Friday, June 29, 2018

भीलवाड़ा से चितौड़गढ़ की ओर – वीर गोरा बादल का शहर

भीलवाड़ा के बाद हमारी अगली मंजिल है चितौड़गढ़। हरणी महादेव से लौटते हुए बस के कंडक्टर ने बता दिया था कि बस स्टैंड जाने की कोई जरूरत नहीं है। आप रेलवे फाटक पार कर चितौड़ हाईवे पर खड़े हो जाएं। वहीं बस मिल जाएगी। वाकई वहां से बस मिल गई। भीलवाड़ा से चितौड़गढ़ की दूरी 55 किलोमीटर है। रेलवे लिंक भी उपलब्ध है। पर मैंने बस से जाना तय किया। भीलवाड़ा से चित्तौड़ गढ़ के बीच सड़क मार्ग और रेल मार्ग समांतर चलते हैं।
शहर से बाहर निकलते ही हमें बायीं तरफ मयूर शूटिंग और बीएसएल की विशाल फैक्ट्रियां दिखाई देती हैं। इन फैक्ट्रियों के गेट पर सेल्स आउटलेट भी बने हुए हैं। एलएन झुनझुनवाला समूह के कपड़ों के कंपनी की स्थापना 1961 में हुई थी। तब से कंपनी लगातार विस्तार तर रही है। आरएसडब्लूएम अब डेनिम का उत्पादन भी करती है। मयूर फैब्रिक्स अब रेडिमेड गारमेंट के क्षेत्र में भी आ गई है। 


बस की खिड़की से रेलवे स्टेशन भी दिखाई दे रहे हैं। भीलवाड़ा से आगे मंडनिया कस्बा आता है। फिर हमीरगढ़। इसके बाद चांदेरिया फिर हम चित्तौड़गढ़ शहर की सीमा में प्रवेश कर गए। चंदेरिया औद्योगिक इलाका है। इसके साथ ही शाम गहराने लगी है। मुझे पता नहीं है कि चित्तौड़गढ़ में कहां जाकर रुकना है। तो बस हमें बस स्टैंड में पहुंचा देती है।

वहां से उतरने के बाद वापस बाजार की ओर बढ़ता हूं। बस स्टैंड के पास मुझे पहला होटल दिखाई देता है – नटराज टूरिस्ट होटल। हरे भरे लॉन के बाद होटल की सफेद रंग की बिल्डिंग है। बाहर से मुझे महंगा होटल प्रतीत हुआ। पर रिसेप्सन पर जाकर सिंगल रूम अटैच बाथ के साथ पूछता हूं। वे बताते हैं 300 रुपये। कमरा खोलवाकर देखा। पसंद आ गया। बस यहीं जम गया। कमरे में बैग रखने के बाद बाहर घूमने निकला। आगे चौराहा पर प्रशानिक दफ्तर है। वहां बाहर  सड़क पर लिखा है – वीर शिरोमणि गोरा, बादल,  जयमल फत्ता और कल्लाजी की नगरी चित्तौड़गढ़ में आपका स्वागत है।
चौराहे पर मीराबाई की रथ पर सवार होकर आती हुई प्रतिमाएं लगी हैं – यह तब का दृश्य है जब मीरा शादी के बाद चित्तौड़ आई थीं। यहां लिखा है – मेवाड़ की राजवधु, मेड़ता की बेटी, शाही ठाटबाट संग डोली में बैठ आई। कृष्ण रंग में रंगी मीराबाई कहलाई।
चौराहे के दूसरे तरफ बापू के दांडी मार्च की प्रतिमाएं लगाई गई हैं। एक तरफ नेकी की दीवार बनी है। यहां आप अपने पुराने कपड़े दान में दे सकते हैं। इन्हें जो चाहे कोई जरूरतमंद को उठा कर ले जा सकता है। कई शहरों में इस तरह के प्रयोग शुरू किए गए हैं जो काफी अच्छे हैं।

अगर आप दिल्ली से चित्तौड़गढ़ पहुंचना चाहते हैं तो शाम को सीधी बस सेवा है। इसी तरह चित्तौड़ से दिल्ली के लिए भी सीधी लग्जरी बसें चलती हैं। ये बसें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने से बुक कराई जा सकती हैं। सालों से हमारी चित्तौड़ आने की इच्छा थी, पर अब जाकर पहुंचा हूं जब फिल्म पद्मावत विवाद के बाद चित्तौड़ चर्चा में आ गया है।
जनवरी 2018 में यहां सैलानियों की आमद काफी बढ़ गई है। रानी पद्मिनी का आकर्षण लोगों में इतना बढ़ा कि एक जनवरी को चित्तौड़गढ़ के किले  में सैलानियों का प्रवेश एक समय के बाद रोकना पड़ा।
रात का भोजन लेने के बाद होटल के कमरे में आकर सो गया। चित्तौड़गढ़ का किला घूमने का कार्यक्रम अहले सुबह का  है। तो अभी शुभरात्रि। मिलते हैं कल सुबह।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( CHHITAURGARH CITY, GORA AND BADAL, MIRA BAI ) 



Thursday, June 28, 2018

भीलवाड़ा का हरणी महादेव मंदिर


भीलवाड़ा शहर से छह किलोमीटर की दूरी पर हरणी महादेव (शिव) का मंदिर  स्थित है। यह राजस्थान के प्रसिद्ध शिवमंदिरों में से एक है। यह शिव का अति प्राचीन मंदिर है। मंदिर में स्वंभू शिवलिंगम के दर्शन किए जा सकते हैं। शिवलिंग किसी प्रचीन में गुफा  में स्थित है। बाद में उसी स्थल पर मंदिर का निर्माण करा दिया गया है। मंदिर में पीतल के बने नंदी की सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई है। स्थानीय लोगों में मंदिर को लेकर काफी आस्था है। वे मानते हैं शिव उन्हें हर संकट से उबारते हैं और पूरे परिवार की रक्षा करते हैं। यहां शिव पर मिठाई, फूल, नारियल और दूध चढाने का रिवाज है। राजस्थान में दूर दूर से लोग हरणी महादेव से मन्नतें मांगने पहुंचते हैं। 


