Thursday, August 30, 2018

सात दरवाजों वाला अभेद्य - बीदर का किला

गुरुद्वारा नानक झीरा के बाद हमारी अगली मंजिल है बीदर फोर्ट। बीदर का किला गुरुद्वारा से कोई 4 किलोमीटर दूर है। एक आटो वाले से बात हुई। उन्होंने 60 रुपये मांगे। यह वाजिब है। मैं उस आटो में बैठकर किले के द्वार पर पहुंच गया। बीदर का विशाल किला शहर के एक कोने में स्थित है। किले को घूमने के लिए दो घंटे का समय रखिए जरूर। पर सबसे काम का बात ये है कि इस किले को देखने के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। हां गेट पर कुछ सुरक्षा गार्ड जरूर तैनात हैं। किले के प्रवेश द्वार पर एक पुरानी तोप आपका स्वागत कर रही है। किले का मुख्य द्वार भव्य है। इस द्वार के नक्काशी में रंग बिरंगा काम दिखाई देता है। कई सौ साल बाद भी इन रंगों में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा है।

इतिहास के झरोखे से किले के अंदर प्रवेश करने के बाद इसके प्राचीर पर चढने की सीढ़ियां बनी हैं। तो आइए थोड़ा सा जान लेते हैं इस किले के इतिहास के बारे में। इस किले का निर्माण बहमनी सुल्तान अहमद शाह द्वारा 1432 से 1432 के बीच कराया गया। किले की दीवार 5.5 किलोमीटर लंबी और बहुत मोटी है। किले में सुरक्षा को लेकर कई खास विशेषताएं हैं, जिसके कारण यह देश के अपराजेय किलों में गिना जाता है। किले के तीन तरफ विशाल खाई है जिसका निर्माण तुर्क सैनिकों द्वारा करवाया गया था। किले की दूसरी विशेषता है इसके मजबूत सात दरवाजे।  मुख्य महल तक दक्षिण के दो मुख्य द्वारों से पहुंचा जा सकता है। शरजा दरवाजा और गुंबज दरवाजा दोनों ही भीमकाय द्वार हैं। इन द्वारों में मेहराब और सुंदर चित्रकारियां बनी हैं। साथ ही सैनिकों के सुरक्षा में तैनात होने के लिए खास जगह बनाई गई है। एक द्वार का नाम मंदू दरवाजा है जो अत्यंत सुरक्षित सुरंग से होकर जाता है।

किले के अंदर तख्त महल, तरकश महल, रंगीन महल, शाही मखतब (रसोई), गगन महल और दीवाने आम का निर्माण कराया गया है। किले में एक 16 खंभो वाली मसजिद और नौबत खाना भी है जो अपनी बेहतरीन वास्तु के कारण देखने लायक हैं।   

किले में सुरंगों का जाल - बीदर के किले में अच्छी संख्या में सुरंग और गुप्त रास्ते बने हैं। साथ ही कई भूमिगत कक्षों का निर्माण कराया गया है। इन सुरंगों की मदद से आपात स्थिति में सुरक्षा तरीके से भागा जा सकता है।  किले के चारों ओर बनी मीनारों पर सुरक्षा के लिए विशाल तोंपे तैनात की गई हैं। किले की सुरक्षा के लिए कुल 37 गढ़ों का निर्माण कराया गया था।

बीदर के किले में अनूठी है जल संरक्षण प्रणाली - बीदर के किले की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी जल संरक्षण प्रणाली।  किले के अंदर कई विशाल कुएं का निर्माण भी कराया गया था। इन कुएं  के जल को पाइप लाइन के सहारे एक दूसरे से जोड़ा भी गया था। चूंकि बीदर के इलाके में हमेशा जल संकट रहता है इसलिए किले में पानी बचाने और उसके इस्तेमाल के लिए खास इंतजाम किए गए थे। बीदर के इस किले के निर्माण शैली से बाद में अन्य किलों को प्रेरणा मिली। बीजापुर, गोलकुंडा, हैदराबाद, बेंगलुरु को इस किले से प्रेरणा मिली है।

किले में संग्रहालय – किले एक अंदर एक छोटा सा पर बड़ा ही सुंदर संग्रहालय है। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी पर रोक है।  हालांकि यहां प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। संग्राहलय में मध्यकालीन भारत के शस्त्रों को सुंदर संग्रह है।
मैं देख पा रहा हूं  कि किले के अंदर से आम रास्ता भी बना हुआ है। कुछ लोग आते जाते दिखाई दे रहे हैं। किला देखने के बाद मैं वापस बस स्टैंड के लिए चल पड़ा हूं। इस बार मुझे शेयरिंग आटो रिक्शा मिल गया है। इसका किराया सिर्फ 10 रुपये है।
(KARNATKA, BIDAR, FORT, WATER ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Tuesday, August 28, 2018

गुरुनानक देव जी के प्रताप से बंजर में निकला था मीठे जल का स्रोत

गुरुद्वारा नानक झीरा - बीदर -  हैदराबाद से चली बस कर्नाटक में प्रवेश कर चुकी है। लाल मिट्टी और दोनों तरफ सघन वन क्षेत्र नजर आ रहे हैं। हम तेलंगाना के संगारेड्डी जिले से गुजर रहे हैं। बीदर शहर से पहले स्वामी नारायण  गुरुकुल स्कूल का विशाल परिसर नजर आता है। बस कर्नाटक के बीदर शहर में प्रवेश कर गई है। चौड़ी चौड़ी सड़के हैं। थोड़ी देर में हम सेंट्रल बस स्टैंड में है। बस स्टैंड काफी साफ सुथरा है। बीदर न सिर्फ आस्था और इतिहास के लिहाज से महत्वपूर्ण है बल्कि शिक्षा का भी बड़ा केंद्र बन चुका है।


