Monday, May 14, 2018

भूटान का शाही बौद्ध मठ – पुनाखा जोंग


दोचुला पास से चलने के बाद पुनाखा से पहले गुरुथांग नामक कस्बा आता है। यह मोचू नदी के किनारे है। भले पुनाखा भूटान की प्राचीन राजधानी थी, पर यहां शहर बाजार के नाम पर कुछ दिखाई नहीं देता। गुरुथांग बाजार से 5 किलोमीटर आगे जाने पर पोचू और मोचू नदियों के संगम पर पुनाखा जोंग दिखाई देता है। यह भूटान का शाही बौद्ध मठ है। जोंग नदी के उस पार है। जाने के लिए नदी पर पुराना लकड़ी का पुल बना हुआ है। यह पुल बड़ा ही सुंदर है। पुल से पानी में मछलियों को देखा जा सकता है।

जोंग में प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को 300 रुपये का टिकट लेना अनिवार्य है। अनादि को स्टूडेंट होने के नाम पर 150 रुपये का डिस्काउंट वाला टिकट मिल गया। छात्र डिस्काउंट के लिए आईडी कार्ड होना जरूरी है।
टिकट लेकर लकड़ी के सुंदर पुल को पार कर हम पुनाखा जोंग के परिसर में पहुंच गए हैं। कोई 20 सीढ़ियां चढ़ने के बाद मठ का विशाल प्रवेश द्वार है। दोनों तरफ दो विशाल धर्म चक्र और दीवारों पर बुद्ध के जीवन कथा से जुडी विशाल पेंटिंग।

इसके बाद हम विशाल आंगन में पहुंच गए हैं। टिकट चेक करने वाले हमें बताते हैं कि इस जोंग के आंतरिक हिस्से में तीन भाग हैं इसमें आप पूजा स्थल और बौद्ध भिक्षु निवास क्षेत्र में नहीं जा सकते। मुख्य मंदिर और उसके आंगन क्षेत्र में घूम सकते हैं।
पुनाखा जोंग का निर्माण 1637-38 में प्रथम रिनपोछे नागवांग नामग्याल द्वारा करवाया गया। यह भूटान का तीसरा सबसे पुराना और दूसरा सबसे बड़ा जोंग माना जाता है।
वास्तव में पुनाखा जोंग भूटान के राजघराने का प्रशासनिक केंद्र 1955 तक हुआ करता था। इसके बगल में ही भूटान का पुराना राजमहल स्थित है। 1955 में राजधानी थिंपू में जाने के बाद भी इस जोंग का महत्व बना हुआ है।
मुख्य मंदिर के अंदर गौतम बुद्ध आचार्य पद्म संभव और नागवांग नामग्याल की प्रतिमाएं हैं। बड़ी संख्या में थंगक पेंटिंग हैं। आंतरिक फोटोग्राफी निषेध है। पर मंदिर की सजावट भव्य है।
नागवांग नामाग्याल को बोरार्ड लामा के रूप में जाना जाता है। वह एक एक तिब्बती बौद्ध लामा थे। उन्हें एक राष्ट्र राज्य के रूप में भूटान के एकीकरण के लिए जाना जाता है। साल 1651 में पुनाखा में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस जोंग में उनकी कुछ स्मृतियां संरक्षित हैं।

पुनाखा जोंग में 400 बौद्ध भिक्षु रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या में  बाल लामा है। एक मंदिर के प्रभारी के तौर पर तैनात 13 साल के लामा से मेरी बात हुई। बताया कि उनके पिता पुलिस में हैं। कभी कभी मिलने आते हैं। उन्होंने मेरे बेटे अनादि से मिलने की इच्छा जताई। बाद में प्रसाद के तौर पर कई सामग्री दी। चाउमिन, केले, चिप्स और बिस्कुट। हमने उन्हे बुद्धा का आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लिया।
जिस समय हमलोग पुनाखा जोंग में पहुंचे है, भूटान के राजा की दादी यानी तीसरे राजा की पत्नी भी विशेष पूजा के लिए आई हैं। हमें उन्हें उनके दर्शन का सौभाग्य मिला। उनकी उम्र 100 साल के आसपास होगी। उनकी सुरक्षा में तैनात भूटान पुलिस के युवा वरिष्ठ अधिकारी से हमारी बात हुई। वे भारत के हैदराबाद में सरदार बल्लभभाई पटेल पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले चुके हैं। वहीं जहां भारत के सभी आईपीएस भी एक साल का प्रशिक्षण पाते हैं।


भूटान के हर राजा की शादी पुनाखा के जोंग में होती है। साल 2013 में भी जिग्मे खेशर की शाही शादी के लिए राजधानी थिंपू से 71 किलोमीटर दूर पुनाखा में 17वीं शताब्दी के एक किले को पहले दुल्हन की तरह सजाया गया। शाही शादी में करीब1500 लोग इक्ट्ठा हुए। शाही शादी में 100 बौद्ध भिक्षुओं की विशेष प्रार्थना के साथ आरंभ हुई। शादी सुबह चार बजे से शुरू होकर करीब दो घटे तक चली। शादी के बाद नरेश और महारानी ने किले के बाहर एक मैदान में जमा हजारों लोगों के साथ मिलकर नृत्य किया। शादी के जश्न में आए लोगों को भूटान की 20 घाटियों से आए 60 बेहतरीन रसोईयों के हाथों का बना हुआ पारंपरिक भूटानी भोजन परोसा गया।
--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PUNAKHA DZONG, BHUTAN )