Thursday, October 11, 2018

नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह और कोडाईकनाल

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कोडाईकनाल झील के आगे साइकिल चलाते हुए अचानक एक साइन बोर्ड देखकर मैं रूक जाता हूं। इस बोर्ड पर पंजाब के नाभा के राजा रिपुदमन सिंह के बारे में कुछ जानकारियां लिखी हैं। कहां पंजाब का नाभा और कहां तमिलनाडु का कोडाईकनाल। कोडाई झील के एक किनारे बना है नाभा गार्डेन। यहां लगे साइन बोर्ड पर लिखा है कि महान देशभक्त और नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह के नाम पर इस उद्यान का नामकरण किया गया है।

दरअसल नाभा के राजा रिपुदमन सिंह को राजनैतिक कैदी बनाकर तमिलनाडु के कोडाईकनाल में लाया गया था। वे यहां पर 1928 से 1942 तक रहे। यहीं पर 1942 में उनका निधन हो गया। कोडाईकनाल की नगरपालिका ने उनके नाम पर झील के किनारे पार्क का निर्माण कराया है।

रिपुदमन सिंह का जन्म 4 मार्च 1883 को हुआ था। उनके पिता का नाम हीरा सिंह था। वे सरदार गुरुचरण सिंह के नाम से भी जाने जाते थे। नाभा के राजा के तौर पर 1911 से 1928 तक उन्होंने शासन किया। जब ब्रिटिश शासन ने उनका राजपाट हड़पने की कोशिश की तो वे क्रांतिकारी बन गए। नाभा पंजाब में पटियाला के पास एक रियासत हुआ करती थी। महाराजा रिपुदमन सिंह 1906 से 1908 के बीच इंपिरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य हुआ करते थे। इस दौरान उन्होंने सिख समाज के अधिकारों को लेकर सक्रियता से अपनी बातें रखीं। जब वे 1911 में राजा बने तो अपने राज्य में उन्होने कई प्रगतिशील सुधार किए। पर राजा रहने के दौरान उनकी अक्सर क्राउन के शासन से नहीं बनती थी।
प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ नहीं दिया पहले विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने नाभा राज्य की सेना के साथ ब्रिटिश राज का साथ देने से इनकार कर दिया था। तभी से वे ब्रिटिश शासन की आंखों की किरकिरी बन गए थे। इसलिए वे एक मात्र भारतीय राजा थे जिसे प्रथम विश्व युद्ध के बाद कोई भी ब्रिटिश वार का सम्मान नहीं दिया गया। 

सन 1919 के जालिंयावाला बाग कांड के बाद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर ब्रिटिश राज की निंदा की। जबकि तब रिश्ते में उनके भाई लगने वाले पटियाला के राजा भूपिंदर सिंह तब ब्रिटिश शासन के बड़े समर्थक हुआ करते थे। हालांकि 1921 में महाराजा रिपुदमन सिंह को 15 तोपों की सलामी के रुतबा प्राप्त था। पर आगे भी उनकी ब्रिटिश सरकार के ठनी रही।
पहले उन्हें ब्रिटिश राज ने देहरादून भेजा । वहां से भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ काम करते रहे। 1927 में नादेड़ श्री हुजुर साहेब की यात्रा पर गए, तब उन्होने अपना नाम बदल कर सरदार गुरुचरण सिंह रख लिया। यहां उन्होने एक बार फिर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने का प्रण लिया। पर इसके तुरंत बाद 1928 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सत्ता से निर्वासित करके मद्रास प्रेसिडेंसी में भेज दिया। उन्हें नजरबंद करके कोडाईकनाल में रखा गया। यहां वे 14 साल रहे। यहीं पर 12 दिसंबर 1942 को 59 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। अब देश आजाद हो गया पर यह इस देशभक्त राजा की आत्मा कोडाईकनाल की हंसी वादियों में आज भी बसती है।
इतिहासकार जेएस गरेवाल और इंदु बांगा अपनी पुस्तक – रिपुदमन सिंह और नाभा में लिखते हैं – रिपुदमन सिंह एक अपवादस्वरुप प्रिंसले शासक थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध कई तरीके से किया। उन्होंने 14 साल का निर्वासित जीवन बिना किसी न्यायिक अपील के गुजार दिया। 

कोडाईकनाल से वापसी - मैं कोडाई लेक के रास्ते में लगे कुछ मील के पत्थरों को देख रहा हूं। दूरी लिखी है पलनी 69 किलोमीटर। शाम को 4 बजे पलनी जाने वाली बस के इंतजार में हूं। कोडाई बस स्टेंड से पलनी, मदुरै या फिर डिंडिगुल जाने के लिए सीमित बसेें ही हैंं। कुछ बसों में आरक्षण भी होता है। शााम 4 बजे वाली बस कोयंबटूर जाती है पलनी होकर। इसमें आरक्षण नहीं होता। यह बस आते ही भर गई। पर मुझे बड़ी मुश्किल से एक सीट मिल पाई। हालांकि भीड़ अगले 20 किलोमीटर की यात्रा में कम होती गई।

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कोडाई कनाल से पलनी के रास्ते में ऊंचा पहाड़ी इलाका आता है। इसे पलनी हिल्स कहते हैं। यह 2300 मीटर तक ऊंचा है। यानी कोडाई कनाल से भी ज्यादा। इसके बाद ऊंचाई कम होने लगती है। पलनी शहर नजदीक आने के साथ ही मुरगन स्वामी दे दर्शन आपको बस से ही होने लगता है।
( MAHARAJA RIPUDAMAN SINGH OF NABHA, PUNJAB, KODAIKANAL  )
-विद्युत प्रकाश मौर्य

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