अलवर राज्य के दीवान के अतिथि भी बने। अलवर नरेश उनसे मिलकर इतने प्रभावित हुए कि उनके भक्त बन गए। 
पहली बार अलवर प्रवास में स्वामी जी यहां के सरकारी अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर गुरुचरण लश्कर के आवास में ठहरे। यह वह स्थान है, जहां अब स्वामीजी का स्मारक बनाया है। उन चिकित्सक की पहचान बंगाली डॉक्टर के रूप में थी। 

इस प्रवास में स्वामीजी की दीवान रामचंद्र की हवेली, मंगलसर रेजीमेंट के हैड क्लर्क लाला गोविंद सहाय विजयवर्गीय, पंडित शंभूनाथ इंजीनियर सहित अन्य लोगों से घनिष्ठता हुई। वे अलवर के अशोका टॉकीज के समीप स्थित गोविंद सहाय के निवास पर भी कुछ दिन रुके थे। स्वामी जी घनिष्ठता के कारण शिकागो में भी अलवर के लोगों को याद करते थे। इसलिए उन्होंने शिकागो से गोविंद सहाय को कई पत्र भी लिखे। पहले  प्रवास के दौरान स्वामी जी ने मालाखेड़ा गेट के पास स्थित एक टीले पर बैठकर कई प्रवचन भी दिए थे। इसी टीले का नाम अब विवेकानंद चौक है, जहां स्वामीजी की प्रतिमा स्थापित की गई है। 31 मार्च 1891 को स्वामी जी अलवर से रवाना हो गए। इस दौरान मूर्ति पूजा को लेकर उनकी महाराज मंगल सिंह से भी चर्चा हुई। एक मौलवी साहब से भी उनकी गहन चर्चा हुई।
साल 1893 शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद भारत लौटने पर विवेकानंद पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुके थे। उसके बाद वे एक बार फिर अलवर आए थे। दूसरी बार स्वामी विवेकानंद दिसंबर 1897 में अलवर  आए। दूसरी बार अलवर आने पर अलवर के लोगों ने उन्हें विशेष सम्मान दिया। इस बार उन्हें राजमहल में ठहराया गया। तत्कालीन महाराजा जय सिंह प्रभाकर ने उनका स्वागत किया। स्वामी विवेकानंद की राजस्थान के खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह से भी काफी मित्रता थी। उन्होंने स्वामी जी को शिकागो जाने में मदद भी की थी।

अलवर शहर में बस स्टैंड के पास विवेकानंद चौराहा है जहां स्वामी जी की विशाल प्रतिमा लगी है। हालांकि कंपनी बाग या पुरजन विहार उद्यान में उनके बारे में कुछ नहीं लिखा है। कंपनी बाग उद्यान के बीच में बहुत सुंदर बागीचा है। इसमें बहुत सुंदर फूल खिलते हैं। कंपनी बाग का मौसम बड़ा सुहाना रहता है। इसे लोग शिमला उद्यान भी कहते हैं। उद्यान की हरियाली और रखरखाव मनमोह लेता है।
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( ALWAR, VIVEKANAND, PURJAN VIHAR, PARK )