यह मन्दिर पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है। प्राचीन समय में यहां घना आरण्‍य होने से आरण्‍य वन कहा जाता था, जिसका अपभ्रंश हो कर हरणी नाम से प्रचलित हो गया। अब महादेव के मंदिर का परिसर काफी सुंदर बन गया है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने के बाद पूरब रुख का मंदिर का प्रवेश द्वार है। मंदिर परिसर में यज्ञशाला और प्रसाद की दुकाने हैं। मंदिर का परिसर बड़ा मनोरम है। शहर से दूर ग्रामीण वातावरण में अवस्थित होने के कारण यहां आकर अदभुत शांति का अहसास होता है।
मंदिर के पीछे विशाल सरोवर है। हालांकि इसमें बरसात के अलावा बाकी समय में पानी नहीं रहता है। बरसात के दिनों में हरणी महादेव का परिसर और आसपास काफी मनोरम हो जाता है। हरणी महादेव में राजस्थान के माहेश्वरी समाज के लोगों की काफी आस्था है। वे इन महादेव को अपना कुल देवता मानते हैं।

महाशिवरात्रि पर विशाल मेला - यहां पर प्रत्‍येक शिवरात्रि पर तीन दिवसीय भव्‍य मेले का आयोजन होता है। मेले का आयोजना जिला प्रशासन द्वारा नगर परिषद के सहयोग से किया जाता है। मेले के दौरान तीनदिन तक हर रात्रि में अलग-अलग कार्यक्रम जैसे धार्मिक भजन संध्‍या (रात्रि जागरण), कवि सम्‍मेलन व सांस्कृतिक संध्‍या का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा सावन महीने में और हर सोमवार को मंदिर परिसर में उत्सव का माहौल रहता है।

खुलने का समय- मंदिर प्रातः काल से देर शाम तक खुला रहता है। दोपहर में थोड़े समय के लिए मंदिर के पट बंद होते हैं।

कैसे पहुंचे – हरणी महादेव का मंदिर मंगरोप रोड पर स्थित है। भीलवाड़ा रेलवे स्टेशन से सुभाष चौराहा वहां से बाइला चौराहा पहुंचे। बाइला चौराहा से मंगरोप जाने वाली बसों से हरणी महादेव तक जा सकते हैं। बस का किराया 10 रुपये है। अगर परिवार समेत हैं या समूह में हैं तो आने जाने के लिए टैक्सी या आटो रिक्शा बुक कर सकते हैं। मंदिर परिसर के आसपास खाने की पीने की दुकाने हैं। रहने के लिए कुछ धर्मशालाएं भी बनी हैं।

दोपहर के तीन बजे हैं। भीलवाड़ा रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद लोगों से पूछता हुआ हरणी महादेव के लिए चल पड़ा हूं। बाइला चौराहा से हरणी महादेव के लिए बस मिल गई। छह किलोमीटर के सफर में रास्ते में दो गांव मिले। शाम को मंदिर में भीड़ बिल्कुल नहीं है। दर्शन के बाद कुछ देर मंदिर परिसर में गुजारने के बाद वापसी के लिए बस का इंतजार करने लगता हूं। थोड़ी देर में शहर जाने वाली एक बस आ गई।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( HARNI MAHADEV TEMPLE, BHILWARA, RAJSTHAN ) 


Tuesday, June 26, 2018

अजमेर – से भीलवाड़ा – हठीले हनुमान जी का शहर

अजमेर भीलवाड़ा जाने के लिए रेल का चयन किया। रेलवे स्टेशन के सामने एक दानापानी रेस्टोरेंट दिखाई देता है। हां यही तो मेरे ब्लाग का भी नाम है। इस नाम का रेस्टोरेंट देखकर खुशी होती है। भीलवाड़ा का टिकट लेकर प्लेटफार्म पर ट्रेन का इंतजार करने लगा। अजमेर का प्लेटफार्म नंबर एक काफी साफ सुथरा है। प्रतीक्षालय और उसके टायलेट भी बेहतर हाल में हैं। कुछ देर एक नंबर प्लेटफार्म के प्रतीक्षालय में गुजारना अच्छा लगता है। जोधपुर इंदौर एक्सप्रेस (14801)  दोपहर में एक बजे है। मैं समय होने पर दो नंबर प्लेटफार्म पर पहुंच गया। कुछ मिनट देर से ट्रेन पहुंच गई। यह ट्रेन सुबह जोधपुर से चलकर पाली मारवाड़ होते हुए अजमेर पहुंचती है। ट्रेन में जगह आसानी से मिल गई। खिड़की वाली सीट। अगला स्टापेज है नसीराबाद। 

इसके बाद बैजननगर फिर सरारी। हालांकि ट्रेन कुछ स्टेशनों पर रुकती गई जहां ठहराव नहीं था। भीलवाड़ा शहर से पहले आउटर सिग्नल पर भी थोड़ी देर रुकी। रास्ते में कई जगह पराठे बेचने वाले मिले। यह पराठा कम नमकीन मोटी रोटी ज्यादा नजर आ रहा है। हम साढ़े तीन बजे भीलवाड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए हैं। राजस्थान में भीलवाड़ा की प्रसिद्ध टेक्सटाइल सिटी के तौर पर है। कानपुर का कपड़ा उद्योग भले बरबाद हो गया पर भीलवाड़ा का बचा हुआ है। मयूर सूटिंग, बीएसएल जैसी नामचीन कपड़ा निर्माता कंपनियां यहां उत्पादन कर रही हैं। भीलवाड़ा उत्तर पश्चिम रेलवे (एनडब्लूआर) का रेलवे स्टेशन है।

