Monday, July 23, 2018

शंहशाह-ए-मालवा यानी मीठे महाबली सरकार

गागरोन के किले की तरफ जाते समय आहू नदी को पार करते ही सूफी संत मीठे शाह की दरगाह है। इन्हे शंहशाहे मालवा भी कहते हैं। हालांकि उनका पूरा नाम हजरत शेख हमीदुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह था। लोग प्यार से उन्हें मीठे महाबली सरकार भी कहते हैं। इस दरगाह के साथ कई रोचक बातें जुडी है। औरंगजेब का बनवाया हुआ दरवाजाझूलती मीनारें। विशाल देग और भी काफी कुछ। तो आईए चलते हैं मीठे शाह के दरबार में। 


चप्पल उतारने के बाद सिर पर साफा बांध मैं दरगाह में अंदर दाखिल हो जाता हूं। एक सज्जन बाहर बैठकर बड़े ही सुर में कव्वाली गा रहे हैं बिना किसी साज के। मैं उन्हें सुनने लगता हूं। थोड़ी देर बाद जब वे चुप होते हैं उनसे बातचीत में पता चलता है कि वे मीठे शाह के दरबार के गद्दीनशीन है। उनका नाम सैयद इमरान अली उर्फ फहीमुद्दीन चिश्ती है, लोग उन्हें चांद बाबा भी कहते हैं। उन्होंने मीठे शाह पर एक किताब भी प्रकाशित कराई है जिसके लेखक वे खुद हैं। वे मुझे दरबार के बारे में बताना शुरू करते हैं।

सूफी दरवेश ( संत) हजरत शेख हमीदुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह उर्फ मीठे शाह ख्वाजा मोउनुद्दीन चिश्ती की परंपरा के ही सूफी संत थे। उनके दरबार की महिमा पानीपत के कलंदर शाह के बराबर है। उन्हें कई नामें से पुकारा जाता है। उनमें से शंहशाह-ए- मालवा मीठे महाबली आदि उनका लोकप्रिय नाम है। 

मीठे शाह का जन्म मध्य एशिया के खुरासान प्रदेश में बुखारा नगर के एक सैय्यद परिवार में हुआ था। उन्होंने अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के दरबार में 20 साल सेवा की। उसके बाद उन्हें ख्वाजा ने गगरोन शरीफ जाने का आदेश दिया। वे गगरोन में ही 1270 ई (हिजरी 670) में परदा कर गए।

दरगाह के बाहर एक हिलती हुई छतरी है। उसके छूने पर वाकई हिलती पर कई सौ सालों से इसी हाल में है। अलग अलग आकार की दो देग यहां दिखाई गेती है। लोहे की विशाल देग में एक साथ कई सौ लोगों के लिए चावल बन सकता है। बताते हैं कि ये बड़ी देग बादशाहों की दी हुई है। इस देग में एक बार में सवा 15 मन चावल बन जाता है। दरगाह परिसर में औलिया मसजिद और कलंदर चौक भी देखा जा सकता है।

गगरोन में मीठे शाह की दरगाह के कारण इसे गगरोन शरीफ भी कहते हैं। दूर दूर से श्रद्धालु यहां मत्था टेकने और मन्नत मांगने आते हैं। सूफी संतो के दर पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही समान रूप से पहुंचते हैं।

हर साल लगता है उर्स मीठे शाह की दरगाह पर हर साल उर्स लगता है। उस समय यहां देश भर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। तीन दिन मेले जैसा माहौल होता है। इस दौरान कव्वाली की महफिलें सजती हैं। देश भर से कई नामचीन कव्वाल भी पहुंचते हैं। मीठे शाह की दरगाह पर उर्स हर साल जेठ महीने में शुक्ल पक्ष में लगता है।

खादिमान कमेटी के तत्वाधान में हर साल उर्स प्रारंभ होने से दस दिन पूर्व यह रस्म अदा की जाती है। इसमें गुम्बद शरीफ पर लगे पंजे शरीफ को उतारने के बाद कच्चे दूध से नहलाकर आस्ताने में रखा जाता है। मोहर्रम का चांद नजर आने पर फिर गुम्बद शरीफ पर पंजे को चढ़ाया जाता है।


दरगाह के पार ही एक हौली (स्तंभ) है। इसकी खास बात है कि इसे एक तरफ से सूंघने पर इत्र की खुशबू आती है तो दूसरी तरफ से सूंघे तो बदबू आती है।  

मीठे शाह की दरगाह के बाहर कुछ दुकाने हैं। एक दुकान चिश्ती साहब यानी चांद बाबा के परिवार की भी है। चलते समय वे मुझे चाय पीने का आग्रह करते हैं। पर मैं अदब से उनकी चाय की पेशकश मना करके आगे बढ़ जाता हूं।
( JHALAWAR, GAGARON SHARIF, MITHE SHAH, SUFI ) 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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