Sunday, December 30, 2018

सिटी पैलेस उदयपुर – मेवाड राजाओं की समृद्ध विरासत के रंग


जगदीश मंदिर और लेक पिछोला तो हमारे होटल के आसपास ही हैं। उदयपुर शहर के बाकी स्थलों के दर्शन के लिए हमने एक आटो रिक्शा बुक कर लिया है। आटो वाले का नाम सज्जाद अहमद है (फोन- 7014638747 ). आटो वाले ने बताया कि हमारा पहला पड़ाव सिटी पैलेस होगा।

 तो हम फिलहाल चल पड़े हैं सिटी पैलेस की ओर। सिटी पैलेस में प्रवेश के लिए दो द्वार हैं। एक द्वार जगदीश मंदिर के पास है। पर हमारा आटो रिक्शा दूसरे द्वार के पास ले गया है। जगदीश मंदिर के पास वाले गेट पर पार्किंग का इंतजाम नहीं है।
राजस्थान के ज्यादातर शहर हिंदू राजाओं द्वारा बसाए गए हैं। पर यूपी बिहार में ऐसे उदाहरण कम हैं। राजस्थान के शहरों के नाम देखिए जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, नवलगढ़, रतनगढ़ आदि नाम राजाओं से जुड़े हैं। 
उदयपुर सिटी पैलेस से पहले कार म्युजियम। 

तो उदयपुर शहर को महाराजा उदय सिंह द्वितीय ने बसाया था। 1559 में महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने मेवाड़ राज्य की नई राजधानी के रूप में स्थापित किया था। जब उदयपुर नहीं बसाया गया था, उस से पहले तक मेवाड़ की राजधानी आहाड़ में हुआ करती थी। वह भी एक एक समृद्ध व्यापारिक शहर हुआ करता था। मेवाड़ राजाओं के राजस्थान में तीन प्रमुख किले हैं। चित्तौड़गढ़, उदयपुर और कुंभलगढ़।

उदयपुर का सबसे प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है सिटी पैलेस। यह महल के साथ विशाल संग्रहालय भी है। इसे घूमने के लिए कम से कम तीन घंटे का समय चाहिए। मेवाड़ राजवंश के वर्तमान उत्तराधिकारी अरविंद सिंह मेवाड़ भी इसी सिटी पैलेस के एक हिस्से में रहते हैं।

तो बात करें टिकट की तो सिटी पैलेस म्युजियम का प्रवेश टिकट 300 रुपये का है। सिर्फ गेट के अंदर जाने का टिकट 30 रुपये का है। किले में एक सरकारी संग्रहालय भी है। उसका टिकट 20 रुपये का है। अगर क्रिस्टल गैलरी देखना चाहते हैं तो उसका टिकट 700 रुपये का है। अगर पैलेस के रेस्टोरेंट में भोजन करना चाहें तो 250 रुपये का कूपन लेना पड़ेगा। सिटी पैलेस से जुडा राज परिवार के पुराने कारों का एक संग्रहालय भी है इसके लिए भी अलग से टिकट है।

सिटी पैलेस पिछोला झील के किनारे स्थित हैं। इसमें बड़ी बालकोनी से शहर को देखना और महल के टावरों झील का नजारा करना बड़ा सुखद है। यह परिसर चार प्रमुख और कई छोटे महलों समूह है।  महल के मुख्य भाग संग्रहालय में प्राचीन कलाकृतियों का विशाल संग्रह है। साथ ही मेवाड़ वंश का पूरा परिचय भी आप यहां पा सकते हैं। महाराणा प्रताप की बहादुरी की दास्तान आप यहां देख सुन और समझ सकते हैं।

1911 में हुए दिल्ली दरबार में मेवाड के राजा ने हिस्सा नहीं लिया था। लिहाजा उनकी कुरसी खाली रह गई थी। मेवाड़ के राजा की वह कुर्सी यहां देखी जा सकती है। संग्रहालय में वाद्य यंत्रों, पेंटिंग, किरासन तेल से चलने वाला पंखा जैसे कुछ अनूठे संग्रह देखे जा सकते हैं।

होटल लेक पैलेस : सिटी पैलेस के सामने लेक पिछोला के बीच मे होटल लेक पैलेस स्थित है। इस होटल को पहले जग निवास महल कहा जाता था और एक ग्रीष्मकालीन महल था। जग मंदिर पैलेस का निर्माण 1743 और 1746 के बीच हुआ था। इसमें काले और सफेद पत्थरों दीवारों सुंदर रूप दिया गया है। अब यह दुनिया के प्रसिद्ध हेरिटेज होटल में शामिल है। तमाम फिल्मी सितारे और विदेशी नागरिक इसमें आकर रहने को शान समझते हैं। सन 1965 में देवानंद अपनी फिल्म गाइड की शूटिंग करने आए तो लेक पैलेस में अपनी टीम के साथ रुके थे। तब उनके साथ अंग्रेजी की लेखिका पर्ल एस बक भी थीं जिन्होंने अंग्रेजी में बनी गाइड की स्क्रीन प्ले लिखी थी। 