स्टेशन के बाहर निकलने पर स्टेशन भवन की दीवारों में रंगबिरंगी सुंदर पेंटिंग नजर आती हैं। स्टेशन भवन पर राजस्थानी शैली की सुंदर छाप दिखाई दे रही है। स्टेशन भवन में हनुमान जी का मंदिर है। ये हठीले हनुमान जी हैं। मंदिर के बाहर बोर्ड लगा है। श्री हठीले हनुमान जी। जरूर उन्होंने कोई हठ किया होगा, तभी उनके नाम के साथ ये उपमा लगी है।
कहा जाता है कि एक समय में यहां भील जाति के लोगों की बड़ी तादात पाई जाती थी। इसी कारण इस स्थान का नाम भीलवाड़ा पड़ा। भीलवाड़ा मतलब भीलों का घर। इसके आसपास का क्षेत्र ऊंचा और पठारी है। गेहं, मक्का और कपास जिले की प्रमुख फसल है।
भीलवाड़ा की स्थापना क़रीब 400 साल पहले हुई बताई जाती है। भीलवाड़ा के शासकों में निरंतर युद्ध हुए इसलिए इसे कई बार उजड़ना पड़ा। अंग्रेज़ी शासन के दौरान 18वीं शताब्दी में इसकी स्थिति में धीरे-धीरे परिवर्तन हुआ। साल  1948  में राजस्थान का भाग बनने से पूर्व भीलवाडा उदयपुर रियासत का एक हिस्सा हुआ करता था। भीलवाड़ा जिले की सीमाएं पूर्व में बूंदी,  पश्चिम में राजसमंद,  उत्तर में अजमेर और दक्षिण में चित्तौड़गढ़ जिले से मिलती हैं।
भीलवाड़ा शहर में गांधी सागर तालाब स्थित है। कभी यह तालाब शहर के लोगों के पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करता था। आज भी इस तालाब में सालों भर पानी रहता है। तालाब के बीचों बीच एक बड़ा सा टापू है। तालाब के किनारे सूफी संतों की दरगाह है। भीलवाड़ा शहर आबादी में ज्यादा बड़ा नहीं है। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर पैदल ही बाजार की तरफ चल पड़ा हूं। शहर में परंपरागत राजस्थानी बाजार नजर आता है। मॉल की संस्कृति से दूर है अभी भीलवाड़ा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( BHILWARA, RAJSTHAN, GANDHI SAGAR, RAIL ) 

Monday, June 25, 2018

अजमेर - क्या है ढाई दिन का झोपड़ा

आखिर क्या है ढाई दिन का झोपड़ा। नाम से कुछ अजीब लगता है। पर यह झोपड़ा नहीं पक्की इमारत है। यह एक इबादतगाह है। मसजिद है। पर कभी यह एक संस्कृत स्कूल हुआ करता था। यह अजमेर में ख्वाजा मोउनुद्दीन चिश्ती दरगाह के पीछे स्थित है।
अजमेर पुष्कर कई बार पहले भी आ चुका हूं, तो इस बार ढाई दिन का झोपड़ा जाने की चाह थी। दरगाह शरीफ के दाहिनी तरफ चलकर रास्ता फिर बाएं मुड़ जाता है। थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ कुछ सीढ़ियां चढ़े, और पहुंच गए ढाई दिन का झोपड़ा।
क्यों नाम है ढाई दिन का झोपड़ा -
ऐसा माना जाता है कि संस्कृत स्कूल की इमारत को ध्वंस कर को ढाई दिन में यहां पर मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। तो क्या सचमुच इस मस्जिद को बनवाने में सिर्फ़ ढाई दिन ही लगे थे, इसलिए इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है । वैसे यह भी माना जाता है कि यहां हर साल चलने वाले ढाई दिन के उर्श के कारण इसका ये नाम पड़ा। वैसे उर्स वाली बात तार्किक लगती है।
ग्यारहवीं सदी के अंत में मुहम्मद गोरी ने तराईन के युद्ध में महाराजा पृथ्वीराज चौहान को जब परास्त कर दिया और उसकी फौजों ने अजमेर में प्रवेश के लिए कूच किया। इस दौरान गोरी ने वहां नमाज अदा करने के लिए मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की और इसके लिए अपने कारिंदों को महज 60 घंटे की समय सीमा प्रदान की। तब गोरी के लोगों ने संस्कृत विद्यालय की इमारत को रद्दोबदल कर महज ढाई दिन में उसे मस्जिद का रूप दे डाला। इस तरह इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा पड़ गया।

वहीं यह भी कहा जाता है कि ढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण मोहम्मद ग़ोरी के आदेश पर कुतुब-उद-दीन ऐबक ने वर्ष 1192 में शुरू करवा दिया था। यह वर्ष 1199 में बन कर तैयार हो गया। इस स्थान पर पहले संस्कृत शिक्षा के लिए विशाल महाविद्यालय था, जिसका निर्माण वीसलदेव विग्रहराजा ने किया था।
जब आप ढाई दिन के झोपड़ा दो देखते हैं तो यहां भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग नजर आता है। इनके ऊपर छत का निर्माण किया गया है I मस्जिद के प्रत्येक कोने में चक्राकार एवं बांसुरी के आकार की मीनारे निर्मित है Iयह पूरी मस्जिद एक दीवार से घिरी हुई है जिसमें कुल सात मेहराबें हैं। इन मेहराबों पर कुरान की आयतें लिखी गई हैं। हेरत के अबू बकर द्वारा डिजाइन की गई यह मस्जिद भारतीय- मुस्लिम वास्तुकला का एक उदाहरण है।
ढाई दिन के झोपड़ा में हमेशा सैलानियों और श्रद्धालुओं की आमद रहती है। सीढ़ियों पर भीक्षा मांगने बैठे लोग नजर आते हैं । मस्जिद के चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो पहाड़ की चोटियां नजर आती हैं।



आसपास क्या देखें - अजमेर का तारागढ़ किला ढाई दिन का झोपड़ा से डेढ़ घंटे की सीधी चढ़ाई पर एक पहाड़ी पर है। यहां पर आपको तारागढ़ जाने वाले वाहन मिल जाएंगे। अक्सर जीप वाले शेयरिंग सवारी बिठाकर तारागढ़ ले जाते हैं, फिर वापस यहीं छोड़ देते हैं।
कैसे पहुंचे – अजमेर रेलवे स्टेशन से ख्वाजा साहब की दरगाह पर पहुंचे। यहां से त्रिपोली गेट। त्रिपोली गेट के पास ही ढाई दिन का झोपड़ा स्थित है। दरगाह के गेट से इसकी दूरी महज एक फर्लांग है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DHAI DIN KA JHOPDA, MASJID, SANSKRIT SCHOOL, AJMER )  


