Wednesday, May 30, 2018

भूटान मतलब खुशियों का देश – ग्रॉस नेशनल हैपीनेस

भूटान को खुशियों का देश लैंड ऑफ हैपिनेस कहा जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भूटान एक बहुत छोटा-सा देश है लेकिन इसकी ख्याति इस कारण है कि यह खुशनुमा देश है। ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस' ( जीएनएच) का मंत्र भी यहीं से दुनिया को मिला है। 'ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्शन' यानी जीडीपी के पीछे दौड़ती दुनिया को   भूटान ने कुछ अलग संदेश दिया है। यह संदेश है -  जीवन में खुश कैसे रहे सकते हैं।  इस   देश   की सबसे खास बात ये है कि यहां सफलता को जीडीपी के बजाय जीएनएएच (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) यानी   खुशियों   के हिसाब से नापा जाता है। जीएनएच को भूटान के 2008 में लागू नए संविधान में शामिल किया गया है।  

पर्यावरण संग  सामंजस्य बिठा कर खुश रहें-  क्या अंधाधुंध प्रगति से खुशियां खरीदी जा सकती हैं। नहीं ना। ऐसा होता चीन के कुछ अति विकसित बड़े शहरों में हर साल प्रदूषण के कारण कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आती। शानदार सड़के, महंगी गाड़ियां, दिन रात बिजली से चलने वाले ऐश ओ आराम के उपकरण से खुश नहीं रहा जा सकता। असली खुशी तो बेहतर पर्यावरण और प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों के साथ सामंजस्य बिठाकर ही प्राप्त की जा सकती है। हम प्रकृति से मिली सुविधाओं का लाभ तो उठाएं पर उनका अंधाधुंध दोहन न करें।

अमेरिका में रहने वाली लिंडा लेमिंग नब्बे के दशक में भूटान पहुंची तो यहां के लोगों की जीवन शैली देखकर वे चकित रह गईं। भूटान की जीवन शैली से प्रभावित होकर उन्होंने 'मैरिड टू भूटान' नामक एक पुस्तक लिखी। अब उनकी दूसरी किताब 'अ फील्ड गाइड टू हैप्पीनेस' भी आई है। इन दोनों किताबों में उन्होंने भूटान के लोगों की खुशी का रहस्य उजागर किया है। वे कहती हैं कि भूटान के नागरिक जिंदगी को बहुत इत्मीनान और भरपूर तरीके से जिंदगी को जीते हैं और इसलिए वे खुश रहते हैं। 
एक और बात है, बेहतर पर्यावरण के कारण भूटान   की हवा में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी अधिक है कि आप पूरे समय तरोताजा महसूस करते हैं।


नो स्मोकिंग कंट्री - हमने पूरे भूटान  भ्रमण के दौरान किसी को भी सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। हालांकि लोग यहां पूर्वोत्तर राज्यों की तरह तांबुल (सुपारी) खाते हैं। यहां पर तांबुल को दोमा कहते हैं। हालांकि यहां कुछ लोग चोरी चुपके ड्रग्स भी लेते हैं। युवा पीढ़ी खास तौर पर कुछ ऐसे नशे के गिरफ्त में है।  

गासा में ऑरगेनिक खेती – भूटान में हमें चीन की सीमा क्षेत्र के शहर गासा की कहानी सुनने को मिलती है। वहां आरगेनिक फार्मिंग शुरू की गई है। गासा के किसान कुछ बड़े होटलों को आरगेनिक तरीके से उगाई गई सब्जियां सप्लाई कर रहे हैं। वहां लहसुन, गाजर, आलू आदि की खेती हो रही है। इससे किसानों की आमदनी भी बढ़ी है। भूटान का पड़ोसी भारत का राज्य सिक्किम पूरी तरह आरगेनिक राज्य बन चुका है। अब भूटान भी उसी नक्शेकदम पर है।

चीन से तस्करी - भूटान की बहुत लंबी सीमा चीन के साथ लगती है। चीन हमेशा से भूटान पर अपना वर्चस्व कायम करने की इच्छा भी रखता है। पर भूटान के रिश्ते ऐतिहासिक तौर पर भारत के साथ बेहतर तरीके से जुड़े हैं। हमें भूटान में एक सज्जन बताते हैं कि भूटान को कई बार चीन प्रलोभन देने की कोशिश करता है। हम भारत से आपकी तीन गुनी आर्थिक सहायता करेंगे पर आप हमारे साथ आओ। भूटान तक चीन सड़क बनाने की इच्छा जाहिर करता है। व्यापारिक मार्ग खोलने की बात करता है। पर भूटान की विदेश नीति भारत निर्धारित करता है। भूटान की सरकार कभी चीन के प्रलोभन में नहीं आई।