जग मंदिर पैलेस -  जग मंदिर पिछोला झील में एक द्वीप पर निर्मित महल है। इसे लेक गार्डन पैलेसभी कहा जाता है, इस के लिए निर्माण 1551 में शुरू हुआ और 1652 पूरा हुआ था। शाही परिवार ने यह महल अपने गर्मियों के दिन में शीतलता पाने के लिए कराया था। बाद में इसका इस्तेमाल पार्टियों की मेजबानी के लिए किया जाने लगा। जब सम्राट जहांगीर के खिलाफ विद्रोह करने वाले राजकुमार खुर्रम ( बाद में सम्राट शाहजहां)  ने यहां आश्रय लिया था। कहा जाता है कि इसी महल से ताजमहल बनाने की प्रेरणा शाहजहां को मिली।  

सिटी पैलेस परिसर को देखकर महसूस होता है कि मेवाड़ राजवंश के उत्तराधिकारी अपनी विरासत से व्यवसाय करना बखूबी जानते हैं। पैलेस से जुड़े हर संग्रह का टिकट काफी महंगा है। इसके अलावा पैलेस में समय समय पर व्यवसायिक आयोजन होते रहते हैं। पैलेस में एक हैंडीक्राफ्ट बाजार और पुस्तकों की दुकान भी है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य Email: vidyutp@gmail.com
(CITY PALACE, UDAIPUR, LAKE PALACE, JAG MANDIR PALACE ) 

Friday, December 28, 2018

उदयपुर – हिंदी फिल्मकारों की सदाबहार पसंद


अगर कोई ये पूछे कि मुंबई के बाद फिल्मकारों के लिए फिल्मों की शूटिंग के लिए सबसे पसंदीदा जगह कौन सी है तो हो सकता है इसका उत्तर उदयपुर ही हो। कई दशकों से उदयपुर और इसके आसपास के इलाके फिल्मकारों की पसंद रहे हैं।
देवानंद की कालजयी फिल्म गाइड (1965) को याद करें। इसकी अधिकतम हिस्सों की शूटिंग उदयपुर और इसके आसपास के इलाकों में हुई है। देव अपने सैलानियों को उदयपुर की गलियों में घूमाते हुए शहर की विशेषताएं बताते हैं। गाइड की शूटिंग चित्तौड़गढ़ में भी हुई। गाइड के जमाने में यहां मीटर गेज रेल आती थी। गाइड के रेलवे स्टेशन के नजारों में मीटर गेज रेल देखी जा सकती है।


इसके ठीक बाद 1966 में आई राज खोसला की फिल्म मेरा साया के अधिकांश हिस्सों की शूटिंग उदयपुर में ही हुई। इस फिल्म में लेक पैलेस होटल और सहेलियों की बाड़ी के नजारे देखे जा सकते हैं। फिल्म में सुनील दत्त और साधना सिवदासानी मुख्य भूमिका में थे। मेरा साया साथ होगा...गीत में भी सहेलियों की बाड़ी के नजारे दिखाई देते हैं।

सन 1983 में आई हॉलीवुड फिल्म आक्टोपुसी की शूटिंग उदयपुर में हुई। यह जेम्स बांड सीरिज की फिल्म थी। इसमें रोजर मूर थे। फिल्म की शूटिंग जगमंदिर पैलेस में हुई।  
 साल 1983 में शशि कपूर की एक फिल्म हिट एंड डस्ट को याद करें। यह एक विदेशी फिल्म थी। इसमें शशि के जूली क्रिस्टी थीं। इस फिल्म में लेक के आसपास के सुंदर नजारे हैं।

सन 1991 में आई रेखा और रजनीकांत की फिल्म फूल बने अंगारे की पूरी शूटिंग उदयपुर में हुई। केसी बोकाडिया की इस फिल्म में जल महल, दिल्ली गेट, स्वरूप सागर लेक, जगदीश मंदिर आदि के नजारे देखे जा सकते हैं।
साल 1992 में आई खुदा गवाह जो अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की फिल्म थी। इसकी शूटिंग उदयपुर और आसपास के अलावा अफगानिस्तान और नेपाल में की गई थी। यह एक बड़े बजट की भव्य फिल्म थी।

साल 2001 में सुभाष घई ने यादें बनाई। हालांकि ये फिल्म ज्यादा नहीं चल पाई थी। पर इसकी शूटिंग उदयपुर के अलावा विदेशों में मलेशिया और ब्रिटेन में की गई थी। फिल्म में करीना कपूर और ऋतिक रोशन थे।

साल 2006 में आई एक और हालीवुड फिल्म की शूटिंग उदयपुर में हुई। द फॉल के निर्देशक तरसेम सिंह थे। इसकी शूटिंग लेक पैलेस होटल में हुई। इसका विश्व भर में प्रदर्शन किया गया था। फिल्म ने अच्छी कमाई की थी। साल 2007 की फिल्म एकलव्य की शूटिंग उदयपुर के पास देवीगढ़ में हुई।यह विधु विनोद चोपड़ा की एक थ्रिलर फिल्म थी।

साल 2007 की एक और फिल्म धमाल में भी उदयपुर के नजारे देखने को मिले। इंद्र कुमार की यह मल्टी स्टारर कामेडी फिल्म थी। इसकी शूटिंग सज्जनगढ़ किला और बड़ी ताल में की गई।

