Sunday, September 30, 2018

त्रिची रेलवे स्टेशन पर जापानी स्टीम लोकोमोटिव

श्रीरंगम रंगनाथ स्वामी के दर्शन करके वापस लौट रहा हूं। आज का रात्रि विश्राम त्रिची शहर में ही है। मंदिर के पास से त्रिची बस स्टैंड तक जाने वाली बस मिल गई। बस रास्ते में त्रिची के भीड़ भाड़ वाले बाजारों से होकर गुजरी। गांधी मार्केट में रात को अति व्यस्त सजा हुआ बाजार नजर आता है। पर मैं बस स्टैंड से पहले तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन के सामने ही उतर जाता हूं।

तमिलनाडु का अति व्यस्त रेलवे स्टेशन -  तिरुचिरापल्ली जंक्शन तमिलनाडु का एक अतिव्यस्त रेलवे स्टेशन है। इसका स्टेशन कोड टीपीजे है। यह चेन्नई सेंट्रल के बाद तमिलनाडु का दूसरा सबसे बड़ा और व्यस्त रेलवे स्टेशन है। त्रिची रेलवे  का डिविजन भी है। डीआरएम आफिस रेलवे स्टेशन के बगल में ही स्थित है। इतिहास में जाएं तो यहां मीटर गेज की रेलवे लाइन 1859 में बनी थी तब त्रिची से नागापट्टनम के बीच पहली लाइन बिछाई गई थी। त्रिची तमिलनाडु के मानचित्र में देखें तो बिल्कुल बीच का शहर है। इसलिए यहां से तमिलनाडु के हर कोने के लिए ट्रेनें मिल जाएंगी। किसी जमाने में तमिलनाडु के ज्यादातर हिस्से मीटर गेज लाइन वाले थे। त्रिची से विल्लूपुरम, वेल्लोर, तंजौर, पुड्डुचेरि , कराइकल, माइलादुताराई, मन्नारगुडी आदि के लिए लाइने जाती हैं। चेन्नई और मदुरै की तरफ भी यहां से जा सकते हैं।

जापानी स्टीम लोकोमोटिव वाईजी 4310 - त्रिची रेलवे स्टेशन के बाहर एक स्टीम लोकोमोटिव को संरक्षित करके रखा गया है। आते जाते लोगों की नजर इस लोकोमोटिव पर पड़ती है। इसके ऊर लिखा है इसका माडल नंबर वाईजी 4310 । यह एक स्टीम लोकोमोटिव हुआ करता था।  इसका मेक नंबर निप्पौन 1740 है। यह 1956 का बना हुआ लोकोमोटिव है। इसकी पहियों की संरचना 2-8-2 श्रेणी की है। इसने तकरीबन चार दशक तक इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दीं। वाईजी मीटर गेज के स्टीम इंजनों की आखिरी श्रंखला है। इसका निर्माण जापान की निप्पोन शारयो सेजो कैशल कंपनी लिमिटेड (Nippon Sharyo Seizo Kaishal Co Ltd Japan) ने किया था। भारत में निप्पौन जापान से ज्यादातर नैरोगेज के लोकोमोटिव मंगाए गए थे। वाईजी सीरीज के मीटर गेज स्टीम इंजन मंगाने के दो उदाहरण ही मिलते हैं। वैसे निप्पौन शारयो जापान की अग्रणी रॉलिंग स्टॉक निर्माता कंपनी है।
इसकी स्थापना 1896 में हुई थी। तो इस जापानी लोकोमोटिव को चारों तरफ से जी भरकर देख लेने के बाद आगे बढ़ जाता हूं।

त्रिची शहर में लोकल सफर के लिए आटो रिक्शा से थोड़ी बड़ी गाड़ियां चलती हैं जो आकार में किसी बस जैसी हैं। मुझे बस स्टैंड से डिंडिगुल रोड पर जाने के लिए ऐसी ही गाड़ी मिल गई। अपने होटल पहुंच गया हूं। पर होटल का रेस्टोरेंट रात को बंद रहता है। तो आसपास में खाने के लिए कुछ दूसरे विकल्प तलाश करने निकला। 
एक रेस्टोरेंट मिला जहां चपाती मिल रही है। 35 रुपये में दो चपाती सब्जी के साथ। इस बार की दक्षिण यात्रा में मैं देख रहा हूं कि चपाती हर जगह मिल जा रही है। कहीं तुरंत बनाई जाती है तो कहीं हॉफ कुक्ड रेडिमेड चपाती को जल्दी से पका कर पेश कर दिया जाता है। पर यह अच्छा है कि आप उत्तर भारत से आए हैं तो आपको चपाती मिल जाएगी। हालांकि मैं तो दक्षिण भारतीय खाना खाकर महीनों गुजार सकता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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(TRICHY STEAM LOCOMOTIVE, RAIL ) 

Friday, September 28, 2018

धरती पर वैकुंठ – श्रीरंगम मंदिर, तिरुचिरापल्ली

श्रीरंगम मंदिर ( भगवान विष्णु का मंदिर ) 
क्या आपको पता है कि देश का सबसे विशाल मंदिर कौन सा है। जवाब है तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर। यह मंदिर 156 एकड़ में फैला है। वहीं दुनिया का सबसे विशाल मंदिर कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर है, जिसका परिसर 402 एकड़ में फैला है। तीसरे नंबर पर दिल्ली का अक्षर धाम मंदिर आता है जो 60 एकड़ में बना है। 
तिरुचिरापल्ली शहर में कावेरी नदी सानिध्य में 'श्रीरंगम' नामक द्वीप पर बने श्रीरंगम मंदिर को 'भू-लोक वैकुंठ' अर्थात् 'धरती का वैकुंठ' कहा जाता है। श्रीरंगम आकार में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर माना जाता है। कंबोडिया के अंकोर वाट के बाद ये मंदिर भव्यता में सबसे बड़ा है। यह 156 एकड़ में विस्तारित है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए देश भर में चर्चित है।

