Tuesday, July 31, 2018

विश्व विरासत में शुमार है रणथंभौर का किला

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में घने जंगलों में स्थित रणथंभौर किला देश के उन किलों में शामिल है, जो कई राजवंशों और कई युद्ध की कहानी बयां करता है। यह रणथंभौर के जंगलों के बीच में स्थित है। सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन से 15 किलोमीटर दूर है रणथंभौर का किला। यह किला राजस्थान के अन्य किलों के समूह के साथ यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शामिल है। इतिहास में कई लड़ाइयों का साक्षी रणथंभौर अब जाना जाता है टाइगर सफारी के लिए तो गणेश जी के मंदिर के लिए। 


यादव राजाओं ने बनवाया किला – इस किले का निर्माण महाराज जयंत ने पांचवी सदी में करवाया था। यह किला यादव राजाओं के अधीन 12वीं सदी तक रहा। इस किले से चौहान राजाओं ने कई लड़ाइयां लड़ी। इस किले ने शाकंभरी के चाहमान राजाओं को काफी ताकत प्रदान की। 12वीं सदी में यह किला पृथ्वी राज चौहान के स्वामित्व में आ गया।  हम्मीर देव जिसने सन 1282 से 1301 तक शासन किया इस किले से शासन करने वाला सबसे प्रतापी राजा था। उसकी बनवाई हुई हम्मीर की कचहरी और महल यहां अब भी देखा जा सकता है। वह एक शक्तिशाली शासक था जिसने कला और साहित्य को बढावा दिया। पर 1301 में यह किला अलाउद्दीन खिलजी के कब्जे में आ गया। लंबे समय बाद 1509 से 1527 तक यह किला राणा सांगा के कब्जे में रहा। इसके बाद यह मुगलों के अधीन हो गया।  साल 1569 में इस किले पर अकबर का कब्जा हो गया।

किले के सात दरवाजे -  रणनीतिक तौर पर सुरक्षित रखने के लिए किले में सात दरवाजे बनाए गए हैं। शेरपुर के पास दिल्ली गेट से प्रवेश करने के बाद आगे
सतपोल और सूरजपोल जैसे गेट आते हैं। आगे नवलखा पोल, हाथी पोल, गणेश पोल के बाद अंधेरी पोल आता है। अंधेरी पोल में दरवाजे के पास टेढा रास्ता है। किले के बुर्ज पर ऊंचाई से कई किलोमीटर तक का नजारा देखा जा सकता है। दुश्मन पर नजर रखने के लिए किले की बनावट शानदार थी।

बाघों का अभ्यारण्य - रणथंभौर किले के आसपास बहुत बड़ा इलाका जंगल है। आजादी के बाद इस जंगल के संरक्षण की कवायद शुरू की गई।
1973 में भारत सरकार ने रणथंभौर के जंगल को टाइगर रिजर्व ( बाघों के लिए अभ्यारण्य ) घोषित किया। 1980 में इस नेशनल पार्क का दर्जा मिला। साल 2014 की गणना में रणथंभौर में 62 बाघ पाए गए थे।  यहां आप बंद जीप में बैठकर टाइगर सफारी के लिए जा सकते हैं। सफारी के लिए सवाई माधोपुर शहर में बजरिया और कई होटलों में बुकिंग होती है।

रणथंभौर के बाघों पर शिकारियों की भी बुरी नजर रहती है। जब टाइगर देखने के इरादे से जाएं तो जंगल में कुलांचे भरते बाघ दिखाई देंगे ही इसकी कोई गारंटी नहीं रहती। इसलिए जब मैं रणथंभौर गया तब टाइगर सफारी में कोई रूचि नहीं दिखाई। हांकिला घूमने के लिए हमारा पूरा समूह निकल पड़ा।

इस किले के आसपास कई तालाब भी हैं। इन तालाबों को अलग अलग नाम से जाना जाता है। पद्म तालाबराजाबाग का तालाबमलिक तालाब आदि। आपके पास समय हो तो इन तालाबों को करीब से देख सकते हैं। चंबल के आंचल में गरमी में लंबा वक्त गुजारने के बाद मैं और दिग्विजय सिंह जून 1992 की गरमी में रणथंभौर के किले में पहुंचे थे। हमारे साथ महाराष्ट्र के दो साथी भी थे।

घूमने वालों को सलाह – किले का दायरा भी बहुत बडा है। आप घूमते-घूमते थक जाएंगे। ऊंची ऊंची दीवारें और विशाल दरवाजों वाले इस किले में सरदी और बरसात में जाना अच्छा रहेगा। किला भ्रमण के दौरान पानी की बोतल अपने साथ रखें। अंदर कोई दुकान नहीं है इसलिए हल्का खाने पीने का सामान भी रख लें। कोई बड़ा लगेज लेकर किले में न जाएं। यहां रखने का इंतजाम नहीं है।
ये किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित है पर किले में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।
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-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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विश्व विरासत किला -
05 वीं सदी का बना हुआ है किला 
700 फीट की ऊंचाई पर है किला 
07 किलोमीटर में है किले का विस्तार 
17 वीं सदी में मुगलों ने जयपुर के राजा को उपहार में दिया यह किला।

( RANTHAMBORE FORT, SAFARI, TIGER ) 

Sunday, July 29, 2018

बाघों के शहर सवाई माधोपुर में 26 साल बाद

राजस्थान का शहर सवाई माधोपुर जाना जाता है बाघों के शहर के लिए। रेलवे स्टेशन पर उतरते ही आपके दर्शन बाघों के म्युरल्स से होते हैं। हो भी क्यों नहीं देश दुनिया से लोग यहां पर बाघ देखने ही तो आते हैं। सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन का परिसर काफी खुला खुला हुआ है। राजस्थान का यह शहर मथुरा-कोटा रेलवे लाइन पर है। मुंबई जाने वाले ज्यादातर ट्रेनें यहां से गुजरती हैं। मैं इस शहर में पूरे 26 साल बाद उतरा हूं। 1992 के जून में सवाई माधोपुर आना हुआ था। तब भाई दिग्विजय नाथ सिंह साथ थे। इच्छा एक बार फिर रणथंभौर वाले गणेश जी तक जाने की है। शाम हो गई है तो कल सुबह सुबह ही जाना होगा।