द चीता गर्ल्स 2008 की फिल्म थी। डिज्नी द्वारा निर्मित इस फिल्म की कहानी में कुछ लड़कियों का दल भारत के दौरे पर आता है। इस फिल्म में दिल्ली गेट, दूध तलाई, सज्जनगढ़ के नजारे हैं।

और आगे बढ़ते हैं। साल 2013 में आई फिल्म ये जवानी है दीवानी में कुछ नजारे उदयपुर के हैं। इसमें रणबीर कपूर दीपिका पादुकोण के साथ उदयपुर के गणगौर घाट, बड़ी लेक, उदयविलास और सिटी पैलेस की शूटिंग है।     
दीपिका पादुकोण की 2013 की एक और फिल्म गोलियों की रासलीला रामलीला में उदयुपर के तमाम नजारे हैं। रणबीर सिंह की इस फिल्म में गणगौर घाट, हनुमान घाट, सिटी पैलेस आदि की शूटिंग है।
राजश्री प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित साल 2015 में आई सलमान की प्रेम रतन धन पायो की शूटिंग फतेहगढ़, कुंभलगढ़ के किले और जगमंदिर पैलेस में हुई। तो उदयपुर के लोग हर साल अपने आसपास फिल्मी सितारों को देखते हैं।
साल 2016 की फिल्म मिर्जा में राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने जोधपुर के नजारे फिल्माए। यह मिर्जा साहिबा की प्रेमकथा पर आधारित फिल्म थी।


अब बात साल 2018 की फिल्म धड़क की।  20 जुलाई 2018  को प्रदर्शित इस फिल्म में श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर और इशांत खट्टर मुख्य भूमिका मे है। पूरी फिल्म उदयपुर के बैकड्राप में ही चलती है। आखिर फिल्मकारों को क्यों इतना लुभाता है उदयपुर। ये तो आप उदयपुर घूमें तो आप भी महसूस कर सकते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( UDAIPUR CITY AND HINDI FILMS, GUIDE, MERA SAYA, DHADAK ) 

Wednesday, December 26, 2018

जगदीश मंदिर – भगवान विष्णु का जागृत मंदिर

जगदीश मंदिर पुराने उदयपुर शहर के मध्य में स्थित एक विशाल मंदिर है। जगदीश मंदिर को मूलत जगन्नाथराय का मंदिर भी कहते है। इसका निर्माण 1652 में पूरा हुआ था। उदयपुर के महाराणा जगत सिंह प्रथम ने इस भव्य मंदिर का निर्माण किया था। इसके निर्माण में कुल 25 साल लगे थे।

सपने में आए जगन्नाथ जी -  कहा जाता है कि महाराजा जगत सिंह की जगन्नाथ पुरी के विष्णु भगवान में अखंड आस्था थी। एक दिन सपने में उन्हें विष्णु भगवान ने कहा कि तुम मेरा मंदिर उदयपुर में बनवाओ मैं वहीं आकर निवास करूंगा। इसी सपने के बाद इस मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर आधार तल से 125 फीट ऊंचाई पर है। इसका शिखर 100 फीट ऊंचा है। 


मंदिर में कुल 50 कलात्मक स्तंभ हैं। इस मंदिर में जो प्रतिमा स्थापित है वह राजस्थान के डूंगरपुर के पश्वशरण पर्वत से लाई गई थी। गर्भ गृह में काले पत्थर की सुंदर विष्णु प्रतिमा स्थापित की गई है। इस मंदिर को जागृत मंदिर माना जाता है। ऐसा माना जाता है साक्षात जगदीश यहां वास करते हैं।

नागर और पंचायत शैली - शिखर और गर्भ गृह के लिहाज से यह नागर शैली में बना मंदिर है। मंदिर परिसर में छोटे छोटे कई मंदिरों का निर्माण कराया गया है, जो पंचायतन शैली का उदाहरण है। मंदिर परिसर में एक शिलालेख भी है जो गुहिल राजाओं के बारे में जानकारी देता है। मंदिर का प्रबंधन देवस्थानम विभाग राजस्थान सरकार के अधीन है।

यह मंदिर मारू-गुजराना स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। नक्काशीदार खंभे, सुंदर छत और चित्रित दीवारों के साथ यह मंदिर एक चमत्कारी वास्तुशिल्प की संरचना प्रतीत होती है। यह मंदिर एक ऊंचे विशाल चबूतरे पर निर्मित है।  मुख्य चौराहे से तीन मंजिल के बराबर सीढ़ियां चढ़कर आप मंदिर में प्रवेश करते हैं। मंदिर के बाह्य हिस्सों में चारों तरफ अत्यन्त सुंदर नक्काशी का काम किया गया है, जिसे देशी विदेशी सैलानी घंटो निहारते रहते हैं। इसमें गजथर, अश्वथर तथा संसारथर को प्रदर्शित किया गया है।

सन 1736 में मुगल बादशाह औरंगजेब के आक्रमण के समय मंदिर का अगला हिस्सा टूट गया। इसके गजथर के कई हाथी तथा बाहरी द्वार के पास का कुछ भाग आक्रमणकारियों ने तोड़ डाला था। उस आक्रमण के दौरान मंदिर की सुरक्षा में नियुक्त नारुजी बारहट बहादुरी से अपने 20 साथियों के संग लड़े और शहीद हो गए।  बाद में महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने फिर से मंदिर की मरम्मत कराई। मंदिर में खंडित हाथियों की पंक्ति में भी नए हाथियों को यथा स्थान लगा दिया गया।

