Tuesday, December 11, 2018

अलवर में मोती डूंगरी, रेलवे स्टेशन और फतेह गुंबज

कंपनी बाग से निकल कर मैं पैदल चलता हुआ मोती डूंगरी की तरफ बढ़ रहा हूं। कंपनी बाग के एक कोने में अमर जवानों की समाधि दिखाई देती है। यह सेना के विभिन्न ऑपरेशन में शहीद होने वाले अलवर के फौजियों की याद में बनी समाधि है। यहां पर शहीदों की एक लंबी सूची भी लगी है। मतलब साफ है कि अलवर क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग फौज में भर्ती होते हैं। मैं उन शहीदों को नमन करके आगे बढ़ जाता हूं।

मोती डूंगरी अलवर शहर का पॉश इलाका है। इस इलाके में एक उद्यान वाले होटल स्वरूप विलास में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा है। हां, जनवादी लेखक संघ राजस्थान का सम्मेलन चल रहा है। मैं थोड़ी देर के लिए उस आयोजन में शामिल हो जाता हूं। इसके बाद फिर आगे की ओर। सामने मोती डूंगरी चिल्ड्रेन पार्क नजर आता है। बच्चों का सुंदर पार्क। मोती डूंगरी ऊंची पहाड़ी पर बना एक किला है। इस किले के निर्माण की प्रेरणा स्कॉटलैंड के महल से मिली। इस पहाड़ी पर एक गणेश मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण कराया गया है। मोती डूंगरी पार्क में अलवर के एक राजा जय सिंह प्रभाकर की विशाल प्रतिमा लगी है। उनका जन्म विनय विलास पैलेस में 14 जून 1882 को हुआ था। उन्हें आधुनिक अलवर का निर्माता माना जाता है। उनका निधन 19 मई 1937 को पेरिस में हुआ था।
मोती डूंगरी के टॉप से रात को अलवर शहर का बड़ा सुंदर नजारा दिखाई देता है। मोती डूंगरी में सूफी संत सैय्यद बाबा की मजार भी है। इस मजार पर महिलाओं को जाने की मनाही है। क्यों पता नहीं। मोती डूंगरी इलाके में कुछ अच्छे होटल भी हैं।
मैं अब मोती डूंगरी से वापस रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा हूं। अलवर शहर का रेलवे स्टेशन साफ सुथरा दिखाई देता है। स्टेशन का भवन एक मंजिला ही है पर लंबा चौड़ा है। स्टेशन की दीवारों पर सुरुचिपूर्ण ढंग से राजस्थानी पेंटिंग की गई हैं। पर स्टेशन के आसपास कोई आवासीय होटल नहीं है। मेरी ट्रेन में अभी देर है। अचानक स्टेशन के उस पर मेरी नजर एक ऐतिहासिक इमारत पर पड़ती है। मैं स्टेशन को फुटओवर ब्रिज से पार करके उस पार पहुंच जाता हूं।

मैं फतेह गुंबज के सामने खड़ा हूं। यह स्मारक फतेह जंग जो मुगल सम्राट शाहजहां का एक मंत्री था उसको समर्पित है। उसका संबंध अलवर के खानजादा शासकों से था। गुंबज के शीर्ष पर उर्दू और फारसी में आलेख लिखा है। बलुआ पत्थर से बने इस भवन में कुल पांच मंजिलें हैं। इसका डिजाइन मुगल और राजपूत शैली का मेल दिखाई देता है। गुंबज परिसर में सुंदर उद्यान बना हुआ है। यह स्मारक सुबह 10 बजे से शाम 4.30 बजे तक ही खुला रहता है। 


स्मारक का विशाल भवन रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज से दिखाई देता है। यह स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार के उल्टी तरफ स्थित है। फतेह गुंबज देखने के बाद मैं फिर से रेलवे स्टेशन लौट आया हूं। अब मुझे अपनी अगली ट्रेन का इंतजार है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( MOTI DUNGRI, ALWAR, FATEH GUMBAJ ) 
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