पर भूटान में ये सुनने में आया कि काफी लोग हा  बार्डर की तरफ से चीन जाकर तस्करी करते हैं। इस तस्करी में भारत से चंदन की लकड़ी चीन भेजी जाती है। वहीं चीन से कपड़े और कास्मेटिक जैसे सामान लेकर लोग आते है। लोग हा से पैदल चलकर एक दो दिन में चीन के निकटवर्ती शहर तक पहुंच जाते हैं। कई लोग तो घोड़े से भी चीन जाते हैं। इसमें कई लोग पकड़े भी जाते हैं। सजा भी होती है। फिर छूटने पर इस काम में लग जाते हैं। चीन से इस तरह की तस्करी करके भूटान के पारो शहर के कई लोग करोड़पति बन चुके हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BHUTAN, GROSS NATIONAL HAPPINESS )



Tuesday, May 29, 2018

तीरंदाजी - भूटान का राष्ट्रीय खेल और परंपरा


भूटान के पारो में  और फिर इसी तरह पुनाखा में नदी के किनारे बने ग्राउंड पर समूह में काफी लोग तीरंदाजी का मुकाबला करते हुए दिखाई दिए। तीरंदाजी भूटान का राष्ट्रीय खेल है। भूटान के लोग इसमें अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पदक जीत लाते हैं। भूटान मे जगह जगह तीरंदाजी के क्लब बने हुए है।

तीरंदाजी भूटान की प्राचीन परंपरा है। पर इसे 1971 में राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया गया।  इसी साल भूटान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना। सन 1984 से भूटान ओलंपिक खेलों में भी हिस्सा ले रहा है।  भूटान के लोग   बड़े ही महंगे तीर धनुष का इस्तेमाल करते हैं। फाइबर ग्लास के बने धनुष की कीमत 50 हजार से एक लाख रुपये तक भी होती है। 



दरअसल तीरंदाजी भूटान के पुरूष वर्ग में जुनून की तरह प्रवेश कर चुका है। पर हमें एक बुराई इस खेल में घुसी हुई नजर आती है। कई जगह लोग यहां तीरंदाजी मुकाबले में पैसा भी लगाते हैं। यह कुछ कुछ हमारे यहां से सट्टा जैसा ही है। इसमें काफी लोग लाखों कमाते हैं तो काफी  लोग बर्बाद भी  हो जाते हैं। 



भूटान में मीडिया – भूटान में मीडिया की बात करें तो समाचार पत्रों  के नाम पर अंग्रेजी में छपने वाले इक्के दुक्के टेबलायड अखबार ही दिखाई देते हैं। इन अखबारों में कुछ राजनीति की तो कुछ विकास की खबरें छपती हैं। एक ऐसा ही अखबार कुंसेल हमें थिंपू में दिखाई दे गया। यह सरकारी अखबार है जो सप्ताह में छह दिन प्रकाशित होता है। कुछ और समाचार पत्र हैं पर  इनकी प्रसार संख्या ज्यादा नहीं है।  अब इन अखबारों की  वेबसाइट भी है। सन 1999 में भूटान सरकार ने अपने यहां इंटरनेट को इजाजत दी।   अब भूटान में केबल टीवी घर घर पहुंच गया है। पर नब्बे के दशक  में  केबल टीवी बिल्कुल नहीं था। केबल पर कुछ भूटान के मनोरंजन चैनल भी हैं। इन चैनलों पर भूटानी फिल्में भी दिखाई जाती हैं। केबल टीवी के कारण  गांव कस्बे के लोग भारतीय टीवी चैनल देखते हैं। इन्हें देखकर वे अच्छी हिंदी बोलना सीख गए हैं।  



सिर्फ प्रेरक फिल्में बनती हैं  हां भूटान में फीचर फिल्में भी बनने लगी हैं। साल 1989 में पहली भूटानी फिल्म बनी थी - गासा लामी सिंगे। इसके बाद कुछ  प्रेम कहानियों पर भी फिल्में बनीं। कई फिल्म  बौद्ध धर्म से प्रभावित कहानियों पर भी बनी हैं। थिंपू शहर में एक सिनेमा घर भी है। यहां पर चलने वाली फिल्म का पोस्टर लगा हुआ दिखाई दे रहा है।   लोग सिनेमा घरों में बड़े ही शौक से फिल्में देखने के लिए जाते हैं।  पर भारत की तरह रोजाना चार शो  यहां पर  नहीं चलता है। 



पर भूटान में मार धाड़ और प्यार मुहब्बत वाली फिल्में काफी कम बनतीं हैं।  सरकार की ओर ऐसी फिल्में बनाने की मनाही है जिसमें किसी तरह की अश्वलीलता हो। इसलिए इस देश में सिर्फ प्रेरणा देने वाली कहानियों पर ही फिल्में ही बनाई जाती हैं। कई फिल्मों  की कहानियां भूटान  की  संस्कृति से जुडी हुई होती हैं।  अब तक भूटान में  दो दशक में 150 से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। 