दक्षिण भारत के कुल 108 वैष्णव मंदिरों में श्रीरंगम का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। वैष्णव भक्त रंगनाथस्वामी मंदिर को स्वर्ग के लिए पवित्र प्रवेश द्वार मानते हैं। भगवान को रंगनाथन के रूप में पूजा जाता है, इन्‍हे भगवान विष्‍णु का ही अवतार माना जाता है। मंदिर के अंदर आदिशेष भगवान विष्णु की शैय्या पर लेटी हुई अखंड भव्य काले रंग की प्रतिमा है।

इस मंदिर, द्रविण शैली में बना हुआ है। मंदिर का निर्माण चोल वंश के राजकुमार धर्म वर्मा ने करवाया था। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को क्षति पहुंचाई। बाद में चोल, पांड्य, होयसल राजाओं ने मंदिर और भव्य रूप प्रदान किया। वर्तमान मंदिर 15वीं सदी का बताया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर आदि शंकराचार्य के समय काफी प्रसिद्ध था। यह कहा जाता है की आदि शंकराचार्य खुद यहां आकर भगवान के लिए रंगनाथाष्टकम गाते थे।

सात घेरों के अंदर मंदिर - श्रीरंगम का मंदिर कुल सात घेरों के अंदर है। इनमें से चार घेरों में श्रीरंगम का नगर बसा हुआ है। मंदिर के बाहरी घेरे का परिमाप 3 किलोमीटर लंबा है। मंदिर के अंदर का मुख्य आकर्षण 1000 स्तंभों वाला मुख्य कक्ष है। इन स्तंभों में अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर परिसर में कुल 53 देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

विशाल गोपुरम – श्रीरंगम मंदिर में कुल 21 गोपुरम बनाए गए हैं। इसमें दो गोपुरम काफी विशाल हैं। मंदिर का सातवां घेरा पूरी तरह तैयार नहीं हो सका था। आप छठे घेरे के विशाल गोपुरम से मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं। यह गोपुरम सबसे विशाल है।

मंदिर की आदि कथा – कहा जाता है कि श्रीराम राज्याभिषेक के पश्चात् विभीषण ने श्रीरघुनाथजी से श्रीरंगजी को मांग लिया। वह इन्हें लेकर लंका जा रहे थे। इसी दौरान रंगद्वीप में उन्हें रखकर स्नान पूजन करने लगे। पूजा के बाद रंगजी उठाना चाहा पर वे नहीं उठा सके। वे अनशन करने लगे तो स्वप्न में आदेश हुआ कावेरी का यह द्वीप मुझे प्रिय है। मैं लंका की ओर मुख करके स्थित हो जाउंगा। तुम यहीं दर्शन कर जाया करो। तबसे श्रीरंगजी यहीं पर विराजमान हैं। मंदिर में रंगजी की प्रतिमा शयनावस्था में है। प्रतिमा काले पत्थरों की है। श्रीरंगनाथ स्वामी शेषनाग की शैय्या पर विराजमान हैं। उनकी गिनती दक्षिण भारत के जागृत देवताओं में होती ैहै, जो किसी भी तुरंत सुन लेते हैं। 

श्रीरंगम के लोगों के लिए तो रंगजी एक जीवित व्यक्ति की तरह हैं। स्थानीय लोग मंदिर इस तरह जाते हैं जैसे वे अपने परिवार के ही किसी सदस्य से मिलने जा रहे हों। इसलिए सुबह हो या शाम सालों भर मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ती है।
दर्शन का समय – मंदिर सुबह से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। दोपहर में कुछ घंटों के लिए मंदिर बंद रहता है। मंदिर में एक साइनबोर्ड पर लिखा है- वनली हिंदूज आर एलाउड। मार्गशीष में आने वाली वैकुंठ एकादशी के समय श्रीरंगम में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। वहीं हर महीने के शुक्लपक्ष में सप्तमी के दिन श्रीरंगजी की जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण दशमी के दिन यहां कावेरी में स्नान करने से आठ तीर्थों का पुण्य मिलता है।
रंगनाथ मंदिर का प्रसाद -  मंदिर के अंदर बने प्रसाद काउंटर से आप प्रसाद खरीद सकते हैं। यहां 15 रुपये में लेमन राइस प्रसाद के रुप में लिया जा सकता है। इसके अलावा भी कई तरह के प्रसाद हैं, जिनकी दरें बोर्ड पर लिखी हैं। आप अपनी सुविधानुसार प्रसाद खरीद सकते हैं।

कैसे पहुंचे - तिरुचिराप्पल्ली शहर के निकट कावेरी और कोलेरून नदियों के विभाजन के एक द्वीप पर यह मंदिर स्थित है। त्रिची रेलवे स्टेशन ( स्टेशन कोड - TPJ ) से मंदिर की दूरी 12 किलोमीटर है। मंदिर तक जाने के लिए त्रिची बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से लोकल बसें मिल जाती हैं। वैसे श्रीरंगम में भी रेलवे स्टेशन है। मंदिर के आसपास भी श्रद्धालुओं के रहने के लिए सस्ते आवास उपलब्ध हैं। अगर आप कुछ घंटे के लिए ठहरना चाहते हैं तो ऐसे आवास भी उपलब्ध हैं। मंदिर प्रबंधन की ओर से भी यात्री निवास का निर्माण कराया गया है।

