Monday, June 25, 2018

अजमेर - क्या है ढाई दिन का झोपड़ा

आखिर क्या है ढाई दिन का झोपड़ा। नाम से कुछ अजीब लगता है। पर यह झोपड़ा नहीं पक्की इमारत है। यह एक इबादतगाह है। मसजिद है। पर कभी यह एक संस्कृत स्कूल हुआ करता था। यह अजमेर में ख्वाजा मोउनुद्दीन चिश्ती दरगाह के पीछे स्थित है।
अजमेर पुष्कर कई बार पहले भी आ चुका हूं, तो इस बार ढाई दिन का झोपड़ा जाने की चाह थी। दरगाह शरीफ के दाहिनी तरफ चलकर रास्ता फिर बाएं मुड़ जाता है। थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ कुछ सीढ़ियां चढ़े, और पहुंच गए ढाई दिन का झोपड़ा।
क्यों नाम है ढाई दिन का झोपड़ा -
ऐसा माना जाता है कि संस्कृत स्कूल की इमारत को ध्वंस कर को ढाई दिन में यहां पर मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। तो क्या सचमुच इस मस्जिद को बनवाने में सिर्फ़ ढाई दिन ही लगे थे, इसलिए इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है । वैसे यह भी माना जाता है कि यहां हर साल चलने वाले ढाई दिन के उर्श के कारण इसका ये नाम पड़ा। वैसे उर्स वाली बात तार्किक लगती है।
ग्यारहवीं सदी के अंत में मुहम्मद गोरी ने तराईन के युद्ध में महाराजा पृथ्वीराज चौहान को जब परास्त कर दिया और उसकी फौजों ने अजमेर में प्रवेश के लिए कूच किया। इस दौरान गोरी ने वहां नमाज अदा करने के लिए मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की और इसके लिए अपने कारिंदों को महज 60 घंटे की समय सीमा प्रदान की। तब गोरी के लोगों ने संस्कृत विद्यालय की इमारत को रद्दोबदल कर महज ढाई दिन में उसे मस्जिद का रूप दे डाला। इस तरह इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा पड़ गया।

वहीं यह भी कहा जाता है कि ढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण मोहम्मद ग़ोरी के आदेश पर कुतुब-उद-दीन ऐबक ने वर्ष 1192 में शुरू करवा दिया था। यह वर्ष 1199 में बन कर तैयार हो गया। इस स्थान पर पहले संस्कृत शिक्षा के लिए विशाल महाविद्यालय था, जिसका निर्माण वीसलदेव विग्रहराजा ने किया था।
जब आप ढाई दिन के झोपड़ा दो देखते हैं तो यहां भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग नजर आता है। इनके ऊपर छत का निर्माण किया गया है I मस्जिद के प्रत्येक कोने में चक्राकार एवं बांसुरी के आकार की मीनारे निर्मित है Iयह पूरी मस्जिद एक दीवार से घिरी हुई है जिसमें कुल सात मेहराबें हैं। इन मेहराबों पर कुरान की आयतें लिखी गई हैं। हेरत के अबू बकर द्वारा डिजाइन की गई यह मस्जिद भारतीय- मुस्लिम वास्तुकला का एक उदाहरण है।
ढाई दिन के झोपड़ा में हमेशा सैलानियों और श्रद्धालुओं की आमद रहती है। सीढ़ियों पर भीक्षा मांगने बैठे लोग नजर आते हैं । मस्जिद के चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो पहाड़ की चोटियां नजर आती हैं।



आसपास क्या देखें - अजमेर का तारागढ़ किला ढाई दिन का झोपड़ा से डेढ़ घंटे की सीधी चढ़ाई पर एक पहाड़ी पर है। यहां पर आपको तारागढ़ जाने वाले वाहन मिल जाएंगे। अक्सर जीप वाले शेयरिंग सवारी बिठाकर तारागढ़ ले जाते हैं, फिर वापस यहीं छोड़ देते हैं।
कैसे पहुंचे – अजमेर रेलवे स्टेशन से ख्वाजा साहब की दरगाह पर पहुंचे। यहां से त्रिपोली गेट। त्रिपोली गेट के पास ही ढाई दिन का झोपड़ा स्थित है। दरगाह के गेट से इसकी दूरी महज एक फर्लांग है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DHAI DIN KA JHOPDA, MASJID, SANSKRIT SCHOOL, AJMER )