Tuesday, October 30, 2018

यहां बनती है मतदान के दौरान उंगली पर लगने वाली स्याही

जब चुनाव के दौरान वोट डालने जाते हैं तो आपकी उंगलियों पर स्याही लगा दी जाती है। ये स्याही आम स्याही से अलग होती है। यानी अमिट होती है। कई बार साफ करते करते महीनों बाद ही इस स्याही का दाग जाता है। पर आपको पता है कि ये स्याही बनती कहां है। तो जवाब है मैसूर में।
सुबह सुबह मैसूर शहर के चंद्रगुप्त रोड पर टहलते हुए मेरी मुलाकात नटराजन से होती है। वे मैसूर पेंट्स में नौकरी करते हैं। उन्होंने बताया कि हमारी कंपनी चुनाव में उंगलियों ने निशान लगाए जाने वाले अमिट स्याही का निर्माण करती है। मैसूर पेंट एंड वार्निस लिमिटेड मैसूर कर्नाटक राज्य सरकार के स्वामीत्व वाली कंपनी है। इस साल मैसूर पेंट्स ने इंडोनेशिया को स्याही का एक्सपोर्ट किया। वहां से कुल 120 करोड़ का कारोबार किया है। वहां भी चुनावों में इस अमिट स्याही का इस्तेमाल किया गया। अच्छे कारोबार के बाद इस साल कंपनी ने कर्मचारियों को शानदार बोनस दिया है। कंपनी के एक कर्मचारी आरवाई नटराज मिले मुझे मैसूर में वे बड़े शान से अपनी कंपनी के बारे में बता रहे हैं।

कंपनी के प्रबंध निदेशक चंद्रशेखर दादामनी हैं। इसका प्लांट मैसूर में बनीमंडप एक्सटेंशन में है। कंपनी बृंदाबन ब्रांड नाम से पेंट भी बनाती है। इसके पेंट के ग्राहक कर्नाटक रोडवेज से लेकर तमाम नामचीन कंपनियां भी हैं। कर्नाटक सरकार की यह कंपनी लगातार कई सालों से फायदे में चल रही है।
मैसूर पेंट्स कंपनी डाक की मुहर वाली स्याही भी बनाती है। पूरे देश के डाकघरों में डाक टिकटों पर मुहर लगाने के लिए इसी स्याही का इस्तेमाल किया जाता है।
अंग्रेजी में इसे इंडेलेबल इंक कहते हैं जो लोकप्रिय तौर पर वोटर्स इंक के नाम से जाना जाता है। तो मैसूर पेंट्स द्वारा निर्मित यह स्याही ही 60 करोड से ज्यादा मतदाताओं की उंगलियों पर लगाई जाती है। इस स्याही की खासियत यही होती है कि यह उंगलियों पर लगाए जाने के 40 सेंकेड के अंदर ही सूख जाती है। सिर्फ भारत ही नहीं अब मैसूर पेंट्स दुनिया के तकरीबन 30 देशों को इस स्याही का निर्यात चुनाव के दौरान करती है।
कंपनी इसे 5 एमएल, 10 एमएल, 15 एमएल, 20 एमएल, 25 एमएल, 40 एमएल, 60 एमएल, 70 एमएल, 80 एमएल और 100 एमएल के साइज में बनाती है। इसमें स्याही लगाने के लिए स्पाउंज, स्टीक, ब्रश, नोजल जैसे एप्लिकेशन के विकल्प दिए जाते हैं। इस स्याही में सिल्वर नाइट्रेट का इस्तेमाल किया जाता है। पर इस स्याही के बनाने का पूरा फार्मूला सेक्रेट है। इसलिए कोई दूसरी कंपनी ऐसी स्याही नहीं बनाती । मैसूर पेंट्स ने 1962 से चुनावी स्याही का निर्माण आरंभ किया था। तभी से वह भारत के चुनाव आयोग को स्याही की सप्लाई कर रहा है।

वैसे कंपनी की बात करें तो मैसूर पेंट्स की स्थापना नलवाडी कृष्णराज वाडियार ने 1937 में पेंट कंपनी की स्थापना की थी। तब इसका नाम मैसूर लैक्स एंड पेंट्स हुआ करता था। अब कंपनी भारत के बाहर थाईलैंड, सिंगापुर, नाइजरिया, मलेशिया, कंबोडिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को चुनावी स्याही सप्लाई कर रही है।

साल 2016-17 की बात करें तो कंपनी ने 6.18 करोड़ का मुनाफा कमाया। अगर चुनावी साल हो तो कंपनी का कारोबार दुगुना हो जाता है। कंपनी के कुल राजस्व का 40 से 60 फीसदी तक वोटर्स इंक से ही आता है। कंपनी का निर्माण परिसर मैसूर में 16 एकड़ के हरे भरे परिसर में बना हुआ है। इसका भवन भी अब हेरिटेड बिल्डिंग की सूची में शामिल हो चुका है। कंपनी की वेबसाइट -  https://mysorepaints.com/

-  विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( INDELIBLE INK, MAYSORE, ELECTION )

Monday, October 29, 2018

मैसूर में साइकिल किराये पर लेकर फर्राटा भरें

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मैसूर में साइकिल की सवारी – पैडल विद प्राइड
मैसूर देश के उन चुनिंदा शहरों में है जहां किराये पर साइकिल दिए जाने की मुहिम सफलतापूर्वक चल रही है। पूरे मैसूर शहर में साइकिल किराये पर देने के लिए कई स्टैंड बनाए गए हैं। इसके लिए आपको एक एप डाउनलोड करना पड़ता है। इसके बाद आपको 350 रुपये या अधिक की धनराशि रिचार्ज करानी पड़ती है। जब भी आप साइकिल लेना चाहें तो स्टैंड में लॉक की गई साइकिलों को मोबाइल एप के माध्यम से निकाल सकते हैं। किसी व्यक्ति से सहायता की कोई जरूरत नहीं। जब तक जहां तक चाहें अपनी साइकिल से मैसूर शहर घूमते रहें। किराया सिर्फ 10 रुपये प्रति घंटा है। 