मंदिर की ओर - मैं रॉक फोर्ट मंदिर के दर्शन के बाद श्रीरंगम के लिए चल पड़ा हूं। लोकल बस मिल गई है। थोड़ी भीड़ है पर बाद में जगह मिल गई। श्रीरंगम बस स्टैंड से मंदिर के लिए एक किलोमीटर की पदयात्रा है। पर बाजार का मुआयना करते हुए मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंच गया। दर्शन के लिए लंबी लाइन है। दो घंटे इंतजार के बाद श्रीरंगजी के दर्शन प्राप्त हुए। मंदिर के बाकी हिस्सों का मुआयना करता हुआ बाहर आ गया।

(SRI RANGAM TEMPLE, TRICHY, BIGGEST TEMPLE COMPLEX IN INDIA ) 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


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Thursday, September 27, 2018

रॉक फोर्ट मंदिर : 417 सीढियों की चढ़ाई और कावेरी नदी

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त्रिची शहर का रॉक फोर्ट टेंपल अदभुत है। मंदिर के शहर के बीचों बीच एक विशाल चट्टान पर स्थित है इसलिए इसका नाम रॉक फोर्ट टेंपल है। मंदिर में जाने का रास्त बीच बाजार से होकर है। नीचे चप्पल स्टैंड पर अपनी पादुका उतार कर आपको 417 के आसपास सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। मंदिर की ऊंचाई 272 फीट है। चोटी पर दो मुख्य मंदिर बने हैं। एक शिव पार्वती का और दूसरा गणपति का।
मंदिर में चढ़ने के रास्ते घुमावदार हैं। इन रास्तों में बीच में कई मंदिर आते हैं। पर मंदिर की चोटी से त्रिची शहर का अदभुत नजारा दिखाई देता है। त्रिची शहर के बीचों बीच सेंट थॉमस कॉलेज से मुख्य बाजार में प्रवेश करने पर एक विशाल सरोवर आता है। उससे आगे चलने पर बायीं तरफ एक पतली गली है। इसमें अंदर जाने पर रॉक फोर्ट मंदिर का प्रवेश द्वार है। यहीं पर जूते चप्पल जमा करने का स्टैंड है। इसके बाद शुरू हो जाती है चढ़ाई। आधार तल पर भी दो मंदिर हैं। मंदिर की चढ़ाई किसी तिलिस्मी किले में प्रवेश जैसी है। 
पत्थरों को काटकर बनाई गई घुमावदार सीढ़ियां। बीच में ठहराव आता है। हर ठहराव पर भी कुछ मंदिर बने हैं। इनके दर्शन करते हुए आगे बढ़िए। पत्थरों को काटकर बनाई गई विशाल गुफा में शिव का अदभुत मंदिर है। इसे तमिल में थाईयूमुनवार मंदिर कहते हैं। 

इस मंदिर का निर्माण छठी शताब्दी में पल्लव राजा महेंद्रवर्मन ने कराया था। इसके साथ ही माता पार्वती भी विराज रही हैं। मंदिर की दीवारों पर देवी देवताओं के सुंदर चित्र भी उकेरे गए हैं। मंदिर परिसर में शिव के भक्त 63 नयनारों की भी प्रतिमाएं हैं। दक्षिण के कुछ मंदिरों में आपको इन नयनारों की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। पल्लव राजाओं के बाद मदुरै के नायक शासकों ने इस मंदिर परिसर में कुछ नवनिर्माण कराए।  

शिव पार्वती के मंदिर के दर्शन के बाद फिर ऊपर की ओर चढ़ाई है। इस चढाई के बाद आप खुले आसमान में आ जाते हैं। यहां पर गणेश जी का मंदिर है। यानी गणेश जी का मंदिर पर्वत की शीर्ष चोटी पर है। इसे तमिल में उच्ची पिलियार मंदिर कहते हैं। यह सातवीं सदी का बना हुआ मंदिर है। श्रद्धालु मंदिर में मत्था टेकते हैं। इसके बाद यहां से पूरे तिरूचिरापल्ली शहर का विहंगम नजारा करते हैं। मंदिर में हर शाम को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है।

रॉक फोर्ट मंदिर की चोटी से पूरे त्रिची शहर का नजारा दिखाई देता है। पर यहां से शहर के बीचों बीच बह रही कावेरी नदी का विस्तार दिखाई देता है। पर आश्चर्य तब होता है जब यह देखते हैं कि कावेरी नदी में एक बूंद भी पानी नहीं है। यानी कावेरी नदी यहां पर बिल्कुल सूखी हुई हैं। कावेरी का तो सारा पानी कर्नाटक में ही रूका हुआ है। मंदिर परिसर में इसके शीर्ष पर मुझे बुरके वाली मुस्लिम युवतियां भी नजर आती हैं जो इस शीर्ष से शहर के सौंदर्य का नजारा लेने आई हैं।
त्रिची के रॉक फोर्ट टेंपल से शहर का नजारा, बीच में सूखी हुई कावेरी नदी और सामने श्रीरंग मंदिर का गोपुरम दिखाई दे रहा है।

खुलने का समय मंदिर सुबह 5.30 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में चैत्र मास में बड़ा उत्सव मनाया जाता है जो 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
( ROCK FORT TEMPLE, TRICHY ) 
    विद्युत प्रकाश मौर्य

