Monday, September 3, 2018

बड़ी देर भई नंदलाला...तेरी राह तके बृजबाला...


कान्हा, कृष्ण मुरारी..गोवर्धन गिरधारी...हम आ गए हैं तेरी ब्रज की नगरी में... 
तो चलिए शुरू करते हैं सात कोस लंबी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा। पर इससे पहले दान घाटी में गिरिराज मंदिर में पूजा अर्चना कर लेते हैं। सभी परिक्रमा शुरू करने वाले भक्त गिरिराज मंदिर में परिक्रमा के साथ ही यात्रा की शुरुआत करते हैं। यहां पर दुग्धाभिषेक करने की परंपरा है। तो हर रोज कई मन दूध इस मंदिर में चढाया जाता है। मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। दानघाटी से ही परिक्रमा की शुरुआत होती है। 

गिरिराज मंदिर के विपरीत दिशा वाली सड़क पर शुरू होता है परिक्रमा का मार्ग। हां परिक्रमा नंगे पांव की जाती है, तो मैं अपनी चप्पले उतार कर अपने बैगपैक में डाल लेता हूं। जो लोग 21 किलोमीटर की पदयात्रा करने में खुद को सक्षम नहीं पाते उनके लिए विकल्प है। ये ठेला गाड़ी। एक ठेले पर दो लोगों बिठाकर पूरी परिक्रमा करा दी जाती है।किराया है एक आदमी के लिए 200 रुपये। रास्ते में मुझे धोबी समाज का धर्मशाला दिखाई देता है। अक्सर धार्मिक स्थलों पर अलग अलग जातीय समाज के धर्मशाला मिलते हैं। पर धोबी (रजक) समाज का भी धर्मशाला गोवर्धन में देखकर खुशी होती है।

थोड़ी दूर चलने के बाद सड़क छोड़कर सड़क के समांतर गोवर्धन पर्वत के तलहटी में बने कच्चे रास्ते पर चल पड़ता हूं। दोपहर के 12 बजे हैं और मेरे आगे पीछे कुछ और पदयात्री चल रहे हैं। हम पर्वत के साथ साथ हरे भरे बाग में चलते जा रहे हैं। पेड़ों की छांव में गरमी बिल्कुल नहीं सता रही।

हमारे साथ एक परिवार है जो मध्य प्रदेश के इंदौर (मालवा) क्षेत्र के खरगोन से आए हैं। डॉक्टर श्याम नीमा मनोचिकित्सक हैं। वे अपने परिवार के साथ हर छह माह में एक बार गोवर्धन परिक्रमा करने चले आते हैं। वे वैष्णव हैं। कई पीढ़ियों से उनका परिवार कृष्ण भक्त है। उनसे बातों बातों में रास्ता कटता जा रहा है। वे बताते हैं कि परिक्रमा के दौरान किसी गोवर्धन पर्वत की शिला पर बैठना या पांव नहीं रखना है। क्योंकि हर शिला कान्हा जी का प्रतीक है।

 कहते हैं कि कान्हा की याद में राधा के दोनों नयन हमेशा नम रहते हैं। तो राधा की पीड़ा गीतों में फूट पड़ती है... कान्हा रे तू राधा बन जा..भूल पुरुष का मान ... तब होगा तुझको राधा के पीड़ा का अनुमान रे...
कहा जाता है कि गोवर्धन परिक्रमा में आपकी किसी न किसी रूप में कान्हा जी से मुलाकात होती है। बस आप कान्हा में ध्यान लगाए रखें। राधा रानी को याद करते रहें। आपको कान्हा की मुरली धुन सुनाई देगी। कन्हैया, नंदलाला, मुरलीवाला...ऐसी बजाए मुरली...मुरलिया जादू भरी...

करीब पांच किलोमीटर के सफर के बाद रास्ता दाहिनी तरफ मुड़ता है। फिर थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ मुड़ने के बाद पर्वत की परिक्रमा वापसी की ओर होने लगती है। यहीं पर जगह रूक कर हम पानी और मौसमी का जूस लेते हैं। थोड़ा सुस्ताने के बाद फिर पदयात्रा शुरू। गोवर्धन पर्वत की औसत ऊंचाई 30 मीटर ही है। कहा जाता है कि पांच हजार साल पहले यह काफी ऊंचा हुआ करता था। पर पुलत्स्य ऋषि के शाप के कारण यह हर रोज एक मुट्ठी कम होता जा रहा है। कहा मथुरा वृंदावन के लोगों को अति वृष्टि से बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने इस पूरे पर्वत को अपनी कानी उंगली पर उठा लिया था। तब इस पर्वत ने छाता का काम किया था।


हमलोग मुखारविंद पहुंच चुके हैं। यहां पर प्राचीन मंदिर है। डाक्टर नीमा यहीं पर रुक जाते हैं, क्योंकि उन्होंने परिक्रमा यहीं से आरंभ की थी। मैं आगे निकल पड़ता हूं। जतीपुरा गांव आता है। यहां पर कुछ मंदिर हैं। वहां नन्ही बालिकाएं मेरे ललाट और गालों पर श्री राधे की छाप लगा देती हैं। मैं श्रीराधे के गान के साथ आगे बढ़ चला।

कुछ गलियां पार करने के बाद सड़क पर। एक बार फिर कच्चे रास्ते की पगडंडी पकड़ ली है। थोडी प्यास लगी है तो इस बार गन्ने का जूस। गोवर्धन में आपको नास्ते में इंदौर का पोहा, राजस्थान का दाल बाटी चूरमा, पूड़ी सब्जी, कचौड़ी जो भी ढूंढे सब कुछ मिल जाएगा। पर सावन में घेवर का मौसम है। सवा तीन घंटे में हमने 12 किलोमीटर की बड़ी परिक्रमा पूरी कर ली है। अब थोड़े से विश्राम के बाद छोटी परिक्रमा आरंभ करूंगा।

 ( GOVARDHAN PARIKRAMA, RADHA KRISHNA, MATHURA,  ) 

-विद्युत प्रकाश मौर्य

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