कर्नाटक का शहर बीदर। वैसे तो कर्नाटक में पड़ता है पर यह भौगोलिक रूप से हैदराबाद के नजदीक है। महाराष्ट्र की सीमा भी इसके पास है। महाराष्ट्र के नांदेड़ और उस्मानाबाद जिले इसके उत्तर में हैं। बीदर में बोली जाने वाली भाषा कन्नड न होकर हिंदी, उर्दू और मराठी है। कर्नाटक के भौगोलिक विभाजन के हिसाब से यह हैदराबाद कर्नाटक में पड़ता है। राजधानी बेंगलुरु से बीदर की दूरी 700 किलोमीटर है। मैं बस स्टैंड से बाहर निकल कर गुरुद्वारा नानक झीरा का रास्ता पूछता हूं। दाहिनी तरफ थोड़ा आगे चलने पर बाएं मुड़ रही सड़क पर गुरुद्वारा का विशाल द्वार बना है और बोर्ड लगा हुआ है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चलने के बाद हम गुरुद्वारा नानक झीरा पहुंच चुके हैं।

महान संत और सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी का संबंध कर्नाटक के शहर बीदर से है। गुरुजी यहां आए और कई महीने तक ठहरे। उनके साथ उनके प्रिय शिष्य मरदाना थे। मरदाना रबाब बजाते थे। बीदर का गुरुद्वारा नानक झीरा पहले गुरु की याद में बना है। ...सा धरती भई हरीआवली, जिथे मेरा सतगुरु बैठा आई।

गुरुद्वारा के मुख्य द्वार के दो सौ मीटर पहले सड़क पर दो शेर आपका स्वागत करते हैं। वहां स्पष्ट निर्देश है तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का इस्तेमाल आगे वर्जित है। बीदर का गुरुद्वारा परिसर काफी विशाल है। परिसर के बाहर भी अतिथि गृह बने हैं और अंदर भी। गुरुद्वारा का मुख्य प्रवेश द्वारा काफी कलात्मक और भव्य है। एक तरफ गुरुद्वारा और लंगर और दूसरी तरफ विशाल सरोवर बना है।

गुरुद्वारा नानक झीरा साहिब में अमृत कुंड है, जिसकी कहानी गुरुनानक देव जी से जुडी है। सन 1510 से 1514 के गुरुनानक देव जी ने दक्षिण की यात्रा की थी। गुरुजी सुल्तानपुर लोधी से चलकर ओंकारेश्वर, बुरहानपुर होते हुए नांदेड़ पहुंचे। वहां से हैदराबाद (गोलकुंडा) होते हुए बीदर पहुंचे। बीदर में इसी अमृत कुंड के पास उन्होंने आसन लगाया। आसपास का रमणीक नजारा देख बाबाजी ने मरदाना को रबाब बजाने को कहा और स्वयं कीर्तन करने लगे। रबाब की ध्वनि सुन वन क्षेत्र में श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए आने लगे।

संगत ने बाबाजी से आग्रह किया कि इलाके में पानी की भारी कमी है। 150 फीट खुदाई पर भी पानी नहीं निकलता। मिलता भी है तो खारा पानी। लोगों के आग्रह पर सत करतार कहते हुए बाबा जी ने अपने दाहिने खड़ाउ से पत्थर हटाया और यहां से मीठे पानी का सोता बह निकला। उस समय से आजतक यहां जल प्रवाहित हो रहा है। इसे अमृत कुंड या नानक झीरा नाम दिया गया है। इस घटना की याद में बाद में यहां विशाल गुरुद्वारा बना, जो सिखों का बड़ा तीर्थ बन गया है।

इसके साथ ही पंज प्यारों में से भाई साहिब सिंह बीदर के रहने वाले थे। वे चमकौर साहिब के युद्ध में शहीद हो गए थे। श्रद्धालु यहां से अमृत जल लेकर अपने घर जाते हैं।

अपना बैग गुरुद्वारा परिसर में यूं ही पेड़ के नीचे छोडकर मैं मत्था टेकने आगे बढ़ गया। गुरुद्वारा में मत्था टेकने के बाद लंगर हॉल की तरफ कदम बढ़ गए। लंगर छकने के बाद वापस आकर अपना बैग लेकर गुरुद्वारा के सौंदर्य को निहारते हुए पूरे परिसर का मुआयना किया। फिर एक ओंकर सतनाम का जाप करते हुए अगली मंजिल की तरफ चल पड़ा।
(BIDAR, GURUDWARA NANAK JHIRA, MARDANA, RABAB, WATER ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य










Sunday, August 26, 2018

हलीम बिरयानी की खुशबू और हैदराबाद का एमजी बस स्टैंड

नागार्जुन सागर से हैदराबाद जा रही बस नॉन स्टाप थी। इसमें कंडक्टर नहीं होता। रास्ते में ड्राईवर ही टिकट काट देता है। हालांकि हमें राहुल बुलेट से हैदराबाद तक लिफ्ट देने की बात कर रहे थे, पर मैंने ये सोचकर की बस में आराम से सो जाउंगा बस से चलना उचित समझा।
पर बस में मुझे सीट देर से मिली। हैदराबाद शहर की सीमा में प्रवेश करते ही बस जाम में फंस गई। हैदराबाद में आप कहीं से किसी भी तरफ प्रवेश करें जाम से सामना होता ही है। खैर बस धीरे धीरे सरकती हुई इमलीबन यानी महात्मा गांधी बस स्टैंड की ओर पहुंच रही है। रास्ते में बाजार सजे हैं। ईद करीब है तो बाजार में त्योहारी डिस्काउंट के बोर्ड लगे हैं।