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Wednesday, September 26, 2018

साल्ट सिटी था फारुख नगर – कभी यहां 40 कुओं से निकलता था नमक

गढ़ी हरसुरु से स्टीम लोकोमोटिव के सफर पर हम चल पड़े हैं फारुख नगर की ओर। ये सफर 12 किलोमीटर का है। रास्ते में एक स्टेशन आता है सुल्तानपुर कालियावास । गाड़ी यहां रुकती है। स्टीम चलित ट्रेन को देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा है। थोड़ी देर रुकने के बाद सिटी बजाती हुई ट्रेन आगे के सफर पर चल पड़ी। रेलवे लाइन केएमपी (कुंडली मानेसर पलवल एक्सप्रेस वे ) को पार करती हुई आगे बढ़ गई। दोनों तरफ हरे भरे खेत हैं। कुछ मिनट के सफर के बाद हमलोग पहुंच गए हैं फारुख नगर। इस स्टीम के सफर के साथ रेवाड़ी स्टीम शेड के प्रभारी आरएच मीणा और उनकी पूरी टीम भी आई हुई है। रेलवे की ओर से नए बहाल हुए दो असिस्टेंट लोको पायलटों के भी भेजा गया है स्टीम की कार्य प्रणाली को समझने के लिए।

बड़े पैमाने पर नमक का निर्यात  - फारुख नगर स्टेशन पहुंचना मतलब अतीत की यादों में खो जाने जैसा है। सन 1732 में इस नगर को नवाब फौजदार खान ने बसाया था। 
फारुखनगर अब गुरुग्राम जिले की नगरपालिका है। यहां आप नवाब फौजदार द्वारा निर्मित शीश महल, दिल्ली गेट, जामा मसजिद, बावडी , शैतान की छतरी आदि देख सकते हैं। शीश महल में इन दिनों नगर पंचायत का दफ्तर है।
इलाके का पानी अत्यंत खारा था। इसलिए यहां के पानी से नमक निकाला जाता था। खारे पानी को खाली प्लाटों में सुखाकर नमक तैयार किया जाता था। फारुखनगर के आसपास कुल 40 कुएं थे जिनसे नमक निकलता था। इस नमक को रेलगाड़ी से ट्रांसपोर्ट करके दिल्ली ले जाया जाता था। वहां से नमक अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजा जाता था। कभी फारुख नगर से हर साल 18350 टन नमक रेलगाड़ी से ले जाया जाता था।

1873 में आई रेलवे लाइन - फारुख नगर के नमक की मांग को देखते हुए ही यहां तक ब्रिटिश काल में 1873 में दिल्ली से रेलवे लाइन बिछाई गई थी। यह मीटर गेज लाइन तब नमक की ढुलाई के लिए बिछाई गई थी। पर कुछ दशक बाद यहां का नमक को राजस्थान के सांभर साल्ट वर्क्स के नमक से टक्कर मिलने लगी। फारुख नगर का नमक महंगा पड़ने लगा तो कारोबार कम होने लगा। एक समय ऐसा आया जब 1923 में यहां से नमक निकालने का काम बिल्कुल बंद हो गया। फिर इस रेलवे लाइन की अहमियत भी कम हो गई। इसके साथ ही फारुकनगर में बेरोजगारी भी बढ गई। उसके बाद यह इलाका अभिशिप्त हो गया।

2011 में ब्रॉडगेज लाइन - आजादी बाद इस लाइन पर कुछ पैसेंजर ट्रेने चलती रहीं। सन 2000 के आसपास दिल्ली से रेवाड़ी और अन्य मार्गों को मीटर गेज से ब्राड गेज में बदला गया। पर गढ़ी हरसुरु जंक्शन से फारुख नगर की 12 किलोमीटर की रेलवे लाइन को 2011 में ब्राडगेज में बदला गया। अब यहां तक हर रोज कुछ पैसेंजर ट्रेनों का संचालन होता है। पर फारुखनगर रेलवे स्टेशन बाबा आदम के जमाने का दिखाई देता है।
अब स्टेशन बिल्डिंग को नया रूप दिया गया है। पास में एक मिनी स्टेडियम का निर्माण रेलवे ने कराया है। रेलवे यहां पर स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए भी कुछ कार्य कर रही है। पर रेलवे स्टेशन पर टिकट की व्यवस्था अभी भी गत्ते वाली ही चल रही है। 

फारुक नगर वैसे गुरुग्राम से पटौदी रोड पर है। सड़क मार्ग से यहां पहुंचना आसान है। गुरुग्राम यहां से 25 किलोमीटर तो पटौदी सात किलोमीटर है। हरियाणा के दूसरे जिले झज्जर की दूरी यहां से 23 किलोमीटर है। अब इस रेलवे लाइन को आगे झज्जर तक विस्तार देने की मांग उठ रही है।


फारुख नगर के इलाके में ज्यादातर क्षेत्रों में पानी आज भी खारा है। पर यहां कई औद्योगिक इकाइयां आ रही हैं। मारुति अपना दूसरा प्लांट लगा रही है। पानासोनिक भी पहुंच गई है। कुछ और कंपनियां आने वाली है। तो फारुख नगर के दिन फिर से बहुरने लगे हैं। गांव के लोगों को 1.17 करोड़ प्रति एकड़ के दर से मुआवजा मिला है।
फारुख नगर रेलवे स्टेशन के पास मुझे कई सौ नई मारूति कारों के विभिन्न माडल दिखाई दे रहे हैं। दरअसल यहां से मारुति कारों की रेलवे में लोडिंग होती है। इसके लिए मोबाइल एक रैंप भी बना हुआ है।
   
