Wednesday, October 17, 2018

पलनी पर्वत पर जाने के लिए अनूठी रेलगाड़ी

पलनी मुरुगन स्वामी मंदिर तक आने जाने के लिए सीढियों के अलावा अनूठी रेलगाड़ी का विकल्प है। यह ढलान पर चलने वाली रेलगाड़ी है, जिसे विंच नाम दिया गया है। इसमें कुल तीन डिब्बे हैं। देखने में खिलौना ट्रेन की तरह लगने वाली यह रेलगाड़ी विद्युत ऊर्जा से धीमी गति से चलती है। तेज ढलाव वाली पटरियों पर यह चढ़ती और उतरती है। मतलब पटरी बदलने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। यहां कुल तीन रेलवे ट्रैक बनाए गए हैं। इनमें से एक ट्रैक राशन , सामग्री आदि के परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि बाकी दो ट्रैक का इस्तेमाल श्रद्धालुओं के लिए किया जाता है। इन रेलगाड़ी के डिब्बे छोटे-छोटे हैं जो चलने से पहले सुरक्षा के लिहाज से बंद कर दिए जाते हैं। यह फुनीकुल रेलवे (FUNICULAR RAILWAY ) का नमूना है। 


ऐसी रेलगाड़ियों का इस्तेमाल ढलाव वाले रास्ते पर किया जाता है। मुझे लगता है यह देश में चलने वाली तमाम रेलगाड़ियों में सबसे अलग और अनूठी है।  इसमें एक लोहे की मजबूत रस्सी चरखी में घूमती है जो तीनो कोच को धीरे धीर ऊपर या फिर नीचे लाने का काम करती है। सुरक्षा के लिहाज से इस रस्सी की हर तीन महीने में जांच की जाती है। हर एक साल बाद इस रस्सी को बदल कर नई लोहे की रस्सी लगाई जाती है।


इस रेलगाड़ी में कुल 36 लोग एक बार में बैठ सकते हैं। आधार तल से पर्वत तक रेलवे ट्रैक की लंबाई 290 मीटर है। आमतौर पर सफर में 8 मिनट का समय लगता है।
पलनी में मंदिर तक पहुंचने के लिए पहली विंच सेवा की शुरुआत 1966 में की गई। पहले विंच की वजन 32 टन है। इसमें 36 लोग सफर कर सकते हैं। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए दूसरी विंच सेवा का शुरुआत 1981 में हुई। इसमें तब 18.5 लाख रुपये का खर्च आया था। जब ये ट्रैक भी कम पड़ने लगे तब तीसरे ट्रैक की शुरुआत 1988 में की गई।

पलनी में यह रेलगाड़ी श्रद्धालुओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। आमदिनों में इसकी सेवा सुबह 6 बजे शुरू होती है जबकि भीड़भाड़ वाले दिनों में इसकी सेवा सुबह 4 बजे से ही आरंभ हो जाती है। विंच की सेवा बिजली से चलती है। पर कभी बिजली कट जाए तो उसके लिए जेनरेटर का भी इंतजाम रखा गया है।  

दो तरह का किराया सिस्टम - इस रेलगाड़ी में दो तरह का किराया सिस्टम लागू किया गया ह। इसके लिए वापसी का किराया 10 रुपये है। पर इसमें इंतजार करना पड़ता है। अगर आप 50 रुपये वाला टिकट लें तो वेटिंग हॉल में नहीं बैठना पड़ेगा। मैं जब पलनी पहुंचा हूं तो मंदिर तक चढ़ाई तो सीढ़ियों से की, पर वापसी की यात्रा विंच से की। वहीं अगर आप नीचे से ऊपर की ओर जा रहे हैं तो किराया 10 रुपये और 25 रुपये रखा गया है। तीन साल से कम उम्र के बच्चों का किराया नहीं लिया जाता है।

आधार तल पर मंदिर में चढ़ाई के लिए जहां से सीढ़ियां आरंभ होती है, उससे थोडा और आगे जाने पर विंच का स्टेशन है। जब आप पलनी जाएं तो इसकी सेवा का इस्तेमाल जरूर करें। यह काफी आनंददायक सफर है। क्योंकि विंच के ट्रैक के साथ बड़े सुंदर बागीचे हैं। इनमें रंग बिरंगे खुशूबदार फूल भी खिले रहते हैं।
दो बार हादसे हुए - अप्रैल 2004 में पलनी के विंच सेवा में एक हादसा हो गया था। तब विंच ने आगे बढ़कर काउंटर को ध्वस्त कर दिया था। इस हादसे में 34 लोग घायल हो गए थे। उसके बाद से संरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिए गए हैं। इससे पहले 1993 में भी इसी विंच से हादसा हुआ था। तब इसमें दो लोगों की मौत भी हो गई थी।
( TAMILNADU, HILL STATION, PALNI, RAIL, FUNICULAR RAILWAY, WINCH ) 