पर्यटन है बड़ा कारोबार -  भूटान सरकार की आमदनी का बड़ा साधन पर्यटन भी है। हालांकि 1970 के दशक में यहां कोई सैलानी नहीं आता था। पर पिछले दो दशक से यहां टूरिज्म बढ़ा है। टूरिज्म कौंसिल ऑफ भूटान के मुताबिक साल 2017 में भूटान में 2.50 लाख विदेशी सैलानी आए। इनमें 71 हजार विदेशी सैलानी थे। तो 1.83 लाख क्षेत्रीय सैलानी थे। क्षेत्रीय मतलब भारत से जाने वाले। अंतरराष्ट्रीय सैलानियों में सर्वाधिक लोग कोरिया से आए। इनमें 9000 सैलानी ब्रिटेन से आए। भूटान में कई टूर आपरेटर हैं जो विदेशी सैलानियों के लिए पैकेज बेचते हैं। इनमें दैनिक तौर पर गाइड की सेवा भी शामिल होती है।
थिंपू स्थित नेहरू वांगचुंग कल्चर सेंटर की इमारत। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य -  Vidyutp@gmail.com

(भूटान का एक अखबार  http://www.kuenselonline.com/   ये अखबार भी हैhttp://www.bbs.bt/news/ )

( BHUTAN, SPORTS, SHOOTING, TOURISM, FILMS AND MEDIA ) 

Monday, May 28, 2018

कई शादियां कर सकते हैं भूटान के लोग

कई रोचक बातें हैं   भूटान   के बारे में। उनमें से एक यह की भूटान के लोग कई शादियां करते हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। हालांंकि अब देश में नए कानून के तहत शादी का प्रमाण पत्र सिर्फ दो शादियों तक का ही मिलेगा। यानी कानून आदमी दो शादियां कर सकता है। बहु पत्नी प्रथा भूटान में कई दशक से चली आ रही है। फुंटशोलिंग से थिंपू जाते समय हमें जो टैक्सी ड्राईवर मिले थे, उन्होंने बताया कि उन्होंने दो शादियां कर रखी हैं। दोनो से उन्हे सात बच्चे हैं।  वे  अपनी दो  शादियां बड़े   गर्व से बता रहे थे।   पर हमारे अगले ड्राईवर की सिर्फ एक ही शादी है। उन्हें अपनी पत्नी से काफी प्रेम है इसलिए दूसरी शादी नहीं की।

बीवी अलग होकर मां  सकती है गुजारा भत्ता-  हालांकि पहली पत्नी के रहते हुए भूटानी कोई दूसरी शादी करता है तो पहली पत्नी उससे अलग रहने का फैसला ले सकती है। इसके लिए वह अदालत में जाकर गुजारा भत्ता मांग सकती है। यह भत्ता हैसियत के अनुसार मिलता है। पर यह कम से कम 600 रुपये मासिक तो होगा ही। पुनाखा में मिली एक भूटानी शादी शुदा महिला बताती हैं कि कई लोग दूसरी और के मुहब्बत में पड़ कर दूसरी शादी रचाते हैं। पर हम ऐसे पति को चाहें तो छोड़ सकते हैं और गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। मतलब कि महिला अधिकारों के लेकर सरकार के नियम अब सख्त हुए हैं। इसलिए सरकार अब सिर्फ दो पत्नियों की इजाजत देती है। पर कोई भूटानी महिला अपने देश के बाहर के किसी नागरिक से शादी नहीं रचा सकती।

अनूठा है भूटान का पहनावा- भूटान के ज्यादातर नागरिक और राजघराने के लोग भूटाने पहनावे में ही नजर आते हैं। यहां के पुरुषों के पहनावा का नाम है गो (GHO) और महिलाओं के पहनावा का नाम है कीरा ( KIRA ) राजकीय सेवा में लगे हर कर्मचारी के राजकीय पहनावे में दफ्तर आना अनिवार्य है। यही नहीं अगर कोई आम आदमी सरकारी दफ्तर में अपने किसी काम से जाता है तो भी यही औपचारिक पहनावा में ही जाना जरूरी है।  जैसे आप बिजली ,पानी  का  बिल या हाउस टैक्स जमा करने जा रहे हैं तो भी  राजकीय परिधान जरूरी है। 



यहां तक की टैक्सी ड्राईवर, टूरिस्ट गाईड के लिए भी ये पहनावा जरूरी है। अगर आप राजकीय परिधान में नहीं हैं तो जुर्माना भरने के लिए तैयार रहिए।  महिलाएं तो ज्यादातर   औपचारिक परिधान में ही नजर आती हैं। हां पुरुष थोड़ी आजादी ले लेते हैं।  स्कूल यूनीफार्म की बात करें तो वह भी भूटानी परिधान  में ही होता है।  



अगर आप भूटान का परंपरागत परिधान यानी गो खरीदना चाहते हैं तो बाजार में रेडिमेड मिलता है। वहीं अगर कपड़ा खरीदकर सिलाई करवाना चाहते हैं  तो इसमें 3500 से अधिक खर्च आ जाता है। हमने  थिंपू शहर के एक दुकान में जाकर परिधान की दरों के बारे में पता लगाया। भूटान सालों भर ठंड रहती है इसलिए लोग ऊनी कपड़े का ही परिधान बनवाते हैं जो थोड़ा महंगा पड़ता है। 
विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Sunday, May 27, 2018