सवाई माधोपुर का रेलवे स्टेशन काफी खुला खुला है। मुख्य भवन से बाहर निकलते ही दूसरे भवन के बीच बांगड़ धर्मशाला है। हम अपनी 1992 की यात्रा में यहीं रुके थे। पर इस बार आगे बढ़ता हूं। स्टेशन के बाहर बजरिया मतलब मार्केट एरिया है। यहीं पर एक होटल में कमरा मिल गया। कमरे में सामान जमाने के बाद बाहर निकल गया। स्टेशन के पास एक छोटा सा शापिंग मॉल खुल गया है। यहां पर प्रसिद्ध मिठाई की दुकान कान्हा की चेन खुल गई है। वही कान्हा जिसके कोलकाता शाखा में हमने रात को मिठाइयां खाई थी। पर यहां हमने कान्हा में कुछ नहीं खाया।

स्टेशन के पास बाजार का मुआयना करने पर तीन चार दुकाने ऐसी मिली जो पूरी सब्जी को प्रतिकिलो की दर से बेच रहे हैं। हां पूरी सब्जी 100 रुपये किलो। अगर ढाई सौ ग्राम खाना है तो 25 रुपये की। काफी लोग खा रहे थे हमने भी रात के खाने में यही खाना तय किया। पूरी सब्जी का स्वाद अच्छा है।
अब पूरी सब्जी खाने के बाद सवाई माधोपुर की सड़क पर घूमने लगा। एक बारात जा रही है। बारात में बड़ी संख्या में धोती वाले बाराती हैं। पर वे डीजे की धुन पर जमकर नाच रहे हैं। पर बेगानी की शादी में मेरा क्या। होटल के पास ही एक दूध की दुकान है। इसमें बड़े से कड़ाह में दूध खौल रहा है। मैं भी 20 रुपये के दूध का टोकन लेता हूं। इसके बाद छाली वाले गर्म दूध का आनंद लेने लगा। और इस दूध के साथ एक सेल्फी भी ले ली।

 चलिए अब सोने का वक्त हो गया। अगली सुबह स्नान करके 5 बजे ही रणथंभौर के लिए चल पड़ा। रेलवे स्टेशन से दाहिनी तरफ जीप स्टैंड से रणथंभौर किले के लिए जीप चलती है। पर यहां का कायदा है भरेगी तो चलेगी। आज टूरिस्ट कम हैं। इसलिए जीप को भरने में ज्यादा वक्त लग रहा है। सवारियां जल्दी मचा रही हैं तो जीप वाला कह रहा है कि आप खाली सीटों के पैसे दो दो तो ही चलूंगा। मैं जीप  आगे वाली सीट पर बैठा हूं। एक घंटे इंतजार के बाद हमलोग चल पड़े हैं। हमारे साथ एक अलवर के युवक हैं वे रणथंभौर गणेश जी को अपनी बहन की शादी का कार्ड देने जा रहे हैं। रेलवे स्टेशन से रणथंभौर किले के द्वार की दूरी 11 किलोमीटर है। रास्ते में कुछ मंहगे होटल और रिजार्ट बने हैं। किले के प्रवेश द्वार के बाद भी कोई पांच किलोमीटर अंदर चलने के बाद किले का मुख्य द्वार आता है। सर्दी की सुहानी सुबह में हमलोग रणथंभौर किले में प्रवेश कर चुके हैं। सामने कई मोर अटखेलियां कर रहे हैं।

(RAJSTHAN,  TIGER CITY, SAWAI MADHOPUR )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Friday, July 27, 2018

कोटा का टनाटन मखनिया लस्सी

दूसरी बार राजस्थान के कोटा शहर में पहुंच गया हूं। एक बार फिर बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन। कुछ घंटे का खाली समय है, तो रेलवे स्टेशन के आसपास के बाजार में घूमने लगता हूं। चौराहे पर नृत्य रत दो प्रतिमाएं लगी हैं। काफी सुंदर हैं। आगे बढ़ने पर घंटाघर दिखाई देता है। लाल रंग के छोटे से भवन के ऊपर घड़ी लगी है। सही समय बता रही है। अब कुछ खाने की इच्छा है। तो एक मिठाई की दुकान पर पहुंचा। टनाटन मखनिया लस्सी। जी हां यही नाम है। टनाटन मखनिया लस्सी। 

लस्सी 15 रुपये का एक गिलास। लस्सी वाकई टनाटन है। इसमें मक्खन भी है। बीकानेर मिष्टान भंडार में ये मखनिया लस्सी मिलती है। यह मिठाई की दुकान रेलवे स्टेशन रोड पर है। यहां रसगुल्ला महज 160 रुपये किलो मिल रहा है। पर अभी ये रसगुल्ले खाने का बिल्कुल ही मन नहीं है। लस्सी पीकर ही मन तृपत हो गया है। तो आगे चलते हैं।

