Saturday, September 8, 2018

अनुभव मंडप (मंदिर)- विश्व गुरू की धार्मिक संसद

विश्व गुरु की 108 फीट ऊंची प्रतिमा देखने के बाद हमारी अगली मंजिल है अनुभव मंडप। अनुभव मंडप वह जगह है जहां से वासवन्ना ने आध्यात्म को जनता के बीच ले जाने के लिए लंबा कार्य किया। यह चर्चा और साधना की स्थली थी। अनुभव मंडप बसव कल्याण शहर के मध्य में स्थित है। इसे लोग पुराना मंदिर भी कहते हैं। 
 बसवन्ना मूर्ति से मैं शहर के लिए चल पड़ा हूं। एक आटो रिक्शा मिला जो मुझे मुख्य बाजार में अंबेडकर प्रतिमा तक छोड़ देता है। 


बसव 36 साल यहां रहे - पुराने शहर के बीचों बीच बसव कल्याण मंदिर स्थित है। इसे अनुभव मंडप कहा जाता है। बसव यहां अपने जीवन के 36 साल तक रहे और इसे अपना कार्य क्षेत्र बनाया। बसव का संदेश था – सभी लोग समान हैं। जन्म के आधार पर कोई ऊंचा या नीच नहीं होता। हर कोई अपनी पसंद का पेशा चुनने के लिए स्वतंत्र है। महिलाओं के जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर अधिकार है। जाति और वर्ण व्यवस्था को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। समाज में छूआछूत के लिए कोई जगह नहीं है।
लिंगायत समाज की नींव रखी - 
विश्वगुरु बशेश्वर ने अनुभव मंडप की स्थापना आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए की थी। यह उस समय एक तरह की धार्मिक संसद थी। यहां प्रतिदिन सुबह और रात के समय गोष्ठी चलती थी। यही वह स्थल है जहां से चिंतन और चर्चा के बाद महान संत का संदेश दुनिया भर में प्रसारित हुआ। कर्नाटक में बसव के मानने वाले लोग लिंगायत कहे जाते हैं। उनके भक्तों की संख्या सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के लोगों में है। वे लोग एक बसव के 12 आदेश को मानते हैं। इन आदेश में गले में एक लिंग धारण करना शामिल है।

बशेश्वर मंदिर या अनुभव मंडप का परिसर काफी शांत है। मंदिर के अंदर विश्व गुरु बशेश्वर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर का आंगन काफी सुंदर है। यहां आकर अप्रतिम शांति का एहसास होता है। पहले इसका भवन काफी साधारण हुआ करता था। बशेश्वर ट्रस्ट द्वारा अनुभव मंडप को अब भव्य रूप प्रदान किया गया है।

बसव कल्याण में मेले के समय यहां काफी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मंदिर के पास ही ट्रस्ट द्वारा निर्मित एक गेस्ट हाउस भी है। बसव कल्याण के विकास के लिए बसव कल्याण डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना की गई है।

चालुक्य राजा मान्यखेट ने कल्याण को राजधानी बनाया
इस शहर पर कलचुरि राजाओं और पश्चिमी चालुक्य राजाओं, देवगिरी के यादव राजाओं का शासन रहा। पर 1050 से 1195 तक पश्चिमी चालुक्यों या कल्याणी चालुक्यों की राजधानी रहा। चालुक्य राजा सोमेश्वर ने अपनी राजधानी को मान्यखेट से कल्याणी में स्थानांतरित किया। दसवीं से 12वीं सदी के बीच पश्चिमी चालुक्यों ने तकरीबन आधे भारत पर यहीं से राज किया।
बसव कल्याण के ज्यादातर मकान प्राचीन नजर आते हैं....पर उनपर कब्जा है। 
कल्याणी अपने खास तरह के भवन निर्माण के वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। बसव कल्याण में कई पुराने भवन और अवशेष जगह जगह दिखाई दे जाते हैं। पर इन भवनों में कई जगह प्रतीत होता है कि लोगों ने कब्जा करके अपना घर बना लिया है। कई ऐतिहासिक इमारतों में लोगों के आवास नजर आते हैं। यहां आप बसव कल्याण किले के अवशेष देख सकते हैं।


बसव कल्याण का बाजार पारंपरिक है। यहां अभी मॉल संस्कृति नहीं आई है। नगर में म्युनिस्पल कांउसिल कार्यरत है। साल 2011 की जनगणना में शहर की आबादी 70 हजार है। यह बीदर जिले का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। आजादी से पहले तक इस शहर का नाम कल्याणी था। 1956 में विश्व गुरु बशेश्वर के नाम पर इस शहर का नाम बसव कल्याण रखा गया।

कैसे पहुंचे – बसव कल्याण मुख्य शहर से धारागिरी स्ट्रीट, अल्लाह नगर पहुंचे। कोई भी आटो रिक्शा वाला पहुंचा देगा या फिर लोग रास्ता बता देंगे। शहर का बस स्टैंड बाहरी इलाके में है। वहां से भी आटो रिक्शा मिल जाएगा। किराया मोलभाव कर लें।
( ANUBHAWA MNADAP, LINGAYAT, BASAV KALYAN ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
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