Saturday, June 23, 2018

अजमेर का जैन चैत्यालय - अयोध्या का अदभुत नजारा

अजमेर का अद्भुत आकर्षण है सोनी जी का नसिया। वैसे इसका असली नाम श्री सिद्धकूट जैन चैत्यालय है। पर निर्माताओं के नाम पर स्थानीय लोग इसे सोनी जी का नसिया कहते हैं। मैं बस स्टैंड से आटो से चला था ढाई दिन का झोपड़ा देखने के लिए पर आटो वाले ने चौराहे पर उतार दिया और कहा यहां से पैदल ढाई दिन के झोपड़ा तक जा सकते हैं। वैसे देखना चाहें तो सामने सोनी जी का नसिया भी है।

अजमेर के पृथ्वीराज रोड पर स्थित यह मंदिर दिगंबर जैन समाज की श्रद्धा का प्रतीक है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में  से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी को समर्पित है यह मंदिर। इसका निर्माण 10 अक्तूबर 1864 को आरंभ हुआ। 26 मई 1865 को इसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। मंदिर की मध्य वेदी पर भगवान आदिनाथ ( ऋषभदेव जी) की प्रतिमा स्थापित है।
मंदिर के भवन के निर्माण में करौली के लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए लोग इसे लाल मंदिर भी कहते हैं। इसके निर्माण में सेठ मूलचंद सोनी का बड़ा योगदान रहा, तो सोनी जी नसिया भी कहलाता है।

मुख्य मंदिर में तीन वेदियां हैं। इस पर जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के इस हिस्से में सिर्फ जैन धर्म के लोगों को प्रार्थना पूजा करने की अनुमति है। पर मंदिर का मुख्य आकर्षण है अयोध्या का अदभुत नजारा। इसे देखने के लिए मामूली सा प्रवेश टिकट है। प्रवेश द्वार पर जूते आदि उतार कर टिकट लेकर सीढ़ियों से ऊपर जाने पर आप मंदिर का भव्यता निहार सकते हैं।
वास्तव में मंदिर बनने के पांच साल बाद सेठ मूलचंद सोनी की इच्छा हुई कि मंदिर में जैन शास्त्रों में वर्णित भगवान ऋषभदेव के पंचकल्याणकों का मूर्त रूप स्थापित किया जाए। इसके बाद मंदिर में अयोध्या नगरी और सुमेरू पर्वत के निर्माण कार्य की शुरुआत हुई। सुनहले रंग की इस अदभुत रचना का निर्माण जयपुर में आरंभ हुआ। इसमें तकरीन 25 साल का समय लगा। पूरी रचना सोने के वर्क से ढकी है। जब सीसे के अंदर अयोध्या नगरी का भव्य नजारा देखते हैं तो आंखे चौंधिया जाती है। आप ये नजारा दूसरी और तीसरी मंजिल से अलग अलग झरोखों से देख सकते हैं।
हर झरोखे से देखने पर कुछ अलग नजारा दिखाई देता है। पहले ये रचनाएं जयपुर में ही प्रदर्शित की गई थीं। वहां दस दिन के मेले में काफी लोग इसे देखने आए। पर 1895 में इसे अजमेर स्थानांतरित किया गया। इसके लिए मंदिर के पीछे भवन का निर्माण कराया गया। इसके बाद यह अजमेर शहर का प्रमुख आकर्षण बन गया।
जैन चैत्यालय में प्रवेश करते समय आपको विशाल टावर दिखाई देता है। यह मान स्तंभ है। 82 फीट ऊंचा यह स्तंभ रायबहादुर सेठ टीकम चंद सोनी द्वारा निर्माण कराया गया। यह इस मंदिर परिसर की सबसे नवीनतम रचना है। यह 1953 में बनकर तैयार हुआ।
अजमेर के इस स्थल का मुआयना करने देश विदेश की महान विभूतियां पधार चुकी हैं। यहां देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी जैसे लोग पधार चुके हैं।
कैसे पहुंचे – अजमेर रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से दो किलोमीटर के दायरे में स्थित है सोनी जी का नसियां। शेयर आटो रिक्शा से यहां पहुंचा जा सकता है। प्रसिद्ध अजमेर शरीफ दरगाह से भी पैदल चलकर 10 मिनट में पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( RAJSTHAN, TEMPLE, SIDHAKUT JAIN CHAITYALYA ) 
  

Thursday, June 21, 2018

दिल्ली से अजमेर और मां अन्नपूर्णा रसोई में सस्ता भोजन


एक बार फिर राजस्थान की ओर चल पड़ा हूं। दिल्ली से देर रात बस से। पर कश्मीरी गेट पहुंचने पर पता चला कि जयपुर की बसें अब सरायकाले खां से जाती हैं। रात एक बजे एक टैक्सी वाले मिल गए, शेयरिंग में 50 रुपये में धौलाकुआं पहुंचाने को कहा। हालांकि दिल्ली में ऐसी टैक्सियां लेना कई बार सुरक्षित नहीं होता। पर मैं बैठ गया। धौलाकुआं मेट्रो स्टेशन के नीचे रात भर जयपुर जाने वाली बसें रुकती हैं। वहां रात को एक से दो बजे के बीच भी चहलपहल थी। मैं जयपुर की बस में बैठ गया। अपने तय कार्यक्रम के मुताबिक बस बहरोड़ के पास एक ढाबे में रुकी। सुबह सुबह मैं जयपुर के सिंधी कैंप बस स्टैंड में था। यहां से तुरंत दूसरी बस अजमेर की मिल गई। बाईपास पर बस कुछ मिनट रूकी।