-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Monday, October 15, 2018

पलनी मुरगन मंदिर – कार्तिकेय का सबसे विशाल मंदिर

भगवान गणेश के बडे भाई कार्तिकेय। क्या आपको पता है कार्तिकेय का सबसे विशाल और प्रसिद्ध मंदिर कहां है। जवाब है तमिलनाडु के पलनी में। पलनी डिंडिगुल जिले का एक शहर है। पर यह एक बड़ा शहर है। देश भर से श्रद्धालु पलनी पहुंचते हैं कार्तिकेय के दर्शन के लिए। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 70 लाख से ज्यादा श्रद्धालु मुरुगन स्वामी के दर्शन के लिए आते हैं।
पलनी बस स्टैंड से मंदिर के आधार तल की दूरी एक किलोमीटर है। पैदल चलकर भी पहुंचा जा सकता है। या फिर आटो रिक्शा या तांगा का विकल्प उपलब्ध है। मंदिर के आधार तल पर जूता स्टैंड, गठरी (बैग) स्टैंड आदि की सुविधाएं उपलब्ध है। यहां पर कई  सारे सस्ते होटल धर्मशालाएं और रात्रि विश्राम स्थल भी हैं।

मुरुगन स्वामी का मंदिर शिवगिरी पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए तकरीबन 689 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। पर्वत की ऊंचाई 160 मीटर है। पर्वत की परिधि 3 किलोमीटर है। पर्वत पर कई तरह के औषधीय पौधे हैं। ऊपर तक जाने के दो विकल्प और हैं। आप रोप वे से जा सकते हैं। दूसरा तरीका रेलगाड़ी से ऊपर पहुंचने का है। रोपवे का किराया 15 रुपये है तो रेलगाड़ी का 25 और 50 रुपये है।

कहानी है कि एक बार नारद मुनि कैलास पर्वत पर एक फल लेकर पहुंचे। यह ज्ञान का फल था। शिव ने यह फल अपने दो बेटों गणेश और कार्तिकेय को दिया। पर मुनि को मंजूर नहीं था कि फल को दो हिस्सों में काटा जाए। तो ये तय हुआ कि जो तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा पहले कर लेगा उसे ये फल मिलेगा। तो कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा पर निकल पड़े। पर गणेश पिता शिव और माता पार्वती की परिक्रमा करने लगे। शिव ने वह फल गणेश को दे दिया। जब कार्तिकेय लौट तो उन्हे गुस्सा आया कि उनकी परिक्रमा व्यर्थ चली गई। नाराज कार्तिकेय ने कैलास छोड़ दिया और दक्षिण भारत के पलनी पहाड़ी पर आकर अपना निवास बनाया। कहते हैं कि कार्तिकेय साधु वेश में यहां तपस्या करने लगे। कहते हैं बाद में शिव पार्वती खुद कार्तिकेय को आशीर्वाद देने पलनी आए। उन्होंने कार्तिकेय को कहा कि तुम खुद दैवीय फल हो, तुम्हे किसी और फल की क्या जरूरत।

पलनी मुरुगन स्वामी मंदिर का निर्माण पूर्ववर्ती चेर राजाओं ने करवाया था। इसके मुख्य गोपुरम को सोने से मढ़ा गया है। मंदिर का परिसर काफी विशाल है। परिसर की दीवारों पर सुंदर कलाकृतियां बनाई गई हैं। कुछ सुंदर पेटिंग भी यहां देखने को मिलती हैं।

पलनी कार्तिकेय मंदिर में सिर्फ हिंदू धर्म मानने वालों को ही अंदर जाने की अनुमति है। आप कुल 689 सीढ़ियां चढ़ने के बाद विशाल चौबारे में पहुंच जाते हैं। यहां से दर्शन के लिए तीन तरह की लाइनें हैं। एक निःशुल्क दर्शन और दूसरा 10 रुपये वाली लाइन, तीसरी 50 रुपये वाली लाइन। मंदिर के गर्भ गृह के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं है। मुख्य मंदिर के दाहिनी तरफ ऋषि बोगार की समाधि है। 

पलनी की चर्चा तमिल के संगम साहित्य में आती है। पलनी की कथा 3000 ईसा पूर्व के सिद्ध ऋषि बोगार से जुडती है। वे चिकित्सा शास्त्र (आयुर्वेद) के बडे विद्वान थे। उन्होंने 4448  जड़ी बूटियों का ज्ञान था। उन्होंने 9 विषैली बूटियों को मिलाकर दवा तैयार की थी। पलनी वही स्थल है जहां पर उन्होने नौ भस्म से दवा तैयार की थी। संत ने पलनी के शिवगिरी पर्वत पर मुरुगुन स्वामी की प्रतिमा स्थापित और दूध पंचामृत से उनका अभिषेक करने लगे। चढ़ावे के लिहाज से तमिलनाडु का सबसे अमीर मंदिर है।
मंदिर परिसर में मंदिर प्रबंधन की ओर से संचालित कैंटीन है जिसमें रियायती दरों पर नास्ता और भोजन मिलता है। इस भोजन को बहुत ही पवित्रता से पकाया जाता है।
पलनी मुरुगुन के दर्शन के लिए दक्षिण भारत के कोने कोने से श्रद्धालु आते हैं। कुछ लोग तो मयूर पंथ सिर पर सजाकर और कुछ लोग मुंडन कराकर पलनी पहुंचते हैं।