वापसी का सफर - चलिए वापसी का समय हो गया है। आजाद लोकोमिटव को ट्रेन से काटकर पीछे से लाकर आगे लगाया जा चुका है। स्टीम स्पेशल की वापसी का समय 11.15 बजे का है। ट्रेन ने सिटी बजा दी है। हम वापसी का टिकट खरीदकर ट्रेन में सवार हो गए हैं। हल्की बारिश हो रही है। फारुख नगर में जिन इलाकों में मीठा पानी है वहां फूलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। गेंदे के फूल झूम रहे हैं और ट्रेन आगे बढ़ती जा रही है। वापसी में भी ट्रेन सुल्तानपुर कलिवास में रुकी। 

ट्रेन में मेरे साथ सफर कर रहे हंसराज यादव मेरे दोस्त बन गए हैं। वे भले ही प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं पर रेलवे के बारे में उनका ज्ञान अदभुत है। वे देश भर में रेलवे में हो रही घटनाओं से अपडेट रहते हैं। वे कह रहे हैं कि मैं तो हर हफ्ते इस स्टीम के सफर पर आउंगा। स्टीम एक्सप्रेस 12 बजे से पहले गढ़ी हरसुरु में आकर रुक गई। तो अब आजाद को अलविदा कहने का समय है।
(HARYANA , RAIL , STEAM LOCOMOTIVE, AZAD, FARUKHNAGR, SALT CITY ) 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


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Tuesday, September 25, 2018

स्टीम इंजन आजाद के साथ एक सफर – अतीत की याद

धुआं उड़ाती स्टीम इंजन की याद तो आपको होगी न। पर अगर आपने इक्कीसवीं सदी में होश संभाला हो तो शायद आपको इसकी याद न हो। क्योंकि 1998 के बाद देश के ज्यादा हिस्सों से स्टीम इंजन की विदाई हो चुकी थी। पर भारतीय रेलवे ने तमाम स्टीम इंजन को संरक्षित करके रखा है हरियाणा के रेवाड़ी स्टीम शेड में। 
इनमें से कई इंजन कुछ फिल्मों की शूटिंग में इस्तेमाल किए गए हैं। पर आम जनता को स्टीम इंजन की सवारी का एक बार फिर से मौका मिले इसके लिए रेलवे ने मौका दिया है। ब्राड गेज के स्टीम इंजन आजाद के साथ सफर का आनंद ले सकते हैं आप हर रविवार को गुरुग्राम के पास गढ़ी हरसुरु नामक रेलवे स्टेशन से फारुख नगर के बीच। वैसे तो इसका उदघाटन 15 सितंबर को हुआ, पर आम जनता के लिए इसे रविवार 23 सितंबर को शुरू किया गया।  
  
स्टीम स्पेशल की पहली औपचारिक राइड, गुरुग्राम के पास गढ़ी हरसुरु से फारुख नगर के बीच। रविवार की सुबह गढ़ी हरसुरु रेलवे स्टेशन से स्टीम का सफर सुबह 9.30 बजे आरंभ होता है। स्टीम लोको आजाद सात कोच को लेकर चल रहा है एक सुहाने सफर पर। इसके सभी कोचों को तिरंगे रंग में रंगा गया है। वैसे ये ट्रेन हर रविवार को ये सफर सुबह नौ बजे चलेगी गढी हरसुरु से फरुख नगर के बीच। आप 25 नवंबर तक इस हेरिटेज सफर पर सवार हो सकते हैं। और एक तरफ का टिकट है महज 10 रुपये का। 

पहले दिन के सफर में कई रेलवे के इस विरासत के सफर के साथी बने। दिल्ली से इफको के जीएम एके गुप्ता अपने परिवार के साथ पहुंचे हैं। वे इस सफर को लेकर बड़े उत्साह में है। गुरुग्राम के बजरंग यादव अपने दो बच्चों के लेकर पहुंचे हैं। इन बच्चों ने कभी स्टीम इंजन नहीं देखा। दिल्ली से भारत स्काउट गाइड के 20 लोगों की टोली पहुंची है, जो खूब तस्वीरें लेने में व्यस्त है। सभी लोग स्टीम इंजन क कार्यप्रणाली देखना चाहते हैं। कोयला कहां से लिया जाता है। स्टीम कैसे बनता है। सिटी कैसे बजती है। इस लोकोमोटिव में एक्सलरेटर कौन सा है। सब जान लेना चाहते हैं। लोको पायलट रविंद्र लोगों की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करते हैं।

कैसा है आजाद – तो कुछ बातें स्टीम लोकोमोटिव आजाद के बारे में। यह कई फिल्मों में अपना जौहर दिखा चुके स्टीम लोको अकबर का भाई है समझो। 1947 में इस लोकोमोटिव को अमेरिकन कंपनी ब्लाडविन लोकोमोटिव वर्क्स से मंगाया गया था। आजाद नाम इसलिए दिया गया क्योंकि यह आजादी के बाद का सबसे पहला इंजन था। यह पहियों की संरचना के हिसाब से 4-6-2 श्रेणी का है। इसका नंबर है डब्लूपी 7200  इसमें कोयला डालने की क्षमता 15 टन की है। पानी डालने की क्षमता 5500 गैलन की है। यह 2680 हार्स पावर की ऊर्जा उत्पन्न करता है। अधितम स्पीड 110 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। आजाद 1911 तक पटरियों पर अपनी सेवाएं देता रहा। अब इसे खास खास मौकों पर उतारा जाता है।