इसके बाद किशनगढ़ बस स्टैंड में पांच मिनट का ठहराव। जयपुर अजमेर हाईवे बहुत शानदार बन चुका है। बस कुलांचे भरती है। मैं सुबह 9 बजे से पहले अजमेर के बस स्टैंड में पहुंच चुका हूं। बस स्टैंड में टूथब्रश-कुल्ला आदि करके एक चाय पी लेता हूं। चाय मैं सिर्फ सर्दियों में ही पीता हूं।
अजमेर शहर में कई साल बाद आया हूं, तीसरी बार। शहर कुछ नया सा लग रहा है। कई दीवारों में सुंदर म्युरल्स लगे हैं। शहर की सड़कें भी पहले की तुलना में काफी अच्छी नजर आ रही हैं। 

तभी मेरी नजर बाहर अन्नपूर्णा भोजन केंद्र के स्टाल पर पड़ती है। यह राजस्थान की वसंधरा सरकार का नया उपक्रम है। गरीबों और आम आदमी को सस्ते में भोजन और नास्ता उपलब्ध कराने का। एक चलते फिरते वैन को भोजनालय का रुप प्रदान किया गया है। यहां मिलता है 5 रुपये में नास्ता और आठ रुपये में भोजन। यह योजना फिलहाल राज्य के 12 शहरों में चलाई जा रही है।
इसके स्टाल रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के आसपास लोकप्रिय स्थलों पर हैं। मैंने ऐसी रसोई आगे भीलवाड़ा और कोटा में भी देखी। अभी ऐसे 500 भोजन वैन संचालित हो रहे हैं। मैंने यहां से सुबह का नास्ता लिया। पहले कंप्यूटराइज्ड टोकन खरीदें फिर काउंटर से नास्ता प्राप्त करें। नास्ते था पोहा और उसके साथ चटनी। पोहा काफी अच्छा बना था। वसुंधरा राजे ने यह योजना 15 दिसंबर 2016 को आरंभ की थी। हालांकि यह योजना श्रमिक वर्ग और असहाय लोगों के लिए है। पर खाने की गुणवत्ता अच्छी है इसलिए आते जाते लोग भी खाते नजर आते हैं। वे डिस्पोजेबल पेपर प्लेट में खाना परोसते हैं। पोहा वजन करके दिया जाता है ताकि किसी को कम मात्रा में नहीं मिले। वैन पर शिकायत करने के लिए फोन नंबर भी लिखा है। अगर आप खाने से संतुष्ट नहीं हैं तो शिकायत भी कर सकते हैं।

इस तरह की रियायती भोजन योजना सबसे पहले तमिलनाडु में जयललिता सरकार ने शुरू की थी।बाद में ऐसी ही योजना तेलंगाना सरकार ने हैदराबाद और कुछ अन्य शहरों में शुरू की। राजस्थान सरकार की यह योजना काफी लोकप्रिय हो रही है। अब दिल्ली सरकार भी रियायती कैंटीन शुरू करने की योजना बना रही है। हालांकि दिल्ली में पहले जन आहार योजना शुरू की गई थी। पर वहां 18 रुपये का खाना परोसा जाता था। पर राजस्थान सरकार आठ रुपये में लोगों का पेट भर रही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( DELHI- AJMER, MA ANNPURNA KITCHEN ) 



Tuesday, June 19, 2018

पटियाला पेग और पटियाला का कुलचा

पटियाला पेग और सोनू के कुलचे
पटियाला पेग देश भर में प्रसिद्ध है। पर जैसे पंजाब का शहर अमृतसर अपने शहर नाम पर कई तरह के व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध है उसी तरह पटियाला की भी अपनी पहचान है। खास तौर पर स्ट्रीट फूड के मामले में बड़ा समृद्ध शहर है।
कुलचे तो आपने खूब खाए होंगे पर पटियाला के कुलचे की बात अलग है। यहां पर किला मुबारक के आसपास स्ट्रीट फूड के तौर पर कुलचे का स्वाद लिया जा सकता है। इनके कुलचे बनाने का अंदाज अलग है। यहां कुलचे में छोले के मसाले को भर देते हैं। उसके बाद रोल बनाकर आपको खाने के लिए पेश करते हैं। इसमे भी कई तरह के कुलचे हैं। पनीर कुलचा, आलू कुलचा आपकी जो पसंद हो खाएं। पटियाला के बाजार में ऐसे कुलचे की प्रसिद्ध दुकाने हैं।

तो सोनू कुलचे की दुकान पर क्या लिखा है जरा गौर फरमाइए – मशहूर हैं कुलचे सोनू के जमाने को पता है... खाता वही है जिसकी किस्मत में लिखा है। अब बात किस्मत की है तो लोग खाने पहुंच ही जाते हैं। ये सोनू की मार्केटिंग स्किल है। वैसे सोनू के अलावा कई और कुलचे वाले हैं जो अच्छा कुलचा बनाते हैं। वैसे आप पटियाला में हैं तो पंजाब के पांरपरिक स्वाद दाल, रोटी का भी आनंद ले सकते हैं। खाने पीने के यहां सैकड़ो विकल्प मौजूद है। बस स्टैंड के आसपास अनगिनत ढाबे हैं जहां पंजाबी स्वाद का आनंद लिया जा सकता है।
अगर आप पटियाला में गर्मियों के दिन में हैं तो लस्सी पीने का आनंद भी ले सकते हैं। यहां की लस्सी का स्वाद भी लाजवाब होता है। पटियाला और आसपास का इलाका दूध दही के लिहाज से समृद्ध है। मदिरा पान करने वालों के बीच पटियाला पेग काफी लोकप्रिय है। आखिर ये पटियाला पेग क्या है... पंजाबी में तमाम गाने पटियाला पेग पर बने हैं।
भारत का पटियाला पैग विदेशों तक प्रसिद्ध है। शादी पार्टी में तो इसके बिना जैसे सब अधूरा सा लगता है। कहा जाता है कि पटियाला पैग हर कोई सहन नहीं कर सकता, क्योंकि पटियाला पैग में शराब की मात्रा स्मॉल और लार्ज पैग से ज्यादा होती है।  शराब पीने वालों के अनुसार पटियाला पैग में करीब 120 मिलीलीटर शराब होती है। इसका मतलब पटियाला पैग में आधा गिलास पानी और आधा गिलास शराब होती है।
कहते हैं इसका आविष्कार पटियाला राजघराने में हुआ था।  बताया जाता है कि पटियाला पैग का सीधा संबंध है महाराजा भूपिंदर सिंह से जो कि 1891 से लेकर 1938 तक पटियाला के राजा थे। महराजा बडा पैग बनाते थे, इसी नाम पर पटियाला पेग लोकप्रिय होता गया।