खुलने का समय – मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है। रात्रि 8 बजे तक खुला रहता है। पर श्रद्धालुओं को शाम 7 बजे के बाद नहीं जाना चाहिए। क्योंकि चढ़ाई करते करते हो सकता है मंदिर बंद हो जाए।

कैसे पहुंचे - पलनी कोयंबटूर से 100 किलोमीटर, डिंडिगुल से 60 किलोमीटर और कोडाईकनाल से 64 किलोमीटर है। वहीं त्रिपुर से पलनी की दूरी 80 किलोमीटर है।
( PALNI, MURUGAN SWAMI TEMPLE, TAMILNADU, HILL STATION ) 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Saturday, October 13, 2018

मुरगन स्वामी के नाम समर्पित है तमिलनाडु का पलनी शहर

कोडाईकनाल से चली हमारी बस शाम को सात बजे के करीब पलनी बस स्टैंड में पहुंच गई है। ये बस आगे कोवाई ( कोयंबटूर ) जाएगी पर मेरा सफर  पलनी तक ही है। पलनी का बस स्टैंड काफी बड़ा और साफ सुथरा है। बस स्टैंड के अंदर भी एक अच्छी कैंटीन है।
बस स्टैंड के अंदर चार लोग भोजपुरी में गप लड़ाते मिले। पूछने पर पता चला क मोतिहारी के लोग हैं। यहां पर पल्लेदारी का काम करते हैं। उनसे मैं त्रिपुर जाने वाली बस का स्टैंड पूछता हूं। उन्होने बताया कि हर 15 मिनट पर त्रिपुर की बस मिलती है। पर फिलहाल तो मुझे रात्रि विश्राम पलनी में ही करना है। बस स्टैंड के बाहर  सामने मुख्य सड़क पर श्रीराम लॉज होटल में मुझे 400 रुपये में अच्छा कमरा मिल गया। होटल काफी बड़ा है और बस स्टैंड के सामने मुख्य सड़क पर स्थित है। बालकोनी से मुरगन मंदिर दिखाई दे रहा है। पर मैं सुबह दर्शन के लिए जाऊंगा।
इससे पहले शाम को कुछ घंटे पलनी के बाजार की सैर कर लेता हूं। पलनी डिंडिगुल जिले का शहर है। 2011 की जनगणना के मुताबिक शहर की आबादी 70 हजार है। पर शहर किसी जिला मुख्यालय जैसा बड़ा और साफ सुथरा नजर आ रहा है। शहर में बड़ी बड़ी कपड़ों की दुकाने हैं जहां लोग खूब खरीददारी कर रहे हैं।
बस स्टैंड के सामने वाली सड़क पर तीन अच्छे शाकाहारी भोजनालय हैं। इनमें से दो होटलों में मैंने अलग अलग तरह के व्यंजन रात को खाने में लिया। खाने का स्वाद अच्छा है। दरें भी वाजिब हैं। हमने आर्डर किया है वेज पुलाव, दही रायता के साथ। दूसरा डिश है पराठा। पर इसमें पराठे के ऊपर कुरमा उड़ेल दिया गया है। साथ में रायता भी है।

पलनी शहर में सजीले टमटम चलते हुए दिखाई दिए। आजकल टमटम और घोड़े कहां दिखाई देते हैं। पर पलनी में टमटम को खूब सजा संवार कर रखा गया है। टमटम का डिजाइन थोड़ा बग्घी जैसा है। बस स्टैंड के बगल में एक विशाल सरोवर है। पर इसमें पानी नहीं है। पलनी शहर के कई इलाकों में कटहल खूब बिक रहे हैं। पके हुए कटहल बहुत बड़े आकार के हैं। लोग खरीदकर बड़े चाव से खाते हैं।
पलनी शहर और कोडाईकनाल के बीच के पहाड़ी इलाके को पलनी हिल्स के नाम से जाना जाता है। ये हिल एरिया भी वेस्टर्न घाट का हिस्सा माना जाता है। पलनी रेलवे स्टेशन भी है। यह वास्तव में कोडाई कनाल का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन है। पलनी कोयंबटूर-डिंडिगुल- रामेश्वरम रेल मार्ग पर पड़ता है। पहले यह लाइन मीटरगेज हुआ करती थी। साल 2012 में डिंडिगुल पलनी खंड को ब्राडगेज में बदल दिया गया। हालांकि इस लाइन पर रेलगाड़ियां कम ही चलती हैं।
पलनी बस स्टैंड में मैंने देखा कि केरल के प्रमुख तीर्थ स्थलों के लिए यहां से सीधी बसों का संचालन किया जा रहा है। यहां से गुरुवायूर और चेन्नई के लिए सीधी बसों की बुकिंग हो रही है।  
हमारी इस यात्रा में पलनी पहले से तय पड़ाव में शामिल नहीं था। पर कोडाई कनाल में एक सज्जन ने पलनी के मुरुगन टेंपल के बारे में जानकारी दी तो मैंने यहां रुककर मुरुगन स्वामी के दर्शन करना तय किया।
-   ( PALNI HILLS, MURUGAN, TANGA, TAMILNADU, HILL STATION ) 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Thursday, October 11, 2018

नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह और कोडाईकनाल

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कोडाईकनाल झील के आगे साइकिल चलाते हुए अचानक एक साइन बोर्ड देखकर मैं रूक जाता हूं। इस बोर्ड पर पंजाब के नाभा के राजा रिपुदमन सिंह के बारे में कुछ जानकारियां लिखी हैं। कहां पंजाब का नाभा और कहां तमिलनाडु का कोडाईकनाल। कोडाई झील के एक किनारे बना है नाभा गार्डेन। यहां लगे साइन बोर्ड पर लिखा है कि महान देशभक्त और नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह के नाम पर इस उद्यान का नामकरण किया गया है।

दरअसल नाभा के राजा रिपुदमन सिंह को राजनैतिक कैदी बनाकर तमिलनाडु के कोडाईकनाल में लाया गया था। वे यहां पर 1928 से 1942 तक रहे। यहीं पर 1942 में उनका निधन हो गया। कोडाईकनाल की नगरपालिका ने उनके नाम पर झील के किनारे पार्क का निर्माण कराया है।

रिपुदमन सिंह का जन्म 4 मार्च 1883 को हुआ था। उनके पिता का नाम हीरा सिंह था। वे सरदार गुरुचरण सिंह के नाम से भी जाने जाते थे। नाभा के राजा के तौर पर 1911 से 1928 तक उन्होंने शासन किया। जब ब्रिटिश शासन ने उनका राजपाट हड़पने की कोशिश की तो वे क्रांतिकारी बन गए। नाभा पंजाब में पटियाला के पास एक रियासत हुआ करती थी। महाराजा रिपुदमन सिंह 1906 से 1908 के बीच इंपिरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य हुआ करते थे। इस दौरान उन्होंने सिख समाज के अधिकारों को लेकर सक्रियता से अपनी बातें रखीं। जब वे 1911 में राजा बने तो अपने राज्य में उन्होने कई प्रगतिशील सुधार किए। पर राजा रहने के दौरान उनकी अक्सर क्राउन के शासन से नहीं बनती थी।
प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ नहीं दिया पहले विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने नाभा राज्य की सेना के साथ ब्रिटिश राज का साथ देने से इनकार कर दिया था। तभी से वे ब्रिटिश शासन की आंखों की किरकिरी बन गए थे। इसलिए वे एक मात्र भारतीय राजा थे जिसे प्रथम विश्व युद्ध के बाद कोई भी ब्रिटिश वार का सम्मान नहीं दिया गया। 

सन 1919 के जालिंयावाला बाग कांड के बाद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर ब्रिटिश राज की निंदा की। जबकि तब रिश्ते में उनके भाई लगने वाले पटियाला के राजा भूपिंदर सिंह तब ब्रिटिश शासन के बड़े समर्थक हुआ करते थे। हालांकि 1921 में महाराजा रिपुदमन सिंह को 15 तोपों की सलामी के रुतबा प्राप्त था। पर आगे भी उनकी ब्रिटिश सरकार के ठनी रही।
पहले उन्हें ब्रिटिश राज ने देहरादून भेजा । वहां से भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ काम करते रहे। 1927 में नादेड़ श्री हुजुर साहेब की यात्रा पर गए, तब उन्होने अपना नाम बदल कर सरदार गुरुचरण सिंह रख लिया। यहां उन्होने एक बार फिर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने का प्रण लिया। पर इसके तुरंत बाद 1928 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सत्ता से निर्वासित करके मद्रास प्रेसिडेंसी में भेज दिया। उन्हें नजरबंद करके कोडाईकनाल में रखा गया। यहां वे 14 साल रहे। यहीं पर 12 दिसंबर 1942 को 59 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। अब देश आजाद हो गया पर यह इस देशभक्त राजा की आत्मा कोडाईकनाल की हंसी वादियों में आज भी बसती है।
इतिहासकार जेएस गरेवाल और इंदु बांगा अपनी पुस्तक – रिपुदमन सिंह और नाभा में लिखते हैं – रिपुदमन सिंह एक अपवादस्वरुप प्रिंसले शासक थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध कई तरीके से किया। उन्होंने 14 साल का निर्वासित जीवन बिना किसी न्यायिक अपील के गुजार दिया। 

कोडाईकनाल से वापसी - मैं कोडाई लेक के रास्ते में लगे कुछ मील के पत्थरों को देख रहा हूं। दूरी लिखी है पलनी 69 किलोमीटर। शाम को 4 बजे पलनी जाने वाली बस के इंतजार में हूं। कोडाई बस स्टेंड से पलनी, मदुरै या फिर डिंडिगुल जाने के लिए सीमित बसेें ही हैंं। कुछ बसों में आरक्षण भी होता है। शााम 4 बजे वाली बस कोयंबटूर जाती है पलनी होकर। इसमें आरक्षण नहीं होता। यह बस आते ही भर गई। पर मुझे बड़ी मुश्किल से एक सीट मिल पाई। हालांकि भीड़ अगले 20 किलोमीटर की यात्रा में कम होती गई।