हाईटेक इंतजाम : स्मार्ट कार्ड लगाएं और स्टैंड से साइकिल निकालें। जब साइकिल जमा करना हो तो किसी भी स्टैंड में जाकर साइकिल को जमाकर दें। साइकिल के अगले हिस्से में एक हुक लगा है जो जाकर स्टैंड में लॉक हो जाता है। जितनी देर साइकिल आपके पास रही उतनी राशि आपके खाते से कट जाएगी।

मैसूर में कई लोग सुबह में साइकिल चलाने के लिए भी साइकिल किराये पर लेकर शहर में घूमने निकल पड़ते हैं। पूरे मैसूर शहर में 25 से ज्यादा साइकिल स्टैंड बनाए गए हैं। इसके अलावा आप चलते फिरते स्टोर से भी साइकिल किराये पर ले सकते हैं।

साइकिल रेंट दिल्ली, जयपुर, पुणे जैसे शहरों में भी है। पर मैसूर के इंतजाम सबसे स्मार्ट हैं। भले ही दिल्ली में साइकिल रेंट को लेकर लोग उदासीन हों पर यहां लोग खूब साइकिल रेंट का लाभ भी उठा रहे हैं। स्कूली बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी यहां साइकिल लेकर दौड़ाते हुए नजर आ जाएंगे।



घंटा घर और मैसूर फोर्ट - मैसूर के घंटाघर का निर्माण 1927 में कृष्णराज वाडियार के शासन काल की सिल्वर जुबली के मौके पर कराया गया था। इस घंटाघर की ऊंचाई 22.85 मीटर है। वाडियार का शासन काल 1902 से 1940 तक रहा। वे मैसूर के लोकप्रिय राजा थे। 
राजा के सम्मान में घंटाघर का निर्माण मैसूर पैलेस के स्टाफ ने अपने वेतन से दान देकर करवाया था। इसकी छतरी राजपूताना स्टाइल में है। आगे छतरी के नीचे डाक्टर अंबेडकर की प्रतिमा भी लगी है। इसके आगे वाडियार सर्किल में चौराहे पर महाराजा की विशाल प्रतिमा लगी है।

हम किले के नार्थ गेट पर हैं। इसे जयराम बलराम गेट भी कहते हैं। अगर आप मैसूर का किला देखना चाहते हैं तो उसके लिए प्रवेश दक्षिणी द्वार से है। प्रवेश का समय सुबह 10 बजे से शाम 5.30 बजे के बीच है। दक्षिणी द्वार पर ही टिकट काउंटर और पार्किंग का इंतजाम है। किले में शाम से 7 से 8 बजे के बीच लाइट एंड साउंड शो भी होता है। किले का प्रवेश टिकट वयस्कों के लिए 50 रुपये और लाइट एंड साउंड शो का भी टिकट 50 रुपये का है।

पर हमें उत्तरी गेट के बाहर सुबह के सुहाने मौसम में हजारों कबूतरों के बीच काफी आनंद आ रहा है। उत्तरी गेट पर श्रीकोट आंजनेय स्वामी का मंदिर है। यहां पर भक्त सुबह सुबह दर्शन के लिए पहुंचने लगे हैं। उत्तरी गेट पर ही दूसरा मंदिर विनायक स्वामी का है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
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Sunday, October 28, 2018

मैसूर के पार्क में कन्नड़ अभिनेता राजकुमार

मैसूर पैलेस से निकल कर मैं पास के पार्क में प्रवेश कर गया हूं। हरे भरे सुंदर पार्क में सुबह सुबह टहलने वाले पहुंचे हैं। यहां ओपन जिम भी बना है। पार्क में हरे भरे पड़े आबोहवा को मस्त बना रहे हैं। पर चामराजेंद्र वाडियार सर्किल पर स्थित यह पार्क कन्नड फिल्मों के महान अभिनेता राजकुमार के नाम पर बना है। हिंदी फिल्मों के दीवाने बॉलीवुड एक्टर राजकुमार को जानते थे। 

जब राजकुमार को साल 1995 में दादा साहेब फाल्के अवार्ड दिए जाने का ऐलान हुआ तब लोगों ने कन्नड के इस महान अभिनेता को देश के दूसरे हिस्सों में जाना। पर कन्नड सिनेमा जगत के वे जेम्स बांड थे। लोग उनकी हर फिल्म का बड़ी शिद्दत से इंतजार करते थे।


कन्नड अभिनेता राजकुमार की पार्क में सुनहले रंग की आदमकद प्रतिमा लगी है। इसके साथ ही राजकुमार की अभिनेता के तौर पर कई तस्वीरें भी लगाई गई हैं। कन्नड की जनता में राजकुमार का वही सम्मान है जो हिंदी में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का है।