जगदीश मंदिर उदयपुर में यह पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। वहीं स्थानीय लोगों की बीच भी यह शहर का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। वैसे तो उदयपुर शहर में हर गली में मंदिर हैं पर खास मौकों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जगदीश मंदिर की ओर उमड़ती है।

गरीबों के लिए अन्नदान – जगदीश मंदि प्रबंधन की ओर से हर रोज गरीब लोगों और साधुओं के लिए अन्नदान का इंतजाम है। इसमें गरीबों को सुस्वादु भोजन कराया जाता है। श्रद्धालु लोग इस लंगर व्यवस्था के लिए दान देते हैं।

मंदिर खुलने का समय – प्रातः 5 बजे से दोपहर ढाई बजे तक मंदिर खुला रहता है। फिर शाम 4 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक तक खुलता है। वहीं शीतकाल में मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है और रात्रि 10 बजे बंद हो जाता है।
-        माधवी रंजना 
( JAGDISH TEMPLE, UDAIPUR, RAJSTHAN, MAHARAJA JAGAT SINGH) 


Monday, December 24, 2018

हेरिटेज हवेली में तीन दिन और लेक पिछोला का नजारा

हमारा आटोरिक्शा पुराने उदयपुर की सड़कों पर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है। इन्हें सड़क न कहकर गलियां कहें तो अच्छा होगा। जगदीश मंदिर के आगे रास्ता और संकरा हो गया है। 

हम पुराने उदयपुर में लेक पिछोला के सामने पहुंच गए हैं। गणगौर घाट के आगे एक वाकिंग ब्रिज है। मतलब झील पर एक ऐसा पुल जिस पर पैदल यात्री ही आर पार जा सकते हैं। इसी के आगे हमें होटल हेरिटेज हवेली का बोर्ड दिखाई दे गया। एक पुराने दरवाजे से अंदर जाने पर बड़ा सा आंगन है। इस आंगन के चारों तरफ कई लोगों के घर हैं। इनमें से ही एक घर को गेस्ट हाउस में बदल दिया गया है। नीचे रिसेप्शन पर रिपोर्ट करने के बाद हमें हमारे कमरे की ओर पहुंचाया गया। पतली घुमावदार सीढियां। दूसरी मंजिल पर कमरा। कमरे में एक डबल बेड के अलावा खिड़की के पास बने पक्के चबूतरे पर तीसरा बेड लगा दिया गया है। अनादि ने वह बेड कब्जा कर लिया। 

कमरे में विशाल खिड़की है जिससे झील का नजारा दिखाई देता है। कमरे के दरवाजे बाबा आदम वाले हैं। डबल डूर वाले दरवाजे और बंद करने के लिए सांकल। अनादि के लिए ये पुरानी चीजें कुछ नई थीं। हमारे अगले तीन दिन इस होटल में काफी अच्छे गुजरे। होटल में एक रुफ टॉप रेस्टोरेंट भी है। बड़ा सजा संवरा रेस्टोरेंट है। इसमें झूले भी लगे हैं। खाने की टेबल से झील का नजारा दिखाई देता है। पर होटल का रसोईया छुट्टी पर है इसलिए रेस्टोरेंट बंद पड़ा है। हालांकि होटल वाले हमें चाय उपलब्ध करा रहे हैं। आरओ का पानी निःशुल्क उपलब्ध है। अगले दिन होटल के केयर टेकर नदीम भाई से मुलाकात हुई। उन्होने बताया कि हमने विजयादशमी के दिन एक और नया लग्जरी होटल बना लिया है।

अगर आप उदयपुर शहर की प्राचीनता और उसके सौंदर्य को करीब से महसूस करना चाहते हैं तो आपको पुराने उदयपुर की गलियों में बने होटलों में ही रुकना चाहिए। वैसे तो रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के आसपास भी अच्छे होटल उपलब्ध हैं। पर पुराने उदयपुर यानी लेक पिछोला के आसपास के होटलों में देसी विदेशी सैलानियों का सालों भर जमावड़ा लगा रहता है। इनमें से कई होटल सुबह-सुबह योगासान की कक्षाएं भी लगाते हैं। यहां नजारा कुछ कुछ जोधपुर और वाराणसी की गलियों से मिलता जुलता है। विदेशी सैलानी साइकिल किराये पर लेकर सुबह-सुबह उदयपुर की गलियों में घूमना पसंद करते हैं। वैसे खाने पीने रहने के लिहाज से देखें तो पुराना उदयपुर थोड़ा महंगा है। पर शहर की खुशबू यहीं है।

उदयपुर में क्या क्या देखें -  तो अब जान लेते हैं कि उदयपुर शहर में क्या कुछ देखने-घूमने लायक है - लेक पिछोला, फतेह सागर झील, जगदीश मंदिर, सिटी पैलेस, जगमंदिर पैलेस, बागोर की हवेली, भारतीय लोक कला मंडल, सहेलियों की बाड़ी, दूध तलाई के पास करणी माता का मंदिर, नीमच माता का मंदिर, सज्जनगढ़ का मानसून पैलेस, सज्जनगढ़ में बोटानिकल गार्डन आदि आप शहर की सीमा में देख सकते हैं।

