Friday, November 30, 2018

दिल्ली से अलवर वाया भिवाडी- तिजारा


दिल्ली से राजस्थान का शहर अलवर ज्यादा दूर नहीं है। ट्रेन या बस से 3 से 5 घंटे में पहुंचा जा सकता है। कई बार अलवर से होकर रेल से गुजरा पर अलवर शहर को करीब से देखने की इच्छा अब जाकर पूरी हो रही है। दिल्ली से अलवर के लिए रेलगाड़ियां वाया गुरुग्राम रेवाड़ी होकर जाती हैं। पर अगर आप सड़क मार्ग से अलवर जाना चाहते हैं तो गुरुग्राम से धारुहेड़ा होकर भिवाडी, तिजारा होते हुए अलवर पहुंच सकते हैं।

अपने घर से निकलने के बाद आनंद विहार से मुझे गुरुग्राम जाने के लिए कैब मिल गई। कैब वाले 50 रुपये लेते हैं आनंद विहार से गुरुग्राम के लिए। हांलाकि आप इतने रुपये में मेट्रो से भी जा सकते हैं। गुरुग्राम के इफको चौक से फिर आगे के लिए कैब मिल जाती है। आगे मतलब रेवाड़ी, धारुहेड़ा, बहरोड़ आदि के लिए। तो मैंने धारुहेड़ा के लिए कैब ले ली है। जब रास्ते में कैब वाले को बताया कि मुझे अलवर जाना है तो उन्होने धारुहेड़ा से पहले ही कपड़ीवास मोड़ पर उतार दिया। 

यहां से बायीं तरफ वाली सड़क भिवाड़ी जा रही है। भिवाड़ी राजस्थान में अलवर जिले का शहर है। पर धारुहेड़ा से लगा भिवाड़ी दिल्ली एनसीआर का शहर बन चुका है। यहां तमाम बिल्डर अपार्टमेंट बना चुके हैं। दिल्ली की तुलना में कम प्रदूषण वाला इलाका है। कपड़ीवास से एक शेयरिंग आटो से मैं भिवाड़ी के बाजार में पहुंच गया हूं। यहां चौराहे पर कुछ अच्छे म्युरल्स लगे हैं जो राजस्थान की संस्कृति को प्रदर्शित कर रहे हैं। 
दरअसल भिवाड़ी दिल्ली के सबसे करीब का राजस्थान का शहर है। गुरुग्राम में नौकरी करने वाले लोग यहां रह सकते हैं। पर दिल्ली से रोज आना जाना दूर होगा। अगर ये शहर लोकल रेल के नेटवर्क पर जुड़ा होता तो यह दिल्ली का अच्छा सेटेलाइट टाउन हो सकता था।
भिवाड़ी के बस स्टैंड पर पहुंच गया हूं। राजस्थान रोडवेज यानी सरकारी बसों की पिछले पांच दिनो से हड़ताल चल रही है। पर रोडवेज से अनुबंधित निजी बसें चल रही हैं। तो एक अलवर जाने वाली बस लगी है। पर बस में बैठने से पहले थोड़ी पेट पूजा। सैनी चाट भंडार से कचौरी। दस रुपये में कचौरी सब्जी के साथ। इस इलाके में मैं देख रहा हूं कि बड़ी संख्या में सैनी लोग हलवाई का काम कर रहे हैं। 
बस चल पड़ी है।मिलकपुर गुर्जर, खिजुरी खास गांव के बाद रास्ते में तातरपुर, टपूकड़ा, भिंडूसी जैसे छोटे छोटे बाजार आते हैं। यहां बस कुछ मिनटों के लिए रुकती है। अगला प्रमुख शहर है तिजारा। तिजारा अलवर जिले का एक कस्बा है। यह जैन तीर्थ स्थल है। तिजारा विधान सभा क्षेत्र भी है।अभी चुनाव का ऐलान नहीं हुआ है पर पार्टियों के नेताओं की बड़ी बड़ी होर्डिंग दिखाई देने लगी है। भिवाड़ी से तिजारा की दूरी 35 किलोमीटर है। 
वहीं भिवाड़ी से अलवर 80 किलोमीटर के आसपास है। सड़क पर चलते हुए पता चलता है कि ये इलाका यादव और सैनी बहुल है। दो घंटे के सफर के बाद मैं अलवर शहर में पहुंच गया हूं। बस रेलवे स्टेशन से गुजरते हुए शहर में बस स्टैंड से थोड़ा पहले उतार देती है। मैं पूछता हुआ बस स्टैंड में पहुंच गया। अलवर का बस स्टैंड काफी विशाल है। पर यहां आज एक भी बस नहीं दिखाई दे रही हैं। क्यों भाई, पांच दिनों से रोडवेज की हड़ताल चल रही है ना।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(DELHI, GURUGRAM, BHIWADI, TIJARA, ALWAR, RAJSTHAN ) 


