Wednesday, May 30, 2018

भूटान मतलब खुशियों का देश – ग्रॉस नेशनल हैपीनेस

भूटान को खुशियों का देश लैंड ऑफ हैपिनेस कहा जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भूटान एक बहुत छोटा-सा देश है लेकिन इसकी ख्याति इस कारण है कि यह खुशनुमा देश है। ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस' ( जीएनएच) का मंत्र भी यहीं से दुनिया को मिला है। 'ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्शन' यानी जीडीपी के पीछे दौड़ती दुनिया को भूटान ने कुछ अलग संदेश दिया है। यह संदेश है खुश कैसे रहे हैं।  इस देश की सबसे खास बात ये है कि यहां सफलता को जीडीपी के बजाय जीएनएएच (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) यानी खुशियों के हिसाब से नापा जाता है। जीएनएच को भूटान के 2008 में लागू नए संविधान में शामिल किया गया।  
क्या अंधाधुंध प्रगति से खुशियां खरीदी जा सकती हैं। नहीं ना। ऐसा होता चीन के कुछ अतिविकसित बड़े शहरों में हर साल प्रदूषण के कारण कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आती। शानदार सड़के, महंगी गाड़ियां, दिन रात बिजली से चलने वाले ऐश ओ आराम के उपकरण से खुश नहीं रहा जा सकता। असली खुशी तो बेहतर पर्यावरण और प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों के साथ सामंजस्य बिठाकर ही प्राप्त की जा सकती है। हम प्रकृति से मिली सुविधाओं का लाभ तो उठाएं पर उनका अंधाधुंध दोहन न करें।

अमेरिका में रहने वाली लिंडा लेमिंग नब्बे के दशक में भूटान पहुंची तो यहां के लोगों का जीवन देखकर चकित रह गईं। भूटानकी की जीवन शैली से प्रभावित होकर उन्होंने 'मैरिड टू भूटान' नामक पुस्तक लिखी। अब उनकी दूसरी किताब 'अ फील्ड गाइड टू हैप्पीनेस' आई है। इन दोनों किताबों के में उन्होंने भूटान के लोगों की खुशी का रहस्य उजागर किया है। वे कहती हैं कि भूटान के नागरिक जिंदगी को बहुत इत्मीनान और भरपूर तरीके से जिंदगी को जीते हैं और इसलिए वे खुश रहते हैं। बेहतर पर्यावरण के कारण भूटान की हवा में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी अधिक है कि आप पूरे समय तरोताजा महसूस करते हैं।


नो स्मोकिंग कंट्री - हमने भूटान में किसी को सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। हालांकि लोग यहां पूर्वोत्तर राज्यों की तरह तांबुल (सुपारी) खाते हैं। यहां पर तांबुल को दोमा कहते हैं। कुछ लोग चोरी चुपके ड्रग्स भी लेते हैं। युवा पीढ़ी खास तौर पर कुछ ऐसे नशे के गिरफ्त में है।  

गासा में ऑरगेनिक खेती – भूटान में हमें चीन की सीमा क्षेत्र के शहर गासा की कहानी सुनने को मिलती है। वहां आरगेनिक फार्मिंग शुरू की गई है। गासा के किसान कुछ बड़े होटलों को आरगेनिक तरीके से उगाई गई सब्जियां सप्लाई कर रहे हैं। वहां लहसुन, गाजर, आलू आदि की खेती हो रही है। इससे किसानों की आमदनी भी बढ़ी है। भूटान का पड़ोसी भारत का राज्य सिक्किम पूरी तरह आरगेनिक राज्य बन चुका है। अब भूटान भी उसी नक्शेकदम पर है।