 सिंगनल्लूरु पुठस्वामय्या मुत्तुराज उर्फ राजकुमार का जन्म 24 अप्रैल 1929 को तालवाडी के गाजनूर में हुआ। उन्होंने कुल 206 फिल्मों में अभिनय किया। शब्दवेदी उनकी आखिरी फिल्म थी। राजकुमार के पिता सिंगनल्लूरु पुठस्वामय्या एक थिएटर कलाकार थे। उनकी माता का नाम लक्षम्मा था। राजकुमार ने 25 साल के उम्र में अपनी पहली फिल्म में प्रमुख भूमिका निभाई। इसके बाद ही उन्होंने अपना लोकप्रिय नाम राजकुमार कर लिया। 1954 में उनकी फिल्म बेडर कण्णप्पाआई थी।



राजकुमार एक फिल्म को छोडकर अपने पूरे जीवन में सिर्फ कन्नड फिल्मों में ही एक्टिंग की। उनकी अन्य भाषा फिल्म है एकमात्र फिल्म है कालहस्ती महात्यमतेलुगू भाषा में थी। बाद में राजकुमार अपनी फिल्म निर्माण कंपनी की स्थापना की जिसका नाम वज्रेश्वरी कंबाइन्स थी। उनकी 100वी फिल्म भाग्यदा बागिलुथी, जबकि 200वीं फिल्म देवता मनुष्य थी। जयंती वह अभिनेत्री थीं जिसके साथ राजकुमार ने कुल 32 फिल्में की।
राजकुमार ने कर्नाटक में कन्नड़ भाषा के लिए आंदोलन में भी हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने पूरे कर्नाटक का दौरा किया। तब लोग उनकी एक झलक पाने के लिए उतावले रहते थे। पर राजकुमार कभी राजनीति में नहीं उतरे।
सन 2000 में राजकुमार उस वक्त राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आए जब 30 जुलाई को कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन ने उनका अपहरण कर लिया। गाजनूर में घर के पास अपहरण किए जाने के बाद वीरप्पन ने 108 दिनों तक उन्हें अपने कैद में रखा। 15 नवंबर 2000 को उनकी रिहाई हो गई, पर रिहाई को लेकर कई रहस्य नहीं खुल सके।
12 अप्रैल 2006 को राजकुमार के बेंगलुरु में निधन हो गया। पर कर्नाटक लोग उन्हे एक महान सितारे के तौर पर हमेशा याद रखेंगे। मैसूर के पार्क में उनकी विभिन्न भाव भंगिमाओं में तस्वीरें लगी हैं, जो उन्हें अभी भी जीवंत बना रही हैं। राजकुमार को दादा साहेब फाल्के के अलावा पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था।

पार्क से बाहर निकलने पर मुझे सजीली बग्घी दिखाई देती है। ऐसी सजीली बग्घी में बैठकर लोग मैसूर पैलेस के चारों तरफ सैर करते हैं। 2012 में अपनी मैसूर यात्रा के दौरान हमने रात को ऐसी ही बग्घी में सैर किया था। वो रात याद आ गई, पर दिन के उजाले में अब आगे चलते हैं।
-(  MYSORE, KARNATKA, KANNADA ACTOR, RAJKUMAR ) 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Friday, October 26, 2018

पुंजुर के जंगल में चाय पकौड़ा और मैसूर की सुहानी सुबह

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सत्यमंगलम के जंगलों को पार करके हम तमिलनाडु के इरोड जिले के गोबी को पार कर चुके हैं। रात गहराने लगी है। इसके बाद हालानासूर, ओंगालवाडी, कारापापलम जैसे ग्रामीण इलाके आए। जंगल में जगह जगह लिखा है- नो पार्किंग जोन। जानवरों के कारण पार्किंग से रोक है। हमारी बस अब कर्नाटक की सीमा में प्रवेश कर चुकी है।



हमलोग पुंजुर पहुंच गए हैं। यहां सड़क के बायीं तरफ एक ढाबा है नाम है होटल आल्विन, जहां पर बस रुक गई है। रात के खाने के लिए। अभी आठ ही बजे हैं, इसलिए मैंने तय किया है कि मैसूर पहुंचकर ही खाऊंगा। वैसे पुंजुर के ढाबे की खाने पीने की दरें वाजिब हैं। होटल आल्विन के आसपास वन क्षेत्र है। वातावरण बड़ा मनोरम है। अगर हल्का फुल्का खाना है तो बाहर एक कैंटीन भी है जिसमें पकौड़े भी मिल रहे हैं। जंगल में मंगल। चाय पकौड़ा लेने में क्या हर्ज है। आधे घंटे रुकने के बाद बस चल पड़ी। मैं समझ रहा था आगे गुंटलपेट आएगा। ऊटी से मैसूर के रास्ते में आया था गुंडलपेट। पर ये बस दूसरे रास्ते से जा रही है। चामराज नगर होते हुए बस मैसूर शहर की सीमा में प्रवेश कर गई है।

रात के नौ बजे हैं। मैसूर शहर में तीसरी बार प्रवेश कर रहा हूं। 1992 फिर 2013 के बाद अब 2018 के जून महीने में। मैसूर में दो बस स्टैंड हैं। हमारी बस सिटी बस स्टैंड में रात 9.40 बजे पहुंच गई है। सिटी बस स्टैंड काफी व्यवस्थित है। यहां लगेज रुम का भी इंतजाम है। बस स्टैंड के कैंपस में भी आवासीय होटल हैं। रात के दस बजने वाले हैं तो होटल जाने से पहले सोचा खाना खाने के बाद ही आगे का उपक्रम किया जाए। मैसूर के सिटी बस स्टैंड का कैंपस साफ सुथरा है। यहां से सारी रात बसें आती जाती रहती हैं। अभी रात में भी मडिकेरी जाने वाली बसें मिल रही हैं। पर मुझे सुबह वाली बस लेनी है। बस स्टैंड में अच्छा रेस्टोरेंट है। कस्तूरी भवन प्योर वेज। यहां पर खाने पीने के तमाम विकल्प हैं। पर मैं कुछ हल्का फुल्का ही लेना चाहता हूं। तो यहां पर भी चपाती मिल गई 35 रुपये में दो बड़ी चपाती। साथ में सब्जी भी है।