Wednesday, November 28, 2018

कभी दिल्ली और आगरा से मुकाबला करता था डीग

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डीग राजस्थान प्रांत के भरतपुर जिले में भरतपुर शहर से 32 किलोमीटर दूर एक प्राचीन ऐतिहासिक शहर है। इसका प्राचीन नाम दीर्घापुर था। स्कंद पुराण में दीर्घ या दीर्घापुर के रूप में इसका उल्लेख आता है। डीग को भरतपुर राज्य की पहली राजधानी राजा बदन सिंह ने बनाया था।

भरतपुर के जाट राजा कुशल प्रशासक ही नहीं थे, बल्कि वे अच्छे कला-प्रेमी एवं कला संरक्षक भी थे। उनके समय में हुए निर्मित किले महल वास्तुकला के अद्भुत नमूने हैं। राजा बदन सिंह को सौन्दर्य कला, स्थापत्य कला और वास्तु का अच्छा ज्ञान था। डीग के भवनों एवं उद्यानों को देखकर यह बखूबी एहसास होता है।
डीग शहर में प्रवेश करते ही जल महल से थोड़ी दूरी पर आपको डीग का पुराना किला नजर आता है। यह छोटा सा नगर अपनी बेजोड किलेबंदी, अत्यधिक सुंदर बगीचों और कुछ भव्य महलों के कारण दर्शनीय है।


भरतपुर के जाट-नरेशों के पुराने महल अपने भव्य सौंदर्य के लिए विख्यात हैं। नगर के चारों तरफ मिट्टी की चहारदिवारी हुआ करती थी। उसके चारों ओर गहरी खाई निर्मित की गई थी। मुख्य द्वार 'शाह बुर्ज' कहलाता था। इसकी लंबाई-चौड़ाई 50 गज थी।
डीग के किले के चारों ओर एक सृदृढ़ मोटी दीवार है। बाहर किले के चारों ओर मार्गों की सुरक्षा के लिए छोटी-छोटी गढ़ियां भी बनाई गई थीं- जिनमें गोपालगढ़ मिट्टी का बना हुआ किला है, सबसे अधिक प्रसिद्ध था। इन किलों की मोर्चाबंदी के अंदर बसा डीग कभी सुंदर सुसज्जित नगर हुआ करता था। यह नगर अपने वैभवकाल में (18वीं शती में) मुगलों की राजधानी दिल्ली से और आगरा से मुकाबला करता था।

डीग का किला का राजा बदन सिंह से जुड़ा है। बदन सिंह ने अपने राज्य का विस्तार युद्ध की अपेक्षा शांति और राजनैतिक कौशल से अधिक किया। डीग और भरतपुर के अजेय किलों के निर्माण और उनमें सुन्दर महलों की रचना उनका शौक था। अपने अंतिम दिनों में भरतपुर की बजाय वह डीग में ही रहते थे। डीग के भवन में एक लम्बा-चौडा तख्तनुमा पलंग आज भी मौजूद है। कहा जाता है कि बदन सिंह ने आगरा के उन शिल्पियों को रोजगार दिया था, जो मुगल-साम्राज्य के कमजोर होने से भूखों मरने की स्थिति में थे।

राजा बदन सिंह के बाद कला के क्षेत्र में महाराजा सूरजमल की अभिरुचि दुर्ग, महल एवं मंदिर निर्माण में खूब थी। हालांकि सभी जाट राजाओं के शासन काल में किलों की मरम्मत एवं पुनर्निमाण का कार्य जारी रहा, परन्तु स्वयं उनका योगदान विशेष रूप से भरतपुर और डीग के आधुनिकतम महलों के निर्माण में रहा।

महाराजा सूरजमल ने इस किले का निर्माण अठारहवीं सदी में कराया। किले का मुख्य आकर्षण है यहां का निगरानी बुर्ज यानी वॉच टावर है जहां से पूरे महल को देखा जा सकता है, साथ ही शहर का भी नजारा भी लिया जा सकता है। आगरा किले से लूट कर यहां लाई गई तोप यहां देखी जा सकती है।

राजा बदन सिंह और महाराजा सूरजमल के बारे में के नटवरसिंह लिखते हैं कि पूरी तरह निरक्षर होने पर भी, बदन सिंह में आश्चर्यजनक सौन्दर्यबोध था। डीग के उद्यानों-प्रसादों की भव्य रूपरेखा उसी ने और केवल अकेले उसी ने रची थी। दिल्ली और आगरा के श्रेष्ठ मिस्त्री, झुंड बना कर बदन सिंह और सूरजमल के दरबारों में रोजगार की तलाश में आते थे।

कैसे पहुंचे : मथुरा जंक्शन से डीग रेल या बस से पहुंच सकते हैं। अलवर और भरतपुर से भी डीग पहुंचा जा सकता है। मथुरा से डीग 35 किलोमीटर है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        (DEEG, FORT, RAJA BADAN SINGH, RAJA SURAJMAL OF BHARTPUR ) 

Monday, November 26, 2018

डीग का जल महल पैलेस - ताजमहल से कुछ कम नहीं...