चीन से तस्करी - भूटान की बहुत लंबी सीमा चीन के साथ लगती है। चीन हमेशा से भूटान पर अपना वर्चस्व कायम करने की इच्छा भी रखता है। पर भूटान के रिश्ते ऐतिहासिक तौर पर भारत के साथ बेहतर तरीके से जुड़े हैं। हमें भूटान में एक सज्जन बताते हैं कि भूटान को कई बार चीन प्रलोभन देने की कोशिश करता है। हम भारत से आपकी तीन गुनी आर्थिक सहायता करेंगे पर आप हमारे साथ आओ। भूटान तक चीन सड़क बनाने की इच्छा जाहिर करता है। व्यापारिक मार्ग खोलने की बात करता है। पर भूटान की विदेश नीति भारत निर्धारित करता है। भूटान की सरकार कभी चीन के प्रलोभन में नहीं आई। पर भूटान में ये सुनने में आया कि काफी लोग हा  बार्डर की तरफ से चीन जाकर तस्करी करते हैं। इस तस्करी में भारत से चंदन की लकड़ी चीन भेजी जाती है। वहीं चीन से कपड़े और कास्मेटिक जैसे सामान लेकर लोग आते है। लोग हा से पैदल चलकर एक दो दिन में चीन के निकटवर्ती शहर तक पहुंच जाते हैं। कई लोग तो घोड़े से भी चीन जाते हैं। इसमें कई लोग पकड़े भी जाते हैं। सजा भी होती है। फिर छूटने पर इस काम में लग जाते हैं। चीन से इस तरह की तस्करी करके भूटान के पारो शहर के कई लोग करोड़पति बन चुके हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BHUTAN, GROSS NATIONAL HAPPINESS )



Monday, May 28, 2018

कई शादियां कर सकते हैं भूटान के लोग

भूटान के बारे में कई रोचक बातें है इस देश के बारे में। उनमें से एक यह की भूटान के लोग कई शादियां करते हैं। हालांकि अब नए कानून के तहत शादी का प्रमाण पत्र सिर्फ दो शादियों तक का ही मिलेगा। यानी कानून आदमी दो शादियां कर सकता है। बहु पत्नी प्रथा भूटान में कई दशक से चली आ रही है। फुंटशोलिंग से थिंपू जाते समय हमें जो टैक्सी ड्राईवर मिले थे, उन्होंने बताया कि उन्होंने दो शादियां कर रखी हैं। दोनो से उन्हे सात बच्चे हैं।  पर हमारे अगले ड्राईवर की सिर्फ एक ही शादी है। उन्हें अपनी पत्नी से काफी प्रेम है इसलिए दूसरी शादी नहीं की।
हालांकि पहली पत्नी के रहते हुए भूटानी कोई दूसरी शादी करता है तो पहली पत्नी उससे अलग रहने का फैसला ले सकती है। इसके लिए वह अदालत में जाकर गुजारा भत्ता मांग सकती है। यह भत्ता हैसियत के अनुसार मिलता है। पर यह कम से कम 600 रुपये मासिक तो होगा ही। पुनाखा में मिली एक भूटानी शादी शुदा महिला बताती हैं कि कई लोग दूसरी और के मुहब्बत में पड़ कर दूसरी शादी रचाते हैं। पर हम ऐसे पति को चाहें तो छोड़ सकते हैं और गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। मतलब कि महिला अधिकारों के लेकर सरकार के नियम अब सख्त हुए हैं। इसलिए सरकार अब सिर्फ दो पत्नियों की इजाजत देती है। पर कोई भूटानी महिला अपने देश के बाहर के किसी नागरिक से शादी नहीं रचा सकती।
पारो में और पुनाखा में नदी के किनारे बने ग्राउंड पर समूह में काफी लोग तीरंदाजी का मुकाबला करते हुए दिखाई दिए। तीरंदाजी भूटान का राष्ट्रीय खेल है। भूटान के लोग इसमें अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पदक जीत लाते हैं। भूटान मे जगह जगह तीरंदाजी के क्लब बने हुए है। कई जगह लोग तीरंदाजी पर पैसा भी लगाते हैं। यह कुछ कुछ हमारे यहां से सट्टा जैसा ही है।

भूटान में मीडिया – भूटान में मीडिया के नाम पर अंग्रेजी में छपने वाले इक्के दुक्के टेबलायड अखबार हैं। इनमें कुछ राजनीति की तो कुछ विकास की खबरें छपती हैं। एक ऐसा ही अखबार कुंसेल हमें थिंपू में दिखाई दिया। पर अब भूटान में केबल टीवी घर घर पहुंच गया है। केबल पर कुछ भूटान के चैनल हैं। इन चैनलों पर भूटानी फिल्में भी दिखाई जाती हैं।  


