Tuesday, August 14, 2018

लखनऊ की बारादरी और मैगलगंज का कालाजाम

लखनऊ के विकास नगर से निकलने के बाद कैसरबाग डिपो जाने के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा में बैठ गया। आटो वाले भाई ने कैसरबाग से थोड़ा पहले उतार दिया और कहा, सामने बारादरी पार करके चले जाइए बस डिपो पहुंच जाएंगे।
बारादरी मतलब लखनऊ की एक ऐतिहासिक इमारत। कैसर बाग के अंदर पूर्वी और पश्चिमी दीवार के मध्य में बारादरी का निर्माण कराया गया था। अवध के अंतिम शासक वाजिद अली शाह द्वारा निर्मित यह यादगार इमारत है। सन 1850 में वाजिद अली शाह ने इसका निर्माण अपने निजी उपयोग के लिए कराया था। कहा जाता है कि मुहर्रम के समय इस बारादरी का प्रयोग साहिबे आलम ( वाजिद अली शाह) स्वयं करते थे। पत्थरों से बनी इस इमारत को प्रारंभ में ही चूने से रंग कर सफेद बना दिया गया था। 

आज भी दूर से दिखाई देने वाली सफेद रंग की ये इमारत आकर्षक लगती है। ज्यादा तामझाम के बिना निर्मित इस इमारत में मुगल स्थापत्यकला की झलक दिखाई देती है। इस भवन में जगह जगह कांच का इस्तेमाल किया गया है जो फ्रांसिसी स्थापत्य कला से प्रभावित जान पड़ता है। जब 1857 की क्रांति हुई तब इस बारादरी का इस्तेमाल बेगम हजरत महल ने अपने सैनिकों के राशन आदि रखने के लिए भी किया। बारादरी की इमारत को देखकर नहीं लगता कि यह 150 साल से ज्यादा पुरानी है।
लाखी दरवादजा - बारादरी से आगे चलने पर कैसर बाग का विशाल प्रवेश द्वार नजर आता है जो लाल बलुआ पत्थर से बना है। इसमें विशाल लकड़ी और लोहे के द्वार लगे हैं। अब इस गेट से वाहन गुजरते रहते हैं। पश्चिमी कैशर बाग गेट राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारक है। इसे लाखी दरवाजा भी कहते हैं। 1847 से 1850 के बीच इस विशाल द्वारा का निर्माण कराया गया तो इस पर एक लाख रुपये का खर्च आया इसलिए इसे लाखी दरवाजा नाम मिला। यह दरवाजा वाजिद अली शाह के समय के कैसरबाग के वैभव को बयां करता है। इसके खूबसूरत मेहराबों पर दो मछलियां बनी हैं जो अवध का राज चिन्ह हुआ करती थीं। इन मछलियों के बीच आसफी गुलदस्ता बना है। इसे हिंद इरानी बूटा भी कहते हैं।
लाखी दरवाजा से आगे निकल कर बर स्टैंड आ गया हूं। बस समय पर आकर प्लेटफार्म पर लग गई है। कंडक्टर टिकट चेक करने आते हैं, पर वे वर्दी में नहीं हैं। उनका बातचीत करने का अंदाज भी भदेस है। हमें दक्षिण भारत से लग्जरी बसों के संचालन के मामले में काफी कुछ सीखने की जरूरत है। खैर बस निकल पड़ी है। बस में हर सीट के पास मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट है। लखनऊ शहर से निकल कर सीतापुर होते हुए लखीमपुर खीरी जिले में बस प्रवेश कर गई है।
मैगलगंज का काला जामुन - रात नौ बजे के आसपास नेशनल हाईवे के किनारे खीरी जिले में मैगलगंज में एक ढाबे पर बस खाने के लिए रूकी। अपना टूरिस्ट होटल में खाने की थाली 90 रुपये की है। नेशनल हाइवे के किनारे बसा लखीमपुर खीरी जिले के मैगलगंज कस्बे के कालाजाम यानी गुलाब जामुन और रसगुल्ले पूरे प्रदेश में मशहूर हैं। खोए से बनने वाले मुलायमआकार में छोटे और रसीले रसगुल्लों की दुकानें पूरे हाइवे पर सजी हैं। बात सिर्फ मैगलगंज की नहीं है। पड़ोस के जिले हरदोई के जहानीखेड़ा में भी इन्हीं रसगुल्लों का दबदबा है। वहां के व्यापारी भी मैगलगंज के रसगुल्लों के नाम से अपनी दुकान चलाते हैं।
1941 में बनने शुरू हुए रसगुल्ले : मैगलगंज के रसगुल्लों का अलग स्वाद 1941 में श्यामलाल हलवाई ने खोजा था। उन्होंने पहली बार यह दुकान खोली थी। इसके बाद मैगलगंज का नाम ही इन रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध हो गया। कई नामचीन हस्तियों ने हाइवे पर रुककर रसगुल्लों का स्वाद लिया है। यहां रसगुल्ले या गुलाब जामुन 15 रुपये के दो मिल रहे हैं। दरें काफी वाजिब हैं। आप ज्यादा खरीदें तो मटके में पैक करके दे देतें हैं।
बस आगे चल पड़ी है। शाहजहां पुर, बरेली सेटेलाइट के बाद मुरादाबाद होते हुए गढ़ मुक्तेश्वर के आगे बस एक बार फिर सुबह 4 बजे एक ढाबे पर रुकी। मैं नींद में ही था अचानक कि अचानक देखा गाजियाबाद के मोहन नगर में बस रुकी है। मैं तुरंत उतर कर अपने घर जाने वाली आटो में बैठ गया।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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(BARADARI, LUCKNOW, MAIGALGANJ, KHIRI, UPSRTC BUS TO DELHI)
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