मीठी धूप के संग थिंपू की सड़कों पर



सुबह सुबह हम   राजधानी थिंपू की सैर करने  निकले हैं।   सूरज की मीठी धूप सड़कों पर बिखर रही है।  क्लाक टावर  स्क्वायर से आधा किलोमीटर आगे चलकर हम लोग राजधानी के इमारतों के आसपास से  गुजर रहे हैं।   कई किलोमीटर तक सड़क पर यूं पैदल चलते हुए हम  एक  स्वच्छ सुंदर राजधानी और उसकी इमारतों के वास्तु का अवलोकन कर रहे हैं।   किसी भी नए शहर में  सुबह  टहलना मेरा प्रिय  शगल है,  तो थिंपू में उसे कैसे छोड़ सकता था। 


हमलोग रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी  भूटान के हाईकोर्ट के पास से गुजर रहे हैं। सन 1955 में  राजधानी बनाए जाने के बाद थिंपू में  तमाम सरकारी भवनों का निर्माण हुआ है। आबादी की बात करें तो यहां  कोई एक लाख 20 हजार लोग रहते हैं। यह भारत के किसी जिला मुख्यालय के शहर से भी कम है।

राजधानी वाले इलाके में वाहनों की आवाजाही भी काफी कम है।  कहीं कहीं रंग बिरंगे फूल खिले हुए हैं।  वांग चू नदी के किनारे जरूरत के हिसाब से नए भवनों का भी निर्माण कराया जा रहा है। वांग चू नदी के पश्चिमी किनारे पर  राजधानी के तमाम भवन स्थित हैं।  थिंपू शहर के उत्तरी क्षेत्र में  नेशनल एसेंबली  और राजा का निवास बना हुआ है। 


इस इलाके में थिंपू जोंग भी स्थित है जो  भूटान सरकार का राजकीय बौद्ध मठ है। इसका मूल नाम तासिखो जोंग है। यह मूल रूप से 1216 में बना था। पर दो बार नष्ट होने के बाद इसे 1962  में बनवाया गया।  तब तीसरे राजा जिग्मे दोरजी वांगचुंक का शासन था।   इस जोंग के अंदर शाम को 5 बजे  के बाद ही प्रवेश किया जा सकता है।


दरअसल इस जोंग के आधे  हिस्से में राजकीय दफ्तर हैं , इसलिए सैलानियों के प्रवेश के लिए इसे शाम के पांच बजे के बाद खोला जाता है। इसमें प्रवेश के लिए आपकी वेशभूषा शालीन होनी चाहिए।   मतलब जोंग के प्रवेश से लिए ड्रेस कोड निर्धारित है। 


आमतौर पर इस क्षेत्र में सैलानियों की आवाजाही की मनाही है। पर सुबह की सैर करते हुए हुए हम लोग तमाम मंत्रालयों के आसपास से गुजर  रहे हैं। 


इन दिनों थिंपू में तीन दिनों का वज्रयान कान्फ्रेंस चल रहा है। यह आयोजन भारत भूटान के कूटनीतिक रिश्तों के  स्वर्ण जयंती  के मौके पर हो रहा है। हालांकि हम इसमें शामिल होने नहीं आए हैं। कई किलोमीटर की सुबह की सैर करने के बाद अब वापसी।  लौटते हुए वांग चू न दी के  किनारे पहुंच  गए। यहां बेंच पर बैठकर नदी की  सुहानी धार को देखते रहना बड़ा सुखद लगता है। 

पारो से लौटते हुए हमने  भूटान शहर को  रात में देखा। यह  किसी भी पहाड़ों के शहर की तरह एक अलग नजारा पेश करता हुआ नजर आता है।   हां दिवाली सा  नजारा। रंग बिरंगा सतरंगा शहर  थिंपू।

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com   ( BHUTAN, THIMPU,  CAPITAL) 



Saturday, May 26, 2018

स्वच्छता की मिसाल पेश करता राजधानी थिंपू

थिंपू भूटान की राजधानी है। हो सकता है यह दुनिया की सबसे साफ सुथरी राजधानियों में शुमार हो। हालांकि मैं भारत के बाहर कम गया हूं फिर भी भूटान के थिंप शहर की स्वच्छता को देखकर ऐसा लगता है। थिंपू शहर वांगचू नदी के किनारे समुद्रतल से 2,400 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। शहर के केंद्र में 4 समानांतर सड़कें हैं। हर सडक के दोनों तरफ पदयात्रियों के लिए फुटपाथ बने हैं। पर इन फुटपाथ पर कहीं भी अतिक्रमण नहीं है।
शहर की स्वच्छता को बरकरार रखने के लिए शहर को पॉलीथीन मुक्त बनाने की कवायद जारी है। थिंपू की मुख्य सड़क पर मुझे एक मशीन दिखाई देती है। यह आटोमेटिक वेंडिग मशीन 5 रुपये का नोट डालने पर एक बैग देती है। इस बैग में आप कुछ भी खरीददारी कर सकते हैं। आधिकारिक तौर पर यहां पॉलीथीन पर प्रतिबंध है।