सिर्फ प्रेरक फिल्में बनती हैं हां भूटान में फिल्में भी बनने लगी हैं। थिंपू शहर में एक सिनेमा घर भी है। पर भूटान में मार धाड़ और प्यार मुहब्बत वाली फिल्में नहीं बनतीं। शायद सरकार की ओर ऐसी फिल्में बनाने की मनाही हो। इसलिए देश में सिर्फ प्रेरणा देने वाली फिल्में ही बनती हैं।

पर्यटन है बड़ा कारोबार -  भूटान सरकार की आमदनी का बड़ा साधन पर्यटन भी है। हालांकि 1970 के दशक में यहां कोई सैलानी नहीं आता था। पर पिछले दो दशक से यहां टूरिज्म बढ़ा है। टूरिज्म कौंसिल ऑफ भूटान के मुताबिक साल 2017 में भूटान में 2.50 लाख विदेशी सैलानी आए। इनमें 71 हजार विदेशी सैलानी थे। तो 1.83 लाख क्षेत्रीय सैलानी थे। क्षेत्रीय मतलब भारत से जाने वाले। अंतरराष्ट्रीय सैलानियों में सर्वाधिक लोग कोरिया से आए। इनमें 9000 सैलानी ब्रिटेन से आए। भूटान में कई टूर आपरेटर हैं जो विदेशी सैलानियों के लिए पैकेज बेचते हैं। इनमें दैनिक तौर पर गाइड की सेवा भी शामिल होती है।

अनूठा है भूटानी पहनावा- भूटान के ज्यादातर नागरिक और राजघराने के लोग भूटाने पहनावे में नजर आते हैं। पुरुषों के पहनावा का नाम है गो (GHO) और महिलाओं के पहनावा का नाम है कीरा ( KIRA ) राजकीय सेवा में लगे हर कर्मचारी के राजकीय पहनावे में दफ्तर आना अनिवार्य है। अगर कोई आम आदमी सरकारी दफ्तर में आम से जाता है तो भी यही औपचारिक पहनावा जरूरी है। 
यहां तक की टैक्सी ड्राईवर, टूरिस्ट गाईड के लिए भी ये पहनावा जरूरी है। अगर आप राजकीय परिधान में नहीं हैं तो जुर्माना भरने के लिए तैयार रहिए। अगर गो खरीदना चाहते हैं तो बाजार में रेडिमेड मिलता है। कपड़ा खरीदकर सिलाई करवाने में 3500 से अधिक खर्च आता है। भूटान सालों भर ठंड रहती है इसलिए लोग ऊनी कपड़े का परिधान बनवाते हैं जो थोड़ा महंगा पड़ता है। 
- vidyutp@gmail.com

(भूटान का एक अखबार -  http://www.kuenselonline.com/   ये अखबार भी है - http://www.bbs.bt/news/ )


Saturday, May 26, 2018

स्वच्छता की मिसाल पेश करता राजधानी थिंपू

थिंपू भूटान की राजधानी है। हो सकता है यह दुनिया की सबसे साफ सुथरी राजधानियों में शुमार हो। हालांकि मैं भारत के बाहर कम गया हूं फिर भी भूटान के थिंप शहर की स्वच्छता को देखकर ऐसा लगता है। थिंपू शहर वांगचू नदी के किनारे समुद्रतल से 2,400 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। शहर के केंद्र में 4 समानांतर सड़कें हैं। हर सडक के दोनों तरफ पदयात्रियों के लिए फुटपाथ बने हैं। पर इन फुटपाथ पर कहीं भी अतिक्रमण नहीं है।
शहर की स्वच्छता को बरकरार रखने के लिए शहर को पॉलीथीन मुक्त बनाने की कवायद जारी है। थिंपू की मुख्य सड़क पर मुझे एक मशीन दिखाई देती है। यह आटोमेटिक वेंडिग मशीन 5 रुपये का नोट डालने पर एक बैग देती है। इस बैग में आप कुछ भी खरीददारी कर सकते हैं। आधिकारिक तौर पर यहां पॉलीथीन पर प्रतिबंध है।