राजस्थान के भरतपुर जिले का शहर डीग। डीग में बना जल महल पैलेस। ये किला सौंदर्य में ताजमहल से कुछ कम नहीं है। पर यहां सैलानियों की नजर कम पड़ी है।
यह भरतपुर के जाट राजाओं का समर पैलेस हुआ करता था। जल महल परिसर में कई भवन हैं जो अलग अलग राजाओं के कार्यकाल में बनवाए गए थे। परिसर में दो विशाल सरोवर हैं , जिनमें नीचे उतरने के लिए झरोखे भी बने हुए हैं। इस महल को 1756-1763 के बीच जाट राजा महाराजा सूरजमल ने बनवाना आरंभ किया। इसके बाद 1764-1768 के बीच राजा जवाहर सिंह ने निर्माण कराया। इसके लिए गुलाबी पत्थर बंसी पहाड़पुर गांव से लाए गए।

इस भवन में गोपाल भवन के दो हिस्से हैं जिन्हे सावन और भादो कहा जाता है।  इसके बाद सूरज भवन, हरदेव भवन, किशन भवन, केशव भवन, नंद भवन जैसे अलग अलग कई भवनों की नजारा आप कर सकते हैं। इन भवनों में विशाल बरामदे भी हैं। कई भवनों में संगमरमर का सुंदर काम भी देखा जा सकता है। सभी भवनों की संरचना ऐसी है कि इसमें आपको गरमी का एहसास कम होगा। इन भवनों के कमरों में रोशनी आने का भी सुंदर इंतजाम किया गया है। सभी भवनों के केंद्र में विशाल हरा भरा उद्यान है। 

रंग बिरंगे फव्वारे - दो अलग अलग सरोवरों के नाम गोपाल सागर और रूप सागर दिए गए हैं। जल महल पैलेस की ख्याति इसके रंग बिरंगे फव्वारों के लिए है। इसमें पानी आने का इंतजाम गोपाल सागर से किया गया है। अभी भी साल में दो बार इन फव्वारों को चलाया जाता है। हर साल अक्तूबर में डीग में प्रशासन की ओर मेला लगता है। तब ये फव्वारे चालू किए जाते हैं।  सम्पूर्ण उत्तर भारत में हिन्दू शैली के एकमात्र महल डीग के जल महल हैं। इन भवनों में काम लाई गई तकनीक आज भी आधुनिकतम बनी हुई है। 


डीग के जल महल परिसर में लक्ष्मण मंदिर और गणेश मंदिर भी स्थित हैं। मैं किले के प्रवेश द्वार पर पहुंच गया हूं। टिकट काउंटर पर बताया गया कि टिकट की कोई जरूरत नहीं है। अंदर प्रवेश करते देखा कि हरी हरी घास पर स्थानीय महिलाएं कीर्तन कर रही हैं। किले से पहले भवन गोपाल भवन में पीछे की तरफ हनुमान जी का मंदिर है। इसे भरतपुर के महाराजा व्रजेंद्र सिंह ने 1942 में बनवाया। इस मंदिर में रोज नगर के श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति 400 साल से ज्यादा पुरानी है। यह मूर्ति हकीक की बनी है। इस मूर्ति में हनुमान जी पर महाजा भरत द्वारा भ्रमवश चलाए गए तीर का निशान देखा जा सकता है।  

जल महल के दोनों सरोवरों की दशा के देखकर दुख होता है। रखरखाव के अभाव में इनके जल में काई जम गई है। पानी में लोगों ने कचरा फेंक कर सरोवर के सौंदर्य को बदरंग कर दिया है। इनकी सफाई कर इसमें नौका विहार को बढावा दिया जा सकता है।


कैसे पहुंचे : मथुरा शहर से डीग की दूरी 35 किलोमीटर है। यह मथुरा अलवर रेल मार्ग पर स्थित है। वहीं अलवर से डीग की दूरी 60 किलोमीटर है। आप भरतपुर , अलवरमथुरागोवर्धन  कहीं से भी डीग आसानी से पहुंच सकते हैं। डीग भरतपुर जिले का छोटा सा शहर है। यहां रहने के लिए ज्यादा विकल्प नहीं है। इसलिए आसपास के शहरों में रुककर दिन में डीग भ्रमण का कार्यक्रम बनाएं तो बेहतर होगा। 
(DEEG,  BHARATPUR , JAL MAHAL , RAJSTHAN)  
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

Sunday, November 25, 2018

मुंबई मे विक्टोरियन युग की इमारत - टाउन हॉल

मुंबई कई बार जाना हुआ है। एक बार सीएसटी स्टेशन के आसपास के क्षेत्र में टहलते हुए एक भव्य इमारत पर नजर पड़ी। मुंबई का टाउन हॉल। सन 1833 में बना टाउन हॉल मुंबई की ऐतिहासिक और आइकोनिक इमारतों में शुमार है। यह मुंबई के विक्टोरियन युग की प्रमुख विरासत है। सफेद रंग की इस इमारक पर लिखा है कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई- 1804 स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी टाउन हॉल। सफेद रंग की इस इमारत के आगे सीढ़ियां बनी हैं। इमारत के ठीक सामने हरा भरा पार्क है जिसका नाम एलिफिंस्टन गार्डन है।  

छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से मुंबई की पुरानी इमारतो को देखते हुए आप टाउन हॉल तक पहुंच सकते हैं। यह इमारत शहीद भगत सिंह रोड पर रिजर्व बैंक के करीब हारनिमैन सर्किल पर है। टाउन हॉल मुंबई के विक्टोरियन युग के इमारतों में प्रमुख है।

दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह -  यह एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई का दफ्तर भी है जिसका इसमें समृद्ध पुस्तकालय है। तो यह सूचनाओं का बड़ा केंद्र है और अध्ययनशील लोगों की पसंदीदा जगह भी। यहां साहित्य, विज्ञान और कला से संबंधित पुस्तकों का अच्छा संग्रह है। यहां पर्सियन, प्राकृत, उर्दू और संस्कृत की दुर्लभ पुस्तकों का भी संग्रह है। भवन में एक छोटा सा संग्रहालय भी है। यहां अकबर द्वारा चलाई गई सोने की मुहरों का भी संग्रह उपलब्ध है। टाउन हॉल की लाइब्रेरी में लाखों दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह है। यह सुबह 10.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है। रविवार को पुस्तकालय बंद रहता है।  

1833 में हुआ निर्माण - टाउन हॉल के भवन का निर्माण 1833 में हुआ था। सन 1811 में इसके निर्माण की योजना बननी आरंभ हुई थी। मुंबई के रिकार्डर जेम्स मैकिंटोश ने टाउन हॉल बनाने की योजना पर काम शुरू किया। इसके निर्माण के लिए शुरुआती फंड के तौर पर 10 हजार रुपये का संग्रह लॉटरी से किया गया था। तब संस्था का नाम था लिटरेरी सोसाइटी ऑफ मुंबई। पर यह फंड पूरे निर्माण के लिए काफी नहीं  था। तब सोसाइटी ने सरकार से और फंड के लिए संपर्क किया। इस भवन का निर्माण 10 साल में पूरा हुआ। अंतिम तौर पर इसके निर्माण में 60 हजार पाउंड की लागात आई थी। इस्ट इंडिया कंपनी ने इसके निर्माण में पूंजी के तौर पर बड़ी हिस्सेदारी निभाई थी।

ग्रीक रोमन स्टाइल की इमारत - इसके वास्तु पर ग्रीक और रोमन स्टाइल का प्रभाव है। सर जॉन माल्कम जो मुंबई के उस समय गवर्नर थे, उन्होने टाउन हाल की इमारत को देश के सुंदरतम इमारतों में करार दिया था। इसका डिजाइन कर्नल थॉमस कूपर ने तैयार किया था। इसकी चौड़ाई 200 फीट और ऊंचाई 100 फीट है।

 टाउन हॉल में प्रवेश के लिए आधार तल से आपको 30 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इसके निर्माण के लिए पत्थरों का आयात ब्रिटेन से किया गया था। इसके स्तंभों का निर्माण ब्रिटेन में ही किया गया था और उन्हे सेना के जहाज से मुंबई लाया गया था। भवन के अंदर लकड़ी का सुंदर काम किया गया है। इमारत के अंदर सीढ़ियां घुमावदार हैं। भवन का आंतरिक सज्जा में भी काफी सुंदरता से कार्य किया गया है।

दुनिया भर से आने वाले सैलानी टाउन हॉल की इमारत को बाहर से निहारते हैं। वहीं शोध करने वाले लोग टाउन हॉल की लाइब्रेरी का इस्तेमाल करने पहुंचते हैं। साल 2016 में टाउन हॉल के भवन की मरम्मत कराई गई। 2017 में इसे एक बार फिर लोगों के लिए खोल दिया गया। कई हिंदी फिल्मों में टाउन हॉल की सीढ़ियां दिखाई गई हैं। 
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
-        (TOWN HALL, MUMBAI, ASIATIC SOCIETY OF MUMBAI 1804 )
सम्मानित करते प्रोफेसर रामेश्वर राय, डाक्टर रामजीलाल जांगिड, प्रोफेसर प्रदीप माथुर और वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह। 

दानापानी  ब्लॉग के लिए मिला राष्ट्रीय एकता पुरस्कार
साल 2012 से लगातार ब्लॉग लिखकर देश की राष्ट्रीय एकता, देश की भाषा-खानपान की भिन्नता से पाठकों को परिचित कराने के लिए अगर इस ब्लॉग को कहीं पुरस्कार सम्मान मिले तो खुशी की बात है न। तो 14 नवंबर 2018 को हिंदू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में भारतीय जन संचार संघ की ओर मुझे दानापानी ब्लॉग के लिए राष्ट्रीय एकता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसमें खासतौर पर ब्लॉगिंग के जरिए शाकाहार को बढ़ावा देने का भी जिक्र किया गया। वास्तव में ये सम्मान दानापानी को पढ़ने वाले देश और दुनिया के लाखों लोगों से मिले स्नेह का ही प्रतिफल है। आप सबका आभार। पढ़ते रहिए दानापानी...