हां ये तो बताना भूल ही गया कि कोटा शहर खाने पीने के लिए काफी शानदार शहर है। यहां रेलवे स्टेशन के आसपास कई अच्छे भोजनालाय है, जहां वाजिब दरों पर आप पेटपूजा कर सकते हैं। मैं शेरे पंजाब वेज नान वेज रेस्टोरेंट में पहुंचा हूं। खाना अच्छा है पर मीनू देखकर आगे बढ़ जाता हूं। कई बार कई रेस्टोरेंट का मीनू देखने की इच्छा रहती है। आगे नजर आता है असली वीरांगना भोजनालय। दरअसल यहां पर दो वीरांगना भोजनालय हैं। दोनों असली होने का दावा करते हैं। पर मैं जा पहुंचा हूं चित्रकूट वालों का अन्नपूर्णा भोजनालय में। यहीं पर एक थाली का आर्डर कर देता हूं। यह थाली 70 रुपये  की है। इसमें सब कुछ है रोटी चावल, सब्जी, दाल रायता आदि। खाना अच्छा है। पर आप कोटा रेलवे स्टेशन के आसपास राजस्थानी दाल बाटी भी खा सकते हैं। वह भी काफी सस्ते में। तो दाल बाटी, मिठाई या फिर थाली खाएं कोटा आपको सारे विकल्प देता है।
कोटा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया हूं। कोटा जंक्शन पर काफी सुंदर पेंटिंग से दीवारों को सजाया गया है। रेलवे स्टेशन पर रिटायरिंग रूम भी काफी अच्छी हालत में हैं। हालांकि उनकी दरें काफी रियायती नहीं हैं। कोटा से अब हमारी अगली मंजिल सवाई माधोपुर है। वैसे तो दिन में सवाई के लिए कई ट्रेनें हैं पर 22981 कोटा श्रीगंगानगर सुपरफास्ट एक्सप्रेस शाम 5.20 बजे कोटा से चलती है। ट्रेन यहीं से बनकर चलती है इसलिए इस ट्रेन में जगह आसानी से मिल गई। यह ट्रेन राजस्थान के एक कोने से दूसरे कोने का सफर तय करती है। कोटा से यह ट्रेन समय पर चल पड़ी है। सहयात्री भी अच्छे हैं। बातों बातों में सवाई माधोपुर पहुंच गए। रास्ते मे ट्रन लाखेरी में रूकी। लाखेरी बूंदी जिले का नगरपालिका स्तर का शहर है। बूंदी कोटा से सटा हुआ जिला है। कोटा बूंदी सभी राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में आते हैं। इसके बाद का स्टेशन था इंद्रगढ़ सुमेरगंज मंडी। जैसे एक तरफ रामगंज मंडी है उसी तरह कोटा के दूसरी तरफ सुमेरगंज मंडी। सुमेरगंज मंडी राजस्थान के बूंदी जिले में आता है। छोटा सा व्यापारिक कस्बा है। यहां जैन समाज के लोग अच्छी संख्या में हैं।
(KOTA, RAJSTHAN, CHAMBAL,  TANATAN LASSI )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Wednesday, July 25, 2018

झालवाड का गढ़ (किला) और सिद्ध गणपति

गगरोन का किला और मीठे शाह की दरगाह से एक बार फिर झालवाड़ शहर लौट आया हूं। आटो वाले ने मुझे झालवाड़ सिटी पैलेस के सामने छोड़ दिया है। मैं सिटी पैलेस में प्रवेश करता हूं। इसमें एक छोटा सा पर बेहतरीन संग्रहालय है। पर यह संग्रहालय इन दिनों नवीकरण के कार्य को लेकर बंद है। इसलिए हम संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर पहुंचकर इसे देखने से वंचित रहे। वैसे संग्रहालय का 20 रुपये का टिकट है। यह हर सोमवार को बंद रहता है। शासकीय संग्रहालय को वर्ष 1915 में स्थापित किया गया था। खुदाई में मिली कई अलग अलग मूर्तियाँ इस संग्रहालय में रखी गई हैं। इसमें हिन्दू भगवान् अर्धनारीश्वर नटराज की मूर्ती भी है जिसे मास्को में ‘फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया’ (भारत के त्यौहारसमारोह में प्रदर्शित किया गया था। अन्य कई मूर्तियों में लक्ष्मीनारायणत्रिमूर्तिनटराजविष्णु और कृष्ण की मूर्तियाँ सम्मिलित हैं। यहां आप दुर्लभ पांडुलिपियांसुंदर मूर्तियाँपुराने सिक्के और चित्र इस संग्रहालय के मुख्य आकर्षण हैं। इसके अलावा आप यहाँ 5वीं और 7वीं शताब्दी के प्राचीन शिलालेख भी देख सकते हैं।


संग्रहालय बंद था तो झालवाड़ सिटी पैलेस का बाहर से ही मुआयना करना उचित समझा। झालावाड़ किले को गढ़ महल के नाम से भी जाना जाता है और यह झालावाड़ शहर के बिल्कुल मध्य में स्थित है। इस किले को महाराजा राणा मदन सिंह ने इस किले को 1840-1845 के दौरान बनवाया था। शहर के बीचोंबीच स्थित किला भव्य है। पर आजकल इस जिलाधीश कार्यालय (कलेक्टेरेट) और कई अन्य सरकारी कार्यालय इस किले में ही संचालित होते हैं। मतलब सरकारी कब्जा है। क्या यह किसी ऐतिहासिक किले का सही इस्तेमाल है। कदापि नहीं। हमने देश के कई हिस्सों में किलों में इस तरह का कब्जा देखा है। महाराजा के उत्तराधिकारियों ने इस जगह की सुंदरता को बढाने के लिए किले के अंदर कई खूबसूरत चित्र लगाए हैं। किले में स्थित जनाना खास को महिलाओं का महल भी कहा जाता है।


गढ़ गणपति का सुंदर मंदिर
झालवाड़ किले के अंदर गढ़ गणपति का प्रसिद्ध मंदिर है। वे किले के संरक्षक है। पर शहर के लोगों की भी गणपति मे अगाध आस्था है। रोज बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। गणपति का श्रंगार भी हर रोज होता है। यह श्रंगार अदभुत होता है। बेशक मंदिर छोटा सा है पर गणपति का प्रतिमा काफी सुंदर है। गढ़ परिसर स्थिति सिद्धी श्री गढ़ गणपति समिति ने साल 2017 में गणेश महोत्सव को ग्रीन गणेश महोत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। तो उस साल गणेश महोत्सव की थीम ग्रीन हर्बल रही।
किला, विशाल प्रवेश द्वार और पुरानी दीवारों वाले पुराने झालावाड़ शहर को देखते हुए गणपति मंदिर से मैं आगे चल पड़ा हूं। हमारे साथी अनिल भारद्वाज ने झालावाड़ में दैनिक भास्कर के ब्यूरो चीफ इमरान भाई से मिलने की सलाह दी थी। मैं इमरान भाई को फोन लगाता हूं। वे मुझे अपने दफ्तर बुला लेते हैं। थोड़ी देर उनसे बातचीत के बाद मैं वापस कोटा बस से जाने का तय करता हूं। वापसी की ट्रेन शाम को है। बस से चलकर जल्दी पहुंच जाउंगा। तो कोटा की बस में बैठ गया। और तीन घंटे में कोटा शहर में पहुंच चुका हूं।
(JHALAWAR CITY, FORT, GANPATI ) 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Monday, July 23, 2018