एनआईएस पटियाला और पंजाबी यूनीवर्सिटी – पंजाब का शहर पटियाला शिक्षा और खेलकूद गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यहां नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्टस की स्थापना की गई है जहां से निकले खिलाड़ी एशियाई खेल और कामनवेल्थ गेम्स में देश का ना रोशन करते हैं। यहां पर पंजबा के प्रमुख विश्वविद्यालय पंजाबी यूनीवर्सिटी की भी स्थापना की गई है। एक तरह से देखा जाए तो पटियाला पंजाब की मिनी राजधानी है। यहां पर पंजाब राज्य बिजली बोर्ड, पंजाब स्टेट एजुकेशन बोर्ड आदि का मुख्यालय है। पंजाब सरकार के कई महत्वपूर्ण दफ्तर पटियाला में ही स्थित हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( PUNJAB, PATIALA FOOD, KULCHA, PATIALA PEG ) 


Sunday, June 17, 2018

फुलकारी और पट्टी वाले सलवार का शहर


पटियाला सलवार। महिलाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय। जी हां, शहर के नाम पर पट्टी वाले ढीले-ढाले सलवार की प्रसिद्धि देश भर में है। उसी पटियाला शहर की सड़कों पर हम घूम रहे हैं।  

थोड़ी बात पटियाला शहर की। तो पटियाला नाम बना है नाम पटियाला दो शब्दों पटि और आला जोड़कर।  पटि एक उर्दू शब्द है जो और आला शहर के संस्थापक बाबा आला सिंह के नाम से आता है। इसका मतलब एक 'भूमि की पट्टी' से है। पटियाला ने सन 1947 में देश विभाजन के समय पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों का दिल खोलकर स्वागत किया। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में आए शरणार्थी यहां बसे थे। तत्कालीन शासक महाराजा यादविंदर सिंह ने पाकिस्तान से आए लोगों को यहां बसाया और सुविधाएं उपलब्ध करवाईं। 
एक बार फिर चलते हैं सलवार की ओर।

पटियाला सलवार (पट्टियों वाली सलवार) पंजाबी पोशाक का एक हिस्सा है। इसे उर्दू में शलवार भी कहा जाता है। यह आम तौर उत्तर भारत में पंजाब राज्य के शहर पटियाला में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली पोशाक है। पर यह पटियाला से बाहर निकलकर कई राज्यों में लोकप्रिय हो चुकी है। पटियाला शहर के बाजारों में अभी भी ऐसे रेडिमेड सलवार और उन्हे बनाने वाले दर्जी मिल जाएंगे।
पंजाब की फुलकारी - पटियाला सलवार सूट और फुलकारी एम्ब्रॉएडरी नहीं होती तो शायद भारत का फैशन बेहद नीरस हो सकता था। यह एक तरह की कढ़ाई है जो चुनरी या दुपट्टे पर हाथ से की जाती है। वैसे तो इस कढ़ाई का जन्म प्राचीन भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ था। पर अब फुलकारी का मतलब पंजाब से है। फुलकारी से तैयार बड़ी सी चादर शादी विवाह में इस्तेमाल की जाती है। वहीं फुलकारी को अब कपड़ों में भी इस्तेमाल किया जाने लगा ह। इसमें बेहद कुशल कारीगरी की जरूरत होती है। अब काफी काम मशीन से भी किया जाने लगा है। पर हाथों से की जाने वाली इस कढ़ाई की कला को पटियाला के लोगों ने बचाकर रखा है। जब भी पंजाब के हस्तशिल्प की चर्चा होती है तो सबसे पहले नाम फुलकारी का आता है।

आजकल फुलकारी किए हुए दुपट्टे का खूब चलन है।पर फुलकारी की शुरुआत कपड़ों पर फूलों की कढ़ाई से हुई। कहा जाता है कि पंद्रहवीं सदी में जब हीर रांझा की प्रेम कहानी बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय हो गई थी उसी दौर में फुलकारी का आविष्कार हुआ।

पारंपरिक तौर पर फुलकारी को सूती कपड़े पर बनाया जाता था। पर इसे मोटे सूती कपड़े पर ही बनाया जाता है। इसे हम खद्दर जैसा कपड़ा भी समझ सकते हैं। खद्दर के कपड़े पर भारी कढ़ाई करना आसान होता है। ऐसी कढ़ाई को ही फुलकारी कहा जाता था। फुलकारी के भी कई प्रकार हैं। जिस फुलकारी जिसमें बहुत ज्यादा घनी पढ़ाई होती है उसे बाग फुलकारी कहते हैं। थिरमा फुलकारी सबसे शुद्ध मानी जाती है। वहीं दर्शन द्वार भी एक तरह की फुलकारी है। इस तरह की फुलकारी गुरुद्वारे में चढ़ाई जाती है। इस फुलकारी में सिर्फ फूलों का ही नमूना नहीं बल्की जानवर और इंसानों का भी नमूना शामिल किया जाता है।
अब कंटेंपरेरी फैशन में फुलकारी कई बदलाव आए हैं। नए जमाने के  डिजाइनरों समय समय पर फुलकारी के साथ कुछ नए एक्सपेरिमेंट भी किए हैं। तो आजकल फुलकारी कई तरह की देखने को मिलती है। फुलकारी जैसा प्रिंट वाला कपड़ा भी बनाया जाने लगा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( FULKARI, PATIALA, SALWAR , PUNJAB ) 





Friday, June 15, 2018

पटियाला - शाही मेहमान खाना और लस्सीखाना

किला मुबारक के मुख्य महल की बाहरी दीवारों को देखते हुए दाहिनी तरफ से हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारे साथ देश के दूसरे शहरों से आए कुछ कालेज के शिक्षकों की एक टीम है। हमें खुले मैदान में दो पुरानी तोपे दिखाई देती हैं। कभी ये आग उगलती होगीं पर अभी तो शांत हैं।