बस मुझे इमली बन बस स्टैंड जो मूसी नदी के किनारे है, उतार देती है। मैं बस स्टैंड के अंदर घुस कर मुआयना करता हूं। कई साल पहले से तुलना करूं तो बस स्टैंड का कायाकल्प हुआ है। यहां सौ से ज्यादा प्लेटफार्म है। स्वच्छ भारत अभियान का असर दिखाई दे रहा है। जगह जगह पे एंड यूज शौचालय बने  हैं। बस स्टैंड सारी रात गुलजार रहता है। एमजी बस स्टैंड से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों के लिए हमेशा बसें मिलती हैं। यह देश की तीसरा सबसे बड़ा व्यस्त बस स्टैंड है। कई मार्गों के लिए यहां अग्रिम आरक्षण की भी सुविधा उपलब्ध है। बस स्टैंड के अंदर बाजार भी है, जहां आपको जरूरत की चीजें मिल जाएंगी।

मुझे पता चला की बीदर की बस प्लेटफार्म नंबर 48 से मिलेगी। वैसे मुझे बस तो सुबह पकडनी है। बीदर के लिए बस रात 11.30 बजे तक है। फिर सुबह 4 बजे से बसें शुरू हो जाती हैं। पर मैं रात को आराम करना चाहता हूं। पर आराम से पहले पेटपूजा। बस स्टैंड के अंदर नंदिनी कैंटीन में लेमन राइस खा लिया। 45 रुपये में अच्छा खाना है। वैसे बस स्टैंड के अंदर खाने पीने के कई रेस्टोरेंट हैं। पाराडाइज बिरयानी का भी टेक अवे काउंटर है। बस स्टैंड के अंदर प्रति घंटे के हिसाब से चुकाकर आराम करने के लिए हॉल बने हैं जहां आराम कुरसियां लगी हैं। पर यहां 20 रुपये घंटा देने की तुलना में मैं किसी सस्ते होटल में रात गुजराना चाहता हूं।

एमजी बस स्टैंड का नाम इमली बन भी है। कभी यहां खूब इमली के पेड़ हुआ करते थे। अब कम हैं। बस स्टैंड के एक तरफ हैदराबाद का चादरघाट मुहल्ला है। यहां धोबी मूसी नदी के किनारे कपड़े धोया करते थे इसलिए ये चादर घाट कहलाया। दूसरी तरफ गोवालीगोडा मुहल्ला है। यहां पर मैं रात को पहुंचा हूं होटल बालाजी में। यहां मुझे 300 रुपये में डबल बेड रुम मिल गया। कमरा अच्छा है। उन्होने खाने के लिए भी पूछा पर मैं तो पेट पूजा कर चुका हूं। पर सोने से पहले खूब नहा कर दिन भर की थकान मिटाई।

सुबह 4.30 बजे जगकर तैयार होकर एमजी बस स्टैंड के प्लेटफार्म नंबर 48 पर पहुंच गया हूं। इतनी सुबह सुबह एक कप ईरानी चाय पीने में कोई बुराई नहीं है। बीदर की दो बसें जाने को तैयार हैं। एक बस की खिड़की वाली सीट ले ली है। बस हैदराबाद की सड़कों को पार करती हुई मुंबई मार्ग पर चल पड़ी है। सुबह भी बाजार में रमजान की खूशबु आ रही है। हलीम बिरयानी और शीप के मांस पर डिस्काउंट के बोर्ड लगे हैं। बस चादरघाट, अफजल गंज, नामपल्ली, लकड़ी का पुल, सोमाजीगुडा, पंचगुट्टा, आमीरपेट, एसआर नगर से होकर गुजर रही है। ये वो इलाके हैं जहां मैं हैदराबाद प्रवास के दौरान खूब घूमता था।

आगे भारत नगर, मूसापेट आया। मूसापेट तक अब मेट्रो रेल चल रही है। इसके बाद कुकुटपल्ली, मिसापुर, बीएचईएल, रामचंद्रपुरम, पटनचेरू आया। पटनचेरु बस टर्मिनल में जाकर बस थोड़ी देर रूकी। इसके बाद सदाशिवपेट फिर जहीराबाद। ये इलाके संगारेड्डी जिले में आते हैं। जहीराबाद में हमारी बस मुंबई हाईवे को छोड़कर कर्नाटक जाने वाले मार्ग पर मुड़ गई।
(HYDRABAD, MG BUS STAND, IMLIBAN, CHADARGHAT ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, August 24, 2018

नागार्जुन कोंडा – कभी बौद्ध शिक्षा का बड़ा केंद्र था

हमारी मोटर लांच तेज गति से नागार्जुन कोंडा की ओर बढ़ रही है। यह 45 मिनट का मनभावन सफर है। हम लांच की छत से डैम और आसपास की पहाड़ियों का नजारा करने में जुटे हैं। इस सफर में दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलंगाना, मुंबई के लोग हैं जो रास्ते में तस्वीरें लेने में जुटे हैं। लांच में पेप्सी की केन उपलब्ध है। बहुत गर्मी है तो मैं एक केन खरीद कर पीता हूं।

थोड़ी देर में हमलोग नागार्जुन कोंडा पहुंचने वाले हैं। यह दूसरी से छठी शताब्दी के बीच दक्षिण भारत का एक आबाद शहर हुआ करता था। बौद्ध शिक्षा का बड़ा केंद्र। विशाल यूनीवर्सिटी और बौद्ध मठ। 


1955 में नागार्जुन सागर डैम बनने के बाद इस प्रचीन शहर के पुरावशेष भी तबाह हुए। अब बांध के बाद बने विशाल जलाशय के द्वीप पर पुराने नागार्जुन कोंडा शहर की स्मृतियों को आबाद करने की कोशिश की गई है। हम इन्ही स्मृतियों से रूबरू होने जा रहे हैं। नागार्जुन कोंडा द्वीप आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले में पड़ता है। इस द्वीप का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। हरे भरे द्वीप पर एक संग्रहालय भी है।