Saturday, November 24, 2018

कर्नाटक के हासन से दिल्ली की ओर - वाया बेंगलुरू

अब कर्नाटक के शहर हासन से बंगलुरु की राह पर हूं। कुछ दूर चलने पर ही बस चेनेराय पटना पहुंच गई है। मुझे याद आया कि यहां तक तो मैं पहले भी आ चुका हूं। पिछली बार जब बंगलुरु से श्रवणबेलगोला के लिए आया था तो सीआर पटना से ही मैंने बस बदली थी। मतलब आगे का सारा रास्ता अब जाना पहचाना आने वाला है। 
बस से चलते हुए अगला पड़ाव हिरीसावे आया। यहां से भी श्रवण बेलगोला का रास्ता बदलता है। अगर आप बेंगलुरु से अपने वाहन से आ रहे हैं तो हिरीसावे से ही श्रवणबेलगोला जा सकते हैं। इस रास्ते में कई टोल प्लाजा आते हैं। थोड़ी देर बाद एक जगह बस दोपहर के खाने के लिए रुक गई है।

मुझे यहां फिर 35 रुपये में दो चपाती और सब्जी की प्लेट मिल गई तो हल्की से पेट पूजा हो गई। फिर बस चल पड़ी है। हम अब मंड्या जिले से गुजर रहे हैं। अब हमारी बस बस आदि चुनचुन गिरी यूनीवर्सिटी के पास से गुजर रही है। पहले आदि चुनचुनगिरी का मेडिकल कॉलेज का परिसर दिखाई देता है। फिर आदिचुनचुनगिरी यूनीवर्सिटी का परिसर दिखाई देता है। यह बीजी नगर, नागमंगला तालुक में आता है। दक्षिण के प्रसिद्ध बालगंगाधर नाथ महास्वामी जी ने यहां पर कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की है। कई राज्यों से छात्र यहां पढ़ाई के लिए आते हैं।

अब हम मंड्या जिले से निकलकर तुमकुरू जिले  में प्रवेश कर गए हैं। तुमकुरू जिले के कुणीगल शहर में बस पहुंच गई हैं। कुणीगल के बाद बस फिर आगे बढ़ चली है। शानदार सड़क के दोनों तरफ हरे भरे नारियल के पेड़ दिखाई दे रहे हैं। इन पेड़ों के पीछे मध्यम आकार की पहाड़ियां हैं। दोपहर में भी इन पहाड़ियों का नजारा बेहद सुंदर प्रतीत हो रहा है। 

अब हमारी बस नीलमंगला पहुंच गई हैं। नीलमंगला में मेंगलुरू बेंगलुरु एनएच 48 को चेन्नई मुंबई एनएच-4 क्रॉस करती है। नीलमंगला से तुमकुर और बंगलुरु के लिए रास्ता बदलता है। यहां से बेंगलुरू शहर सिर्फ 27 किलोमीटर रह गया है। नीलामंगला बेंगलुरु ग्रामीण जिले में आता है। दोपहर तीन बजे बस बंगलुरु शहर की सीमा में प्रवेश कर गई है। पर इसके साथ ही जाम लगना भी आरंभ हो गया है। बंगलूरू के बाहरी इलाके में रास्ते में मुझे एक ज्वार की रोटी का स्टाल नजर आता है। इसका मतलब ज्वार की रोटी व्यवसायिक तौर पर बेची जाने लगी है। यह तो अच्छी बात है। 

बेंगलुरु शहर में प्रवेश करने के साथ ही मेट्रो रेल का नेटवर्क दिखाई देने लगा है। अब मैं केएसआर बंगलुरु रेलवे स्टेशन के सामने स्थित बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। आज ही रात को दिल्ली के लिए वापसी की उडान है इसलिए बंगलुरू में किसी दोस्त रिश्तेदार से मिलना संभव नहीं है। तो दो घंटे बस स्टैंड के आसपास के बाजार में ही टाइम पास किया। किसी दोस्त रिश्तेदार से मिलने का समय नहीं है। बंगलुरु सिटी से एयरपोर्ट के लिए एसी बस सेवा चलती है। इसका किराया 235 रुपये है। केआईए 9 बस में एयरपोर्ट के लिए सवार हो गया। 



अगर आपको अकेले ही एयरपोर्ट जाना हो तो बस सेवा ही ठीक है। इससे पहले के बंगलुरु एयरपोर्ट तक के सफर के लिए हमने टैक्सी से यात्राएं की थी। हालांकि बेंगलुरु के हर इलाके से एयरपोर्ट के लिए बस सेवाएं हैं। यहां तक कि बंगलुरु एयरपोर्ट से मैसूर के लिए भी सीधी लग्जरी बस सेवा उपलब्ध है। पर कहीं से भी एयरपोर्ट पहुंचना हो संभावित जाम को देखते हुए समय लेकर निकलना चाहिए। 