शहर के आसपास आप सास बहु का मंदिर, एक लिंगी मंदिर, नाथद्वारा, हल्दीघाटी, कुंभलगढ़ फोर्ट और रणकपुर जैन मंदिर, चार भुजा मंदिर आदि देखने जा सकते हैं। यहां कम से कम तीन दिन रहने का कार्यक्रम बनाएं तो अच्छा रहेगा।

उदयपुर में सैलानी सालों भर आते हैं। राजस्थान के अन्य शहरों की तुलना में यहां का मौसम सुहाना रहता है। इसलिए लोग उदयपुर को राजस्थान का कश्मीर भी कहते हैं। पर हम यहां इतनी देर से क्यों आए। तो इसका उत्तर है कि मेरी कोशिश उन स्थलों की सैर करने की रहती है जहां अभी कम लोग पहुंचे हैं। पर राजस्थान की बात हो तो बिना उदयपुर के कैसे हो सकती है बात।

-विद्युत प्रकाश मौर्य- ईमेल -vidyutp@gmail.com
(UDAIPUR, HERITAGE HAWELI, GANGAUR GHAT, LAKE PICHOLA ) 

Saturday, December 22, 2018

दिल्ली से झीलों के शहर उदयपुर की ओर

इस बार दसहरे की छुट्टियों में हमने सैर की छोटी योजना बनायी। पूरे परिवार के साथ। दिल्ली से उदयपुर, माउंट आबू और जोधपुर होते हुए दिल्ली वापसी। राजस्थान का यही शहर है उदयपुर जहां हमारा जाना अभी तक हुआ नहीं था। मुख्य रूप से दिल्ली से उदयपुर जाने के लिए दो रेलगाड़ियां चलती हैं। मेवाड़ एक्सप्रेस और चेतक एक्सप्रेस। हमारा आरक्षण मेवाड़ एक्सप्रेस में है। हमलोग नियत समय से पहले हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुंच गए। ट्रेन के लिए एक घंटे के इंतजार में ये देखा कि प्लेटफार्म नंबर 6-7 पर कहीं बैठने की बेंच नहीं नजर आ रही हैं। तो प्लेटफार्म पर नीचे बिछाकर बैठने के लिए बुक स्टाल पुराना अखबार भी पांच रुपये में खरीदना पड़ा। खैर हमारा कोच जहां हम बैठे थे ठीक उसके सामने ही आकर लगा। 

माधवी को बहुत दिनों बाद स्लीपर क्लास में बैठने का मौका मिला था। कई बार वे स्लीपर क्लास की गंदगी देखकर भन्ना उठती हैं। पर मेवाड़ एक्सप्रेस ने नाराज होने का मौका नहीं दिया। हमलोग घर से खाना बनाकर पैक करके चले थे। तो डिनर करके सोने की तैयारी करने लगे। हमारे आसपास दिल्ली के शिक्षकों का एक बड़ा समूह जा रहा है जो उदयपुर –चितौड़गढ की सैर करने जा रहा है। तो हमारे समाने वाले मास्टर जी सरल सीधे सादे सज्जन हैं पर पर उनकी बीवी चुस्त है। सुबह हुई तो हम चितौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर थे। मास्टर जी वाला समूह यहीं उतर गया। यहां  से उदयपुर की दूरी 110 किलोमीटर है। मैं चित्तौड़गढ़ पहले घूम चुका हूं। अगला स्टेशन कापसान है। यहां काफी लोग उतर गए। 

कापसान में एक पीर बाबा की मजार है। तो यहां काफी लोग आते हैं। अगला स्टेशन मावली जंक्शन है। इसके सूरज चढ़ रहा है और हमलोग झीलों के शहर के करीब पहुंचते जा रहे हैं। उदयपुर सिटी एक साफ सुथरा रेलवे स्टेशन है। हमारी गाड़ी प्लेटफार्म नंबर एक पर आकर लग गई है। उदयपुर घूमने आई कुछ बालाएं बड़ी नाजो अदा के संग स्टेशन के नाम के साथ अपनी तस्वीरें खिचवां रही हैं। तो भला हम क्यों पीछे रहे हैं। 

उदयपुर सिटी के साथ हमारी भी तस्वीर होनी चाहिए। इस सजे संवरे रेलवे स्टेशन पर बहुत कम रेलगाड़ियां ही यहां रोज आती हैं। स्टेशन के आसपास नया शहर बसा हुआ है। इधर नए नए होटल बने हैं। पर हमारा होटल पुराने उदयुपर में हैं। 

एक दिन पहले दिल्ली मे ही होटल हेरिटेज हवेली के केयर टेकर नदीम भाई का फोन आ गया था। उन्होने कहा था स्टेशन से उतर कर आटो रिक्शा ले लिजिएगा। उन्होने होटल का लोकेशन भी बताया था लेक पिछोला में वाकिंग ब्रिज के पास है ये होटल जगदीश मंदिर से थोड़ा आगे। हमने कुरता पायजमा और लंबी दाढ़ी में अवतरित हुए एक बुजुर्ग मुस्लिम आटो रिक्शा वाले को होटल का पता बताया। वे बोले 80 रुपये। मैंने कहा ठीक है चलिए। पर इससे पहले उदयपुर रेलवे स्टेशन की कुछ तस्वीरें और सेल्फी तो हो जाए।