आपको पता है आजाद को स्टार्ट करने में आजकल छह घंटे का समय लगता है। यूं समझ लिजिए इन स्टीम इंजन का रखरखाव अब बहुत महंगा हो गया है, क्योंकि स्टीम इंजन अब बनते नहीं। कंपनियां आफ्टर सेल सर्विस नहीं देतीं।

लोको पायलट रविंद्र बताते हैं कि उनकी भर्ती तो इलेक्ट्रिक लोको पायलट के तौर पर हुई थी, पर बादल डीजल लोको चलाया। अब खास प्रशिक्षण के बाद स्टीम लोको चला रहे हैं। क्योंकि अब स्टीम इंजन नहीं बचे तो स्टीम इंजन चलाने वाले पायलट भी नहीं बचे। स्टीम लोको को चलाना डीजल या इलेक्ट्रिक की तुलना में मुश्किल काम है। दो फोर मैन लगातार बायलर में कोयला डालने में जुटे रहे हैं। यहां तो लोको पायलट रविंद्र खुद ही कोयला डालने में लगे हैं। चलते चलते हमने लोको पायलट रविंद्र के साथ एक सेल्फी भी ली। उनकी मेहनत और निष्ठा को सलाम।

कैसे पहुंचे - गुरुग्राम रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से से गढी हरुसुर की दूरी 10 किलोमीटर है। लोकल ट्रेन या शेयर आटो से पहुंचा सकता है। आप दिल्ली रेलवे स्टेशन या सराय रोहिल्ला से सीधे लोकल ट्रेन द्वारा भी पहुंच सकते हैं। ये लोकल ट्रेनें दिल्ली कैंट पालम होकर गुजरती हैं।
(HARYANA , RAIL , STEAM LOCOMOTIVE, AZAD ) 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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( आगे पढ़िए - साल्ट सिटी फारुख नगर - यहां के 40 कुओं से निकाला जाता था नमक )  

Monday, September 24, 2018

तिरुचिरापल्ली या त्रिची: तमिलनाडु का बेहतरीन शहर

तंजौर से चलकर तो एक बार फिर त्रिची वापस लौट आया हूं। यहां रहने के लिए होटल पहले बुक कर रखा है। हालांकि हमारी वेबबुकिंग में होटल की लोकेशन बस स्टैंड के पास दिखाई गई थी, पर यह होटल बस स्टैंड से कोई दो किलोमीटर दूर है। पर शुक्र है कि वहां तक जाने के लिए शेयरिंग आटो और बस की सुविधा उपलब्ध है। मुझे थोड़ी पूछताछ के बाद होटल तक जाने के लिए बस मिल गई।


होटल अमुथाम रेसिडेंसी डिंडिगुल हाइवे पर है। कमरे काफी बड़े -बड़े और हवादार भी हैं। इसलिए बस स्टैंड के दूरी कोई खास मायने नहीं रखती। होटल पहुंचा तो चेकइन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद भूख लगी थी। अच्छी बात है कि होटल का अपना रेस्टोरेंट है जो खूब चलता है। दोपहर की थाली 85 रुपये की। खाना अनलिमिटेड। खाना अच्छा भी है। पर यह रेस्टोरेंट रात को बंद रहता है। रात में आसपास में दूसरे विकल्प मौजूद हैं।

कई दिन सफर के दौरान गंदे हुए कुछ कपड़े भी धो डाले। यहां गर्मी है तो जल्दी सूख जाएंगे। इसके दोपहर में थोड़ी देर आराम किया। शाम को 4 बजे त्रिची शहर घूमने निकला। हमारे होटल वाले ने सलाह दी कि पहले आप रॉक फोर्ट टेंपल जाएं उसके बाद श्रीरंगम मंदिर। उनकी सलाह ठीक थी। त्रिची शहर के यही दो बड़े आकर्षण हैं।

तिरूचिरापल्ली नाम संस्कृत के त्रिशिरापुरम नाम से बना है। यह नाम त्रिशिरा अर्थात तीन सिर और पल्ली या पुरम् अर्थात शहर से मिलकर बना है। ऐसा माना जाता है कि त्रिशिरा नाम के तीन सिर वाले राक्षस ने भगवान शिव की आराधना इसी शहर के नजदीक की थी। कभी चोल साम्राज्‍य का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा रहा तिरूचिरापल्‍ली शहर तिरूचिरापल्ली जिले का मुख्यालय है। नाम लंबा है तो तमिलनाडु के लोग इसे त्रिची के नाम से भी पुकारते हैं।

यह आबादी में चेन्नई के बाद तमिलनाडु का दूसरा बड़ा शहर है। राजधानी चेन्नई से त्रिची की दूरी 335 किलोमीटर है। शहर की आबादी 11 लाख से ज्यादा हो चुकी है। कावेरी नदी शहर के बीचों बीच से गुजरती है। यह शहर विशेष रूप से श्री रंगानाथस्वामी मंदिर, श्री जम्बूकेश्‍वर मंदिर के लिए जाना जाता है।

तिरूचिरापल्ली में कुछ समय तक मुगल शासकों ने भी राज किया। इसके बाद इस पर विजयनगर के शासकों ने कब्जा कर लिया। विजयनगर के शासकों के राज्यपाल ने इस क्षेत्र में 1736 ई. तक शासन किया। त्रिची हाथ से बनी सिगार और साड़ियों के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। वरैयुर की हाथ से बनी सिगार पूरे विश्‍व में प्रसिद्ध है।