हमलोग मोटर लांच से उतर कर द्वीप पर कदम रख चुके हैं। यहां के संग्रहालय का प्रवेश टिकट 20 रुपये का है। यह टिकट मोटर लांच स्टेशन पर ही मिल जाता है। द्वीप पर आरओ वाटर, शौचालय आदि का इंतजाम है। एक कैंटीन भी है, पर वह कम सैलानी के मौसम में बंद रहती है।

तो चलते हैं नागार्जुन कोंडा, यानी अतीत के आबाद शहर से संवाद करने। खंडहर बताते हैं कि कभी इमारते बुलंद रही होंगी। संग्रहालय के अंदर तीसरी और चौथी शताब्दी में निर्मित इच्छवाकु काल की गौतम बुद्ध के जीवन से जुडी शानदार मूर्तियां हैं। लाइम स्टोन की बनी इन मूर्तियों में एक में बुद्ध के मुकुटको देवता गण स्वर्ग ले जा रहे हैं इसका मनोहारी चित्रण किया गया है। बुद्ध की बैठी और खड़ी कई प्रतिमाएं हैं, इनमें कई ध्वंस हो गई हैं।

एक प्रतिमा पंचमुख नाग मुछलिंद की है जो तपस्या के समय बुद्ध की रक्षा करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यहां एक खड़े बुद्ध की प्रतिमा है जो 293 सेमी यानी करीब 3 मीटर ऊंची और 35 सेमी चौड़ी है। यह प्रतिमा काफी प्रसिद्ध है। संग्रहालय में बुद्ध के योगी, संन्यासी , वृद्ध और रोगी के रूपों को देखना और एक दिन ज्ञान प्राप्ति के लिए गृह त्याग आदि के प्रकरणों के सुंदर चित्र भी देखे जा सकते हैं।
जिस दौर में ये प्रतिमाएं बनी हैं नागार्जुन कोंडा बड़ा ही समृद्ध शहर था। 


कई हजार बौद्ध भिक्षु यहां निवास करके विद्या अध्ययन करते थे। यहां पर विशाल भिक्षु निवास, बाजार, स्नान घाट, श्मशान घाट, स्तूप आदि का निर्माण कराया गया था। यहां सुंदर रंगशाला भी थी। यहां पर एक पुष्प भद्र स्वामी का मंदिर, नव ग्रह मंदिर, बाल कुबेर मंदिर, बड़ा तालाब और विनोद शाला भी हुआ करती थी। अब ज्यादातर चीजों का अवशेष नहीं है। कुछ भवनों के मॉडल बनाकर बताने की कोशिश की गई है।

कुछ घंटे द्वीप पर गुजारने के बाद अब वापसी की वेला है। शाम होने लगी है। राहुल मुझे विजय विहार के बस स्टाप पर छोड़ देते हैं। हालांकि वे मुझे अपने साथ हैदराबाद चलने का भी ऑफर देते हैं। पर मैं कुछ देर इंतजार करता हूं, फिर माचेरला से आने वाली हैदराबाद की बस मिल गई। इस 2 बाई 2 बस में किराया लगा 180 रुपये। रात के नौ बजे मैं हैदराबाद के इमलीबन स्थित महात्मा गांधी बस स्टैंड पहुंच गया हूं।
-        ( NAGARJUNA KONDA, BUDDHA, GUNTUR, ANDHRA, TELANGANA )
 -        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Thursday, August 23, 2018

केरल के साथ खड़े होने की जरूरत – तबाह हो गया ईश्वर का देश

केरल की एक सड़क - तबाही से पहले और तबाही के बाद
केरल यानी ईश्वर का अपना देश। कभी यह चार शब्द केरल टूरिज्म की टैगलाइन हुआ करते थे। पर अगस्त 2018 में हुई तेज बारिश में केरल के 14 में 11 जिलों में भारी तबाही मची है। अब बारिश कम हो गई है। पानी उतरने लगा है। पर बुरी तरह बर्बाद हो चुके केरल को मदद की दरकार है। इड्डुकी जिले का मुन्नार जो दुनिया के दस बेहतरीन टूरिस्ट डेस्टिनेशन में गिना जाता है, उसके आसपास के रास्ते बर्बाद हो चुके हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, पिछले साल अक्तूबर में (2017) में ही तो हम सपरिवार मुन्नार की हसीन वादियों में कुछ दिन गुजार कर आए थे। पर वे मुन्नार के चाय के बगान अब तबाह हो चुके हैं।
केरल ने सौ साल में ऐसी बारिश कभी नहीं देखी। इस बारिश से केरल की कमर कुछ ऐसी टूटी है कि सब कुछ ठीक होने में कुछ साल लग सकते हैं। इस दौर में केरल के साथ मिलकर हाथ बटाने की जरूरत है। आर्थिक मदद, सामान से मदद, दवाओं से मदद जैसे भी हो सके केरल के साथ खड़ा होने की जरूरत है। यह खुशी की बात है कि हर क्षेत्र के लोग केरल की मदद के लिए आगे आ रहे हैं।
बारिश ने कहर कुछ इस तरह ढाया कि केरल का सबसे व्यस्त कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से सभी तरह की उडाने रोकनी पड़ी। पेरियार नदी का पानी आसपास के गांव को डूबो चुका है। कई रास्ते तो बुरी तरह तबाह हो चुके हैं। इन सड़को को फिर से बनाने में लंबा वक्त लग सकता है। केरल की आईपीएस अधिकारी रीमा राजेश्वरी ने एक फोटो ट्वीट की है। इसमें एक सड़क है जो पहले ऐसी थी और बाढ़ के बाद वह किस तरह तबाह हो गई है उसे देखा जा सकता है।
हो सकता है एक सैलानी के तौर इन सर्दियों में और नए साल में आप केरल के तमाम हिस्सों का आनंद नहीं ले सकें। पर केरल आने वाले दिनों मे फिर पहले जैसा हरा भरा खिलखिलाता हुआ दिखाई दे इसके लिए हमें केरल के साथ खड़े होने की जरूरत है।