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कोडाई कनाल से पलनी के रास्ते में ऊंचा पहाड़ी इलाका आता है। इसे पलनी हिल्स कहते हैं। यह 2300 मीटर तक ऊंचा है। यानी कोडाई कनाल से भी ज्यादा। इसके बाद ऊंचाई कम होने लगती है। पलनी शहर नजदीक आने के साथ ही मुरगन स्वामी दे दर्शन आपको बस से ही होने लगता है।
( MAHARAJA RIPUDAMAN SINGH OF NABHA, PUNJAB, KODAIKANAL  )
-विद्युत प्रकाश मौर्य

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Wednesday, October 10, 2018

जंगल की सैर और मेमोरी लॉस– कोडाईकनाल

कोडाईकनाल में रहते हुए आप फारेस्ट टूर यानी जंगल की सैर का भी आनंद ले सकते हैं। इसके लिए वन विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है जो आपको टूर आपरेटर ही दिलवा देगा। इस टूर में आप साइलेंट वैली, बेरीजाम लेक, माथिकेटन फारेस्ट व्यू ( मेमोरी लॉस ) आदि का आनंद ले सकते हैं। कहा जाता है कि इन घने जंगलों में पहुंचकर स्मृति विलोप हो जाता है।

यह टूर एक दिन का है। इसे शेयरिंग बस से 300 रुपये प्रति सवारी और कार से 2800 रुपये में बुक किया जा सकता है। यहां जंगल की सैर करना एक यादगार अनुभव हो सकता है।


कोडाई कनाल के आसपास सैर की करने की बात करें तो आप मानावानूर और ओकल जा सकते हैं। वहां भी रहने के लिए होटल और रिजार्ट हैं। गुजरात और मुंबई के कई उद्योगपति लोग आकर इन स्थलों में कई दिन गुजारकर स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। इन्ही वादियों में कई अच्छे स्कूल भी हैं, जहां दूर दूर से बच्चे पढ़ाई के लिए आते हैं। कोडाईकनाल शहर में कुरूंजी आंडावार नामक एक सुंदर मंदिर भी है। समय निकाल कर वहां भी जा सकते हैं।

सिल्वर कैसेड झरना – कोडाई बस स्टैंड से 8 किलोमीटर आगे सिल्वर केसेड नामक झरना है। यह कोडाईकनाल शहर का लोकप्रिय टूरिस्ट स्पाट है।इसे आप पलनी की ओर जाते हुए भी देख सकते हैं। इस झरने में कोडाई लेक का पानी आता है। झरने का पानी देखने में चांदी की तरह लगता है। इसलिए तो इसे सिल्वर कैसेड नाम मिला है। यहां खूब सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। 

मीठे आम का मौसम: पर कोडाई आए हैं तो यहां के स्थानीय फलों का खूब आनंद लें। मैं जून के महीने में कोडाईकनाल पहुंचा हूं तो आजकल यहां आम का मौसम है। कोडाई में स्थानीय आम आए हैं जो 40 रुपये किलो हैं। खूब मीठे भी हैं।

पंजाबी खाना भी : कोडाई में खाने पीने के लिए शाकाहारियों को कोई दिक्कत नहीं है। वैसे यहां पर मांसाहारी भोजनालय ज्यादा हैं। पर कुछ शुद्ध शाकाहारी भोजनालय भी हैं। सेवेन प्वाइंट जंक्शन के पास एक पंजाबी ढाबा भी है। यहां पर थाली 190 रुपये की है। अब दक्षिण भारत में पंजाबी खाना तलाश करेंगे तो थोड़ी महंगी जरूर मिलेगी। पर यहां पर आप परंपरागत दक्षिण भारतीय भोजन का स्वाद बड़े मजे से ले सकते हैं जो आपकी जेब के अनुकूल भी है। 


बाकी आप यहां स्ट्रीट फूड का भी आनंद ले सकते हैं। सुबह नास्ते में इडली, दिन के खाने में लेमन राइस, वेज बिरयानी या फ्रायड राइस आदि आप ले सकते हैं। यह सब कुछ बजट में आ जाएगा। कई जगह नास्ते में यहां पर पूरी सब्जी भी मिल जाती है। कुछ रेस्टोरेंट में खिचड़ी, छोला भठूरा और चना भाजी भी मिल जाती है।

फलों के संग भेलपुरी - पर कोडाईकनाल की सड़कों पर घूमते हुए आप खास तरह की भेलपुरी का आनंद लें। इसमें उबली हुई मूंगफली के साथ कई तरह के फलों को कतरन बनाकर मिलाया जाता है। इसका स्वाद अच्छा है। हल्की बारिश के बीच इसे गरमा गरम खाने का आनंद और बढ़ जाता है। यह सब कुछ सेहत के लिए भी अच्छा है। यहां पर आपको भुट्टा का स्वाद भी मिल सकता है। लेक के किनारे गाजर और दूसरे फल भी मिलते हैं। यहां जगह जगह कच्चा आम भी आपको हर मौसम में मिल जाता है।

कोडाईकनाल में सुबह सुबह हल्की बारिश में लेक के किनारे साइकिल चलाते हुए रुक कर फिल्टर कॉफी पीने का भी अपना अलग मजा है। कोडाईकनाल में उटी की तरह होममेड चाकलेट का भी आनंद लिया जा सकता है। यहां पर मुन्नार की तरह मसालों की भी दुकानें हैं। जहां से आप बेहतरीन गुणवत्ता वाले मसाले भी खरीद कर अपने घर ले जा सकते हैं।

( KODAIKANAL FOOD, MANGO, BHUTTA ) 
 - -विद्युत प्रकाश मौर्य

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Monday, October 8, 2018

कोडाईकनाल - मोयर्स प्वाइंट और गुना की गुफाएं...

