Tuesday, May 29, 2018

तीरंदाजी - भूटान का राष्ट्रीय खेल और परंपरा


भूटान के पारो में  और फिर इसी तरह पुनाखा में नदी के किनारे बने ग्राउंड पर समूह में काफी लोग तीरंदाजी का मुकाबला करते हुए दिखाई दिए। तीरंदाजी भूटान का राष्ट्रीय खेल है। भूटान के लोग इसमें अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पदक जीत लाते हैं। भूटान मे जगह जगह तीरंदाजी के क्लब बने हुए है।

तीरंदाजी भूटान की प्राचीन परंपरा है। पर इसे 1971 में राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया गया।  इसी साल भूटान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना। सन 1984 से भूटान ओलंपिक खेलों में भी हिस्सा ले रहा है।  भूटान के लोग   बड़े ही महंगे तीर धनुष का इस्तेमाल करते हैं। फाइबर ग्लास के बने धनुष की कीमत 50 हजार से एक लाख रुपये तक भी होती है। 



दरअसल तीरंदाजी भूटान के पुरूष वर्ग में जुनून की तरह प्रवेश कर चुका है। पर हमें एक बुराई इस खेल में घुसी हुई नजर आती है। कई जगह लोग यहां तीरंदाजी मुकाबले में पैसा भी लगाते हैं। यह कुछ कुछ हमारे यहां से सट्टा जैसा ही है। इसमें काफी लोग लाखों कमाते हैं तो काफी  लोग बर्बाद भी  हो जाते हैं। 



भूटान में मीडिया – भूटान में मीडिया की बात करें तो समाचार पत्रों  के नाम पर अंग्रेजी में छपने वाले इक्के दुक्के टेबलायड अखबार ही दिखाई देते हैं। इन अखबारों में कुछ राजनीति की तो कुछ विकास की खबरें छपती हैं। एक ऐसा ही अखबार कुंसेल हमें थिंपू में दिखाई दे गया। यह सरकारी अखबार है जो सप्ताह में छह दिन प्रकाशित होता है। कुछ और समाचार पत्र हैं पर  इनकी प्रसार संख्या ज्यादा नहीं है।  अब इन अखबारों की  वेबसाइट भी है। सन 1999 में भूटान सरकार ने अपने यहां इंटरनेट को इजाजत दी।   अब भूटान में केबल टीवी घर घर पहुंच गया है। पर नब्बे के दशक  में  केबल टीवी बिल्कुल नहीं था। केबल पर कुछ भूटान के मनोरंजन चैनल भी हैं। इन चैनलों पर भूटानी फिल्में भी दिखाई जाती हैं। केबल टीवी के कारण  गांव कस्बे के लोग भारतीय टीवी चैनल देखते हैं। इन्हें देखकर वे अच्छी हिंदी बोलना सीख गए हैं।  



सिर्फ प्रेरक फिल्में बनती हैं  हां भूटान में फीचर फिल्में भी बनने लगी हैं। साल 1989 में पहली भूटानी फिल्म बनी थी - गासा लामी सिंगे। इसके बाद कुछ  प्रेम कहानियों पर भी फिल्में बनीं। कई फिल्म  बौद्ध धर्म से प्रभावित कहानियों पर भी बनी हैं। थिंपू शहर में एक सिनेमा घर भी है। यहां पर चलने वाली फिल्म का पोस्टर लगा हुआ दिखाई दे रहा है।   लोग सिनेमा घरों में बड़े ही शौक से फिल्में देखने के लिए जाते हैं।  पर भारत की तरह रोजाना चार शो  यहां पर  नहीं चलता है। 



पर भूटान में मार धाड़ और प्यार मुहब्बत वाली फिल्में काफी कम बनतीं हैं।  सरकार की ओर ऐसी फिल्में बनाने की मनाही है जिसमें किसी तरह की अश्वलीलता हो। इसलिए इस देश में सिर्फ प्रेरणा देने वाली कहानियों पर ही फिल्में ही बनाई जाती हैं। कई फिल्मों  की कहानियां भूटान  की  संस्कृति से जुडी हुई होती हैं।  अब तक भूटान में  दो दशक में 150 से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। 



पर्यटन है बड़ा कारोबार -  भूटान सरकार की आमदनी का बड़ा साधन पर्यटन भी है। हालांकि 1970 के दशक में यहां कोई सैलानी नहीं आता था। पर पिछले दो दशक से यहां टूरिज्म बढ़ा है। टूरिज्म कौंसिल ऑफ भूटान के मुताबिक साल 2017 में भूटान में 2.50 लाख विदेशी सैलानी आए। इनमें 71 हजार विदेशी सैलानी थे। तो 1.83 लाख क्षेत्रीय सैलानी थे। क्षेत्रीय मतलब भारत से जाने वाले। अंतरराष्ट्रीय सैलानियों में सर्वाधिक लोग कोरिया से आए। इनमें 9000 सैलानी ब्रिटेन से आए। भूटान में कई टूर आपरेटर हैं जो विदेशी सैलानियों के लिए पैकेज बेचते हैं। इनमें दैनिक तौर पर गाइड की सेवा भी शामिल होती है।
थिंपू स्थित नेहरू वांगचुंग कल्चर सेंटर की इमारत। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य -  Vidyutp@gmail.com

(भूटान का एक अखबार  http://www.kuenselonline.com/   ये अखबार भी हैhttp://www.bbs.bt/news/ )

( BHUTAN, SPORTS, SHOOTING, TOURISM, FILMS AND MEDIA ) 

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