थिंपू में लगी बैग वेंडिंग मशीन। 
थिंपू शहर में राह चलते आप कहीं भी कचरा नहीं फेंक सकते। अगर फेंक दिया तो सीसीटीवी में कैद हो जाएंगे और आपको जुर्माना भरना पड़ सकता है। पूरे शहर में हर जगह कैमरे लगे हुए हैं। इसलिए सावधान रहिए।

ट्रैफिक नियमों की सख्ती – शहर ट्रैफिक नियमों को लेकर बड़ा पाबंद है। हर जगह सड़क पर पार्किंग के लिए जगह निर्धारित किए गए हैं। कई जगह सड़क पर भी पार्किंग बाक्स बना दिए गए हैं। आप यहां शुल्क देकर अपनी गाड़ी खड़ी कर सकते हैं। इसके अलावा कहीं भी पार्किंग की तो जुर्माना भरने के लिए तैयार रहिए।

पैदल यात्री भी जेब्रा क्रासिंग के अलावा कहीं भी सड़क पार नहीं कर सकते। पर जब आप जेब्रा क्रासिंग पर सड़क पार करने के लिए खडे होते हैं तो दोनों तरफ से आने वाली गाड़ियां पदयात्रियों को देखकर बड़े सम्मान से रूक जाती हैं। चाहे वह कितनी भी महंगी एसयूवी हो या फिर किसी भी स्तर की सरकारी गाड़ी वह पैदल चलने वाले को जेब्रा पर पहले रास्ता देती है। इस समय एक पैदल यात्री के तौर पर भी बड़ी शाही एहसास होता है।


कोरोनेशन पार्क – थिंपू शहर में सुबह की सैर के लिए वांगचू नदी के किनारे बना कोरोनेशन पार्क बेहतरीन जगह है। यह पार्क थिंपू के स्टेडियम के ठीक सामने है। लंबे वर्गाकार पार्क में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। पार्क के अंदर सुनहले रंग की विशाल बुद्ध की प्रतिमा है। यह प्रतिमा मैत्रेय बुद्ध की है। यानी बुद्ध चलायमान मुद्रा में है। भूटान के लोग इसे वाकिंग बुद्धा स्टैचू कहते हैं। 



पार्क के अंदर ओपन जिम का भी निर्माण किया गया है। यहां आप सुबह सुबह बिना किसी शुल्क के व्यायाम कर सकते हैं। यहां लगे मशीनों के इस्तेमाल के तरीके की भी जानकारी दी गई है। पार्क में एक फलों के जूस के दुकान भी है। यहां पर लगे एक बोर्ड में फलों के जूस पीने के फायदे भी गिनाए गए हैं।

लहरों का संगीत - थिंपू की एक सुबह - वांगचू नदी के किनारे। 
तो अब पार्क से बाहर चलते हैं। वांगचू नदी के किनारे सुंदर बेंच बनी हैं। यहां बैठ कर सुबह के धूप के मजे लिजिए और नदी के सौंदर्य को निहारिए। वांगचू नदी का जल कल कल बहता हुआ संगीत की स्वर लहरियां उत्पन्न करता है। हमारे होटल भूटान के कमरे में नदी का यह संगीत रात भर सुनाई देता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( THIMPU CITY, BHUTAN ) 



Thursday, May 24, 2018

अच्छा खााओ, पीयो और मस्त रहो- खुशियों का देश भूटान

शाकाहारी हैं तो भूटान में घबराएं नहीं - खाने पीने की बात करें तो भले ही भूटान बुद्ध का देश है पर यहां शायद ही कोई शाकाहारी हो। पर अगर आप भूटान की यात्रा पर हैं और शाकाहारी हैं तो घबराने की बात नहीं है। आपका काम चल जाएगा।
वैसे तो ज्यादातर भूटान के लोग सर्वाहारी हैं। भले ही लोग बौद्ध धर्म को मानते हों पर यहां बीफ  खुलेआम खाया जाता है। बीफ का मतलब इसमें गोमांस भी शामिल है। हमारे टैक्सी ड्राईवर बताते हैं कि उनकी पत्नी बीफ नहीं खाती। उसे लगता है जिस जानवर का हम दूध पीते हैं उसका मांस कैसे खा सकते हैं। पर भूटान में इस तरह की सोच वाले इक्के दुक्के लोग ही हैं। ज्यादातर लोग गोमांस भी खाते हैं।

