Wednesday, July 11, 2018

चित्तौड़गढ़ से काटूंदा मोड़ और अफीम के खेत

चित्तौड़गढ़ की दाल बाटी खाने के बाद वापस आकर होटल नटराज से चेकआउट किया और बस स्टैंड आ गया।  मैंने पता किया था कि चित्तौड़ और कोटा के रास्ते में जोगणिया माता का प्रसिद्ध मंदिर है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कोई बस सीधी जोगणिया माता नहीं जाती, पर आप काटूंदा मोड़ उतर सकते हैं। वहां से जोगणिया माता के लिए दूसरी बस मिल जाएगी। तो मैं एक बस में सवार हो गया काटूंदा मोड का टिकट लेकर। कुछ समय बात बस्सी नामक एक कस्बा आया। कुछ मिनट रुकने के बाद बस आगे चल पड़ी। पारसौली और बिछौर जैसे कस्बे आए रास्ते में।



अफीम की खेती - हाईवे बहुत अच्छा बन चुका है। बस तेजी से दौड़ रही है। तभी रास्ते में  सडक के किनारे खेतों में हरे हरे पौधे लहलहाते नजर आते हैं। ये पौधे किस चीज के हैं। इनमें सुंदर सफेद फूल लगे हैं। सहयात्रियों से पूछने पर पता चला कि ये अफीम के पौधे है। तो इस इलाके में अफीम की खेती होती है। पर अफीम की खेती के लिए सरकार से पट्टा यानी लाइसेंस प्राप्त करना पड़ता है। जितने इलाके में स्वीकृति है उतने ही दायरे में अफीम लगा सकते हैं। सरकार खेतों में एक इंस्पेक्टर बहाल कर देती है। वह खेती की निगरानी करता है। तैयार अफीम की सरकारी खरीद होती है।
किसान इसे कहीं और नहीं बेच सकता है। बिना अनुमति के अगर अफीम बोया तो छापा पडता है और पुलिसिया कार्रवाई भी हो जाती है। अफीम की खेती सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के अधीन होती है। चित्तौड़गढ़ के अलावा राज्य के झालावाड़, बारां, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा में अफीम की खेती होती है। वास्तव में यह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण औषधीय फसल हैं। इसमें लगभग 42 से भी अधिक प्रकार के अल्केलॉइट पाए जाते हैं। जिनमे मुख्य रूप मॉरफीन, कोडीन, थीवेन, नारकोटिन तथा पेपेवरिन अधिक ही महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाने में होता हैं। अफीम के दानों में लगभग 52 फीसदी तेल होता हैं। अफीम के फूल के नीचे वाले हिस्से से डोडा निकलता है। यह भी नशा करने के काम आता है। हालांकि सारा अफीम सरकार खरीद लेती है। पर यह सुनने में आता है कि तय स्टाक सरकार को बेचने के बाद कुछ किसान बचे हुए अफीम को तस्करों के हाथ बेच देते हैं।
मैं बस से काटूंदा मोड पर उतर जाता हूं। यहां हाईवे के बगल में अफीम के पेड़ दिखाई देते हैं। काटूंदा छोटा सा बाजार है। यहां से मुझे जोगणिया माता के लिए दूसरी बस लेनी है। पर दूसरी बस के लिए एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। इस बीच काटूंदा मोड के बाजार का मुआयना कर रहा हूं। बाजार में कई म्युजिकल बैंड पार्टी के दफ्तर हैं। उनकी सजी धजी गाड़ियां यहां लगी हुई हैं।
अब जोगणिया माता जाने वाली बस आ गई है। काटूंदा मोड़ से जोगणिया माता मंदिर की दूरी 20 किलोमीटर है। बस रावतभाटा रोड पर जाकर एक ग्रामीण सड़क में मुड़ जाती है। जोगणिया माता का मंदिर चितौड़गढ़ जिले के बेगू तहसील में पड़ता है।
ग्राम पंचायत का नाम रावडदा है। पर यहां पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहनों की कमी है। माता मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर के आसपास बाजार बन चुका है। यहां पर रात में रुकने के लिए अलग अलग समाज के कुछ धर्मशालाओं का भी निर्माण हुआ है। जाट समाज, गूजर समाज की धर्मशालाओं के बीच मुझे यहां धाकड़ समाज का धर्मशाला दिखाई देता है। हां भाई धाकड़। मतलब जिसकी धाक चलती हो। तो चलिए चलते हैं जोगणिया माता के दरबार में। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KATUNDA MOR, AFIM FARMING, JOGANIA MATA MANDIR )