शंहशाह-ए-मालवा यानी मीठे महाबली सरकार

गागरोन के किले की तरफ जाते समय आहू नदी को पार करते ही सूफी संत मीठे शाह की दरगाह है। इन्हे शंहशाहे मालवा भी कहते हैं। हालांकि उनका पूरा नाम हजरत शेख हमीदुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह था। लोग प्यार से उन्हें मीठे महाबली सरकार भी कहते हैं। इस दरगाह के साथ कई रोचक बातें जुडी है। औरंगजेब का बनवाया हुआ दरवाजाझूलती मीनारें। विशाल देग और भी काफी कुछ। तो आईए चलते हैं मीठे शाह के दरबार में। 


चप्पल उतारने के बाद सिर पर साफा बांध मैं दरगाह में अंदर दाखिल हो जाता हूं। एक सज्जन बाहर बैठकर बड़े ही सुर में कव्वाली गा रहे हैं बिना किसी साज के। मैं उन्हें सुनने लगता हूं। थोड़ी देर बाद जब वे चुप होते हैं उनसे बातचीत में पता चलता है कि वे मीठे शाह के दरबार के गद्दीनशीन है। उनका नाम सैयद इमरान अली उर्फ फहीमुद्दीन चिश्ती है, लोग उन्हें चांद बाबा भी कहते हैं। उन्होंने मीठे शाह पर एक किताब भी प्रकाशित कराई है जिसके लेखक वे खुद हैं। वे मुझे दरबार के बारे में बताना शुरू करते हैं।

सूफी दरवेश ( संत) हजरत शेख हमीदुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह उर्फ मीठे शाह ख्वाजा मोउनुद्दीन चिश्ती की परंपरा के ही सूफी संत थे। उनके दरबार की महिमा पानीपत के कलंदर शाह के बराबर है। उन्हें कई नामें से पुकारा जाता है। उनमें से शंहशाह-ए- मालवा मीठे महाबली आदि उनका लोकप्रिय नाम है। 

मीठे शाह का जन्म मध्य एशिया के खुरासान प्रदेश में बुखारा नगर के एक सैय्यद परिवार में हुआ था। उन्होंने अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के दरबार में 20 साल सेवा की। उसके बाद उन्हें ख्वाजा ने गगरोन शरीफ जाने का आदेश दिया। वे गगरोन में ही 1270 ई (हिजरी 670) में परदा कर गए।

दरगाह के बाहर एक हिलती हुई छतरी है। उसके छूने पर वाकई हिलती पर कई सौ सालों से इसी हाल में है। अलग अलग आकार की दो देग यहां दिखाई गेती है। लोहे की विशाल देग में एक साथ कई सौ लोगों के लिए चावल बन सकता है। बताते हैं कि ये बड़ी देग बादशाहों की दी हुई है। इस देग में एक बार में सवा 15 मन चावल बन जाता है। दरगाह परिसर में औलिया मसजिद और कलंदर चौक भी देखा जा सकता है।

गगरोन में मीठे शाह की दरगाह के कारण इसे गगरोन शरीफ भी कहते हैं। दूर दूर से श्रद्धालु यहां मत्था टेकने और मन्नत मांगने आते हैं। सूफी संतो के दर पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही समान रूप से पहुंचते हैं।

हर साल लगता है उर्स मीठे शाह की दरगाह पर हर साल उर्स लगता है। उस समय यहां देश भर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। तीन दिन मेले जैसा माहौल होता है। इस दौरान कव्वाली की महफिलें सजती हैं। देश भर से कई नामचीन कव्वाल भी पहुंचते हैं। मीठे शाह की दरगाह पर उर्स हर साल जेठ महीने में शुक्ल पक्ष में लगता है।

खादिमान कमेटी के तत्वाधान में हर साल उर्स प्रारंभ होने से दस दिन पूर्व यह रस्म अदा की जाती है। इसमें गुम्बद शरीफ पर लगे पंजे शरीफ को उतारने के बाद कच्चे दूध से नहलाकर आस्ताने में रखा जाता है। मोहर्रम का चांद नजर आने पर फिर गुम्बद शरीफ पर पंजे को चढ़ाया जाता है।


दरगाह के पार ही एक हौली (स्तंभ) है। इसकी खास बात है कि इसे एक तरफ से सूंघने पर इत्र की खुशबू आती है तो दूसरी तरफ से सूंघे तो बदबू आती है।  

मीठे शाह की दरगाह के बाहर कुछ दुकाने हैं। एक दुकान चिश्ती साहब यानी चांद बाबा के परिवार की भी है। चलते समय वे मुझे चाय पीने का आग्रह करते हैं। पर मैं अदब से उनकी चाय की पेशकश मना करके आगे बढ़ जाता हूं।
( JHALAWAR, GAGARON SHARIF, MITHE SHAH, SUFI ) 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Saturday, July 21, 2018

बिना किसी नींव के खड़ा है विशाल गागरोन का किला

झालावाड़ में हमारी मंजिल है गागरोन फोर्ट। गागरोन का किला। रेलवे स्टेशन पर एक आटो रिक्शा वाले से बात हुई। उन्होंने किला घूमाने और वापस शहर छोड़ देने के लिए वाजिब कीमत मांगी। तो मैं उनके साथ चल पड़ा किले की ओर। आटो वाले का नाम विनोद सिंह है। (मोबाइल नंबर – 96028 66751 ) आप कभी झालावाड़ जाएं तो उनके साथ घूम सकते हैं।
गागरोन का किला रेलवे स्टेशन से 9 किलोमीटर और मुख्य बाजार से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। तो चलिए चलते हैं। आटो रिक्शा शहर पार करके ग्रामीण इलाके से होते हुए एक बरसाती नदी को पार करता है। इसके बाद हम किले के मुख्य द्वार तक पहुंच चुके हैं। यह किला राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है। अपना टिकट लेने के बाद सुरक्षा गार्डों से मैं आटो रिक्शा अंदर ले जाने का अनुरोध करता हूं। मुझे यह अनुमति मिल जाती है। पहला फायदा पैदल कम चलना पड़ेगा दूसरा फायदा की हमारे आटो वाले अच्छे गाइड भी हैं। उनका सानिध्य मिलेगा।
गागरोन का किला – राजस्थान के कुछ दूसरे किलों के साथ गागरोन का किला 2013 में यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया। तो कुछ तो खास बात है इस किले में। पहली बात की यह किला दो नदियों के संगम पर बना है। एक तरफ सिंध नदी तो दूसरी तरफ आहू नदी बहती है। इसलिए कहीं से भी आक्रमणकारियों को इन नदियों को पार करके ही आना होगा। तो सामरिक तौर पर यह किला अति सुरक्षित है। किले के प्रवेश द्वारा पर सूफी संत मीठे शाह की दरगाह है।