कोडाईकनाल की सैर करते हुए हम पहुंच गए हैं मोयर्स प्वाइंट। यहां पर खूब भीड़ है। जंगल में मंगल है। खाने पीने की दुकाने हैं। मैंने एक बार फिर कच्चे आम खाए। तो मोयर्स प्वाइंट क्या है। ये एक ब्रिटिश अधिकारी का नाम है। उसने कोडाई कनाल से केरल के मुन्नार जाने का रास्ता बनाया था। उसकी याद में बना है ये प्वाइंट। सर थॉमस मोयर ने 6 जून 1929 को कोचीन की तरफ जाने वाली सड़क के निर्माण कार्य की शुरुआत करवाई थी। इस सड़क के निर्माण में उसका बड़ा योगदान रहा। 14 फरवरी 1932 को मद्रास के गवर्नर सर जॉर्ज फ्रेडरिक स्टेनली ने इस सड़क का उदघाटन किया।

 हालांकि अब मोयर्स के रास्ते से वाहनों को जाने की अनुमति नहीं है। क्योंकि घने जंगल हैं। इन जंगलों में बेशकीमती चंदन के पेड़ हैं। इन जंगलों में वन्य जीव रहते हैं। इसलिए रास्ते को संरक्षित किया गया है। कोडाईकनाल को भौगोलिक रूप से देखा जाए तो केरल के इडुकी जिले और वहां से प्रमुख हिल स्टेशन मुन्नार से ज्यादा दूर नहीं हैं।

मोहक मगर खतरनाक गुना केव्स – 21 मौत हो चुकी हैं यहां मोयर प्वाइंट से आगे बढ़कर हमलोग पहुंचे हैं गुना केव्स। इससे पहले हमें बस से ही ग्रीन वैली दिखाई गई। बहुत ही गहरी घाटी है, इसलिए इसे सुसाइडल प्वाइंट भी कहते हैं। यहां से कूद जाने के बाद कुछ अता पता नहीं चलेगा। तो हम खतरनाक गुफाओं की ओर जा रहे हैं। इसका नाम डेविल्स किचेन है। 


पर कमल हासन की तमिल फिल्म गुना की 1992 में यहां शूटिंग हुई उसके बाद इसका नाम गुना केव्स रख दिया गया। यहां एक खतरनाक कुआं है जिसे अब जंजीर लगाकर बंद कर दिया गया है। शराब के नशे में यहां अब तक 21 लोगों की जान जा चुकी है। 15 साल पहले तक 20 लोगो की मौत हुई थी। 2013 में आखिरी बार एक युवक की यहां मौत हुई। यहां एक व्यू प्वाइंट और पेड़ की जड़ों के साथ सुंदर नजारे बनते हैं। 


यहां पर मेरी मुलाकात अनिल कुमार सिंह से हुई जो लखनऊ में बीएचईएल में इंजीनियर हैं। वे बीएचयू आईटी 1999 -2003 के एलुमनी हैं। तो गुना केव्स में हिंदी फिल्म गुमराह की भी शूटिंग हुई है जैसा कि हमारे गाइड महोदय ने बताया। गुना केव्स को 1821 में ब्रिटिश अधिकारी बीएस वार्ड ने तलाश किया था। इसकी ऊंचाई 2230 मीटर है।

पीलर रॉक मोयर प्वाइंट से 3 किलोमीटर और गुना केव्स के पास ही है। यह 122 मीटर ऊंची चट्टान है, जो विशाल स्तंभ के शक्ल में है। यहां पर भी खाने पीने की दुकानें सजी रहती हैं। 1992 से पहले गुना केव्स और पीलर रॉक तक बहुत कम लोग ही पहुंचते थे। पर अब यहां हर रोज मेला लगा रहता है।

हमलोग आगे बढ़ रहे हैं गोल्फ कोर्स की ओर। सड़क के किनारे जंगलों में 148एकड़ में फैला विशाल गोल्फ कोर्स है। यहां हिंदी फिल्म सपने साजन के और शिवाजी गणेशन की कई तमिल फिल्मों की शूटिंग हुई। गोल्फ कोर्स के आगे हरी भरी वादियों में एक स्कूल दिखाई दिया। आगे पंबारपुरम में शापिंग कांप्लेक्स है। यहां सभी बस वाले रोकते हैं। आप कुछ शापिंग करें और बस वालों का कमिशन बने। पर मैं पास में बने के सुंदर झरने को देखने दौड़कर पहुंच जाता हूं। इस झरने का नाम फेयरी फाल्स है।

आज के टूर के समापन से पहले हमें बस एक गाइड 500 साल पुराने जामुन के पेड़ से साक्षात्कार कराते हैं। हमलोग बस रुकवा कर इस गौर से देखते हैं। फिर आगे बढ़ जाते हैं। मैं एक बार फिर लेक के पास ही उतर जाता हूं। कोडाई की सारी रौनक तो यहीं है।
(MOYERS POINT, GUNA CAVES, FOUR PILLER ROCKS, GOLF COURSE )
( KODAI KANAL, MAGIC MUSHROOM, TAMILNADU, HILL STATION ) 

-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Sunday, October 7, 2018

कोडाईकनाल - चीड़ के जंगलों में ...मेरा दिल भी कितना पागल है...