संयोग से हम राजधानी थिंपू के जिस होटल में ठहरे उसका रेस्टोरेंट शाकाहारी है। पर यहां कुछ शाकाहारी रेस्टोरेंट में अंडा भी पेश किया जाता है। होटल गासिल के आधार तल पर रिसेप्शन के साथ रेस्टोरेंट हैं। होटल का कुक भारतीय है। यहां पर आपको पंजाबी थाली भी खाने में मिल जाएगी। यहां शाकाहारी थाली 150 रुपये की है। इस थाली में चपाती, चावल, सब्जी, दाल, पापड़, मिठाई आदि सब कुछ है। अनादि को थाली खूब पसंद आई । पंजाबी थाली में तंदूरी रोटी भी मिल जाती है। गासिल खाना हमें इतना पसंद आया कि अगले दो दिन होटल में भूटान  में रुकने के बावजूद हम खाने यहीं आते रहे। होटल भूटान भी शाकाहारी है। पर उस थ्री स्टार होटल का रेस्टोरेंट महंगा है।
सुबह नास्ते में होटल गासिल में पराठे मिल जाते हैं। एक पराठा 50 रुपये का है जो नास्ते के लिए पर्याप्त है। भूटान के ज्यादातर होटल में शराब भी परोसी जाती है।
समोसा भी मिलता है – भूटान के सब्जी बाजार वाली सड़क पर घूमते हुए कुछ सस्ते रेस्टोरेंट नजर आए। पर किसी रेस्टोरेंट में खुले में कुछ रखा हुआ नहीं दिखाई दिया। दरवाजा खोलकर अंदर जाइए तो बैठकर कुछ खा पी  सकते हैं। इनमें सिर्फ एक वेज रिफ्रेशमेंट वाला है। पर कई दुकानों में समोसे मिल जाते हैं। ये समोसा सुबह बनाकर रख देते हैं। दिन भर लोग गर्म करके खाते रहते हैं।

थिंप में पराठा – थिंपू के नोरजिम लाम मुख्य सड़क हमारे ड्राईवर साहब हमें एक पराठे की दुकान पर ले गए। यहां सुबह दस बजे से रात नौ बजे तक पराठा और चाय मिलता है। यह शाकाहारी नास्ता घर है। यहां आप पराठा के अलावा चाउमिन खा सकते हैं। एक पराठा 40 रुपये का है। साथ में वे चटनी देते हैं। दो पराठा खा लें तो भरपेट भोजन हो जाता है। यह खाने के लिए थिंपू में किफायती जगह है। यह पराठे की दुकान होटल नोरलिंग बिल्डिंग के बेसमेंट में है। बेसमेंट कई नास्ता घर है पर इसमें एक ही शाकाहारी नास्ता घर है।


कहीं स्ट्रीट फूड नहीं – पूरे थिंपू शहर मे ठेले वाले खोमचे वाले दिखाई नहीं देते। जो भी खाने नास्ते की दुकाने हैं वह बंद दरवाजे के अंदर है। कहीं खुले मे खाने पीने की कोई चीज बिकती हुई नजर नहीं आती है। फुटपाथ पर खाने पीने के स्टाल न होने के कारण खाना पीना थोड़ा महंगा जरूर है, पर इससे स्वच्छता बनी रहती है। हमारे टैक्सी ड्राईवर बताते हैं कि जब दिन में उन्हें कहीं बाहर खाना होता है तो उनके भी 100 से 150 रुपये खर्च हो जाते हैं।  

सिटी होटल पारो का खाना –  पारो के सिटी होटल के भोजनालय में खाने का अनुभव भी काफी अच्छा रहा। हालांकि यह शाकाहारी नहीं है पर स्वच्छता का स्तर काफी अच्छा है। हमने यहां दो बार फ्राइड राइस तो एक बार बिरयानी और दाल आर्डर करके खाया। खाने पीने की दरें भी वाजिब हैं। वैसे पारो के सबसे किफायती होटल ऑल सीजन्स का भी अपना भोजनालय   है।


पुनाखा और पारो के रास्ते में हमें लोबासा के में रेडीमेड पूरियां बिकती हुई दिखाई दीं। यह हमारे यहां के गोलगप्पे का बड़ा रूप है। लोग इसे खरीद लेते हैं और नास्ते में नमक और चटनी के साथ खाते हैं। आप शाकाहारी हैं तो बेकरी से पावरोटी, नमकीन, चावल के मीठे लड्डू ( मुरुंडा या लाई ) आदि  भी खरीद सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( BHUTAN VEG FOOD, PARO, THIMPU, PUNAKHA ) 



Tuesday, May 22, 2018

चिमी लाखांग - लिंग पूजन की अनूठी परंपरा

थिंपू से पुनाखा आते समय पुनाखा से पहले लोबासा में सड़क से लगभग एक   किलोमीटर दूर पहाड़ी पर यह लहखांग बौद्ध मंदिर एवं मठ स्थित है। पर हम यहां जा रहे हैं पुनाखा से वापसी के समय। शाम के 4 बज गए हैं। पर आज पुनाखा के दर्शनीय स्थलों को देखने की ललक में हम दोपहर का लंच भूल चुके हैं। लोबासा में एक होटल में रुकते हैं हमलोग पर वे बताते हैं कि खाने में कुछ नहीं है। अब हमारे ड्राईवर साहब गाड़ी को बायीं तरह मोड देते हैं। खेतों से होकर घाटियों के बीच सड़क चली जा रही है।



