Tuesday, July 3, 2018

महलों में पली होके मगन चली...मीरा रानी दीवानी कहाने लगी...

कान्हा की भक्ति में अपना पूरा जीवन मिटा देने वाली मीरा। मीरा बाई चित्तौड़ की महारानी थीं। वे मेड़ता से ब्याह कर यहां आई थीं। चित्तौड़गढ़ के किले में मीरा के प्रभु गिरिधर नागर का सुंदर मंदिर देखा जा सकता है।

मीरा के श्याम का मंदिर - चित्तौड़गढ़ के किले में कुंभ श्याम के मंदिर के प्रांगण में ही एक छोटा और अत्यंत सुंदर मंदिर है, जिसे कृष्ण दीवानी भांतिमति मीरा बाई का मंदिर कहते हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार पहले यह मंदिर ही कुंभ श्याम का मंदिर था, लेकिन बाद में बड़े मंदिर में नई कुंभा स्वामी की प्रतिमा स्थापित हो जाने के कारण उसे कुंभ श्याम का मंदिर जानने लगे और यह मंदिर मीराबाई का मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो गया। इस मंदिर के निज भाग में मीरा और उनके आराध्य मुरलीधर श्रीकृष्ण का अत्यंत सुंदर चित्र हैं। मंदिर के गर्भ गृह में मुरली वाले कान्हा विराजते हैं तो उनके चरणों के पास मीरा बाई की प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर के सामने ही एक छोटी-सी छतरी बनी है। यहां मीरा के गुरु स्वामी रैदास के चरण चिन्ह अंकित किए गए हैं। बाहर से देखने में भी मीरा के श्याम का मंदिर अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है।

मीराबाई का जन्म 1498 में राठौर राजवंश में मेड़ता में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ। 1516 में उनका विवाह मेवाड़ के राजा भोजराज से हुआ। उनकी मृत्यु 1557 में द्वारा में हुई। बचपन से ही वह कृष्ण भगवान की दिवानी हो चुकी थी और उनको वोह अपने पति मानने लगी थी। मीरा सारे लोकलाज छोड़कर घंटो कान्हा के प्रेम सुधबुध खोकर लीन रहती थीं। मीरा ने कृष्ण भक्ति में अत्यंत सुंदर रचनाएं की जो हिंदी साहित्य की धरोहर हैं।

मीरा के मंदिर के बाहर सूचना पट्ट पर लिखा है – यही वह मंदिर है जहां मीरा कृष्ण भक्ति में लीन रहा करती थीं। यहां एक बार मीरा को विष देकर मारने की कोशिश की गई थी। पर उनका विष का प्याला अमृत हो गया था। मंदिर में नियमित सेवा पूजा, बाल भोग और भजन कीर्तन का कार्यक्रम चलता रहता है। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

कम उम्र में पति को खो देने वाली मीरा का मन सांसारिक मोह से विरक्त हो गया था। वे आध्यात्म की ओर प्रवृत हो गईं। परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए भटकने लगीं। क्षत्रिय कुल में जन्मी मीरा बाई काशी में रहने वाले महान कवि संत रविदास (1398- 1540)  की समकालीन थीं। मीरा परम ज्ञान पाने के लिए देश भर के तमाम गुरुओं से तीर्थाटन के दौरान मिलीं। पर अंत में उन्हें रैदास के सानिध्य में जाकर ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने रैदास को अपना गुरु माना।

जौहर स्थल – जहां हजारों वीरांगनाओं ने प्राणों की आहूति दी
चित्तौड़गढ़ के किले में आप वह ऐतिहासिक चौहर स्थल देख सकते हैं, जहां अलाउद्दीन खिलजी से बचने के लिए रानी पद्मिनी के संग तमाम रानी की सखियों और अन्य महिलाओं ने अग्नि में प्रवेश कर जान दे दी थी। इस क्रिया को जौहर नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि यहां विशाल अग्निकुंड तैयार किया गया था। आजकल उस कुंड को पाट दिया गया है।
समृध्देश्वर महादेव के मंदिर से महाराणा कुम्भा के कीर्ति स्तम्भ के मध्य जौहर स्थल एक विस्तृत मैदानी हिस्सा है, जो चारों तरफ से दीवारों से घिरा हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व तथा उत्तर में दो द्वार बने हैं, जिसे महा सती द्वार कहा जाता है। ये द्वार और कोट रावल समर सिंह ने बनवाया था।
चित्तौड़ पर बहादुरशाह के आक्रमण के समय यही हाड़ी रानी कर्मवती ने सम्मान व सतीत्व की रक्षा हेतु 13 हजार वीरांगनाओं के साथ विश्व प्रसिद्ध जौहर किया था। कहा जाता है कि इस स्थान की खुदाई करने पर मिली राख की कई परत इस करुण बलिदान की पुष्टि होती है। यहां दो बड़ी-बड़ी शिलाओं पर प्रशस्ति खुदवाकर उसके द्वार पर लगाई गई थी, जिसमें से एक अभी भी अस्तित्व में है।
फिल्म पद्मावत के कारण चित्तौड़गढ़ के चर्चा में आन के बाद चित्तौड़गढ़ में सैलानियों की आमद बढ़ गई है। खास तौर पर इस जौहर स्थल को लोग जरूर देखना चाहते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( MEERA BAI TEMPLE, CHHITAURGARH FORT)