मैंने पहले भी लिखा था कि कोडाईकनाल घूमने के लिए एक या दो दिन काफी नहीं है। तो जब यहां आने का कार्यक्रम बनाएं तो कम से कम चार दिनों का तो बनाएं ही। अब सवाल उठता है कोडाईकनाल में क्या देखें और कैसे देखें। तो जनाब पहाड़ों पर रिलैक्स होने आते हैं। प्रकृति का आनंद लेने आते हैं तो आराम आराम से घूमिए न। जल्दी किस बात की है।
वैसे तो किसी भी जगह घूमने के लिए टैक्सी बुक करने का विकल्प रहता है। पर कोडाई कनाल में आप मिनी बसों को बुक करके शेयरिंग तरीके से पैकेज टूर में घूम सकते हैं। यह घूमने का किफायती तरीका हो सकता है।

कोडाईकनाल के बस स्टैंड में ही कई टूर आपरेटर के बुकिंग दफ्तर हैं। और स्थानीय भ्रमण कराने वाली बसें भी यहीं से शुरू होती हैं। कोडाई और आसपास घूमने के लिए पैकेज कई तरह के हैं। ज्यादातर पैकेज आधे दिन के हैं।
 अलग अलग टूर आपरेटरों के ब्रोशर में पांच तरह के पैकेज दिखाई देते हैं। पर इनमें सबसे लोकप्रिय पैकेज है जिसका नाम वीआईपी फारेस्ट टूर है। इसमें अपर लेक व्यू, पाइन फारेस्ट, मोयर्स प्वाइंट, डेविल्स किचेन (गुना केव) , ला स्लथ चर्च, फोर पिलर रॉक, गोल्फ कोर्स,  500 साल पुराना पेड़ , फेयरी फाल्स आदि शामिल है। इस पैकेज के 250 रुपये जमा करके हमने अगले दिन के लिए बुकिंग करा ली है।

टूर ऑपरेटर ने हमें सुबह नौ बजे का समय दे रखा है। पर अपनी आदत के मुताबिक मैं घूमने के लिए सुबह सुबह जग गया हूं। मार्निंग वॉक के दौरान देखा रोटरी क्लब के लोग एक जागरूकता रैली निकाल रहे हैं। वे लोग तमिलनाडु के अलग अलग जिलों के रोटरी क्लब के अधिकारी हैं। इनका कोडाई में तीन दिनों का सम्मेलन चल रहा है। मैं रैली में उनके साथ थोड़ी देर चला। इस दौरान कोयंबटूर के रोटरियन लक्ष्मी नारायण से मेरी बात हुई। उन्होंने अपने अभियान के बारे में बताया। इसके बाद मैं दुबारा लेक पर चला गया। सुबह सुबह एक बार फिर किराये पर लेकर साइकिल चलाई।
अपर लेक व्यू से झील का नजारा। 

नौ बजे एसके एम टूर एंड ट्रैवल्स के दफ्तर पहुंच गया। पर काफी इंतजार के बाद साढ़े दस बजे बस चली। यह  बस 18 सीटों वाली है। ज्यादातर टूर ऑपरेटर की बसें ऐसी ही हैं। इसमें एक गाइड भी है जो तमिल, अंग्रेजी और हिंदी में बोलता है।
हमारा पहला प्वाइंट है अपर लेक व्यू। यह कोडाई की ऊंची जगह है जहां से झील का विहंगम नजारा दिखाई देता है। यहां गाइड ने हमें लेमन ग्रास की पत्तियां दिखाई। उससे भीनी सी खुशबू आती है। यहां पंद्रह मिनट रुकने के बाद हमलोग अगले पड़ाव पर बढ़ चले।

कुछ किलोमीटर चलने के बाद हम जंगल में प्रवेश कर चुके हैं। चीड़ के जंगल। अत्यंत लंबे चीड़ के पेड़। ऊंचाइयां और ढलानें। रंग बिरंगे लोगों की खूब भीड़ है। पर इन जंगलों को देखकर कुछ याद आने लगा.. मेरा दिल भी कितना पागल है..ये प्यार तो तुमसे करता है। हां संजय दत्त और माधुरी दीक्षित याद आए फिल्म साजन के। उस गाने की शूटिंग इन्ही चीड़ के जंगलों में तो हुई थी।


कुछ लोग यहां घुड़सवारी का आनंद ले रहे हैं। तो अलग अलग पोज खूब सारी तस्वीरे खिंचवा कर यादों को समेट लेना चाहते हैं डिजिटल बैंक में। इन चीड़  के जंगलों में हिंदी फिल्म राजा हिंदुस्तानी की भी शूटिंग हुई थी। वहीं मणिरत्नन बांबे फिल्म के भी कुछ नजारे यहां फिल्माए थे। 