लोबासा गांव में जो भी घर बने हैं उनकी दीवारों में आकर्षक पेंटिंग बनी हैं। पर हम इन पेंटिंग में बड़े बड़े पुरुष जननांग देखते हैं। आखिर ऐसा क्यों। भूटान के इस क्षेत्र में पुरुष जननांग को सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए उसकी पेंटिंग बनी जाती है। इसमें यहां शरमाने जैसी कोई बात नहीं है।


चिमी लाखांग से पहले गांव में दोनों तरफ कुछ आर्ट गैलरी हैं। यहां पर थंगक पेंटिंग खरीदी जा सकती है। इसके साथ ही यहां पर लकड़ी के बने हुए मानव लिंग बिक रहे हैं। ये मानव लिंग छोटे-बड़े अलग-अलग आकार के हैं। कुछ मानव लिंग चाबी के गुच्छे के साथ लगे हैं। फुटपाथ पर सामान बेच रही लड़कियां रोककर हमें कुछ खरीदने के लिए कहती हैं। पर हम नहीं खरीद पाते। भले यहां यह सब कुछ समान्य हो पर हम अपने घर  में इसे  नहीं रख सकते। न ही किसी को  उपहार में दे सकते हैं। इसी बीच हल्की बारिश शुरू हो गई है। तेज हवाएं भी चल रही हैं। पर इस सुहाने मौसम में हम चल पड़े हैं चिमी लाखांग की ओर। 



पार्किंग से आधा किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर तक जाना पड़ता है।  
चिमी लाखांग तक मुख्य सड़क से यहां तक आने के लिए पर्यटकों को पगडंडीनुमा रास्ते से हो कर गुजरना पड़ता है जो धान के खेतों के बीच से हो कर जाता है। ये रास्ता बड़ा ही मनोरम है। हल्की बारिश ने सफर का मजा और बढ़ा दिया है। यह बौद्ध मंदिर 15वीं सदी की बौद्ध भिक्षु लामा द्रुकपा कुअनले को समर्पित है। मंदिर में प्रार्थना चक्र घूमाने के बाद हमलोग आगे बढ़ते हैं।


मंदिर परिसर में पूजा हो रही है। हम भी जाकर प्रार्थना में बैठ जाते हैं। पांच मिनट बाद हम उठने वाले हैं। पर बौद्ध भिक्षु हमें इशारों में उठने के लिए मना करते हैं। तो हम बैठे रह जाते हैं। और पांच मिनट बाद भिक्षु एक बाल लामा की ओर इशारा करते हैं। वह हमें आशीर्वाद देने आता है। विशाल हथियार का स्पर्श और विशाल आकार के मानव लिंग का स्पर्श। दरअसल चिमी लाखांग की ये परंपरा है। यहां के आशीर्वाद से लोग मानते हैं कि पौरूष कायम रहता है।

चिमी लाखांग बौद्ध मंदिर का निर्माण 1499 में हुआ था। द्रुपका कुअनले तिब्बती परंपरा के बौद्ध संत थे। वे पश्चिमी तिब्बत से इधर आए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे शराब और महिलाओं की निकटता पसंद करते थे। संत कुअनले ने कविताएं भी लिखी थीं। वे अपने को मुक्त विचारों का योगी कहते थे। उन्होंने माना कि उन्होंने सैकड़ो महिलाओं से संबंध बनाए थे। उनका मानना था कि इस तरह से वे उनकी मदद करते हैं। और यह सब आधात्याम की ओर प्रवृत होने का मार्ग है। वे कहते हैं मैं  शराब, औरत और गीतों के साथ आनंद मनाता हूं। कुअनले कहते हैं – एक युवा महिला प्रेम में आनंद पाती है। एक युवा पुरुष सेक्स में आनंद पाता है। एक बुजुर्ग आदमी अपनी स्मृतियों से आनंदित होता है।
चिमी लाखांग के दर्शन से लौटने के बाद शाम होने लगी है। आगे चलकर लोबासा बाजार में हमलोग एक रेस्टोरेंट में रुकते हैं। चूंकि दोपहर का लंच नहीं किया है तो थोड़ी भूख लग रही है। वहां पर कुछ वेज मोमोज और कॉफी का आर्डर करके बैठ जाते हैं। मोमोज थोड़े महंगे जरूर हैं पर उनका स्वाद काफी अच्छा है। कॉफी पीकर भी आनंद आ गया। हमने अपने टैक्सी ड्राईवर साहब को भी अपने  साथ  बिठाकर कॉफी पिलाई। थिंपू वापसी से पहले परमिट चेकपोस्ट पर हमारा पुनाखा वाला परमिट जमा करा लिया जाता है।  