कैसे करें मदद - अगर आप केरलको दान देना चाहते हैं तो केरल सरकार के इस पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन दान दे सकते हैं। 
https://donation.cmdrf.kerala.gov.in/  केरल सरकार को आपकी ओर से दिया गया यह दान आयकर से पूरी तरह से छूट प्राप्त है। आपको 80जी के तहत छूट की रसीद भी साथ ही मिल जाती है।

- vidyutp@gmail.com
(KERALA, FLOOD) 



Wednesday, August 22, 2018

नालगोंडा से नागार्जुन सागर की ओर

नालगोंडा से नागार्जुन सागर के लिए पहली बस सुबह 5.30 बजे से मिलने लगती है। मेरा होटल बस स्टैंड के सामने है तो मैं तैयार होकर सुबह 6.30 वाली बस में नागार्जुन सागर के लिए बैठ गया। किराया है 44 रुपये। कोई दो घंटे का सफर है। रास्ते में नीदामानूर और हालिया जैसे दो प्रमुख कस्बे में बस रूकी। कुछ लोग चढ़ते उतरते हैं। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। वैसे बस माचेरला तक जा रही है। माचेरला आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले का शहर है। सुबह 9.30 बजे बस ने विजय विहार के स्टाप पर उतार दिया। 
सामने एक टिफिन्स की दुकान है, तो सबसे पहले पेटपूजा। बीस रुपये में मसाला डोसा खाकर तृप्त हो गया। सामने दो मंदिर हैं। वहां मत्था टेकने के बाद नागार्जुन कोंडा जाने वाले मोटर लांच का स्टेशन पूछता हूं। लोगों ने बताया कि थोडा पैदल चलकर आगे की ओर जाएं। पैदल चलकर वहां पहुंच गया। बस का स्टाप तो यहां भी है, पर यहां कोई नास्ते की दुकान नहीं है। यहां से तेलंगाना टूरिज्म की ओर से नागार्जुन कोंडा के लिए मोटर लांच का संचालन किया जाता है। समय 9.30 और 1.00 बजे का है। पर सवारी कम हो तो दिन में एक बार ही मोटर लांच चलती है।
कम से 60 लोग हों तो चलेगी मोटर लांच 
यहां आने पर पता चला कि कम से कम 60 लोगों के होने पर ही मोटर लांच चलेगी। अभी पहुंचे सिर्फ 8 लोग हैं। इंतजार करना होगा। गर्मी में सैलानी कम आते हैं। तो आंध्र प्रदेश शासन की ओर गुंटुर की तरफ से चलने वाली मोटर लांच बंद है। शनिवार रविवार को ज्यादा सैलानी आते हैं। आज सोमवार है तो लोगों को इंतजार है। तीन घंटे इंतजार के बाद भी लोग नहीं पूरे हुए। इस बीच हैदराबाद के राहुल से दोस्ती हुई। वे बाइकर हैं, बुलेट से देश भर में घूमते हैं। पूरा दक्षिण घूम चुके हैं, अब लेह जाने की इच्छा रखते हैं। इंतजार करते हुए दोपहर हो गई है। इस बीच शिकंजी पीया है। 
तेलंगाना टूरिज्म का विजय विहार टूरिस्ट कांप्लेक्स 
विजय विहार में लंच - अब भूख लगी है। तो राहुल के साथ उनकी बुलेट पर हमलोग दो किलोमीटर पीछे तेलंगाना टूरिज्म के विजय विहार रिजार्ट पहुंचे। वहां दोपहर का लंच लिया। 137 रुपये में अनलिमिटेड बूफे लंच। खाना बहुत अच्छा था, तो जमकर खा लिया। वापस आने पर एक बार फिर मोटर लांच पाने की कवायद। अभी भी 24 यात्री हो सके हैं। तो तय हुआ कि हमलोग अपना दिन क्यों खराब करें 150 रुपये प्रति व्यक्ति की जगह थोड़े ज्यादा पैसे दिए जाएं तो मोटर लांच चल सकती है। फिर यही किया गया 150 की जगह 350 प्रति व्यक्ति देने पड़े। इस तरह दोपहर 1.30 बजे नागार्जुन कोंडा के लिए सफर आरंभ हुआ। मोटर लांच अच्छी है। इसमें 150 लोग सफर कर सकते हैं।

13 द्वार आंध्र में 13 तेलंगाना में -  नागार्जुन सागर बांध कृष्णा नदी पर बना है। आंध्र और तेलंगाना के विभाजन के बाद इसके 26 द्वार में से 13 आंध्र में पड़ते हैं तो 13 तेलंगाना में। नागार्जुन सागर आप आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले से या फिर तेलंगाना के नालगोंडा जिले से पहुंच सकते हैं। हैदराबाद से नागार्जुन सागर के लिए सीधी बसें भी हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन माचरेला है जो यहां से 24 किलोमीटर है।
नागार्जुन सागर बांध - राष्ट्र का नवीन मंदिर 
नागार्जुन सागर बांध का निर्माण स्वतंत्रता के बाद 1955 में करवाया गया। इसके वास्तुकार पद्मभूषण केएल राव थे। बांध के पास बने पार्क में केएल राव और आंप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की प्रतिमाएं लगी हैं। 1955 में बांध की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने रखी थी। बांध पूरी तरह 1967 में तैयार हुआ। साल 2005 में इस बांध के 50 साल पूरे हो गए।
इस बांध के कारण 800 मेगावाट से ज्यादा बिजली का उत्पादन होता है। इस बांध से मिलने वाले पानी से न सिर्फ आंध्र तेलंगाना के सात जिलो में खेतों की सिंचाई होती है। साथ ही पूरे हैदराबाद शहर को पीने का पानी यहां से मिलता है। इसलिए पानी के  बूंद बूंद की कीमत हैदराबाद के लोग खूब जानते हैं।
( NAGARJUNA SAGAR DAM, NALGONDA, GUNTUR, ANDHRA, TELANGANA, KRISHNA RIVER, WATER) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Monday, August 20, 2018