बस स्टैंड से लोकल बस पकड़कर मैं चल पड़ा हूं रॉक फोर्ट टेंपल के लिए। बस वाले कंडक्टर मुझे एक विशाल चर्च के पास उतार देते हैं। त्रिची शहर के बीचों बीच में होली चर्च स्थित है। 

होली रिडेमार बेसेलिका का निर्माण 1880 में करवाया गया था। यह एक रोमन कैथोलिक चर्च है। इस लंबे और विशाल चर्च की वास्तुकला काफी सुंदर है। इसे देखने काफी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं। इसकी आंतरिक दीवारों पर सुंदर आयल पेंटिंग देखी जा सकती है। पास में ही त्रिची का प्रसिद्ध सेंट जोसेफ कॉलेज स्थित है। इस चर्च के आस-पास ही त्रिची शहर के कई प्रमुख बाजार भी स्थित है। बाजार में खूब भीड़ है। मैं लोगों से रॉक फोर्ट टेंपल का पता पूछता हुआ आगे बढने लगता हूं।

( TRICHY, TIRUCHIRAPALLI, HOLY CHURCH ) 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
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Sunday, September 23, 2018

तमिलनाडु का सांस्कृतिक शहर तंजौर

तंजौर पैलेस कांप्लेक्स में कुछ घंटे गुजारने के बाद अब हमारी आगे चलने की तैयारी है। किले के अंदर हस्तशिल्प की दुकानें भी हैं। यहां से आप यादगारी के लिए कुछ खरीददारी कर सकते हैं। पर इससे पहले नारियल पानी पी लेते हैं।

अगर आप तंजौर और आसपास के सभी प्रमुख मंदिरों को अच्छी तरह देखना चाहते हैं और चोल राजाओं की कलाप्रियता को करीब से महसूस करना चाहते हैं तो तंजौर में आपको तीन दिन रुकना पड़ेगा।फिर यहां से 100 किलोमीटर के दायरे में स्थित प्रमुख स्थलों के दर्शन की योजना बनानी होगी। हमने आधे दिन में ही तंजौर के प्रमुख स्थलों का दर्शन किया है। पर तंजौर दुबारा आने की इच्छा बनी रहेगी। तंजौर जिले में तकरीबन 25 प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। अगर आप शाम को तंजौर में हैं तो किले में लाइट एंड साउंड शो देख सकते हैं। हर रोज यहां दो शो होते हैं।

कावेरी नदी के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसे दक्षिण में चावल का कटोरा के नाम से भी जाना जाता हैं। साल 850 ई. में चोल वंश ने मुथरयार प्रमुखों को पराजित करके तंजौर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद चोल राजाओं इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। चोल वंश ने 400 साल से भी अधिक समय तक तमिलनाडु पर राज किया। इस दौरान तंजौर के वैभव में काफी  विकास हुआ।

चोल राजाओं के बाद नायक और मराठों ने भी यहां शासन किया। वे लोग कला और संस्कृति के कद्रदानों में थे। कला के प्रति उनका लगाव को उनके द्वारा बनवाई गई यहां इमारतों से साफ नजर आता है।


तंजौर का जो वर्तमान महल का इसका निर्माण 1550 में नायक राजाओं ने कराया था। तंजौर पर आखिरा शासन मराठा राजाओं का रहा। 1855 में यह ब्रिटिश राज्य के अधीन आ गया। ब्रिटिश शासन आने के बाद तंजौर में चर्च का भी निर्माण हुआ। शहर में प्रसिद्ध शिवगंगा किला और शिवगंगा कुंड है। इस कुंड से पूरे शहर को पीने का पानी मिलता था।

मशहूर है तंजौर पेटिंग – तमिलनाडु का तंजौर पेंटिंग्स अपनी विशेष शैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यहां आने वाले सैलानी इन्हें खरीदना पसंद करते हैं। सही कीमत और अच्छी क्वालिटी के लिए आपको गांधी रोड पर बने कुछ एंटीक शॉप की ओर जाना होगा। यहां से पेंटिंग्स खरीद सकते हैं, साथ ही  तंजौर प्लेट्स, पंचलौह प्रतिमाएं, पूजा सामग्री आदि भी यहां से खरीद कर ले जा सकते हैं।  

तंजौर तमिलनाडु का एक जिला है। इस शहर की आबादी ढाई लाख से ज्यादा है। पर शहर काफी साफ सुथरा दिखाई देता है। शहर का नया बस स्टैंड विशाल है। यह शहर के बाहर है। पर पुराना बस स्टैंड शहर के बीच में है। पर शहर में कहीं भीड़भाड़ और चिलपों नहीं नजर आता।

कई घंटे तंजौर की यात्रा के बाद अब मुझे थोड़ी भूख लग रही है। तो आटो वाले ड्राईवर महोदय मुझे नए बस स्टैंड के सामने दो शाकाहारी रेस्टोरेंट में से किसी एक में खाने की सलाह देते हैं।

राज आर्य प्योर वेज होटल में प्रवेश कर गया हूं। खाने में आर्डर कर दिया है मसाला डोसा। थोड़ा हल्का फुल्का खाने के बाद एक बार फिर बस स्टैंड में आकर त्रिची जाने वाली बस में बैठ गया हूं। दोपहर मे बस के सफर में हल्की नींद आ रही है। एक घंटे में बस ने त्रिची पहुंचा दिया।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyut@daanapaani.net
( TANJAUR PAINTING ,  CITY, FOOD, CHOLA KINGDOM ) 