तो खाने से निवृत होने के बाद मैं अपने होटल की ओर चल पड़ा। होटल भाग्यलक्ष्मी पैलेस लॉज को हमने गोआईबीबो डाट काम से बुक किया है। होटल की तलाश में मुझे थोड़ी दिक्कत आई। क्योंकि मिलते जुलते नाम के दो होटल हैं। हालांकि ये होटल बस स्टैंड की दीवार के ठीक पीछे वाली गली में लश्कर मुहल्ला में स्थित है। पर होटल की तलाश में मेरा आधा घंटा समय बर्बाद हुआ। दो गलत रास्तों में तलाशने के बाद सही जगह पहुंच सका। कई सालों में ऐसा पहली बार हुआ है। होटल पहुंचने पर उन्होंने में मुझे ग्राउंड फ्लोर पर एक छोटा सा डबल बेडरुम उपलब्ध कराया।

सुबह पांच बजे जगकर मैं मैसूर की सड़क पर टहलने के लिए निकल पड़ा। मैं मैसूर के चंद्रगुप्त रोड पर हूं। सामने सड़क पर गवर्नमेंट म्यूजियम दिखाई दिया। पर यह सुबह सुबह बंद है। इसी परिसर में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय स्थित है।
मैसूर शहर की सड़कें चौड़ी-चौड़ी हैं। इन सड़कों पर तांगे अभी भी दिखाई देते हैं। मैं मैसूर शहर के विशाल घंटाघर के पास पहुंच गया हूं। आगे चलने पर मैसूर पैलेस का प्रवेश द्वार दिखाई देता है। यहां पर सैकड़ों पक्षी कलरव कर रहे हैं । सुबह लोग उन्हे दाना डाल रहे हैं। तो इस सुहानी सुबह में कुछ फोटोग्राफर और सजे संवरे लोग किले की पृष्ठभूमि में फोटोग्राफी के लिए भी पहुंच गए हैं।
(MYSORE, KARNATKA, BUS STAND, PUNJUR, CHAMRAJNAGAR )   



 विद्युत प्रकाश मौर्य
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Thursday, October 25, 2018

सत्यमंगलम के जंगल और वीरप्पन

अविनाशी में दोपहर का शानदार भोजन करने के बाद मैंने होटल के रिसेप्शन पर मौजूद मैनेजर से पूछा मैसूर जाने वाले बस पकड़ने के लिए कहां जाना उचित होगा। वापस त्रिपुर जाऊं या फिर कोयंबटूर। उन्होंने कहा कहीं जाने की जरूरत नहीं है। आप यहां से सत्यमंगलम की बस लें। सत्यमंगलम में आपको त्रिपुर और कोयंबटूर दोनों जगह से आने वाली मैसूर की ओर जाने वाली बसें मिल जाएंगी। 


इरोड जिले के सत्यमंगलम शहर में ....
अविनाशी से त्रिपुर 15 किलोमीटर है तो कोयंबटूर, मेटुपालियम और सत्यमंगलम तीनों की दूरी 40 किलोमीटर ही है। तो मैं सत्यमंगलम जाने वाली बस में बैठ गया। किराया 26 रुपये। लगभग एक घंटे का सफर। सत्यमंगलम इरोड जिले का कस्बा है। इसे संक्षेप में सती कहते हैं। तमिलनाडु रोडवेज की हरी बस एनएच 381 पर सरपट आगे बढ़ रही है।


शाम 5.30 बजे सत्यमंगलम बस स्टैंड पहुंच गया हूं। पूछताछ पर जाकर मैसूर की बस के बारे में पूछा। उन्होंने मेरे अंग्रेजी में सवाल का हिंदी में जवाब दिया। बस 5.45 में आएगी। पर कर्नाटक रोडवेज की लाल बस 5.40 में ही आ गई।


 बस में ज्यादा लोग नहीं थे। मैं आगे की सीट पर जाकर बैठ गया , जिससे सामने का बेहतरीन नजारा दिखाई दे। बस चल पड़ी। अब हम एनएच 209 पर जा रहे हैं। कुल 13 किलोमीटर बाद आया बन्नारी। यहां देवी मंदिर के सामने बस रूकी। कुछ लोग उतर गए। कुछ नए लोग चढ़े।

बस आगे चल पड़ी। थोड़ी देर में घाट सेक्शन आरंभ हो गया। एक साइनबोर्ड आया। सत्यमंगलम टाइगर रिजर्ब में आपका स्वागत है। तो हम सत्यमंगलम के जंगल से गुजर रहे हैं। बस उंचाई पर चढ़ रही है और एक के बाद एक तीखे मोड़ आने लगते हैं। हेयर पिन बैंड। कुल 27 हेयरपिन बैंड। पर इस बार कोई उल्टी नहीं हुई। आराम से सभी बैंड गुजरते गए। इसके साथ ही हम काफी ऊंचाई पर आ चुके हैं। तमिलनाडु छूटता जा रहा है। और हम कर्नाटक के करीब आते जा रहे हैं।