किले की नींव नहीं – एक और खास बात है जो इस किले तो बाकी दुर्ग से काफी अलग करती है। यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसकी को नींव नहीं है। बस किला बनता चला गया। यह अनगढ़ शैली में बना प्रतीत होता है बिना किसी डिजाइन के। पर धीरे धीरे विशाल रूप लेता गया। इतिहासकारों के मुताबिक दुर्ग का निर्माण सातवीं सदी से 14वीं सदी तक चलता रहा।

वैसे गागरोन किले का निर्माण मुख्य रूप से डोड राजा बीजलदेव ने बारहवीं सदी में करवाया था। यहां अगले 300 साल तक यहां खींची वंश का राज्य रहा। इस किले से कुल 14 युद्ध और दो जौहर हुए। तीन तरफ से पानी से घिरा होने है इस कारण इसे जलदुर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एकमात्र ऐसा किला है जिसमें तीन परकोटे बने हैं। सामान्यतया सभी किलो के दो ही परकोटे होते हैं। कुछ लोग इस किले को हाउंटेड यानी भुतहा भी मानते हैं। एक टीवी चैनल पर हाउंटेड किलों की सूची में इस किले को लेकर कार्यक्रम प्रसारित हुआ था, उसके बाद किले के बारे में देश भर के लोगों ने ज्यादा जाना।  

हजारों महिलाओं ने किया था जौहर - जब यहां के शासक अचलदास खींची मालवा के शासक होशंग शाह से हार गए थे तो यहां की राजपूत महिलाओं ने खुद को दुश्मनों से बचाने के लिए जौहर (जिंदा जला दिया) कर दिया था। सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था। अचलदास खींची गागरोन के अंतिम प्रतापी नरेश थे। 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने 30 हजार घुड़सवार, 84 हाथी और पैदल सेना लेकर कई राजाओं के साथ इस दुर्ग को घेर लिया। अचलदास इस युद्ध में राजपूती परंपरा में बहादुरी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस दौरान दुश्मन से बचने के लिए हजारों महिलाओं ने किले में जौहर किया था। इसके बाद सैकड़ो साल तक यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के अधीन रहा।
किले के चारों तरफ पदयात्रा करते हुए नदी की जलधारा का बना मनोरम नजारा दिखाई देता है। बारिश के दिनों में इन नदियों में पानी बढ जाता है, तब इस किले को देखने का आनंद भी बढ़ जाता है।


हुक्का पीने की आवाज आती थी - किले मे राजा अचल दास के शयन कक्ष और उनके पलंग को लेकर कई बातें कही जाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यहां से रोज रात को कई तरह की आवाजें आती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पलंग के पास से हुक्का पीने की आवाज आती थी। जब यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के कब्जे में आया तो भी अचलदास के शयन कक्ष और उनके पलंग से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। किले के अंदर एक मंदिर भी है। यह मंदिर खींची राजाओं द्वारा स्थापित है। इसमें आज भी पूजा अर्चना होती है। किले के आसपास अब गांव बस गया है।
हालांकि गागरोन दुर्ग को करीब से देखना अत्यंत रोचक अनुभूति है, पर यहां दैनिक तौर पर सैलानियों का आमद कम ही होती है। पर किले के बारे में सुनकर अक्सर यहां विदेशी सैलानी पहुंचते रहते हैं।  
( RAJSTHAN, GAGRON FORT,  JHALAWAR CITY , REMEMBER IT'S A WORLD HERITAGE SITE)
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Friday, July 20, 2018

कोटा से झालावाड़ वाया रामगंज मंडी

रोज सुबह सात बजे कोटा से झालावाड़ के लिए पैसेंजर ट्रेन चलती है। इलेक्ट्रिक इंजन से चलने वाली यह पैसेंजर ट्रेन 25 रुपये किराया में 98 किलोमीटर का सफर सुगमता से कराती है। इतनी दूर बस से जाना चाहें तो 100 रुपये लग जाएंगे। सुबह सुबह कोटा जंक्शन पहुंच गया हूं। कोटा झालावाड़ पैसेंजर 7 बजे है। इससे पहले कोटा रतलाम पैसेंजर मिल गई। यह छह बजे ही खुलती है। इसमें जगह मिल गई और मैं रामगंज मंडी तक का सफर इस ट्रेन से करता हूं। 73 किलोमीटर का सफर आराम से गुजरा। रामगंज मंडी में स्टेशन से बाहर निकल कर नास्ता। और क्या पोहा और जलेबी। 20 रुपये में। मेरे पास एक घंटा है। 8.35 में झालावाड़ पैसेंजर आएगी। तब रामगंज मंडी रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क पर चहलकदमी। रामगंज मंडी कोटा जिले का शहर है।