-     ---   विद्युत प्रकाश मौर्य    Email- vidyutp@gmail.com
(CHIMI LHAKHANG, LOBASA, PUNAKHA , LAMA DRUKPA KUNLEY  ) 

Sunday, May 20, 2018

गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी - भूटान के रोमियो जूलियट

पुनाखा में घूमते हुए हम अनायास ही एक प्रेम कहानी में प्रवेश कर गए। गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी वास्तव में भूटान के रोमियो जूलियट की कहानी है।


पुनाखा में हमारी नजर 700 साल पुराने एक मिट्टी के घर पर पड़ी। पुनाखा जोंग से गासा रोड पर एक किलोमीटर आगे नदी के किनारे ती मंजिला मिट्टी का घर दिखाई देता है। तो ये कहानी है गासी लामा सिंगी और चांगुल बूम गालिम की।

हमारे टैक्सी ड्राईवर हमें उस प्रेम कहानी में ले जाते हैं। गालिम पुनाखा के एक अमीर किसान की बेटी थी। नदी के किनारे मिट्टी का एक तीन मंजिला घर जीर्ण अवस्था में दिखाई देता है। अब भूटान सरकार द्वारा इस घर को हेरिटेज साइट का दर्जा दे दिया  गया है।  

यह भूटान की अमर प्रेम कहानी है,जो ज्यादातर भूटानी लोगों की जुबान पर रहती है। गालिम का जो तीन मंजिला घर है यह अपने समय के बड़े अमीर किसान का घर हुआ करता था। सिंगी कौन था। वह तिब्बत सीमा पर बसे गांव गासा के एक साधारण परिवार का युवक था।
पुनाखा में गालिम का पुस्तैनी घर 
तो गालिम और सिंगी में प्यार हो गया। यह एक अमीर और गरीब की प्रेम कहानी थी।कहते हैं गालिम बला की खूबसूरत थी। तो गालिम पर इस इलाके के जमींदार देब का दिल आ गया। उसने गालिम से विवाह करने की इच्छा अपने एक सहायक के समक्ष जताई। उस सहायक को गालिम और सिंगी के प्रेम के बारे में जानकारी थी। इसलिए उसने सिंगी को गालिम से दूर करने की साजिश रची। सिंगी को किसी काम से गासा भेज दिया गया। इसके बाद देब से गालिम से विवाह का प्रस्ताव उनके पिता को भेजा। एक बड़े जमींदार से विवाह का प्रस्ताव पाकर पिता खुश हुए क्योंकि उन्हें गालिम के प्रेम के बारे में पता नहीं था।


पर गालिम ने अपने पिता को सिंगी के प्रति अपने प्रेम की बात बताई। साथ ही इस राज का भी खुलासा किया कि वह गर्भवती है। यह सब कुछ पिता के लिए झकझोर देने वाला था। नाराज पिता ने गालिम को अपने घर से निकाल दिया। इसके बाद गालिम मोचू नदी के तट पर असहाय घूमती रही। इस दौरान वह सिंगी के प्रेम में विरह के गीत गा रही थी। साथ ही वह हर आते जाते लोगों को अपना संदेश गासा में सिंगी तक पहुंचाने के लिए आग्रह करती थी। पर अपने खराब सेहत और गर्भवती शरीर के कारण गालिम जल्द ही बीमार पड़ गई। कहते हैं कि गालिम के साथ संवेदना जताने के लिए मोचू नदी की धारा भी धीमी पड़ गई।
एक राहगीर ने गालिम की हालत देखने के बाद गासा जाकर सिंगी को उसका संदेश सुनाया। गालिम का यह हाल जानकर सिंगी दौडा दौड़ा पुनाखा की ओर चल पडा। पर उस रात गालिम ने एक बुरा सपना देखा। सिंगी के पुनाखा पहुंचने तक गालिम रोते रोते दम तोड़ चुकी थी। गालिम के पास पहुंचने के बाद सिंगी ने भी अपने आखिरी सांस ली। इस तरह दो प्रेमी इस दुनिया में नहीं मिल सके पर दूसरी दुनिया में मिलन के लिए कूच कर गए। 
पर गालिम और सिंगी की प्रेम की दास्तां सुनाता गालिम का घर आज भी अपनी जगह पर मौजूद है। वैसे कई सालों से यह घर खाली है। गालिम के परिवार से जुड़े अगली पीढ़ी के लोग अभी भी इस घर के आसपास के घरों में रहते हैं।  अब भूटान सरकार की योजना गालिम के इस घर को संग्रहालय में तब्दील करने की है। 

भूटान के प्रेमी युगल गालिम के घर को देखने आते हैं और यहां पर साथ जीने-मरने की कसमें खाते हैं।  गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी पर भूटान में दो बार फिल्में भी बन चुकी हैं। साल 2011 में बनी सिंग लेम नामक भूटानी फिल्म  सुपर हिट रही थी।

 विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( PUNAKHA, GALIM AND SINGI LOVE STORY, SING-LEM MOVIE 2011 )