Friday, September 21, 2018

चोल राजाओं का वैभव देखें - तंजौर का किला

चाचा-भतीजा डेनियल ने भारत के तमाम ऐतिहासिक स्थलों की शानदार पेंटिंग बनाई थी। इनमें से एक है बिहार के रोहतास गढ़ किले की पेंटिंग। पर ये पेंटिंग मुझे दिखाई दे रही है तमिलनाडु के तंजौर में राजा के निजी संग्रहालय में। तो यहां मेरा रोहतास जिला है पेंटिंग में मौजूद। वैसे तो डेनियल की ज्यादा पेंटिंग पटना संग्रहालय में देखने को मिली थीं। पर तंजौर के राजा भी पेंटिंग के बड़े शौकीन थे। इसलिए सरस्वती भवन में उनकी कलाप्रियता दिखाई देती है। 


तंजौर के तमाम मंदिर देखने के बाद अब हम इतिहास और विरासत की ओर बढ़ चले हैं। आप भी तंजौर के चोल राजाओं की विरासत को जानना और समझना हो तो तंजौर फोर्ट और सरस्वती भवन जरूर पहुंचे। प्रवेश का टिकट 50 रुपये का है। कैमरे के लिए 50 रुपये का शुल्क अलग से है। फिर भी सरस्वती भवन के संग्रह की फोटोग्राफी पर प्रतिबंध है। पर ये छोटा सा संग्रहालय बहुमूल्य है।

सरस्वती भवन के इस संग्रहालय में दक्षिण के प्रसिद्ध कंब रामायण की 1719 की दुर्लभ पांडुलिपी देखी जा सकती है। इसमें कुल 537 पन्ने हैं। इसके अलावा कई पुस्तकों और पांडुलिपियों का बेहतरीन संग्रह है। यहां आप अश्व शास्त्र, गज शास्त्र समेत कई पुरानी कॉफी टेबल बुक्स देख सकते हैं। यहां आप चोल राजाओं की भी बेहतरीन पेटिंग देख सकते हैं।

साल 1820 में तंजौर के राजा सरफोजी अपने लाव लश्कर के साथ वाराणसी घूमने गए। वहां बनारस शहर उन्हें इतना पसंद आया कि शहरों को यादों में बसा लेने के लिए उन्होंने अपने कलाकारों से बनारस के घाटों की पेंटिंग बनवाई। तो आप यहां पेंटिंग में 1820 का बनारस का दशाश्वमेध घाट देख सकते हैं। यहां कुल 64 घाटों की पेंटिंग है। सरस्वती भवन लाइब्रेरी के बिक्रय केंद्र से कुछ पुस्तकें खरीदी भी जा सकती हैं।

अब आगे चलते हैं पैलेस में आर्ट गैलरी से आगे मूर्तिकला का विशाल संग्रह है। इस संग्रह में बुद्ध प्रतिमाएं, शिव और कार्तिकेय की प्रतिमाएं। गणेश की नृत्य रत प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। यहां मौजूद ज्यादातर मूर्तियां तंजौर और आसपास के क्षेत्रों से लाई गई हैं। ज्यादातर मूर्तियां 11वीं और 12वीं सदी के चोल काल की हैं। यहां राजा सरफोजी की संगमरमर की बनी हुई एक विशाल प्रतिमा भी देखी जा सकती है।

पूरे संग्रहालय के तीन हिस्से हैं। आगे आप विशाल आंगन में पहुंच जाते हैं। वहां आप विशाल दरबार हॉल भी देख सकते हैं। इस हॉल में लकड़ी का बेहतरीन काम हुआ है। पर सब कुछ आज भी अच्छे हाल में दिखाई देता है। दरबार हॉल में चटख रंगों का इस्तेमाल हुआ है जो आज भी तरोताजा दिखाई देता है। दीवारों पर मूर्तिकला और चित्रकला का सुंदर संयोजन है।

92 फीट की ह्वेल-  अब चलिए पहली मंजिल पर चलते हैं। यहां पर एक विशाल ह्वेल की असली अस्थि पंजर यानी स्केल्टन देखने को मिलता है। इसे बड़े जतन से संभाल कर रखा गया है। यहां पर इस ह्वेल की कहानी भी बयां की गई है। कुल 92 फीट लंबी इस ह्वेल को 1955 में प्राप्त किया गया था। फिशरी डिपार्टमेंट ने इस ह्वेल को आर्ट गैलरी को उपहार स्वरूप प्रदान किया था। 


आठ मंजिला गुडापुरम - सरस्वती भवन से लगा हुआ आठ मंजिला विशाल टावर गुडापुरम देखा जा सकता है। यह 190 फीट ऊंचा है। इस पर चढ़ने के लिए सीढियां भी बनी हुई हैं। राजा के महल के इस हिस्से को बेल टावर कहते हैं।

खुलने का समय - संग्रहालय सुबह 10 बजे से 5 बजे तक खुला रहता है। संग्रहालय में प्रवेश के लिए टिकट 50 रुपये का है।अंदर की कुछ विथिकाओं के लिए अलग से टिकट है। हर बुधवार को संग्रहालय बंद रहता है। इसलिए अपनी योजना इसी के अनुरूप बनाएं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य
ईमेल - vidyut@daanapaani.net
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