नालगोंडा में ज्वार की रोटी और टमाटर की चटनी


तेलंगाना के नालगोंडा शहर की सैर के बाद शाम को लौटकर नालगोंडा के बाजार में मसाला डोसा खाया 20 रुपये का। यह मसाला डोसा नहीं बल्कि छोटा ओनियन डोसा है। इसका स्वाद अच्छा है। अब रात के खाने के लिए निकला हूं। स्थानीय स्वाद की तलाश में।
चलते चलते मैंने देखा शहर के अस्पताल रोड पर फुटपाथ पर महिलाएं लकड़ी के चुल्हे पर ज्वार की रोटियां बना रही हैं। आटा गूंथने के बाद हाथ से ही रोटी को थपका कर पराठे से भी बड़ा कर देती हैं। बिल्कुल पतला। फिर उन्हे तवे पर बड़े ही करीने से पका रही हैं। इसको पकाने के लिए पानी का इस्तेमाल करती हैं। कोई घी तेल नहीं। बिना परथन के पानी पर रोटी सेंक लेना यह भी एक कला है।


रोटी के साथ मिर्च और टमाटर की लाल चटनी। एक रोटी 10 रुपये की। एक खाई तो अच्छी लगी। और लेने की इच्चा हुई। एक एक कर मैं तीन ज्वार की रोटियां खा लेता हूं। अब देख रहा हूं कि कई लोग यहां से ज्वार की रोटियां पैक कराकर भी ले जा रहे हैं। लोगों ने बताया कि गरमी ज्वार की रोटी खाना सेहत के लिए अच्छा है। रोटी पकाने वाली महिला की श्रम को मन ही मन नमन करते हुए वापस होटल की ओर लौट आया।


 ज्वार की रोटी के फायदे (GRAIN SORGHUMSEED )

 ज्वार को मोटा अनाज माना जाता है। कई जगह इसकी खेती जानवरों के चारे के लिए की जाती है। ज्वार को संस्कृत में यवनालयवाकार या जूर्ण कहते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि ज्वार का आटा प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है। यह हृदय और मधुमेह रोगियों समेत कई रोगों में फायदेमंद है। ज्वार के फायदे बवासीर और घावों को भरने में भी कारगर हैं। गर्मियों में इसका सेवन शीतलता प्रदान करता है। ज्वार ठंडा होता है जिसके कारण इसे खाने से हमे प्यास अधिक लगती है। ज्वार की रोटी को छाछ में भिगोकर भी खा सकते हैं।

आमतौर पर ज्वार की रोटी हाथो से ही बनाई जाती हैभारत के ग्रामीण लोग आज भी इसे मुख्य भोजन के रूप में खाते है। यह गेंहू की रोटी का सबसे अच्छा विकल्प बन सकता हैं।  ज्वार में पोटैशियमकैल्शियम और आयरन होता हैं। चावल और गेहूं की तुलना में ज्वार में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। मधुमेह वाले व्यक्ति के लिएगेहूं के आटे की चपाती की तुलना में ज्वारी आटा की रोटी बनाने की सलाह दी जाती है।


(NALGONDA, TELANGANA, JWAR KI ROTI )

   -        विद्युत प्रकाश मौर्य

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Sunday, August 19, 2018

नालगोंडा में सूफी संत लतीफ शाह की दरगाह - सौहार्द की मिसाल


दोपहर की गर्मी में बस के दो घंटे  के सफर के बाद मैं भुवनगिरी से नालगोंडा पहुंच गया हूं। बस स्टैंड में उतरने के बाद बाहर निकलते ही किसी ठिकाने की तलाश में हूं। सामने नजर आता है नालगोंडा लॉज। रिसेप्शन पर एक महिला हैं। बताती हैं कमरा 300 रुपये का है। मैं यहीं ठिकाना बना लेता हूं। इस होटल में दिन में भोजनालय भी संचालित होता है। पर मैं खाने के समय के बाद पहुंचा हूं। थोड़ी देर कमरे में आराम करने के बाद शाम गहराने के साथ नलगोंडा की सड़कों पर घूमने निकल पड़ता हूं।
नालगोंडा शहर बहुत बड़ा नहीं है। आबादी डेढ़ लाख के आसपास है। चौराहों पर कुछ महापुरुषों की प्रतिमाएं लगी हैं। इनमें महात्मा ज्योतिबा फूले भी हैं। गरमी बहुत है तो बाजार में जगह जगह शरबत की दुकाने हैं। यहां शरबत की दुकानें कुछ अलग किस्म की हैं। एक फ्रिजर में कई अलग अलग स्टील के पॉट हैं जिनमें अलग अलग तरह के शीतल पेय बनाकर रखे गए हैं। आप जो स्वाद मां करेंगे दुकानदार निकाल कर दे देता है। पांच, दस रुपये से लेकर 15 रुपये ग्लास तक।
नालगोंडा का पुराना नाम नीलगिरी था। यहां पाषाण युग और पूर्व पाषाण युग के अवशेष मिले हैं , इसलिए यह क्षेत्र पुरातात्व शास्त्रियों के लिए रुचि का विषय रहा है। मौर्य काल, सातवाहन काल और बहमनी सम्राज्य में नालगोंडा प्रमुख व्यापारिक केंद्र था।