धनिया के लिए मशहूर - पर यह धनिया के लिए मशहूर है। यहां धनिया की बहुत बड़ी मंडी है। बताया जाता है कि मसालों की सबसे बड़ी कंपनी एमडीएच भी धनिया पाउडर बनाने के लिए धनिया रामगंज मंडी से खरीदती है। आसपास के गांव के लोग खूब धनिया बोते हैं। सीजन मे मंडी धनिया के बोरों से पट जाती है। एक दिन में 20 हजार बोरी तक धनिया आ जाता है यहां की मंडी में। साल 2018 में मौसम अनुकूल होने के कारण धनिया का उत्पादन बंपर हुआ है।
झालावाड़ तक रेलमार्ग बन जाने के बाद कोटा से रतलाम के बीच रामगंज मंडी रेलवे स्टेशन अब जंक्शन बन चुका है। कोटा जिले के रामगंज मंडी से झालावाड़ शहर की दूरी 26 किलोमीटर है जो रेल नेटवर्क से अब जुड़ गया है।
साल 2012 से इस मार्ग पर रेल चल रही है पर मार्च 2016 में झालावाड विद्युतीकृत रेल नेटवर्क से जुड़ गया। अब कोटा से झालावाड सिटी के बीच कोटा से वाया रामगंज मंडी पैसेंजर ट्रेन का संचालन होता है। रामगंजमंडी-भोपाल ब्राडगेज रेल परियोजना से कोटा-झालावाड से भोपाल के लिए कम दूरी का वैकल्पिक मार्ग मिल जाएगा। नई रेलवे लाइन के भोपाल से रामगंज मंडी तक लगभग 287 किलोमीटर होगी।

इसके तहत रामगंज मंडी जंक्शन से झालावाड़ तक 27 किलोमीटर रेलवे लाइन तो बिछाई जा चुकी है। आगे झालवाड से अकलेरा-ब्यावरा के बीच काम शुरू कर दिया गया है । झालावाड़ से अकलेरा के बीच चार स्टेशन बने हैं। यह सफर आधे घंटे में तय हो जाएगा। इसमें झालरा पाटनजूनाखेड़ाआमेठा और अकलेरा स्टेशन बने हैं।
झालावाड ब्यावरा रूट पर तीन सुरंगे भी बनाई जा रही हैं। सबसे बड़ी टनल घाटोली में बनेगी। झालावाड़ से अकलेरा-ब्यावरा के बीच 14 नए रेलवे स्टेशन और तीन सुरंगे बनेंगी। इसमें एक अकलेरा में दूसरी पिछोला तीसरी घाटोली में होगी। सबसे बड़ी सुरंग एक किलोमीटर की घाटोली में होगी। रामगंजमंडी से भोपाल बड़ी रेल लाइन परियोजना के तहत 165 किलोमीटर के ब्यावरा तक के रूट के लिए अनुमानित लागत 1450 करोड़ रुपये तय की गई है। इस कार्य को 2021 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। ब्यावरा मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले का शहर है।

रामगंज मंडी  में एक घंटा गुजर गया है। ठीक 8.35 मे झालावाड पैसेंजर आकर लग गई है। मुझे आसानी से खिड़की वाली सीट मिल गई है। अगला स्टेशन से जुल्मी। हां जी जुल्मी। सही सुना आपने। इसके बाद का स्टेशन झालावाड़ है। रेल पटरियों के दोनों तरफ पथरीले रास्ते हैं। झालावाड़ सिटी रेलवे स्टेशन काफी सुंदर है। यह फिलहाल आखिरी रेलवे स्टेशन है। सारे लोग उतर रहे हैं तो हम भी उनके साथ हो गए।
(KOTA, RAMGANJ MANDI, JHALAWAR CITY, RAJSTHAN, CHAMBAL RIVER )

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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Thursday, July 19, 2018

कोटा उम्मीदों का शहर, सपनों का शहर

चंबल नदी के किनारे बसा कोटा शहर अब देश भर में अपनी नई पहचान रखता है। कोटा कोचिंग हब बन चुका है। कभी यह शहर कोटा स्टोन के लिए जाना जाता था। रात को आठ बजे के आसपास कोटा बस स्टैंड पर उतरा हूं। यहां से शेयरिंग आटो से रेलवे स्टेशन पहुंच गया हूं। कोटा रेलवे स्टेशन का भवन बाहर से सुंदर लग रहा है। स्टेशन के मुख्य भवन के बाहर रंग बिरंगे फव्वारे स्टेशन भवन की सुंदरता और बढ़ा रहे हैं।
कोटा मथुरा से मुंबई मार्ग का अति व्यस्त रेलवे स्टेशन है। मैं अनगित बार कोटा से होकर गुजरा हूं। पर कोटा में उतरने का कभी मौका नहीं मिला। मेरे एक पत्रकार साथी अनिल भारद्वाज कोटा के रहने वाले हैं। पर संयोग है कि जब मैं कोटा आया हूं वे शहर के बाहर हैं। इसलिए उनसे मिलना नहीं हो सका।
कोटा रेलवे स्टेशन पश्चिम मध्य रेलवे जोन में आता है। पश्चिम मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय जबलपुर में है। कोटा देश के सौ अति व्यस्त रेलवे स्टेशनों में शामिल है। 1987 से ही यह मार्ग विद्युतीकृत है। स्टेशन भवन के पास ही मंडल रेल प्रबंधक का कार्यालय है। यहां पर रेल कर्मचारी यूनियन के कई पोस्टर लगे हैं। इनमें एक पोस्टर में प्रधानमंत्री जी से मांग की गई है कि रेलवे में पुरानी पेंशन योजना को फिर लागू किया जाए। इसके लिए रेल कर्मचारी प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहे हैं। उन्हें एनपीएस में जाना रास नहीं आ रहा है।
रेलवे स्टेशन पर हरियाणा की लोकप्रिय गायिका सपना चौधरी के कार्यक्रम का पोस्टर लगा है। सपना अब हरियाणा से निकल कर राजस्थान, यूपी और बिहार में जाकर स्टेज शो कर रही हैं।
मुझे सुबह झालावाड़ की ट्रेन लेनी है तो रात को यहां रुकना है। स्टेशन के बाहर बायीं तरफ राम मंदिर रोड पर एक होटल में ठिकाना बनाया है। सिंगल कमरा 300 रुपये में। अब रात की पेट पूजा करनी है। पर इसके पहले थोड़ा सड़क पर टहलने निकल पड़ता हूं।
आगे चलकर राम मंदिर में प्रवेश कर गया। यह कोटा शहर का अति सुंदर मंदिर है। परिसर काफी बड़ा है। मुख्य मंदिर में रामजी का सुंदर दरबार सजा है। मंदिर परिक्रमा पथ में राम जानकी के अलावा दूसरे देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित है। यहां थोडा वक्त गुजारना काफी अच्छी अनुभूति देता है। मंदिर में शहर व्यापारी वर्ग के लोगों की आवाजाही लगी रहती है। मंदिर प्रबंधन की ओर से कई कार्यक्रमों का भी नियमित आयोजन किया जाता है। मंदिर की ओर से चिकित्सालय और धर्मशाला का भी संचालन किया जाता है। मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है। अगले दिन सुबह ट्रेन पकड़ने से पहले एक बार फिर मैं राम मंदिर में मत्था टेकने पहुंच जाता हूं।
कोटा शहर के हर इलाके में कोचिंग संस्थान और हास्टल की भरमार है। इन कोचिंग संस्थानों ने कोटा शहर की अर्थव्यवस्था बदल दी है। देश भर से छात्र यहां जागती आंखों में सपना लेकर आते हैं और कई सालों तक जमकर इंजीनयरिंग या मेडिकल की तैयारी करते हैं। बड़ी संख्या में छात्रों का चयन भी हो जाता है। तो कुछ हिस्से में निराशा भी आती है। लेकिन कोटा तो उम्मीदों का शहर है। सपनों का शहर है।
(KOTA, RAJSTHAN, CHAMBAL,  COACHING CITY )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Tuesday, July 17, 2018