बेंगलुरु में हेली टैक्सी सेवा – बेंगलुरु एयरपोर्ट पर मुझे एक विज्ञापन चौंकाता है। हां जी अब लगातार जाम झेलने वाले बंगलुरु शहर में एयरपोर्ट पहुंचने के लिए हेलीटैक्सी सेवा का संचालन शुरू हो चुका है। आईटी सिटी से एयरपोर्ट की हेलीटैक्सी सेवा का किराया 2500 रुपये है। अगर सड़क मार्ग से आएं तो जाम में तीन घंटे लग सकते हैं। इसलिए ये सेवा चल रही है। इसमें 8 सीट वाले हेलीकाप्टर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका विज्ञापन बता रहा है कि यह आईटी सिटी से एयरपोर्ट 15 मिनट में पहुंचा देती है। मेरे एक दोस्त बताते हैं कि यह सेवा आईटी प्रोफेशनल के बीच लोकप्रिय भी हो रही है। अभी इस तरह की सेवा किसी दूसरे महानगर में नहीं शुरू हुई है।

बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद नंदिनी के स्टॉल से मैसूर पाक लेना नहीं भूला। नंदिनी का यह स्टॉल एयरपोर्ट के बाहर ही है। यहां नंदिनी के सारे प्रोडक्ट बाजार भाव पर ही मिलते हैं। पर एक बार एयरपोर्ट के अंदर पहुंच गए तो दूसरे ब्रांड की इन्ही मिठाइयों के दाम चार गुने हो जाते हैं। नंदिनी कर्नाटक सरकार का ब्रांड है। इसकी मिठाइयां अच्छी होती हैं।

दिल्ली की उड़ान -  मेरी दिल्ली की उड़ान इंडिगो से 22.10 बजे है। वक्त से पहले एयरपोर्ट में प्रवेश कर गया हूं। दो घंटे इधर-उधर घूम कर टाइम पास कर रहा हूं। कभी कपड़ों के स्टाल पर तो कभी किताबों के स्टाल पर। बुक स्टाल पर देख पा रहा हूं कि करुणानिधि और हेमा मालिनी पर लिखी गई जीवनीपरक पुस्तकों को प्रमुखता से डिस्प्ले किया गया है। पहली पुस्तक है रामकमल मुखर्जी की ड्रिम गर्ल हेमा मालिनी और दूसरी पुस्तक है - करुनानिधि - ए लाइफ इन पॉलिटिक्स। 

मैं तय समय पर विमान में दाखिल हो गया हूं। ईद के कारण विमान में दिल्ली जाने वाले श्रमिक वर्ग के लोग बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं जो गठरियां लेकर विमान में बेतकल्लुफ होकर सवार हुए हैं। पहले से ही इतनी गठरियांं रख दी हैंं कि मेेेेरे बैैग को रखने के लिए केबिन लगेज बॉक्स में जगह तक नहीं मिली। तो अपना बैग सीट के नीचे रखकर मैं चुपचाप बैठ गया हूं।

विमान के पायलट कैप्टन दलजीत सिंह हैं और सह पायलट हैं निहारिका। सुरक्षा एनाउनंसमेंट सुनने के बाद मैं विमान में अपनी सीट पर सो गया। इंडिगो विमान की रात के 1.05 बजे दिल्ली के टी-पर लैंडिंग के साथ मेरी नींद खुली। अब इतनी रात गए मैं घर कैसे जाऊं। तो कुछ घंटे हमने एराइवल की लांज में ही गुजारे फिर घर जाने के लिए कश्मीरी गेट जाने वाली एसी बस में बैठ गया।

दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो सेवा रात 11 बजे बंद हो जाती है। पर एयरपोर्ट के टी3, टी2 और टी1 से होती हुई वाया धौलाकुआंनई दिल्ली स्टेशनकश्मीरी गेट के लिए डीटीसी की एसी बस सारी रात हर आधे घंटे पर चलती रहती है।  
मध्य रात्रि मे दिल्ली के टी - 2 पर वापसी...

... तो हमारी दक्षिण की एक और यात्रा पूरी हुई। इस बार यात्रा मार्ग था - दिल्ली से हैदराबाद, भुवनगिरी, नालगोंडा, नागार्जुन सागर, हैदराबाद, बीदर, बसव कल्याण, कालबुर्गी, चेन्नई, त्रिची, तंजौर, डिंडिगुल, कोडाईकनाल, पलनी, त्रिपुर, अविनाशी, सत्यमंगलम, मैसूर, कुशलनगर, मडिकेरी, हासन, बेलुर, हासन, बेंगलुरु, दिल्ली...
कभी ख्वाबों में कभी तेरे दर पे तो कभी दर बदर
ए गमे जिंदगी तुझे ढूंढते हुए हम कहां भटक गए...