लतीफ साहेब की दरगाह 570 सीढ़ियों की चढाई  - नालगोंडा शहर में सूफी संत लतीफ साहेब की दरगाह प्रमुख दर्शनीय स्थल है। शहर के मध्य में पहाड़ी पर स्थित दरगाह पर पहुंचने के लिए 570 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। पर रास्ता बड़ा ही साफ सुथरा और मनोरम है। रास्ते में नीम के पेड़ लगे हैं, जिनसे भीनी सी खुशबू आ रही है। पर इस दरगाह पर रोज श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं उमड़ती। हर शुक्रवार को लोग वहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

फरवरी- मार्च महीने में लतीफ शाह की दरगाह पर सालाना उर्स लगता है। तीन दिनों के इस उर्स के दौरान दूर-दूर से जायरीन यहां पहुंचते हैं। इस दौरान हनुमान जी के भक्त भी जलसे में हिस्सा लेते हैं। यह उर्स सांप्रदायिक सौहार्द का बेहतरीन नमूना होता है। हरे हरे पेड़ पौधों के बीच मेरी इच्छा सीढ़ियां चढ़कर दरगाह तक जाने की है। पर तकरीबन 100 सीढ़ियां चढ़ने के बाद लौट आया। लोगों ने बताया कि उपर कोई भी नहीं होगा। जो लोग आम दिनों में लतीफ शाह की दरगाह पर दुआ मांगने आते हैं, उनके लिए  नीचे आधारतल पर ही एक मसजिद बनी है। यहीं पर दुआ कबूल हो जाती है।



(NALGONDA, TELANGANA, LATIF SHAH, URS,  )
   -        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Friday, August 17, 2018

मुसुनुरी नायकों की वीरगाथा सुनाता भुवनगिरी का किला

बालाजी के दर्शन के बाद हम भुवनगिरी बाजार के बस स्टैंड  पहुंच गए हैं। काफी गरमी है तो थोड़ा जूस ले लेना चाहिए। अब बात भुवनगिरी की। भुवनगिरी नाम सही है, पर अंग्रेजी में इसका स्पेलिंग है उसके हिसाब से इसे भोंगीर पढ़ा जाएगा। तो इसकी अंगरेजी की स्पेलिंग ठीक किए जाने की जरूरत है।
तेलंगाना राज्य का नया जिला है यदाद्रि भुवनगिरी। नया जिला नलगोंडा से विभाजित होकर अक्टूबर 2016 में बना है। रंगारेड्डी और नलगोंडा इसके पड़ोसी जिले हैं। हैदराबाद से महज 60 किलोमीटर दूर स्थित भुवनगिरी शहर जिले कामुख्यालय है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 163 पर स्थित है। भुवनगिरी बस स्टैंड के सामने भुवनगिरी का किला दिखाई देता है। दरअसल पूरा शहर विशाल पहाड़ी की तराई में बसा हुआ है।

दसवीं सदी का किला - भुवनगिरी शहर का अपना इतिहास है, जिसकी कहानी भुवनगिरी का विशाल किला सुना रहा है। किले पर जाने के लिए बस स्टैंड से थोड़ा आगे चलने पर सीढ़िया बनी हुई है। प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट भी रखा गया है। किले का रख रखाव राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग करता है। भुवनगिरी शहर के किसी भी इलाके में आप खड़े हों वहां से किला दिखाई देता है। यह किला 10वीं सदी में बनवाया गया। इसका निर्माण चालुक्य राजा त्रिभुनमल विक्रमादित्य चतुर्थ ने 1074 ई में करवाया था। तब इसका नाम निर्माता राजा के नाम पर ही त्रिभुवनगिरी रखा गया था। बाद में इसे छोटा करके भुवनगिरी कहा गया। चौदहवीं सदी में यह किला मुसुनुरी नायकों को अधीन रहा। काकातीय सम्राज्य के अधीन मुसुनुरी नायक शूद्र समाज से आने वाले वीर योद्धा थे।
किले में कन्नड़ और तेलगु में लिखे कुछ अभिलेख मिलते हैं जो उस समय के लोगों के जीवन शैली पर प्रकाश डालते हैं। बाद में यह किला लंबे समय तक काकातीय सम्राज्य के अधीन रहा। पर एक हजार साल पुराना किला आज भी बेहतर हाल में दिखाई देता है। पंद्रहवी सदी में यह किला बहमनी सल्तनत के अधीन हो गया। निजाम के शासन में कुतुबशाही के दौरान इस किले का इस्तेमाल लंबे समय तक जेल के रूप में किया जाता रहा। पर ब्रिटिश काल में यह किला लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा।


रॉक क्लाइंबिंग की ट्रेनिंग - तकरीबन 500 फीट की ऊंचाई पर यह किला अंडाकार क्षेत्र में बना हुआ है। नीचे से किले तक जाने वाली सीढ़ियां अभी भी अच्छे हाल में हैं। सीढ़ियों की शुरुआत में आधार तल पर एक हनुमान जी का मंदिर है। किले में अस्तबल, तालाब, कुएं आदि का निर्माण कराया गया था। किले के ऊपर से पूरे शहर और आसपास का विहंगम दृश्य बड़ा शानदार दिखाई देता है। 
यहां लोग बताते हैं कि भुवनगिरी किले से गोलकुंडा किले तक कभी सुरंग हुआ करती थी। हालांकि इसकी कोई ऐतिहासिकता नहीं मिलती। भुवनगिरी के किले में एक रॉक क्लाइंबिंग का प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित किया जाता है। यहां दूर दूर से सैर सपाटा के शौकीन लोग रॉक क्लाइंबिंग का प्रशिक्षण लेने आते हैं। इस स्कूल की स्थापना 2013 में तेलंगाना टूरिज्म की ओर से की गई।
भुवनगिरी तेलंगाना का छोटा सा शहर है। इसकी आबादी 60 हजार के आसपास है। यहां के बस स्टैंड से हैदराबाद, नलगोंडा समेत आसपास के शहरों के लिए बसें हमेशा मिल जाती हैं। बस स्टैंड सुविधाजनक बना हुआ है। स्टैंड के अंदर छोटा सा बाजार है। मुझे आधे घंटे के इंतजार के बाद नलगोंडा की ओर जाने वाली बस मिल जाती है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य