बिजौलिया का किसान आंदोलन और विजय सिंह पथिक

मेनाल के मंदिर दर्शन के बाद आधा किलोमीटर पैदल चलकर मैं भीलवाडा – कोटा हाईवे पर आ जाता हूं। यहां एक दो लाइन होटल हैं और जोगणिया माता मंदिर की तरफ जाने वाले रास्ते का प्रवेश द्वार है। बस अंधेरा होने ही वाला है। कुछ मिनट इंतजार के बाद कोटा की तरफ जाने वाली बस दिखाई दे गई। मैंने बस को हाथ दिया और बस रूक गई। अब मैं कोटा की तरफ जा रहा हूं। बस हाईवे पर सरपट भाग रही है। पहले आरोली बाजार आया, फिर बस बिजौलिया नामक कस्बे में जाकर रुक गई। यहां तकरीब 20 मिनट का ठहराव था।

यह बिजौलिया भीलवाड़ा जिले में पड़ता है। पर मुझे पता चलता है कि राजस्थान के प्रजा-मंडल आन्दोलन में विशिष्ट स्थान रखता है। यहीं से महान स्वतंत्रता सेनानी और गुर्जर समाज के गौरव विजय सिंह 'पथिकके नेतृत्व में जागीरदारी के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई थी। यह स्वतंत्रता से पहले देश का प्रमुख किसान आंदोलन था। 27 फरवरी 1882 को विजय सिंह पथिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली कलां गांव में हुआ था। उनकी मृत्यु 28 मई 1954 को हुई।

पथिक का युवावस्था में ही सम्पर्क रास बिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे क्रान्तिकारियों से हो गया था। साल 1915 के लाहौर षड्यन्त्र के बाद उन्होंने अपना असली नाम भूप सिंह गुर्जर से बदल कर विजय सिंह पथिक रख लिया था। बाद में हमेशा इसी नाम से जाने जाते रहे। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन से भी पहले 1916 में पथिक ने राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बिजौलिया में किसानों का आंदोलन खड़ा कर किसानों में स्वतंत्रता के लिए अलख जगाने का काम किया था। तब बिजौलिया उदयपुर रियासत में आता था। यहां के किसान अंग्रेजों द्वारा मालगुजारी के तौर पर ज्यादा राशि वसूले जाने से परेशान थे। किसानों पर 84 तरह के कर लगाए जाते थे। पथिक ने कई साल इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 1919 में मुंबई जाकर गांधी जो को किसानो की करुण दशा सुनाई। पथिक उच्च कोटि के पत्रकार भी थे। उन्होने वर्धा में रहकर राजस्थान केसरी नामक पत्र निकाला। बाद में अजमेर से नवीन राजस्थान नामक पत्र भी निकाला।

बिजौलिया के गांधी - पथिक को बिजौलिया का गांधी भी कहा गया। 1921में पथिक ने बेगू, पारसोली, भिन्डर, बस्सी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा किया। बिजौलिया दूसरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। अंतत: ब्रिटिश सरकार ने जी हालैण्ड को बिजौलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। दोनो पक्षों में समझौता हुआ और किसानों की तमाम मांगें मान ली गईं। कुल 84 में से 35 लागन माफ हुए। यह किसानों की बड़ी जीत थी।
पैनोरमा बनाने की मांग - मांडलगढ़ में विजय सिंह पथिक की पुण्यतिथि 28 मई 2018 में मनाई गई। इस मौके पर राजस्थान गुर्जर महासभा ने सरकार से मांग रखी कि बिजौलिया किसान आंदोलन के नायक विजय सिंह पथिक का पैनोरमा बिजौलिया में बनाया जाएजिससे आने वाली पीढ़ियां पथिक के जीवन से प्रेरणा ले सकें। 
बिजौलिया की ऐतिहासिक बावड़ियां और मंदिर - बिजौलिया में कुछ ऐतिहासिक इमारते भी हैं। यहं पर प्रसिद्ध मंदाकिनी मंदिर एवं कुछ बावडियां स्थित हैं। ये मंदिर 12 वीं शताब्दी के बने हुए हैं। लाल पत्थरों से बने ये मंदिर पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के हैं।
बस बिजौलिया से आगे चल पडी है। आगे बूंदी जिले का डाबी नामक कस्बा आता है। कुछ देर बाद बस राजस्थान के सबसे बड़े शहरों में से एक कोटा में प्रवेश कर चुकी है। बस हमें कोटा के बस स्टैंड में उतार देती है। पर मुझे अगले दिन सुबह रेल से सफर करना है इसलिए मैं बस स्टैंड से आटो पकड़कर रेलवे स्टेशन के लिए चल देता हूं। कोटा रेलवे स्टेशन के पास राम मंदिर रोड पर एक होटल में रात के लिए ठिकाना बनाता हूं।  
(BIJAULUA, RAJSTHAN, VIJAY SINGH PATHIK, FARMER MOVEMENT ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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रात में राजस्थान का बिजौलिया शहर। 