थोड़ी बात सत्यमंगलम के जंगलों की। कभी तमिलनाडु के सत्यमंगलम के इन्ही जंगलों में छुपकर वीरप्पन अपने तस्करी के करोबार को चलता था। तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों ही शहरों में वह अपने पैर फैला चुका था। कहते हैं कि वीरप्पन ने अपने खजाने को कर्नाटक और तमिलनाडु के बॉर्डर पर पड़ने वाले सत्यमंगलम के घने जंगलों में गड्ढे खोदकर दबाया था। वैसे इस इलाके में पैसे जेवरात और अन्य कीमती चीजें जमीन में रखने का चलन भी काफी पुराना है।
वीरप्पन तमिलनाडु के सत्यमंगलम जंगल में छुपकर अपने तस्करी के कराेबार को चलता था. तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों ही शहरों में वह अपने पैर फैला चुका था। कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन पर कम-से-कम 100 हत्याओं और चंदन तस्करी के आरोप थे। वीरप्पन को मारने के लिए नियुक्त आईपीएस विजयकुमार ने बन्नारी अम्मान मंदिर में कसम खाई कि जब तक वीरप्पन को पकड़ नहीं लेते तब तक सिर के बाल नहीं मुड़वाएंगे।


 18 अक्टूबर 2004 को  अपने साथियों के साथ तमिलनाडु के धरमपुरी जंगल में हुए एनकाउंटर में वीरप्पन को मार दिया गया। विजय कुमार ने वीरप्पन पर एक किताब 'वीरप्पन चेजिंग द ब्रिगांड'  भी लिखी है। इसमें उन्होंने वीरप्पन के बचपन से लेकर डाकू बनने तक की कहानी भी बयान की है।
बन्नारी से गोबी तक लगातार चढ़ाई थी। गोबी जंगल के बीच छोटा सा गांव है। शाम ढलने लगी है ,पर सफर जारी है। तो अलविदा तमिलनाडु। फिर आना होगा।
--- ( SRI BANNARI MARIAMMAN TEMPLE, SATYAMANGLAM, ERODE, TAMILNADU, VIRAPPAN, CHANDAN )
विद्युत प्रकाश मौर्य

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Tuesday, October 23, 2018

बन्नारी अम्मान मंदिर – सत्यमंगलम के जंगलों में शक्ति की देवी

तमिलनाडु के इरोड जिले में बन्नारी में देवी का अत्यंत सुंदर मंदिर है। मरिअम्मा देवी का यह मंदिर कई कारणों से प्रसिद्ध है। मरिअम्मा को वर्षा की देवी माना जाता है। वे दुर्गा या महाकाली का रूप मानी जाती हैं। साथ ही यह मनोकामना पूरी करने वाली देवी हैं।
कहा जाता है बन्नारी में लोगों ने बाघ और गाय को एक ही घाट पर पानी पीते हुए देखा था। इसलिए इस धरती को पवित्र माना जाता है। कोई 300 साल पहले यहां चरवाहे गाय चराते थे। पर उनकी गाय में से एक गाय दूध निकालने पर भी दूध नहीं देती थी। एक दिन देखा गया कि दिन  में एक खास जगह पर जाकर वह गाय अपने आप दूध देना शुरू कर देती है। बाद में इस स्थल पर माता का मंदिर बना। मंदिर काफी सुंदर और आकर्षक रंगों में रंगा हुआ है। 24 स्तंभों वाला शोभा मंडप श्रद्धालुओं के सहयोग से 1967 में निर्मित कराया गया। अर्थ मंडप और महामंडप मंदिर की शोभा को और बढ़ाते हैं। मंदिर परिसर में  गणेश जी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

बन्नारी अम्मान मंदिर दक्षिण मुखी है। इसके दोनों तरफ घना जंगल है। यह भी माना जाता है कि तमिलनाडु ने व्यापार करने कर्नाटक जाने वाले व्यापारियों की माता हमेशा से रक्षा करती आई हैं। मंदिर के आसपास के जंगलों में हाथी, सूअर, भालू, हिरण आदि पाए जाते हैं।
मंदिर को लेकर कई तरह के चमत्कारों की कथा कही जाती है। ब्रिटिश काल में एक अंग्रेज वन अधिकारी ने लोगों को मंदिर में होने वाले कुंदम उत्सव के लिए लकड़ियां काटने से रोक दिया। उसके बाद उस अधिकारी को लगातार उल्टी और दूसरी बीमारियां होने लगीं। जब मंदिर के कुंड से पानी लाकर उसे दिया गया तो उसकी तबीयत में सुधार होने लगा।
कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने के लिए संकल्प लेने के लिए आईपीएस विजय कुमार बन्नारी अम्मान मंदिर में पहुंचे थे।

कुंदम उत्सव में आग पर चलते हैं श्रद्धालु - मंदिर में हर साल कुंदम उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में शामिल होने के लिए तमिलनाडु के अलग अलग जिलों  लाखों लोग पहुंचते हैं। इस उत्सव में हजारों लोग आग पर चलकर पार हो जाते हैं। आश्चर्य की बात यह होती है जलती आग पर चलते हुए श्रद्धालुओं को कुछ नहीं होता। सुबह 4 बजे शुरू होने वाले इस अनूठे रस्म में बाद दोपहर तक लोग हिस्सा लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस क्रिया को करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस उत्सव के दौरान तमिलनाडु रोडवेज विशेष बसें चलाती है। वहीं हजारों पुलिस कर्मी सुरक्षा इंतजाम में लगे रहते हैं।