स्टेशन के बाहर महाराणा प्रताप की तस्वीर लगी है। स्टेशन भवन पर हल्दीघाटी युद्ध के रेखा चित्र बने हैं। उदयपुर रेलवे स्टेशन से निकलकर शहर को निहारते हुए अब हम पुराने उदयपुर शहर की ओर बढ़ रहे हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(UDAIPUR, RAJSTHAN, MEWAR EXPRESS ) 



Thursday, December 20, 2018

कोटला का किला – क्या यहां जिन्न रहते हैं...

कोटला जो कभी दिल्ली का पांचवां शहर था...
दिल्ली के आईटीओ के पास स्थित है कोटला का किला। आईटीओ से दिल्ली गेट की ओर जाते हुए दाहिनी तरफ अंदर जाकर आप किले के प्रवेश द्वार पर पहुंच सकते हैं। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक है। किले में प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है। किले का दायरा बहुत बड़ा नहीं है। एक घंटे में आप पूरा किला घूम सकते हैं।  

फिरोज शाह कोटला दिल्ली का एक किला है, जिसे 1360 में फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था। तब उसने नगर का नाम दिया था फिरोजाबाद। उस समय यह दिल्‍ली का पांचवे शहर था। किले के अवशेषों के साथ - साथ जामा मस्जिद और अशोक स्‍तम्‍भ के बचे अवशेष भी फिरोजाबाद में स्थित हैं। फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली के फिरोजबाद के अलावा पंजाब का फिरोजपुर, हरियाणा का फतेहाबाद, हिसार और यूपी में जौनपुर जैसे नगर बसाए थे। उसने कुल 300 नए शहरों की स्थापना की थी।

फिरोज शाह तुगलक अपने चाचा मुहम्मद बिन तुगलक से राज-गद्दी छीनने के बाद 1354 में फिरोज शाह कोटला किले का निर्माण शुरू करवाया था। फिरोज शाह ने ये किला इसलिए भी बनवाया था क्योंकि तुगलकाबाद के किले में पानी की समस्या हो गई थी। तब वह यमुना के किनारे आया।  किले के अंदर सुंदर उद्यानों, महलों, मस्जिदों और मदरसों का निर्माण किया गया था, यह राजधानी का शाही गढ़ था।


खास आकर्षण है अशोक स्तंभ - फिरोजशाह कोटला किले का खास आकर्षण है अशोक स्तंभ। यह स्तंभ एक तीन मंजिला पिरामिड नुमा इमारत के ऊपर स्थापित है। यह स्तंभ 13 मीटर ऊंचा है। इसे हरियाणा के अंबाला के पास के टोपरा गांव से उखाड़कर यहां लाकर स्थापित कराया गया था। इस स्तंभ पर लेखन भी है। पर इसे अंबाला से दिल्ली कैसे लाया गया। यह थोड़ा आश्चर्य जनक है। बताया जाता है कि इसे यमुना में जल मार्ग से दिल्ली लाया गया था। फिर इसे तीसरी मंजिल पर पहुंचा कर स्थापित कैसे किया गया होगा यह देखकर भी अचरज होता है। 

फिरोजशाह तुगलक को भारत का अंतिम मुस्लिम शासक माना जाता है। उसे इतिहास में बड़े प्रशासनिक सुधारों और विकास कार्यो के लिए याद किया जाता है। क्या आपको पता है कि वह दीपालपुर की हिंदू राजकुमारी का पुत्र था।

क्या भुतहा है फिरोजशाह कोटला का किला - कोटला फिरोजशाह एक खंडहर सा किला है। कहा जाता है कि यहां कई रहस्यमयी जिन्न रहते हैं, जो उनको मानने वालों की मुराद भी पूरी करते हैं। फिरोज शाह कोटला में सबसे ज्यादा चर्चित जिन्न है 'लाट वाले बाबा' जो बाकी जिन्नों के मुखिया हैं।
आसपास से लोग यहां आते हैं, जो कई बार अपने सबसे गहरे और डरावने राज को साझा करते हैं। इतना ही नहीं यहां कई लोग झाड़-फूंक करवाने भी आते हैं जिन्हें लगता है कि उनके ऊपर किसी बाहरी ताकत का साया है कोई शैतानी ताकत उनपर हुकुम चला रही है। जब हमलोग यहां पहुंचे तो कई औरतें रो रो कर इन जिन्नों से गुहार लगाती हुई नजर आईं। काफी लोग यहां अपनी समस्याएं लेकर आते हैं और खत लिखकर छोड़ जाते हैं। इन सबको देखकर काफी लोग कहते हैं कि ये किला भुतहा है।

कई लोग ये भी कहते हैं कि कोई अकेली लड़की इस किले के हर हिस्से का दौरा नहीं कर सकती। कहा जाता है कि यहां के जिन्न सुंदर महिलाओं को अपने वश में कर लेते हैं इसलिए अकेली महिलाएं यहां जाने से कतराती हैं।