Monday, July 16, 2018

मानसून में चलें - मेनाल, मनमोहक महानालेश्वर मंदिर

जोगणिया माता के दर्शन के बाद मैं आगे की यात्रा के लिए बस का इंतजार कर रहा हूं। पर दो घंटे इंतजार के बाद बस नहीं आई। यहां से हाईवे पर पहुंचने के दो रास्ते हैं 20 किलोमीटर दूर काटूंदा मोड़ या फिर 7 किलोमीटर दूर मेनाल। एक स्थानीय दुकानदार ने सलाह दी अब बस आने की उम्मीद नहीं है। आप पैदल मेनाल निकल जाओ। मुझे आगे कोटा की बस लेनी है। कोई उपाय न देख मैं पैदल मेनाल के लिए चल पड़ता हूं। जोगणिया माता और मेनाल के बीच 6 किलोमीटर कोई आबादी नहीं है। निर्जन वन क्षेत्र से होकर पक्की सड़क जा रही है। एक किलोमीटर चलने के बाद मुझे मेनाल 6 किमी का मील का पत्थर दिखाई देता है।

तभी पीछे से एक हीरो होंडा बाइक पर दो युवक आते दिखाई देते हैं। मैं उन्हें इशारा करके लिफ्ट मांगता हूं। बाइक पर तीसरी सवारी के तौर पर वे मुझे लिफ्ट दे भी देते हैं। रास्ते में उनसे थोड़ी बात होती है। वे मांडलगढ़ इलाके के रहने वाले हैं। मेनाल से मुझे कोटा की बस पकड़नी है। तभी मुझे अपने बायीं तरफ एक मंदिर दिखाई देता है। मैं उनसे पूछता हूं। वे बताते हैं कि यह मेनाल का ऐतिहासिक मंदिर है। आप तो घूमने ही निकले हो तो इस मंदिर को देख ही लो। बस तो आधे घंटे बाद भी मिल जाएगी। बस मैं उनसे आग्रह करता हूं और वे हमें मेनाल के ऐतिहासिक मंदिर के प्रवेश द्वार पर छोड़ देते हैं। उनका बहुत बहुत धन्यवाद।


महादेव शिव का 12वीं सदी में बना अनूठा मंदिर 
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का मेनाल ग्राम। यहां स्थित है महादेव शिव का अनूठा मंदिर। यह मंदिर अपने नैसर्गिक वैभव और शानदार कलाकृतियों के लिए जाना जाता है। मंदिर के पास ही बेहद खूबसूरत जल प्रपात है। मेनाल भीलवाडा जिले में मांडलगढ़ से 20 किलोमीटर दूर चितौडगढ़ की सीमा पर स्थित है। मेनाल का महानालेश्वर मंदिर 12 वीं शताब्दी के चौहान कला का सुंदर नमूना है। इसका निर्माण 1164 में पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने करवाया था। मंदिर का तोरण द्वार जयचंद और संयोगिता ने बनवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिरइससे थोड़ी दूर पर स्थित रूठी रानी का महल और हजारेश्वर मंदिर यहां देखने योग्य हैं। 

महानालेश्वर मन्दिर पत्थर जड़े बड़े चौक के बीच में स्थित है। मंदिर के आगे विराज रहे नन्दी की प्रतिमा खंडित है। इस मन्दिर की बाहरी दीवारों पर बेल-बूटों और फूलों के बीच देवताओं की अनेक मूर्तियां बनी हैं। इन मूर्तियों में कई कामकला से जुडी हैं। मेनाल का यह मंदिर राजस्थान का ऐलोरा प्रतीत होता है। मन्दिर के मण्डप और शिखर के बीच एक ऊंचे विमान  पर एक विशाल शेर की मूर्ति बनाई गई है। इसके एक बगल में एक हाथी बैठा है। मंदिर परिसर में शिव के अलावा गौरी और गणेश के भी मन्दिर बने हैं। परिसर में कुछ और भवन बने हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि कभी वे धर्म शिक्षा के विद्यालय हुआ करते थे। इस परिसर में कभी सैकड़ो छात्र रहकर शिक्षा प्राप्त किया करते थे।  


 महानालेश्वर मन्दिर के ठीक सामने का द्वार जिस स्थल पर खुलता है ठीक उसी बिन्दु पर  मेनाल नदी झरने के रूप में सौ फीट से ज्यादा नीचे गिरती है। नदी के पाट के पार एक और शिव मन्दिर और मठ बना है। यह मंदिर 1170 में महारानी सूया देवी ने बनवाया था। इसे लोग रूठी रानी का मंदिर भी कहते हैं। 

महानाल या मेनाल - मेनाल वास्तव में पुरातत्व, धर्म और पर्यटन का अनोखा संगम है।  मेनाल के मंदिर के पास एक बरसाती नदी ग्रेनाइट की चट्टानों पर वेग से बहती हुई आती है और घोड़े की नाल की आकृति वाले एक गहरे गड्ढे में जा गिरती है। यहां एक खूबसूरत झरने का निर्माण होता है। तो झरने का नाम हुआ महानाल। यही शब्द लगता है कि अपभ्रंश हो कर बाद में मेनाल बन गया।


मेनाल को 1956 से भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। वर्तमान में यहां की देखभाल भारत सरकार पुरातत्व विभाग (एएसआई) करता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर विभाग द्वारा एक होटल भी स्थापित किया गया है।

बारिश में निखर जाता है सौंदर्य - मेनाल में वैसे तो पुरे साल भर लोग घूमने के लिए आते रहते हैं पर यहां पर आने का सबसे अच्छा समय बरसात का है। उस समय मेनाल का झरना बहुत ज्यादा तेजी से नीचे की और गिरता है और चारों और बहुत ज्यादा हरियाली होती है। बरसात के सीजन में यहां सैलानियों का तांता लगा रहता है। रविवार को यहां सैलानियों की संख्या ज्यादा होती है।

कैसे पहुंचे - मेनाल चित्तौड़-कोटा राज मार्ग पर स्थित बूंदी से करीब 100 किमी दूरी पर स्थित है। चित्तौड़गढ़ से करीब 70 किमी की दूरी पर स्थित है। वहीं कोटा से मेनाल की दूरी 86 किलोमीटर है।
( MENAL , SHIVA TEMPLE, RAJSTHAN ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
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