खुलने का समय – मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है। यह श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रात्रि 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के आसपास अब श्रद्धालुओं के लिए अतिथि गृह आदि का प्रबंध है।
कैसे पहुंचे – तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित सत्यमंगलम शहर से बन्नारी की दूरी 13 किलोमीटर है। यह गोबी से 14 किलोमीटर पहले स्थित है। सत्यमंगलम से कर्नाटक की तरफ जाने  वाली सभी बसें बन्नारी में मंदिर के पास रुकती हैं।
- ( SRI BANNARI MARIAMMAN TEMPLE, SATYAMANGLAM, ERODE, TAMILNADU )
- विद्युत प्रकाश मौर्य
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Sunday, October 21, 2018

अविनाशी लिंगेश्वर मंदिर - दक्षिण की काशी

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तमिलनाडु के त्रिपुर के शहर के अविनाशी कस्बे में शिव का अविनाशी लिंगेश्वर मंदिर स्थित है। यह तमिलनाडु के प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल है। इस मंदिर का निर्माण सुंदर पंड्या द्वारा करवा गया था। वे दक्षिण के प्रसिद्ध शैव संत सुंदरमूर्ति नयनार के करीबी थे। अविनाशी मंदिर के शिलालेखों से पता चलता है कि चोल, पांड्य और होयसल राजाओं ने इस मंदिर के निर्माण में काफी योगदान किया। अविनाशी का शिव मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित इमारतों में शामिल है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1756 का बना हुआ है। इसके परिसर को मैसूर के राजा कृष्ण राज वाडियार ने उन्नत करवाने में योगदान किया। मंदिर का परिसर ढाई एकड़ में फैला हुआ है। इसके सात मंजिला मुख्य गोपुरम का निर्माण 1980 में पूरा कराया गया।

अविनाशी मतलब जिसका कभी विनाश नहीं होता है । शिव ही तो हैं अजर, अमर और अविनाशी। अविनाशी के शिव मंदिर की एक खासियत है यहां पार्वती की स्थिति। शिव के सभी मंदिरों में पार्वती की स्थापना उनके बायीं तरफ होती है। पर यहां पर पार्वती उनके दाहिनी तरफ बैठी हैं।

अविनाशी शहर तमिलनाडु के कोंगानाडू प्रांत का हिस्सा हुआ करता था। इस प्रांत में धारापुरम, इरोड, कोयंबटूर,  त्रिपुर, इरोड, सेलम, करूर आदि शहर आते थे। संगम काल में यह शहर थिरुपुकोल्यूर नाम से जाना जाता था। कोंगानाडू क्षेत्र में कुल सात प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं, इनमें अविनाशी लिंगेश्वर प्रमुख है। अविनाशी को तमिलनाडु का काशी माना जाता है। मंदिर परिसर में एक सरोवर है जिसे गंगा तीर्थ माना जाता है। आमवस्या के दिन खास तौर पर लोग इस तीर्थ में स्नान करते आते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा दिन में प्रतिदिन अन्नदानम का भी संचालन किया जाता है।


मंदिर परिसर में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और माता विशालाक्षी की भी प्रतिमाएं हैं। मंदिर परिसर में 63 नयनारों की भी मूर्तियां हैं। मंदिर में गज लक्ष्मी और माता दुर्गा की भी प्रतिमा स्थापित है। दक्षिण भारत में शिवभक्त नयनारों का काफी महत्व है।

अविनाशी के लिंगेश्वर मंदिर में हर साल चैत्र मास में मंदिर में सालाना ब्रह्मोत्सव का मनाया जाता है।तब यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।


मंदिर खुलने का समय – सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक मंदिर खुलता है। फिर शाम को 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक मंदिर खुला रहता है। मंदिर के बाहर पूजन सामग्री की कई दुकानें है। मुख्य सड़क पर हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा है।

कैसे पहुंचे - शिव का यह मंदिर अविनाशी में चेन्नई कोचीन हाईवे एनएच 47 पर स्थित है। यह सत्यमंगलम की ओर जा रहे राजमार्ग पर बायीं तरफ स्थित है। मंदिर के पास ही बस स्टाप है, जहां आप किसी तरफ से भी आने पर उतर कर मंदिर जा सकते हैं।

अविनाशी  - शिव हैं अजर अमर और अविनाशी
तमिलाडु में त्रिपुर के पास स्थित इस कस्बे का नाम है अविनाशी। यह है शिव के प्रसिद्ध अविनाशी मंदिर के लिए। यहां महादेव शिव का नाम अविनाशी है। त्रिपुर शहर से अविनाशी की दूरी महज 15 किलोमीटर है। पर त्रिपुर शहर के तेजी से हो रहे विस्तार ने त्रिपुर और अविनाशी के बीच की दूरी खत्म कर दी है।
अविनाशी नेशनल हाईवे नंबर 47 पर स्थित है। अब अविनाशी का विकास कोयंबटूर के सब अर्बन शहर के तौर पर भी हो रहा है। अविनाशी की स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां से त्रिपुर 15 किलोमीटर तो कोयंबटूर, मेट्टुपालियम और सत्यमंगलम तीनों शहरों की दूरी 40 किलोमीटर है। त्रिपुर से स्थानीय बस में बैठकर मैं अविनाशी बस स्टैंड पहुंच गया हूं। चौड़ी और साफ सुथरी सड़कों पर अविनाशी का बाजार काफी अच्छा है।