क्या क्या देखें – किले अंदर मुख्य रूप से आप फिरोजशाह कोटला किला, अशोक का स्तंभ, मस्जिद और बाउली (सीढ़ी युक्त कुंआ ) देख सकते हैं। किले के पिछले हिस्से से दिल्ली का रिंग रोड और इंदिरा गांघी इंडोर स्टेडियम नजर आता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( FIROZSHAH TUGLAK, FORT, KOTALA, ASHOKA PILLAR ) 
कोटला में सम्राट अशोक के स्तंभ के साथ।

Tuesday, December 18, 2018

बहादुरी की सैकड़ो दास्तां सुनाता- दिल्ली का वायुसेना संग्रहालय

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दिल्ली के एयरपोर्ट के पास स्थित वायुसेना का संग्रहालय। भारतीय वायु सेना की बहादुरी की कई कही और अनकही कहानियां सुनाता है। एक दिन समय निकालिए कुछ घंटे और जानिए समझिए हमारी वायुसेना की ताकत को। उनके अतीत के गौरव को। खास तौर यहां वायु सेना द्वारा स्वतंत्रता के बाद हुए युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कई लड़ाकू विमानों को देखा जा सकता है। कुछ विमान क्षतविक्षत अवस्था में हैं तो कुछ काफी चालू हालत में भी हैं।

सुखोई के साथ। 
यहां हैंगर में 15 विभिन्न प्रकार के सैन्य वायुयान खड़े हैं जो 08 अक्तूबर 1932 को वायु सेना के गठन के समय से ही सेना की रीढ़ की हड्‌डी रहे हैं। इनमें 1929 में खैबर दर्रे से गुजरने वाला पहला वायुयान वेस्टलैण्ड भी है। वेस्टलैण्ड लाईसैण्डर (लिजिक), हॉकर हरीकेन, हॉकर टेम्पेस्ट तथा वाइकर्स स्पिटफायर ने द्वितीय विद्गवयुद्ध के दौरान तबाही मचाई थी।

पालम स्थित वायु सेना संग्रहालय में एक एनैक्सी है जिसमें विंग कमांडर (बाद में एयर मार्शल) एस मुखर्जी, ओ बी ई, स्क्वाड्रन लीडर (बाद में एयर कमोडोर) मेहर सिंह, एम वी सी, डी एस ओ, विंग कमांडर (बाद में एयर मार्शल) ए एम इंजीनियर, डी एफ सी तथा एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह, डी एफ सी की भव्य तस्वीरों से सुसज्जित है। ये अफसर भारतीय वायु सेना के अग्रणी थे। संग्रहालय में रखा हुआ वायु सेना का ध्वज एक अप्रैल 1954 को पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा भारतीय वायु सेना को प्रदान किया गया था।

संग्रहालय का दूसरा भाग द्वितीय विश्व युद्ध के पदक विजेता भारतीय अफसरों की तस्वीरों से सजा हुआ है। इन अफसरों ने बड़ी दिलेरी से दुश्मनों की युद्ध मशीनो को तबाह कर दिया तथा अपने उड़ान मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए। 1966 तथा 1971 की लड़ाइयों में पाकिस्तान से जब्त किए गए कुछ छोटे शस्त्र जैसे रिवॉल्वर, पिस्टल आदि तथा वायु सेनाध्यक्ष को भेंट की गई समारोह-किर्च आदि को भी यहां देखा जा सकता है।
एमआई4 हेलीकाॉप्टर। 

वायु सेना से जुड़े देश  दो प्रमुख संग्रहालय हैं। एक संग्रहालय मेघालय की राजधानी शिलांग  हैं तो दूसरा दिल्ली में। आश्चर्य की बात है कि दिल्ली में रहने वाले लोग इतने शानदार संग्रहालय से अनजान हैं। रोज इस बेहतरीन  संग्रहालय को देखने बहुत कम लोग ही पहुंचते हैं।  
ये सब कुछ पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब्त हुआ था

खुलने का समय : प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक। आप वायु सेना संग्रहालय से निकलते समय वायु सेना से जुड़े कई प्रतीक चिन्ह भी खरीद सकते हैं।जैसे वायुसेना की टोपियां, चाबी रिंग और दूसरी उपहार में दी जाने योग्य वस्तुएं। वायुसेना स्टेशन परिसर में एक कैंटीन भी है। भूख लगने पर हल्का फुल्का रिफ्रेशमेंट यहां उपलब्ध है।

दो दिन का अवकाश : सोमवार एवं मंगलवार को संग्रहालय बंद रहता है। यानी बुधवार से रविवार तक आप यहां जा सकते हैं। प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। पर कोई सरकारी पहचान पत्र होना जरूरी है। जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या फिर मतदाता पहचान पत्र।

भारतीय वायुसेना का आदर्श वाक्य
क्या आपको पता है कि भारतीय वायु सेना का आदर्श वाक्य गीता के ग्यारहवें अध्याय से लिया गया है।  - नभः स्पृशं दीप्तम्।
यह महाभारत के महायुद्ध के दौरान कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान श्री क्रष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का एक अंश है। भगवान श्री क्रष्ण, अर्जुन को अपना विराट रूप दिखा रहे हैं। भगवान का यह विराट रूप आकाश तक व्याप्त है जो अर्जुन के मन में भय और आत्म-नियंत्रण में कमी उत्पन्न कर रहा है। इसी प्रकार भारतीय वायु सेना राष्ट्र की रक्षा में वांतरिक्ष शक्ति का प्रयोग करते हुए शत्रुओं का दमन करने का लक्ष्य करती है।

