Wednesday, May 2, 2018

भूटान के सबसे अनूठे बौद्ध मठ टाइगर नेस्ट की चढ़ाई

वास्तव में यह एक विशाल बौद्ध मठ ही है पर इसे टाइगर नेस्ट कहते हैं। वह इसलिए कि आचार्य पद्मसंभव यहां आठवीं सदी में बाघ पर सवार होकर आए थे। अगर आप पारो में हैं और टाइगर नेस्ट देखना चाहते हैं तो कम से कम आधे दिन का समय निकालना पड़ेगा। पारो शहर से टाइगर नेस्ट का बेस प्वाइंट 7 किलोमीटर की दूरी पर है। बेस प्वाइंट से टिकट लेने के बाद टाइगर नेस्ट के लिए चढ़ाई करनी पड़ती है। हरे भरे जंगलों से होकर कच्चा रास्ता। दूरी है 4.5 किलोमीटर । यानी चढ़ना और उतरना 9 किलोमीटर का सफर। पर ये हरियाला सफर है। हालांकि कई लोगों के लिए ये मुश्किलों भरा होता है। तो वे कई बार बीच रास्ते से वापस लौट आते हैं।

टाइगर नेस्ट की ऊंचाई 3210 मीटर यानी करीब 10 हजार फीट है। यह स्थान पारो घाटी से 900 मीटर ऊपर है। यह एक खड़ी चट्टान के शीर्ष पर स्थित दुर्गम स्थान है। दुनिया भर से आने वाले सैलानियों के लिए पैदल यात्रा की पसंदीदा जगह है।
चूंकि टाइगर नेस्ट का सफर थका देने वाला है इसलिए हमने सुबह चढ़ाई करना तय किया। होटल से चाय, मुरमुरा जैसा हल्का नास्ता लेने के बाद हमलोग सुबह 7.30 बजे टाइगर नेस्ट के आधार तल पर पहुंच गए थे। एक दिन पहले ही इसके लिए टैक्सी बुक कर ली थी। टैक्सी वाले आधार तल तक छोडने और फिर लाने के लिए 800 रुपये मांगते हैं। आधार तल से 50-50 रुपये में दो डंडे किराये पर लेने के बाद हमने चढ़ाई शुरू कर दी। बैग में पानी की बोतल और कुछ खाने पीने की चीजें रख ली हैं। रास्ते में कुछ अलग अलग देशों से सैलानी मिलते गए। हमारे साथ लंदन से आए एक सज्जन चल रहे हैं उनकी उम्र 69 साल है पर चढने को लेकर उत्साहित हैं।
टाइगर नेस्ट के आधे रास्ते पर कैफेटेरिया है जहां तक घोड़े से जाया जा सकता है। घोड़े वाले इसके 600 रुपये लेते हैं। पर इसका कोई फायदा नहीं है। उसके आगे तो पैदल ही जाना है।
रास्ता हरे भरे जंगलों से  होकर जा रहा है। कई जगह सीधी चढ़ाई भी है। कच्चे रास्ते में पगड़ंडियों से पता चलता रहता है कि आपको किधर जाना है। डेढ़ घंटा चलने के बाद हमलोग कैफेटेरिया पहुंचे हैं। यहां पर चाय और बिस्कुट 130 रुपये का है। इतनी महंगी चाय कौन पीए भला। थोड़ा सुस्ताने के बाद आगे की चढ़ाई शुरू कर दी। रास्ते में एक कोलकाता का परिवार मिला। पति-पत्नी और उनकी दो नन्हीं बेटियां। बातों बातों में सफर कटता रहा।  हम सबसे ऊंचे प्वाइंट पर पहुंच गए हैं जहां से टाइगर नेस्ट दिखाई देने लगा है। इसके बाद तकरीबन 700 सीढ़ियां उतरनी और चढ़नी है। सीढ़ियों का उतार खत्म होने पर एक सुंदर झरना दिखाई देता है। झरने के सौंदर्य का आनंद लेने के बाद चढाई। और अब हम तीन घंटे की मनोरम पदयात्रा करके पहुंच गए हैं टाइगर नेस्ट के प्रवेश द्वार पर।
टाइगर नेस्ट का मूल नाम ताकसांग है। भूटानी में इसका अभिप्राय बाघ से ही है। कहा जाता है। इतने ऊंचे पहाड़ों पर गुफाओं में आचार्य पद्मसंभव ने लंबे समय तक ध्यान किया। वे तीन बार यहां लंबे समय तक रहे। अब यहां कुल सात मंदिर बने हैं। यहां बौद्ध भिक्षु गण निवास करते हैं। दूर से देखने में यह पहाड़ों के बीच गुफा लगता है। पर अंदर से देखने में काफी भव्य है। 
साल 2005 में जापान सरकार के सहयोग से इसे नवीकृत किया गया है। मंदिर में आचार्य पद्मसंभव और गौतम बुद्ध की विशाल मूर्तियां हैं। पहाड़ों पर जिस तरह पर्वत श्रंखला को काट कर इन गुफाओं और मंदिरों का निर्माण किया गया है वह किसी अजूबे से कम नहीं है। 
इसे दुनिया के 7वंडर की सूची में और नए विश्व विरासत की सूची में भी शामिल किया जाना चाहिए। यहां एक सज्जन से मुलाकात हुई जो पारो कालेज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने हमें टाइगर नेस्ट के महत्व के बारे में बताया। मंदिर से हमें आशीर्वाद के तौर पर पवित्र जल भी दिया।


एक घंटे टाइगर नेस्ट में गुजारने के बाद हम वापस लौट चले। पहले सीढ़ियां उतरना फिर करीब 400 सीढ़िया चढ़ना। इसके बाद तो लगातार उतरना है। हमारी उतरने में गति तेज हो गई। हमने रास्ते में किसी सज्जन के भूटान के लोकल मोबाइल नंबर से अपने ड्राईवर को आने की सूचना दी। वे टाइगर नेस्ट के बेस कैंप पर अपना वाहन लेकर हाजिर थे। वापसी पर देखा कि वहां कई दुकानें सज गई थीं जो उपहार में दिए जाने योग्य वस्तुएं बेच रहे थे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(TIGER NEST, PARO )