Friday, August 24, 2018

नागार्जुन कोंडा – कभी बौद्ध शिक्षा का बड़ा केंद्र था

हमारी मोटर लांच तेज गति से नागार्जुन कोंडा की ओर बढ़ रही है। यह 45 मिनट का मनभावन सफर है। हम लांच की छत से डैम और आसपास की पहाड़ियों का नजारा करने में जुटे हैं। इस सफर में दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलंगाना, मुंबई के लोग हैं जो रास्ते में तस्वीरें लेने में जुटे हैं। लांच में पेप्सी की केन उपलब्ध है। बहुत गर्मी है तो मैं एक केन खरीद कर पीता हूं।


विशाल जलाशय के पानी को काटती हुई मोटर लांच चलती जा रही है। और थोड़ी देर में हमलोग नागार्जुन कोंडा पहुंचने वाले हैं। ऐतिहासिक नागार्जुन कोंडा। जी हां,  यह दूसरी से छठी शताब्दी के बीच दक्षिण भारत का एक आबाद शहर हुआ करता था। बौद्ध शिक्षा का बड़ा केंद्र। विशाल यूनीवर्सिटी और बौद्ध मठ। 



1955 में नागार्जुन सागर डैम बनने के बाद इस प्रचीन शहर के पुरावशेष भी तबाह हुए। अब बांध के बाद बने विशाल जलाशय के द्वीप पर पुराने नागार्जुन कोंडा शहर की स्मृतियों को आबाद करने की कोशिश की गई है। हम इन्ही स्मृतियों से रूबरू होने जा रहे हैं। नागार्जुन कोंडा द्वीप आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले में पड़ता है। इस द्वीप का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। हरे भरे द्वीप पर एक संग्रहालय भी है।


हमलोग मोटर लांच से उतर कर द्वीप पर कदम रख चुके हैं। सागर के तट से संग्रहालय  तक चढ़ाई वाली ट्रैकिंग हैं। यहां के संग्रहालय का प्रवेश टिकट 20 रुपये का है। यह टिकट मोटर लांच स्टेशन पर ही मिल जाता है। द्वीप पर आरओ वाटर, शौचालय आदि का इंतजाम है। एक कैंटीन भी है, पर वह कम सैलानी के मौसम में बंद रहती है।

तीसरी और चौथी सदी की बौद्ध प्रतिमाएं -  तो चलते हैं नागार्जुन कोंडा, यानी अतीत के आबाद शहर से संवाद करने। खंडहर बताते हैं कि कभी इमारते बुलंद रही होंगी। संग्रहालय के अंदर तीसरी और चौथी शताब्दी में निर्मित इच्छवाकु काल की गौतम बुद्ध के जीवन से जुडी शानदार मूर्तियां हैं। लाइम स्टोन की बनी इन मूर्तियों में एक में बुद्ध के मुकुट को देवता गण स्वर्ग ले जा रहे हैं इसका मनोहारी चित्रण किया गया है। बुद्ध की बैठी और खड़ी कई प्रतिमाएं हैं, इनमें कई ध्वंस हो गई हैं।

यहां पर एक प्रतिमा पंचमुख नाग मुछलिंद की है जो तपस्या के समय बुद्ध की रक्षा करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यहां एक खड़े बुद्ध की प्रतिमा है जो 293 सेमी यानी करीब 3 मीटर ऊंची और 35 सेमी चौड़ी है। बुद्ध की यह प्रतिमा काफी प्रसिद्ध है। यह तमाम चित्रों में नजर आती है।


आप यहां पर संग्रहालय में बुद्ध के योगी, संन्यासी , वृद्ध और रोगी के रूपों को देख सकते हैं। इसके अलावा एक दिन ज्ञान प्राप्ति के लिए गृह त्याग आदि के प्रकरणों के सुंदर चित्र भी देखे जा सकते हैं।   जिस दौर में ये प्रतिमाएं बनी हैं नागार्जुन कोंडा बड़ा ही समृद्ध शहर हुआ करता था। 



कई हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे यहां -  यहां पर कई हजार बौद्ध भिक्षु यहां निवास करके विद्या अध्ययन करते थे। यहां पर विशाल भिक्षु निवास, बाजार, स्नान घाट, श्मशान घाट, स्तूप आदि का निर्माण कराया गया था। यहां सुंदर रंगशाला भी थी। यहां पर एक पुष्प भद्र स्वामी का मंदिर, नव ग्रह मंदिर, बाल कुबेर मंदिर, बड़ा तालाब और विनोद शाला भी हुआ करती थी। अब ज्यादातर चीजों का अवशेष नहीं है। कुछ भवनों के मॉडल बनाकर बताने की कोशिश की गई है।


इस ऐतिहासिक शहर के साथ दोपहरी गुजारना यादगार रहा। मोटर लांच ने हमें नागार्जुन सागर के इस द्वीप पर  दो घंटे गुजारने का वक्त  दिया था। इसके  बाद हमलोग फिर से मोटर लांच पर  वापस आ चुके हैं। कुछ घंटे द्वीप पर गुजारने के बाद अब वापसी की वेला है। लांच से वापस  लौटने तक शाम होने लगी है।

नागार्जुन कोंडा से प्राप्त कुछ मूर्तियां दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में भी देखी जा सकती हैं।  ऐसी ही एक मूर्ति साहित्य अकादमी के पुस्तकों के कवर के अंदर दिखाई देती है। यह राजा शुद्धोधन के दरबार का नजारा है।  इसमें तीन भविष्य वक्ता  बुद्ध की मां मायादेवी के स्वप्न का मतलब समझा रहे हैं।  नीचे बैठा एक लिपिक उसे लिख रहा है। यह लिपिबद्ध करने का पहला चित्र है।  





राहुल मुझे विजय विहार के बस स्टाप पर छोड़ देते हैं। हालांकि वे मुझे अपने साथ हैदराबाद चलने का भी ऑफर देते हैं। पर मैं शालीनता से बस से जाने की बात कहता हूं।  विजय विहार में मैं कुछ देर इंतजार करता हूं, फिर माचेरला से आने वाली हैदराबाद की बस मिल गई। इस 2 बाई 2 बस में किराया लगा 180 रुपये। थोड़ी देर तक बस में जगह नहीं मिली पर बाद में अच्छी सीट मिल गई। रात के नौ बजे मैं हैदराबाद के इमली बन स्थित महात्मा गांधी बस स्टैंड पहुंच गया हूं।

-        ( NAGARJUNA KONDA, BUDDHA, GUNTUR, ANDHRA, TELANGANA )
 -        विद्युत प्रकाश मौर्य
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