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( BHUWANGIRI, BHONGIR, TELANGANA, ROCK CLIMBING ) 

Wednesday, August 15, 2018

दिल्ली से यदाद्रि बालाजी नरसिम्हा के चरणों में

एक बार फिर दक्षिण की ओर। अब तक कितनी बार दक्षिण जा चुका हूं इसकी गिनती मुश्किल है। पर जनवरी 1992 में पहली बार दक्षिण जाना हुआ था। इसके बाद दिसंबर 2006 में। फिर जनवरी 2007 से हैदराबाद लंबा ठिकाना बन गया। फिर हैदराबाद से दिल्ली वापसी हो गई। पर 2012 में एक बार फिर दक्षिण की लंबी यात्रा। उसके बाद तकरीबन हर साल दक्षिण के किसी न किसी हिस्से में जाना हुआ। दक्षिण भारत की कई बातें अच्छी लगती हैं। खासतौर पर खाना पीना, मंदिर और ऐतिहासिक विरासत के स्थल।
इस बार हमारी उड़ान टी-2 से है। सुबह 3 बजे टी 2 के प्रवेश द्वार पर पहुंच गया हूं। टी-3 से टी-2 जाने के लिए एक लंबा गलियारा बन गया है। हालांकि टी-3 की टी2 विशाल और आकर्षक नहीं है। चेकइन के बाद गो एयर के विमान का इंतजार। 
एयरोब्रिज के बजाय बसों में सवार होकर विमान तक पहुंचाया गया। हालांकि टी-2 में एयरोब्रिज की सुविधा है। सुबह 5.40 की उडान है।पायलट हैं कैप्टन दीप वर्धन, को पायलट आदित्य पाटिल। क्रू मेंबर हैं सुमित, अयान, सिमरन और प्रज्ञा। मुझे सीट नंबर 5 एफ मिली है। खिड़की वाली सीट। पर मैं रात भर जगा हूं सो फ्लाइट में सीट पर आते ही सो गया। 
 हैदराबाद के राजीव गांधी विमानपत्तन पर साढ़े सात बजे सुबह पहुंच गए हैं हम। वहां से सिटी में जाने के लिए बस। किराया 210 रुपये। हैदराबाद के हर इलाके के लिए बसें मिलती हैं यहां से। मैं उप्पल वाली बस में बैठा। एक घंटे बाद उप्पल में उतर गया। सड़क पार करके भुवनगिरी-यादगिरीगुट्टा जाने वाली बस तुरंत मिल गई। एक घंटे का रास्ता है उप्पल से।

तेलंगाना की के चंद्रशेखरराव की सरकार ने यदाद्रि-भुवनगिरी को नया जिला बना दिया है। पहले यह नलगोंडा जिले का हिस्सा था। भुवनगिरी जिले का मुख्यालय है। भुवनगिरी काजीपेट-सिकंदराबाद लाइन का रेलवे स्टेशन भी है। बस भुवनगिरी बस स्टैंड में पहुंची। वहां से फिर यदाद्रि के लिए चल पड़ी। कोई 11 किलोमीटर और आगे। पुराना नाम तो यादगिरीगुट्टा है, पर अब छोटा नाम दिया गया है यदाद्रि। बस ने यदाद्रि स्टैंड के अंदर उतार दिया। पर मंदिर जाना है तो स्नान करना जरूरी है। सुलभ में स्नानागार की सुविधा 30 रुपये में है।
स्नान कर कपड़े बदल कर मंदिर जाने वाली बस में बैठ गया। मंदिर यहां 4 किलोमीटर ऊंची पहाड़ी पर है। रास्ता बहुत अच्छा बन गया है। तेलंगाना रोडवेज की बस चलती है मंदिर के प्रवेश द्वार तक। किराया 10 रुपये। वैसे आटो वाले भी 10 रुपये में ले जाते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ है। काफी संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे हैं।यदाद्रि के बालाजी नरसिम्हा का मंदिरतेलंगाना का सबसे बड़ा मंदिर है। एक घंटे लाइन में लगे रहने के बाद बालाजी नरसिम्हा के दर्शन लाभ प्राप्त हो गए। मंदिर के निकास द्वार पर प्रसाद मिल रहा है।

तो लेमन राइस, नमकीन चावल मंदिर का प्रमुख प्रसाद है। मंदिर के रास्ते में खिलौनों की भी दुकाने हैं। ये खिलौने देखकर अपना बचपन याद आ जाता है। जब हम रुक कर मचल उठते थे। पर मैं एक बार फिर यहां अपना पसंदीदा कच्चे आम खाता हूं। दक्षिण  कच्चे आम को बड़े सुंदर ढंग से काटकर बेचते हैं। सिर्फ 10 रुपये में। मंदिर से लौटकर बस स्टैंड के पास एक रेस्टोरेंट में वेज बिरयानी खाई।
वेज बिरयानी 35 रुपये में - स्वाद अच्छा है...
यहां वेज बिरयानी सिर्फ 35 रुपये में मिली। दही-रायता के साथ। खूब स्वाद है। अब दोपहर हो चुकी है। आगे का सफर आटो रिक्शा से हुआ भुवनगिरी तक। रास्ते में यादगीर का रेलवे स्टेशन दिखाई दिया। पर आपको यदाद्रि आना हो तो हैदराबाद से रेल या बस से भुवनगिरी आएं। भुवनगिरी भी रेलवे स्टेशन है। भुवनगिरी में भी रहने खाने पीने के अच्छे इंतजामात उपलब्ध हैं।
-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  

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