Thursday, December 13, 2018

रेवाड़ी रेलवे स्टेशन- रात है या बारात फूलों की...

अलवर से रेवाड़ी के लिए लौट रहा हूं। मुझे अलवर जंक्शन से ट्रेन मिली है पोरबंदर मोतिहारी एक्सप्रेस। इसके इंजन की तरफ से लगने वाली जनरल बोगी में मैं सवार हो गया हूं। ट्रेन में जगह मुश्किल से मिली है। एक साइड वाली एक आदमी की सीट पर एडजस्टमेंट करके बैठ गया हूं। गुजरात से बिहार जा रहे एक श्रमिक भाई जो इस सीट पर बैठे हैं उन्होंने मेरे लिए भी थोड़ी जगह बना दी है। मैंने उन्हें बताया कि मेरा डेढ़ घंटे का सफर है रेवाडी उतर जाउंगा। मैं आखिर रेवाड़ी क्यों उतरने वाला हूं। क्योंकि मुझे सुबह सुबह गढ़ी हरसुरु जंक्शन पहुंचना है। और वहां से फरूखनगर जाना है।
रात है या बारात फूलों की....
ट्रेन रात के आठ बजे रेवाड़ी जंक्शन पर पहुंच गई है। पर रेवाड़ी जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर 3 पर उतरने पर गेंदे फूलों की खुशबू से वातावरण महकता हुआ नजर आया। देखता हूं प्लेटफार्म पर गेंदे के फूल के विशाल ढेर लगे हैं। ऐसा लग रहा है मानो रात में फूलों का बाजार सज गया हो रेलवे प्लेटफार्म पर। हां फूलों का बाजार  ही तो है। पर पूछने पर ये पता चला कि यह तो हर रोज का नजारा है। दरअसल रेवाड़ी और उसके आसपास के गांव में बड़े पैमाने पर फूलों की खेती होने लगी है। इन फूलों को संग्रहित करके रोज दिल्ली के खारी बावली की फूल मंडी में भेजा जाता है। मैंने किसी जमाने में वाराणसी में बांस फाटक का फूल बाजार देखा था। रेवाड़ी स्टेशन के प्लेटफार्म पर इन फूलो के ढेर के साथ मौजूद व्यक्ति ने बताया कि लोकल ट्रेन से ये फूल दिल्ली भेजे जाते हैं। शादी विवाह के मौसम में फूलों की मांग और बढ़ जाती है। रेवाड़ी जिले में गेंदे की खेती का क्षेत्रफल हर साल बढ़ रहा है। यह साल 2017 में 300 हेक्टेयर से ऊपर पहुंच चुका था। 


किसानों को फूलों की खेती से लाभकारी मूल्य मिल रहा है। इसलिए काफी किसान परंपरागत खेती छोड़कर फूलों की खेती को अपना रहे हैं। ये खुशबू का कारोबार है जो मुनाफा दिला रहा है। रेवाड़ी में गुलाब और गेंदे के फूलों की खेती होती है। त्योहारी सीजन में तो फूलों की कीमतें दोगुनी हो जाती हैं। आम दिनों में 50 से 60 रुपये किलो बिकने वाले फूल त्योहार के मौके पर 100 रुपये किलो तक हो जाते हैं।
तो फूलों पर एक शायरी याद आती है...
जिंदगी है बहार फूलों की
दास्तां बेशुमार फूलों की
तुम क्या तस्सवुर में
आई खुशबू हजार फूलों की...

मुझे रात में रेवाड़ी में ही रुकना है तो रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर पहला जो होटल दिखाई देता है उसमें कमरा बुक करके ठहर जाता हूं। इसके बाद रात्रि भोजन के लिए निकल गया। कुछ होटलों के मीनू देखने के बाद एक भीड़ भाड़ वाले ढाबे में खाने के लिए बैठ गया। थाली आर्डर की। खाने के बाद काउंटर पर जब पैसे देने आया तो अचानक वेटर पीछे दौड़कर आया। भाई साहब ये मोबाइल आपका  है क्या। मैं चौंका । हां मेरा ही है। दरअसल खाने के बाद मैं अपना फोन अपनी कुरसी पर छोड़ आया था। वेटर की इमानदारी और जागरूकता से मेरा फोन मिल गया। उन्हें दिल से धन्यवाद।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(ALWAR TO REWARI, FLOWERS )