Friday, September 21, 2018

चोल राजाओं का वैभव देखें - तंजौर का किला

चाचा-भतीजा डेनियल ने भारत के तमाम ऐतिहासिक स्थलों की शानदार पेंटिंग बनाई थी। इनमें से एक है बिहार के रोहतास गढ़ किले की पेंटिंग। पर ये पेंटिंग मुझे दिखाई दे रही है तमिलनाडु के तंजौर में राजा के निजी संग्रहालय में। तो यहां मेरा रोहतास जिला है पेंटिंग में मौजूद। वैसे तो डेनियल की ज्यादा पेंटिंग पटना संग्रहालय में देखने को मिली थीं। पर तंजौर के राजा भी पेंटिंग के बड़े शौकीन थे। इसलिए सरस्वती भवन में उनकी कलाप्रियता दिखाई देती है। 


तंजौर के तमाम मंदिर देखने के बाद अब हम इतिहास और विरासत की ओर बढ़ चले हैं। आप भी तंजौर के चोल राजाओं की विरासत को जानना और समझना हो तो तंजौर फोर्ट और सरस्वती भवन जरूर पहुंचे। प्रवेश का टिकट 50 रुपये का है। कैमरे के लिए 50 रुपये का शुल्क अलग से है। फिर भी सरस्वती भवन के संग्रह की फोटोग्राफी पर प्रतिबंध है। पर ये छोटा सा संग्रहालय बहुमूल्य है।

सरस्वती भवन के इस संग्रहालय में दक्षिण के प्रसिद्ध कंब रामायण की 1719 की दुर्लभ पांडुलिपी देखी जा सकती है। इसमें कुल 537 पन्ने हैं। इसके अलावा कई पुस्तकों और पांडुलिपियों का बेहतरीन संग्रह है। यहां आप अश्व शास्त्र, गज शास्त्र समेत कई पुरानी कॉफी टेबल बुक्स देख सकते हैं। यहां आप चोल राजाओं की भी बेहतरीन पेटिंग देख सकते हैं।

साल 1820 में तंजौर के राजा सरफोजी अपने लाव लश्कर के साथ वाराणसी घूमने गए। वहां बनारस शहर उन्हें इतना पसंद आया कि शहरों को यादों में बसा लेने के लिए उन्होंने अपने कलाकारों से बनारस के घाटों की पेंटिंग बनवाई। तो आप यहां पेंटिंग में 1820 का बनारस का दशाश्वमेध घाट देख सकते हैं। यहां कुल 64 घाटों की पेंटिंग है। सरस्वती भवन लाइब्रेरी के बिक्रय केंद्र से कुछ पुस्तकें खरीदी भी जा सकती हैं।

अब आगे चलते हैं पैलेस में आर्ट गैलरी से आगे मूर्तिकला का विशाल संग्रह है। इस संग्रह में बुद्ध प्रतिमाएं, शिव और कार्तिकेय की प्रतिमाएं। गणेश की नृत्य रत प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। यहां मौजूद ज्यादातर मूर्तियां तंजौर और आसपास के क्षेत्रों से लाई गई हैं। ज्यादातर मूर्तियां 11वीं और 12वीं सदी के चोल काल की हैं। यहां राजा सरफोजी की संगमरमर की बनी हुई एक विशाल प्रतिमा भी देखी जा सकती है।

पूरे संग्रहालय के तीन हिस्से हैं। आगे आप विशाल आंगन में पहुंच जाते हैं। वहां आप विशाल दरबार हॉल भी देख सकते हैं। इस हॉल में लकड़ी का बेहतरीन काम हुआ है। पर सब कुछ आज भी अच्छे हाल में दिखाई देता है। दरबार हॉल में चटख रंगों का इस्तेमाल हुआ है जो आज भी तरोताजा दिखाई देता है। दीवारों पर मूर्तिकला और चित्रकला का सुंदर संयोजन है।

92 फीट की ह्वेल-  अब चलिए पहली मंजिल पर चलते हैं। यहां पर एक विशाल ह्वेल की असली अस्थि पंजर यानी स्केल्टन देखने को मिलता है। इसे बड़े जतन से संभाल कर रखा गया है। यहां पर इस ह्वेल की कहानी भी बयां की गई है। कुल 92 फीट लंबी इस ह्वेल को 1955 में प्राप्त किया गया था। फिशरी डिपार्टमेंट ने इस ह्वेल को आर्ट गैलरी को उपहार स्वरूप प्रदान किया था। 


आठ मंजिला गुडापुरम - सरस्वती भवन से लगा हुआ आठ मंजिला विशाल टावर गुडापुरम देखा जा सकता है। यह 190 फीट ऊंचा है। इस पर चढ़ने के लिए सीढियां भी बनी हुई हैं। राजा के महल के इस हिस्से को बेल टावर कहते हैं।

खुलने का समय - संग्रहालय सुबह 10 बजे से 5 बजे तक खुला रहता है। संग्रहालय में प्रवेश के लिए टिकट 50 रुपये का है।अंदर की कुछ विथिकाओं के लिए अलग से टिकट है। हर बुधवार को संग्रहालय बंद रहता है। इसलिए अपनी योजना इसी के अनुरूप बनाएं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य
ईमेल - vidyut@daanapaani.net
( TANJAUR, SARSWATI BHAWAN, PALACE, GUDAPURAM, BOOKS, PAINTINGS, BONES OF WHALE )