वह यादगार लंच 
अविनाशी के बाजार में थोड़ी दूर चलने के बाद खाने की इच्छा हुई तो एक शाकाहारी भोजनालय में प्रविष्ट हुआ। नाम है होटल सीताराम। दोपहर के अनलिमिटेड भोजन की थाली 80 रुपये की है।पर मैंने 60 रुपये की लिमिटेड थाली मंगाई। अब इसमें क्या क्या है जरा देखिए। लेमन राइस , कर्ड राइस, टोमैटो राइस, वेज बिरयानी, चपाती, कोरमा, पापड़ और रायता। इतना सब कुछ बड़ी मुश्किल से खाया गया। पर स्वाद में ये खाना दक्षिण भारत में अब तक मिले सबसे बेहतरीन भोजन में था। और कीमत बिल्कुल वाजिब। मैंने होटल के मैनेजर को खास तौर पर धन्यवाद कहा।
( TAMILNADU, AVINASHI SHIVA TEMPLE ) 

-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Friday, October 19, 2018

पलनी से त्रिपुर - टेक्सटाईल सिटी ऑफ इंडिया

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मुरगन स्वामी के दर्शन के बाद होटल से चेकआउट कर बस स्टैंड पहुंच गया हूं। अब पलनी से त्रिपुर के लिए चल पड़ा हूं। हर 15 मिनट पर त्रिपुर के लिए एक बस मिल जाती है। एक बस में खिड़की के पास वाली सीट मिल गई है। पलनी से त्रिपुर की दूरी 80 किलोमीटर है। पलनी शहर को पार करके बस हरे भरे रास्ते पर आगे बढ़ रही है। कुछ देर बाद बस धारापुरम नामक कस्बे में जाकर बस स्टैंड में थोडी देर के लिए रुकी। धारापुरम अब त्रिपुर जिले का हिस्सा है, पर यह तमिलनाडु का बहुत ही प्राचीन शहर है। कभी यह चेर, पश्चिमी गंगा राजवंश और बाद में कांगू चोलस राजवंश के शासन काल में कांगू नाडू प्रदेश की राजधानी हुआ करती थी। इतिहास में इसे वंचिपुरी के नाम से जाना जाता था।

धारापुरम से बस आगे स्टेट हाईवे नंबर 37 पर बढ़ रही है। रास्ते में विंड एनर्जी के टर्बाइन खेतों में लगे नजर आए। ऐसे प्रोजेक्ट गुजरात और राजस्थान में भी हमने देखे हैं। अगला कस्बा आया कोडुवाई। यहां से त्रिपुर 22 किलोमीटर रह गया है। कोडुवाई में नागेश्वर स्वामी का मंदिर स्थित है। और अब हम त्रिपुर शहर की सीमा में पहुंच चुके हैं। कई चौक चौराहों को पार करता हुई बस शहर के बीचों बीच स्थित बस स्टैंड में पहुंच गई है। हालांकि त्रिपुर का बस स्टैंड तमिलनाडु के दूसरे शहरों के बस स्टैंड की तरह शानदार नहीं है।

त्रिपुर यानी तमिलनाडु को वह औद्योगिक शहर जो विश्व मानचित्र में अपनी बड़ी पहचान बना चुका है। हम आप सब हर रोज त्रिपुर के बने हुए उत्पादों का इस्तेमाल हर रोज करते हैं। देश के अमीर से लेकर गरीब नागरिक जो भी कॉटन होजरी के उत्पाद इस्तेमाल करते हैं इसमें 99 फीसदी त्रिपुर के बने होते है। बनियान, जांघिया, ब्रा, पैंटी, टी शर्ट कुछ भी। यहां तक की विश्व के प्रमुख बाजारों में बिकने वाले कॉटन होजरी के उत्पाद त्रिपुर से बनकर जाते हैं। नाइक और एडिडास जैसी नामचीन कंपनियां यहां से उत्पाद बनवाती हैं। किसी जमाने में कॉटन होजरी के केंद्र कोलकाता हुआ करता था। पर अब वह भी त्रिपुर में शिफ्ट हो चुका है। वीआईपी, लक्स से लेकर तमाम नए ब्रांडों का उत्पादन केंद्र त्रिपुर है।

एक अनुमान के मुताबिक त्रिपुर शहर में तकरीबन पांच लाख बिहार, यूपी, बंगाल  और ओडिशा के मजदूर होजरी के उद्योग में काम कर रहे हैं। मैं बस स्टैंड से निकल कर पैदल चलता हुआ त्रिपुर के बाजार में प्रवेश कर जाता हूं। तीन अलग अलग होजरी और गारमेंट के शोरुम में जाकर कुछ चीजें देखता हूं। अंत में एजा ( ESSA )  के शोरुम से अपने लिए कुछ चीजें खरीद लेता हूं, त्रिपुर के यादगारी के तौर पर। बाजार में एक युवक से मुलाकात हुई। वे ओडिशा के रहने वाले हैं यहां टीशर्ट पर प्रिंटिंग का काम करते हैं। चलते चलते मोतिहारी के कुछ मजदूर मिले जो सिलाई का काम करते हैं।

त्रिपुर शहर नोयाल नदी के किनारे बसा है। इसे अब देश दुनिया में वस्त्रों के शहर के तौर पर ही जाना जाता है। त्रिपुर का सालाना निर्यात 12 हजार करोड़ से अधिक का है। देश के कुल निटवियर एक्सपोर्ट में 90 फीसदी हिस्सेदारी त्रिपुर की है। तमिल राजनीति के दो बड़े नाम पेरियार और सी अन्नादुर्रै की पहली मुलाकात भी त्रिपुर में ही हुई थी। पांच लाख से ज्यादा आबादी वाला शहर 27 वर्ग किलोमीटर में फैला है। त्रिपुर सेलम से कोयंबटूर रेल मार्ग पर रेलवे से भी जुड़ा है। यहां से कोयंबटूर की दूरी 45 किलोमीटर है।