वायु सेना संग्रहालय कैसे पहुंचे -  यह पालम में दिल्ली केंटोण्मेंट इलाके में स्थित है। दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल 1डी से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब आप यहां दिल्ली मेट्रो के मेजेंटा लाइन के सदर बाजार छावनी स्टेशन से भी पहुंच सकते हैं। यहां से संग्रहालय काफी करीब है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

(AIR FORCE MUSEUM, DELHI, AIRPORT, PALAM, SADAR BAZAR CANT METRO, MAGENTA LINE ) 


Monday, December 17, 2018

न्यू महाराष्ट्र सदन में सुबह का नास्ता- बडा पाव और मिसल पाव

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हल्की बारिश में भिंगते हुए सुबह सुबह हमलोग दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित न्यू महाराष्ट्र सदन में पहुंच गए हैं। लोदी गार्डन की सैर के बाद हमारी योजना यहां ब्रेकफास्ट करने की है।


कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित महाराष्ट्र सदन कुछ साल पहले ही अपने नए नवेले रुप में मेहमानों का स्वागत करता है। इसका विशाल हरा भरा भवन काफी भव्यता लिए है। इसके परिसर में प्रवेश करते ही बायीं तरफ महात्मा ज्योतिबा फूले की विशाल बैठी हुई प्रतिमा है। वहीं दाहिनी तरफ डाक्टर आंबेदकर की प्रतिमा है। इन दोनों प्रतिमाओं को देखने और नमन करने कोई भी नागरिक जा सकता है। हालांकि प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मी आपके आने का कारण पूछते हैं। महाराष्ट्र सदन के पोर्टिको में प्रवेश करने के बाद आपको अपना परिचय पत्र दिखाना पड़ता है। भवन के अंदर सिर्फ सरकारी कर्मचारियों और पत्रकारों को ही प्रवेश की अनुमति है। यानी इसकी कैंटीन में खाने का आनंद आम लोग नहीं ले सकते। हां आप किसी मित्र के साथ जा सकते हैं।

प्रवेश द्वार के बाद मुख्य हाल में माता सावित्री बाई फूले की प्रतिमा देखी जा सकती है। यह संयोग है कि देश महान दलित और पिछड़े महानायकों की जन्म स्थली और कार्य स्थली महाराष्ट्र रही है। दिल्ली का महाराष्ट्र सदन उन महानायकों को अपने यहां गर्व से सम्मान पूर्वक स्थान देता है।
महाराष्ट्र सदन की आंतरिक डिजाइन भी सुरुचिपूर्ण है। महाराष्ट्र से आने वाले सांसदों विधायकों का अस्थायी निवास है यह। कैंटीन बिल्कुल सामने है। यह कोई निजी कंपनी ठेके पर चलाती है। पर  अत्यंत साफ सुथरी कैंटीन की सेवाएं अच्छी है।
सुबह के नास्ते में हमने बड़ा पाव, साबुदाना की खिचड़ी, पोहा, समेत जितनी चीजें उपलब्ध थी सब आर्डर कर डाली। सबका स्वाद लिया। हर चीज का स्वाद अपने स्तर पर बेहतर है।हां बहुत दिनों बाद यहां मिसल पाव का भी स्वाद लिया। अपने माथेरन दौरे में मैंने मिसल पाव खाया था। और बटाटा बड़ा भी। सुस्वादु नास्ते के बाद कॉफी की चुस्की। हम चार लोगों का इतना सब कुछ खाने के बाद बिल भी कुछ खास नहीं आया।
कुछ दिनों के बाद एक बार फिर महाराष्ट्र सदन जाना हुआ। इस बार हमलोग रात्रि में डिनर के लिए पहुंचे थे। लंच और डिनर का मीनू अलग है। हालांकि यहां उत्तर भारतीय डिश भी मिलते हैं। पर महाराष्ट्र सदन में हमने मराठी डिश आर्डर किया। मिक्स वेज कोल्हापुरी, साउजी पनीर। पर सभी मराठी सब्जियां खूब मसाले वाली हैं। उनमें मिर्च भी ज्यादा है। तो माधवी और वंश को यहां का डिनर कुछ खास पसंद नहीं आया।तो लब्बोलुआब ये है कि नास्ता तो अच्छा है पर लंच और डिनर कुछ  खास नहीं।

पर अगर आपको नास्ते में मराठी वड़ा पाव का स्वाद दिल्ली में लेना हो तो  यहां जरूर पहुंच सकते हैं। वैसे महाराष्ट्र सदन के बगल में कोपरनिक मार्ग पर पुराना महाराष्ट्र सदन है। इसमें कैंटीन है। यहां सभी लोग जा सकते हैं। मतलब आम आदमी भी। यहां जाकर भी आप मराठी खाने का स्वाद ले सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( MAHARASTRA SADAN, BADA PAV, MISAL PAV )