शाही मेहमानखाना या रनबास  - किले की ऊंची दीवारों को देखते हुए हम किले के पृष्ठ भाग में पहुंच गए हैं। पर एक महल को देखकर हमलोग चौंक जाते हैं। इस इमारत को शायद अतिथि गृह के रूप में इस्‍तेमाल किया जाता था। इसका विशाल प्रवेश द्वार और दो आंगन खासे आकर्षण लिए हुए हैं। वहां बने फव्‍वारे और टैंक आंगन की शोभा बढ़ाते हैं। रनबास के आंगन में एक रंगी हुई दीवारें और सोन जड़ा सिंहासन बना है जो लोगों को काफी लुभाता है। रंगी हुई दीवारों के सामने ही ऊपरी खंड में कुछ मंडप भी हैं, जो एक-दूसरे के सामने बने हुए हैं।

इस मेहमान खाना में वातानुकूलन का अनूठा इंतजाम है। किले के बगल में एक गहरा कुआं बना है। इस कुएं से पानी किले के अंडरग्राउंड में बने तहखाने में लाने का इंतजाम है। इससे मेहमान खाना में गर्मियों में ठंडक बनी रहती होगी। पर यह सब कुछ अब बहुत बुरे हाल में है। मेहमान खाने की दीवारें भरभरा रही हैं।  कभी शाही मेहमान खाने में दूसरे राजघराने से आने वाले देशी-विदेशी मेहमान ठहरा करते थे।


लस्सीखाना  - इस छोटी दोमंजिली इमारत के आंगन में एक कुंआ बना हुआ है। इस इमारत का इस्तेमाल कभी रसोईघर के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाता था। लस्‍सी खाना रनबास के सटा हुआ है और किला अंदरूनी हिस्से के लिए यहां से रास्‍ता भी जाता था। पटियाला के लोगों का कहना है कि एक जमाने में यहां 3500 लोगों को खाना बनाया जाता था।

पर नानकशाही ईट व सफेद पत्थर से बने इस किले के कई हिस्से खस्ताहाल होकर गिर चुके हैं। शीशे की कलाकारी के साथ बनाया गया शीशमहल बीते कई सालों से मरम्मत के नाम पर बंद पड़ा है। यहां आने वाले सैलानी इसे बाहर से ही देखकर लौट जाते हैं ।

किला मुबारक के कायाकल्प के प्रयास - शाही शहर के किला मुबारक के कायाकल्प के लिए प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार की स्कीम के तहत 45 करोड़ रुपये की ग्रांट 2015 में मंजूर हुई।

हेरिटेज वेडिंग साइट बनेगा किला मुबारक - पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और टूरिज्म मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा पटियाला के किला मुबारक को विवाह स्थल में तब्दील किया जा रहा है। इससे उम्मीद है कि पटियाला मेंटूरिज़्म को बढ़ावा मिल सकेगा। जिस तरह लोग जोधपुर और उदयपुर में जाकर शाही शादियों का आयोजन करते हैं वैसा ही कुछ पटियाला के किला मुबारक में कराए जाने की योजना है।  राज्य सरकार की योजना है कि किले के अंदर सेवन स्टार होटल जैसी सारी सुविधाएं टूरिस्ट्स को प्रदान कराई जाएं। इसके इलावा किले में इंडोर स्पोर्ट्स और स्विमिंग पूल की व्यवस्था भी किए जाने की योजना है।

प्रवेश शुल्क – फिलहाल किला मुबारक का प्रवेश शुल्क  10 रुपये प्रति व्यक्ति और 5 रुपये बच्चों के लिए है। किला मुबारक सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से रिक्शा करके पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( QUILA MUBARAK, PATIALA, PUNJAB ) 

Wednesday, June 13, 2018

किला मुबारक – मुगल और राजस्थानी शिल्प का अनूठा मेल

पटियाला के बस स्टैंड से निकलकर मैं एक रिक्शे वाले को किला मुबारक छोड़ने को कहता हूं। हालांकि शेयरिंग आटो से जाने का विकल्प था, पर रिक्शा से शहर को देखने का आनंद ही कुछ और है। तो रिक्शा वाले हमें पटियाला के पुराने बाजार, सब्जी मंडी, तंग गलियों से घुमाते हुए दर्शनी गेट पर लाकर छोड़ देते हैं। बताते हैं कि सामने किला मुबारक का गेट है। मैं अठारहवीं सदी के विशाल इमारत के सामने खड़ा हूं जो आजकल बदहाल है।

वास्तव में पटियाला का किला मुबारक सिख इतिहास का दमकता हुआ पहलू है जो अब बिखर रहा है। यह किला वास्तुकला का एक आदर्श उदाहरण और शहर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है। पूरे पटियाला शहर का विस्तार किला मुबारक परिसर के चारों तरफ हुआ है। साल 1764 में महाराजा आला सिंह ने इस किले के निर्माण कराया था। यह किला ओल्ड मोती बाग पैलेस के निर्माण से पहले तक, पटियाला राजपरिवार का निवास हुआ करता था।


लगभग 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस किले का निर्माण सबसे पहले एक मिट्टी के किले के रूप में किया गया था।  बाद में इसे एक पक्के किले के रूप में विशाल रूप प्रदान किया गया। इस महल की वास्तुकला उत्तर मुगल और राजस्थानी शैली का बेहतर मिश्रण है। सबसे पहले बाबा आला सह जी ने 1756 में यहां कच्ची पट्टी बनाई थी। यहीं पर 1764 में किला मुबारक की स्थापना की गई । 
इस किले में किला अंद्रू या मुख्‍य महल, गेस्‍ट हाउस और दरबार हॉल परिसर के प्रमुख हिस्से हैं। बाजार से जब आप दर्शनी गेट से प्रवेश करते हैं तो दाहिनी तरफ दरबार हॉल है। इसमें एक संग्रहालय का निर्माण कराया गया है। पर यह संग्रहालय किले के रखरखाव के कारण बंद किया हुआ है।