त्रिपुर शहर के सभी बाहरी मुहल्लों में होजरी उत्पादन की इकाइयां काम कर रही हैं। कई बड़े उत्पादकों के अलावा यहां पर बड़ी संख्या में जॉब वर्कर भी हैं, जो बड़ी कंपनियों को अपने उत्पादों की सप्लाई करते हैं। 

त्रिपुर शहर के आसपास के इलाके  में कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इसलिए यहां कॉटन इंडस्ट्री के कच्चा माल भी आसानी से मिल जाता है।
- ( TAMILNADU, TRIPPUR, GARMENT INDUSTRY ) 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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Wednesday, October 17, 2018

पलनी पर्वत पर जाने के लिए अनूठी रेलगाड़ी

पलनी मुरुगन स्वामी मंदिर तक आने जाने के लिए सीढियों के अलावा अनूठी रेलगाड़ी का विकल्प है। यह ढलान पर चलने वाली रेलगाड़ी है, जिसे विंच नाम दिया गया है। इसमें कुल तीन डिब्बे हैं। देखने में खिलौना ट्रेन की तरह लगने वाली यह रेलगाड़ी विद्युत ऊर्जा से धीमी गति से चलती है। तेज ढलाव वाली पटरियों पर यह चढ़ती और उतरती है। मतलब पटरी बदलने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। यहां कुल तीन रेलवे ट्रैक बनाए गए हैं। इनमें से एक ट्रैक राशन , सामग्री आदि के परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि बाकी दो ट्रैक का इस्तेमाल श्रद्धालुओं के लिए किया जाता है। इन रेलगाड़ी के डिब्बे छोटे-छोटे हैं जो चलने से पहले सुरक्षा के लिहाज से बंद कर दिए जाते हैं। यह फुनीकुल रेलवे (FUNICULAR RAILWAY ) का नमूना है। 


ऐसी रेलगाड़ियों का इस्तेमाल ढलाव वाले रास्ते पर किया जाता है। मुझे लगता है यह देश में चलने वाली तमाम रेलगाड़ियों में सबसे अलग और अनूठी है।  इसमें एक लोहे की मजबूत रस्सी चरखी में घूमती है जो तीनो कोच को धीरे धीर ऊपर या फिर नीचे लाने का काम करती है। सुरक्षा के लिहाज से इस रस्सी की हर तीन महीने में जांच की जाती है। हर एक साल बाद इस रस्सी को बदल कर नई लोहे की रस्सी लगाई जाती है।


इस रेलगाड़ी में कुल 36 लोग एक बार में बैठ सकते हैं। आधार तल से पर्वत तक रेलवे ट्रैक की लंबाई 290 मीटर है। आमतौर पर सफर में 8 मिनट का समय लगता है।
पलनी में मंदिर तक पहुंचने के लिए पहली विंच सेवा की शुरुआत 1966 में की गई। पहले विंच की वजन 32 टन है। इसमें 36 लोग सफर कर सकते हैं। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए दूसरी विंच सेवा का शुरुआत 1981 में हुई। इसमें तब 18.5 लाख रुपये का खर्च आया था। जब ये ट्रैक भी कम पड़ने लगे तब तीसरे ट्रैक की शुरुआत 1988 में की गई।

पलनी में यह रेलगाड़ी श्रद्धालुओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। आमदिनों में इसकी सेवा सुबह 6 बजे शुरू होती है जबकि भीड़भाड़ वाले दिनों में इसकी सेवा सुबह 4 बजे से ही आरंभ हो जाती है। विंच की सेवा बिजली से चलती है। पर कभी बिजली कट जाए तो उसके लिए जेनरेटर का भी इंतजाम रखा गया है।  

दो तरह का किराया सिस्टम - इस रेलगाड़ी में दो तरह का किराया सिस्टम लागू किया गया ह। इसके लिए वापसी का किराया 10 रुपये है। पर इसमें इंतजार करना पड़ता है। अगर आप 50 रुपये वाला टिकट लें तो वेटिंग हॉल में नहीं बैठना पड़ेगा। मैं जब पलनी पहुंचा हूं तो मंदिर तक चढ़ाई तो सीढ़ियों से की, पर वापसी की यात्रा विंच से की। वहीं अगर आप नीचे से ऊपर की ओर जा रहे हैं तो किराया 10 रुपये और 25 रुपये रखा गया है। तीन साल से कम उम्र के बच्चों का किराया नहीं लिया जाता है।

आधार तल पर मंदिर में चढ़ाई के लिए जहां से सीढ़ियां आरंभ होती है, उससे थोडा और आगे जाने पर विंच का स्टेशन है। जब आप पलनी जाएं तो इसकी सेवा का इस्तेमाल जरूर करें। यह काफी आनंददायक सफर है। क्योंकि विंच के ट्रैक के साथ बड़े सुंदर बागीचे हैं। इनमें रंग बिरंगे खुशूबदार फूल भी खिले रहते हैं।
दो बार हादसे हुए - अप्रैल 2004 में पलनी के विंच सेवा में एक हादसा हो गया था। तब विंच ने आगे बढ़कर काउंटर को ध्वस्त कर दिया था। इस हादसे में 34 लोग घायल हो गए थे। उसके बाद से संरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिए गए हैं। इससे पहले 1993 में भी इसी विंच से हादसा हुआ था। तब इसमें दो लोगों की मौत भी हो गई थी।
( TAMILNADU, HILL STATION, PALNI, RAIL, FUNICULAR RAILWAY, WINCH ) 

-      विद्युत प्रकाश मौर्य

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