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyut@daanapaani.net
(BELUR, PATALESHWAR TEMPLE, BENGLURU AIRPORT, HELITAXI SERVICE, INDIGO, DELHI T2 ) 

Friday, November 23, 2018

बेलुर में हल्की बारिश और लेमन राइस और पतालेश्वर महादेव मंदिर

बेलुर में चन्न केशव मंदिर के दर्शन के बाद नास्ते का समय हो गया है। लगेज रुम से अपना बैग रिलीज कराने के बाद मैं मंदिर के पास ही एक साफ-सुथरे रेस्टोरेंट में पहुंच गया। यहां मैंने नास्ते लेमन राइस लिया। इसका स्वाद बहुत अच्छा है। यहां पर आगरा के एक जैन परिवार से मुलाकात हुई जो श्रवणबेलगोला में बाहुबली के दर्शन के बाद बेलुर दर्शन के लिए आया है। जैन परिवार की एक कन्या बला की खूबसूरत है। वे जैन लोग हैं तो बिना लहसुन प्याज वाला नास्ता तलाश कर रहे हैं। पर उन्हें निराशा हाथ लगी। हल्की बारिश में मौसम सुहाना हो रहा है। नास्ते के बाद मैं अब आगे चल पड़ा हूं। बारिश में भींग रहा हूं पर बेलुर के एक और मंदिर को देखने निकल पड़ा हूं पैदल पैदल।  



बेलुर का अदभुत पतालेश्वर मंदिर -  बेलुर का दूसरा प्रमुख मंदिर है पतालेश्वर मंदिर। यह शिव जी का छोटा सा मंदिर है। पर इसकी सुंदरता बेमिसाल है। इस मंदिर का निर्माण भी होयसल राजाओं ने ही करवाया था। मंदिर के प्रवेश द्वार पर काले पत्थरों से बनी नंदी की सुंदर प्रतिमा है।
मंदिर का शिवलिंगम भी बहुत ही सुंदर है। इस मंदिर की दीवारों पर भी अत्यंत कलात्मक मूर्तियां हैं। इन्हें देखकर लगता है कि इस छोटे से मंदिर के निर्माण में शिल्पियों ने काफी समय लगाया होगा।

पर यह मंदिर बाद में बदहाल हो गया था। छोटा सा ये मंदिर काफी समय तक लोगों की नजरों से ओझल हो गया था। पर अब इस मंदिर को स्थानीय लोगों ने जीर्णोद्धार करके काफी सुंदर बना दिया है। मंदिर के बाहर एक तस्वीर लगी है जिसमें घासफूस से ढकी मंदिर की पुरानी तस्वीर और एक बाद की तस्वीर लगाई गई है। स्थानीय लोगों ने इस विरासत के महत्व को समझा और इसे नया रूप दिया। 
कैसे पहुंचे - पतालेश्वर नाथ का यह सुंदर सा मंदिर बेलुर के बस स्टैंड के पास ही स्थित है। यह मंदिर कर्नाटक सरकार के होटल विष्णु रीजेंसी के बिलकुल बगल में स्थित है। आप बस स्टैंड से पैदल चलकर यहां तक पहुंच सकते हैं। मैं पहले विष्णु जी और अब शिवजी के दर्शन के बाद मैं पैदल चलता हुआ ही बस स्टैंड वापस आ गया हूं।

पास हैं हेलिबिडू और चिकमंगलूर - बेलूर हासन जिले में है। पर यहां से चिकमंगलूर की दूरी सिर्फ 25 किलोमीटर है। कॉफी के लिए मशहूर चिकमंगलूर भी मेरी जाने की इच्छा है। पर अगली किसी यात्रा में सही। बेलूर से दूसरा प्रमुख शहर हेलीबिडू जो कभी होयसल राजाओं की राजधानी हुआ करता था, उसकी दूरी भी महज 16 किलोमीटर है। वहां भी कई कलात्मक हिंदू और जैन मंदिर है। हालांकि मैं आज हेलिबेडू भी जा सकता हूं, पर शाम को बेंगलुरू से दिल्ली के लिए मेरा विमान छूट सकता है। तो हेलीबेडू अगली किसी यात्रा में देखेंगे। 

अब अपने घोंसले की ओर वापसी का वक्त आ गया है। बेलुर बस स्टैंड से सीधे बेंगलुरु वाली बस मिल गई है। पता चला कि ये बस मुडिगेरे से आ रही है। मुडिगेरे बेलुर से 33 किलोमीटर चिकमंगलूर जिले का एक छोटा सा शहर है। बस हासन बस स्टैंड में पांच मिनट रुकने के बाद 11.25 बजे बेंगलुरु हाईवे की ओर बढ़ चली है। यहां से बेंगलुरु की दूरी 180 किलोमीटर है।


-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyut@daanapaani.net
(   ( BELUR, PATALESHWAR TEMPLE, SHIVA, LEMON RICE, HELIBIDU, HASAN, KARNATKA )