किला मुबारक का किला अंद्रूं सैलानियों को खास तौर पर आकर्षित करता है। इसके वास्‍तुशिल्‍प पर उत्‍तर मुगलकालीन और राजस्‍थानी शिल्‍प का प्रभाव स्‍पष्‍ट रूप से देखा जा सकता हे। किला परिसर में उत्‍तर और दक्षिण छोरों पर 10 बरामदे बनाए गए हैं जिनका आकार प्रकार अलग तरह का है।
जब मुख्‍य महल को आप देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह महलों का एक झुंड हो। इस किले में हर कमरे का अलग नाम और पहचान है। किला परिसर के महलों को बड़ी संख्‍या में भित्ति चित्रों से सजाया गया है। इन्‍हें महाराजा नरेन्‍द्र सिंह की देखरेख में बनवाया गया था। किला मुबारक के अंदर बने इन महलों में 16 रंगे हुए और कांच से सजाए गए चेंबर भी हैं।

महल के दरबार कक्ष में भगवान विष्‍णु के अवतारों और वीरता की कहानियों को दर्शाया गया है। तो महिला चेंबर में लोकप्रिय रोमांटिक कहानियों चित्रित की गईं हैं। महल के अन्‍य दो चेंबरों में अच्‍छे और बुरे राजाओं के गुण-दोषों पर भी प्रकाश डाला गया है। इन महलों में बने भित्ति चित्र 19 वीं शताब्‍दी में बने भारत के श्रेष्‍ण भित्ति चित्रों में गिने जाते हैं। ये भित्ति चित्र राजस्‍थानी, पहाड़ी और अवधि संस्‍कृति की छवि पेश करते हैं।

दरबार हॉल में देखे गुरु गोबिंद सिंह की तलवार – यह दो मंजिला हॉल एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। हॉल में लकड़ी और कांच की शानदार कारीगरी की गई है। दरबार हॉल सार्वजनिक समारोहों में लोगों के एकत्रित होने के लिए बनवाया गया था। इस हॉल को ही अब एक संग्रहालय में तब्‍दील कर दिया गया है। इसमें आकर्षण झाड़ फानूस और विभिन्‍न अस्‍त्र-शस्‍त्रों को प्रदर्शित किया गया है। इस संग्रहालय में गुरु गोबिंद सिंह की तलवार और कटार के साथ-साथ नादिरशाह की तलवार भी देखी जा सकती है।
- vidyutp@gmail.com
( KILA MUBARAK, PATIALA, DARABR HALL ) 

Monday, June 11, 2018

पटियाला का काली माता मंदिर

पंजाब के प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है पटियाला श्री काली माता का मंदिर। श्री काली देवी जी का मंदिर करीब 100 साल पुराना है। यहां पर न केवल पटियाला शहर बल्कि पंजाब के हर जिले से और आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु  माथा टेकने आते हैं।

काली माता मंदिर का परिसर विशाल है। अक्सर यहां दर्शन के लिए लंबी लाइन लगी रहती है। प्रवेश द्वार के बाहर बड़ी संख्या में प्रसाद की दुकाने हैं। मुख्य मंदिर के पीछे विशाल आंगन यज्ञशाला और कुछ और मंदिर समूह हैं। मंदिर परिसर में राज राजेश्वरी देवी का मंदिर है। कहा जाता है कि यह काली माता मंदिर से भी पुराना है।

काली माता मंदिर का निर्माण भी पटियाला के राजघराने द्वारा करवाया गया था। पटियाला के महाराजा भूपिदंर सिंह ने मंदिर के निर्माण का नींव पत्थर 1936 में रखा था। मंदिर को महाराजा कर्म सिंह ने बनवाया था। मंदिर में स्थापित काली माता की मूर्ति छह फीट की है। मां का सौंदर्य अदभुत है। यहां स्थापित मां काली माता जी की मूर्ति कलकत्ता से खास तौर पर मंगवाई गई थी। उस समय देवी मां की मूर्ति का मुख शहर के बाहर की तरफ यानी बारादरी गार्डन की तरफ रखा गया था और तब उधर शहर का विस्तार नहीं था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी और लोग उस तरफ जाकर रहने लगे तो देवी मां की नजरों के तेज का प्रभाव वहां रहने वाले लोगों पर न पड़े इसलिए मंदिर में एक विशाल दीवार बना दी गई। श्रद्धालु ऐसा मानते हैं कि मां की आंखों में काफी तेज है।

नवरात्र में लगता है मेला- मंदिर में हर साल नवरात्र के दौरान लाखों की संख्या में भक्तों का आना जाना होता है। रोजाना सुबह देवी मां को स्नान कराया जाता है और श्रंगार किया जाता है। नौ देवियों की पूजा भी विधि विधान के साथ संपन्न होती है। नवरात्र में भक्त आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में आते हैं। हजारों की संख्या में आने वाले भक्त अष्टमी के दिन सुबह से लेकर दोपहर तक कतार में लगकर मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र में जब मंदिर के आसपास विशाल मेला लग जाता है तब माल रोड से नौ दिन के लिए वाहनों का गुजरना रोक दिया जाता है।

शराब, बकरे और मुर्गे भी चढ़ाते हैं – काली माता मंदिर में कुछ रोचक परपंराएं हैं। मंदिर में नवरात्र में बकरे, मुर्गे के अलावा शराब का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है। कई श्रद्धालु यहां सालों भर शराब की बोतलें लेकर माता को चढ़ाने आते हैं। इसके अलावा कड़ाह प्रसाद और मीठा पान का भी मां के चरणों में भोग लगाया जाता है।

माता का लंगर - मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए यहां रोजाना मंदिर में लंगर का इंतजाम है। पर लंगर का समय निर्धारित है। लंगर हॉल में प्रेरक नीति वचन लिखे गए हैं।

कैसे पहुंचे -  काली माता मंदिर पटियाला शहर के मॉल रोड पर बारादरी उद्यान के पास स्थित है। श्री काली माता का मंदिर बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन से पैदल 10 मिनट में या फिर रिक्शा अथवा तीन पहिया वाहन के जरिये मात्र पांच मिनट में ही पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KALI MATA MANDIR, PATIALA, PUNJAB )