( KODAI KANAL, FOREST, FILM SAJAN, RAJA HINDUSTANI,  TAMILNADU, HILL STATION ) 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Friday, October 5, 2018

कोडाईकनाल लेक की वह सुहानी शाम

कोडाईकनाल 2133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित दक्षिण भारत का लोकप्रिय हिल स्टेशन है। मैं इससे पहले तमिलनाडु के ऊटी और केरल के मुन्नार में जा चुका हूं। पर कोडाई की ऊंचाई उससे ज्यादा है। साथ  ही यह एक सदाबहार हिल स्टेशन है जहां आप कई रोज गुजार सकते हैं। 21 वर्ग किलोमीटर के दायरे में यहां काफी देखने लायक स्थल हैं, जहां रहकर आप आनंदित हो सकते हैं।


जैसे ऊटी में बोटानिकल गार्डन वहां का मुख्य आकर्षण है ठीक उसी तरह कोडाईकनाल की झील कोडाई लेक यहां का मुख्य आकर्षण है। इस झील का विस्तार काफी लंबा चौड़ा है। अगर झील के चारों तरफ बनी सड़क पर चलें तो ये चक्कर साढ़े चार किलोमीटर का है। झील के किनारे पहुंचते ही आपको मौजमस्ती में डूबे देश के कोने कोने से आए लोग नजर आने लगते है। रंग बिरंगे लोग. हरी भरी वादियों में। झील के साथ मनोरंजन के तमाम मसाले मौजूद हैं। सबसे अच्छा तरीका है साइकिल किराये पर लें और झील का पूरा चक्कर लगाएं। घूमना भी और व्यायाम भी हो गया।

 झील के किनारे पहुंचते ही मैं एक साइकिल किराये पर ले लेता हूं। 50 रुपये में आधे घंटे के लिए। वैसे यहां हर साइज की साइकिलें उपलब्ध हैं। डबल सीट और डबल पैडल वाली साइकिल भी किराये पर उपलब्ध है। साइकिल से चलते हुए कुदरत का नजारा लेने के लिए बार बार रास्ते में रुक जाता हूं। फिर चल पड़ता हूं। हल्की सी बारिश हो रही है। पर इसकी परवाह किसे है। 


झील के किनारे साइकिल चलाने में इतना मजा आया कि अगले दिन सुबह फिर साइकिल चलाने पहुंच गया।आप झील में पैडल वाली बोट किराये पर लेकर बोटिंग का आनंद भी उठा सकते हैं। कई जगह बोट स्टेशन बने हैं जहां से बोट किराये पर ली जा सकती है। लोग पूरे परिवार के साथ बोटिंग का आनंद लेते दिखाई दे जाते हैं। पर मैं अकेला हूं तो बोट के बजाय साइकिल चलाना पसंद किया।


यह झील देखने में प्राकृतिक लगती है, पर आप गलत हो सकते हैं। यह एक मानव निर्मित झील है। इसका निर्माण मदुरै के कलेक्टर रहे सर वेरे हेनरी लेविंगे ने 1863 में कराया था। पूरे कोडाईकनाल शहर का विकास ब्रिटिश काल में हुआ। पर अब यह झील पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बन गई है। सुबह सात बजे से रात्रि 10 बजे तक झील के आसपास सैलानियों का जमावड़ा लगा रहता है। कोडाईकनाल के कई होटल झील के पास हैं। आप भी अपने होटल का चयन झील के निकट इलाके में ही करें तो यहां के सौंदर्य का पूरा आनंद ले पाएंगे।

लेक से लगता हुआ एक तिब्बती बाजार है। यहां से आप कपड़े और जरूरत के दूसरे सामान खरीद सकते हैं। यहां खासतौर पर कपड़े वाजिब दरों पर मिल जाते हैं।
झील से लगता हुआ एक सुंदर पार्क भी है। ब्रायंट पार्क में प्रवेश के लिए टिकट है। पर पार्क में शाम को घूमना सुहाना मौसम हो सकता है। मुझे यहां कई लोग डीएसएलआर कैमरे लेकर फोटो शूट करते दिखाई दिए। अन्ना पार्क नामक पार्क में भी अत्यंत सुंदर फूल हैं। इन्हें आप घंटो निहार सकते हैं। पार्क में हर्बल वृक्षों की भी श्रंखला है। कुछ घंटे पार्क में गुजारने के बाद मैं अपने होटल लौट आया हूं।

कैसे पहुंचे – कोडाईकनाल का निकटतम रेलवे स्टेशन पलनी है। जो 64 किलोमीटर की दूरी पर है। दूसरा रेलवे स्टेशन कोडाई रोड है जो 80 किलोमीटर की दूरी पर है। वैसे यहां डिंडिगुल और मदुरै से भी पहुंचा जा सकता है।

(KODAIKANAL LAKE, PARK, CYCLE ON RENT, BRAYANT PARK ) 

 विद्युत प्रकाश मौर्य

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