Wednesday, November 21, 2018

बेलूर का चन्न केशव मंदिर : होयसल राजाओं की अनुपम कृति

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हल्की बारिश के बीच सुबह सुबह मैं हासन के बस स्टैंड के अंदर हूं। कर्नाटक का हासन शहर इस जिले का मुख्यालय भी है। इसका नाम हासन हासनंबा मंदिर के नाम पर पड़ा है। बेंगलुरु से हासन की दूरी 183 किलोमीटर है। यह शहर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगोडा की राजनीति का केंद्र रहा है। हासन का बस स्टैंड काफी शानदार बना है। मुख्य सड़क और बस स्टैंड के भवन के बीच काफी खाली जगह छोड़ी गई है। स्टेशन भवन काफी बड़ा और सुविधाजनक है। कुल 92 हजार वर्ग फीट बना बस स्टैंड जून 2017 में 32 करोड़ की लागात से तैयार हुआ है। 
बस स्टैंड में कैफे कॉफी डे का कॉफी स्टॉल है। यहां महज 10 रुपये की कॉफी है। हल्की बारिश में कॉफी पीना बड़ा भला प्रतीत होता है। मुझे अब बस लेनी है बेलुर की। बेलुर यहां 35 किलोमीटर है। चिकमंगलुर जाने वाली बस बेलुर जाएगी। मैं उसमें बैठ गया। हरे भरे रास्ते से सरपट भागती हुई बस ने 40 मिनट में ही बेलुर पहुंचा दिया। बेलुर बस स्टैंड में भी हल्की बारिश हो रही है। बस स्टैंड के अंदर भी कॉफी के पौधों में फूल लगे हैं। मैं चन्न केशव मंदिर का रास्ता पूछ कर पैदल ही आगे बढ़ जाता हूं।

बारहवीं सदी का है चन्न केशव मंदिर – 
बेलुर कर्नाटक की कला और शिल्प की नगरी है। यह मुख्य रुप से चन्न केशव मंदिर के लिए जाना जाता है। होयसल राजाओं द्वारा बनवाया गया यह मंदिर काफी विशाल है। बेलुर का पुराना नाम बेलापुरी हुआ करता था जो अब बिगड़कर बेलुर हो गया है।

चन्न केशव यानी यह भगवान विष्णु का विशाल मंदिर है। होयसल वंशीय नरेश विष्णुवर्धन ने चन्न केशव मंदिर का निर्माण 1117 ईस्वी में करवाया था। मंदिर की कलाकत्मकता को देखकर लगता है कि यह मंदिर कई सालों में बनकर तैयार हुआ होगा। होयसल राजाओं ने बेलूर और हेलिबिड में कई भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जो आज भी उसी शान से खड़े हैं। 



चन्न केशव मन्दिर को, जो स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से देश के सर्वोत्तम मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर 178 फुट लंबा और 156 फुट चौड़ा है। परकोटे में तीन प्रवेश द्वार हैं। इनमें सुंदर मूर्तिकारी की गई है। इसमें कई प्रकार की मूर्तियां जैसे हाथी, पौराणिक जीव-जंतु, मालाएं, स्त्रियों के चित्र आदि उत्कीर्ण किए गए हैं।

चन्न केशव मंदिर नक्षत्र की आकृति का है। इसका प्रवेश द्वार पूरब दिशा की ओर खुलता है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर एक चतुष्कोण मंडप में आप पहुंच जाते है। वह मंडप खुला हुआ है। मुख्य मंदिर में भगवान की मूर्ति लगभग सात फीट ऊंची है। इसकी चार भुजाएं हैं। उनके साथ उनके दाहिने भूदेवी और बाएं में लक्ष्मी देवी हैं। भगवान के हाथ में शंख, चक्र, गदा और पद्म दिखाई देते हैं।

यह मंदिर मुसलमान शासकों द्वारा कई बार लूटा गया। पर बार बार  हिन्दू राजाओं ने इसका बार बार जीर्णोद्वार भी करवाया। बताया जाता है कि मुख्य मंदिर के ऊपर एक विशाल गुंबद हुआ करता था जो निर्माण के 200 साल अंदर ही ध्वंस हो गया। फिर भी मंदिर के गर्भ गृह की भव्यता देखने लायक है। इसकी दीवारों पर देवी देवताओं की अनगिनत मूर्तियां उकेरी गई हैं।


मंदिर के बायीं तरफ सौम्य नायिकी ( महालक्ष्मी) का विशाल मंदिर स्थित है। वही श्री विष्णु मंदिर के दाहिनी तरफ रंग नायिकी का मंदिर स्थित है। मुख्य मंदिर के पीछे विशाल यज्ञ मंडप है। मंदिर के चारदीवारी के अंदर की ओर विशाल गलियारा है। इन गलियारों में भी मूर्तियों का निर्माण हुआ है।
चन्न केशव मंदिर भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन है। मंदिर के पास लगेज और जूते आदि रखने का इंतजाम है। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे – बेलुर बस स्टैंड से चन्न केशव मंदिर की दूरी एक किलोमीटर है। पैदल या फिर आटो रिक्शा से मंदिर पहुंचा जा सकता है। श्रवण बेलगोला आने वाले तीर्थ यात्री अक्सर बेलुर भी पहुंचते हैं, क्योंकि श्रवणबेलगोला से बेलुर की दूरी ज्यादा नहीं है। 
--- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyut@daanapaani.net
(BELUR, BELAPURI, CHAN KESHWA TEMPLE )
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