Saturday, July 21, 2018

बिना किसी नींव के खड़ा है विशाल गागरोन का किला

झालावाड़ में हमारी मंजिल है गागरोन फोर्ट। गागरोन का किला। रेलवे स्टेशन पर एक आटो रिक्शा वाले से बात हुई। उन्होंने किला घूमाने और वापस शहर छोड़ देने के लिए वाजिब कीमत मांगी। तो मैं उनके साथ चल पड़ा किले की ओर। आटो वाले का नाम विनोद सिंह है। (मोबाइल नंबर – 96028 66751 ) आप कभी झालावाड़ जाएं तो उनके साथ घूम सकते हैं।
गागरोन का किला रेलवे स्टेशन से 9 किलोमीटर और मुख्य बाजार से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। तो चलिए चलते हैं। आटो रिक्शा शहर पार करके ग्रामीण इलाके से होते हुए एक बरसाती नदी को पार करता है। इसके बाद हम किले के मुख्य द्वार तक पहुंच चुके हैं। यह किला राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है। अपना टिकट लेने के बाद सुरक्षा गार्डों से मैं आटो रिक्शा अंदर ले जाने का अनुरोध करता हूं। मुझे यह अनुमति मिल जाती है। पहला फायदा पैदल कम चलना पड़ेगा दूसरा फायदा की हमारे आटो वाले अच्छे गाइड भी हैं। उनका सानिध्य मिलेगा।
गागरोन का किला – राजस्थान के कुछ दूसरे किलों के साथ गागरोन का किला 2013 में यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया। तो कुछ तो खास बात है इस किले में। पहली बात की यह किला दो नदियों के संगम पर बना है। एक तरफ सिंध नदी तो दूसरी तरफ आहू नदी बहती है। इसलिए कहीं से भी आक्रमणकारियों को इन नदियों को पार करके ही आना होगा। तो सामरिक तौर पर यह किला अति सुरक्षित है। किले के प्रवेश द्वारा पर सूफी संत मीठे शाह की दरगाह है।


किले की नींव नहीं – एक और खास बात है जो इस किले तो बाकी दुर्ग से काफी अलग करती है। यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसकी को नींव नहीं है। बस किला बनता चला गया। यह अनगढ़ शैली में बना प्रतीत होता है बिना किसी डिजाइन के। पर धीरे धीरे विशाल रूप लेता गया। इतिहासकारों के मुताबिक दुर्ग का निर्माण सातवीं सदी से 14वीं सदी तक चलता रहा।

वैसे गागरोन किले का निर्माण मुख्य रूप से डोड राजा बीजलदेव ने बारहवीं सदी में करवाया था। यहां अगले 300 साल तक यहां खींची वंश का राज्य रहा। इस किले से कुल 14 युद्ध और दो जौहर हुए। तीन तरफ से पानी से घिरा होने है इस कारण इसे जलदुर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एकमात्र ऐसा किला है जिसमें तीन परकोटे बने हैं। सामान्यतया सभी किलो के दो ही परकोटे होते हैं। कुछ लोग इस किले को हाउंटेड यानी भुतहा भी मानते हैं। एक टीवी चैनल पर हाउंटेड किलों की सूची में इस किले को लेकर कार्यक्रम प्रसारित हुआ था, उसके बाद किले के बारे में देश भर के लोगों ने ज्यादा जाना।  

हजारों महिलाओं ने किया था जौहर - जब यहां के शासक अचलदास खींची मालवा के शासक होशंग शाह से हार गए थे तो यहां की राजपूत महिलाओं ने खुद को दुश्मनों से बचाने के लिए जौहर (जिंदा जला दिया) कर दिया था। सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था। अचलदास खींची गागरोन के अंतिम प्रतापी नरेश थे। 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने 30 हजार घुड़सवार, 84 हाथी और पैदल सेना लेकर कई राजाओं के साथ इस दुर्ग को घेर लिया। अचलदास इस युद्ध में राजपूती परंपरा में बहादुरी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस दौरान दुश्मन से बचने के लिए हजारों महिलाओं ने किले में जौहर किया था। इसके बाद सैकड़ो साल तक यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के अधीन रहा।
किले के चारों तरफ पदयात्रा करते हुए नदी की जलधारा का बना मनोरम नजारा दिखाई देता है। बारिश के दिनों में इन नदियों में पानी बढ जाता है, तब इस किले को देखने का आनंद भी बढ़ जाता है।


हुक्का पीने की आवाज आती थी - किले मे राजा अचल दास के शयन कक्ष और उनके पलंग को लेकर कई बातें कही जाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यहां से रोज रात को कई तरह की आवाजें आती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पलंग के पास से हुक्का पीने की आवाज आती थी। जब यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के कब्जे में आया तो भी अचलदास के शयन कक्ष और उनके पलंग से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। किले के अंदर एक मंदिर भी है। यह मंदिर खींची राजाओं द्वारा स्थापित है। इसमें आज भी पूजा अर्चना होती है। किले के आसपास अब गांव बस गया है।
हालांकि गागरोन दुर्ग को करीब से देखना अत्यंत रोचक अनुभूति है, पर यहां दैनिक तौर पर सैलानियों का आमद कम ही होती है। पर किले के बारे में सुनकर अक्सर यहां विदेशी सैलानी पहुंचते रहते हैं।  
( RAJSTHAN, GAGRON FORT,  JHALAWAR CITY , REMEMBER IT'S A WORLD HERITAGE SITE)
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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