थिंपू में लगी बैग वेंडिंग मशीन। 
थिंपू शहर में राह चलते आप कहीं भी कचरा नहीं फेंक सकते। अगर फेंक दिया तो सीसीटीवी में कैद हो जाएंगे और आपको जुर्माना भरना पड़ सकता है। पूरे शहर में हर जगह कैमरे लगे हुए हैं। इसलिए सावधान रहिए।

ट्रैफिक नियमों की सख्ती – शहर ट्रैफिक नियमों को लेकर बड़ा पाबंद है। हर जगह सड़क पर पार्किंग के लिए जगह निर्धारित किए गए हैं। कई जगह सड़क पर भी पार्किंग बाक्स बना दिए गए हैं। आप यहां शुल्क देकर अपनी गाड़ी खड़ी कर सकते हैं। इसके अलावा कहीं भी पार्किंग की तो जुर्माना भरने के लिए तैयार रहिए।

पैदल यात्री भी जेब्रा क्रासिंग के अलावा कहीं भी सड़क पार नहीं कर सकते। पर जब आप जेब्रा क्रासिंग पर सड़क पार करने के लिए खडे होते हैं तो दोनों तरफ से आने वाली गाड़ियां पदयात्रियों को देखकर बड़े सम्मान से रूक जाती हैं। चाहे वह कितनी भी महंगी एसयूवी हो या फिर किसी भी स्तर की सरकारी गाड़ी वह पैदल चलने वाले को जेब्रा पर पहले रास्ता देती है। इस समय एक पैदल यात्री के तौर पर भी बड़ी शाही एहसास होता है।


कोरोनेशन पार्क – थिंपू शहर में सुबह की सैर के लिए वांगचू नदी के किनारे बना कोरोनेशन पार्क बेहतरीन जगह है। यह पार्क थिंपू के स्टेडियम के ठीक सामने है। लंबे वर्गाकार पार्क में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। पार्क के अंदर सुनहले रंग की विशाल बुद्ध की प्रतिमा है। यह प्रतिमा मैत्रेय बुद्ध की है। यानी बुद्ध चलायमान मुद्रा में है। भूटान के लोग इसे वाकिंग बुद्धा स्टैचू कहते हैं।

पार्क के अंदर ओपन जिम का भी निर्माण किया गया है। यहां आप सुबह सुबह बिना किसी शुल्क के व्यायाम कर सकते हैं। यहां लगे मशीनों के इस्तेमाल के तरीके की भी जानकारी दी गई है। पार्क में एक फलों के जूस के दुकान भी है। यहां पर लगे एक बोर्ड में फलों के जूस पीने के फायदे भी गिनाए गए हैं।
तो अब पार्क से बाहर चलते हैं। वांगचू नदी के किनारे सुंदर बेंच बनी हैं। यहां बैठ कर सुबह के धूप के मजे लिजिए और नदी के सौंदर्य को निहारिए। वांगचू नदी का जल कल कल बहता हुआ संगीत की स्वर लहरियां उत्पन्न करता है। हमारे होटल भूटान के कमरे में नदी का यह संगीत रात भर सुनाई देता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( THIMPU CITY, BHUTAN ) 
लहरों का संगीत - थिंपू की एक सुबह - वांगचू नदी के किनारे। 


Thursday, May 24, 2018

अच्छा खााओ, पीयो मस्त रहो, खुशियों का देश भूटान

शाकाहारी हैं तो भूटान में घबराएं नहीं - खाने पीने की बात करें तो भले ही भूटान बुद्ध का देश है पर यहां शायद ही कोई शाकाहारी हो। पर अगर आप भूटान की यात्रा पर हैं और शाकाहारी हैं तो घबराने की बात नहीं है। आपका काम चल जाएगा।
वैसे तो ज्यादातर भूटान के लोग सर्वाहारी हैं। भले ही लोग बौद्ध धर्म को मानते हों पर यहां बीफ खुलेआम खाया जाता है। बीफ का मतलब इसमें गोमांस भी शामिल है। हमारे टैक्सी ड्राईवर बताते हैं कि उनकी पत्नी बीफ नहीं खाती। उसे लगता है जिस जानवर का हम दूध पीते हैं उसका मांस कैसे खा सकते हैं। पर भूटान में इस तरह की सोच वाले इक्के दुक्के लोग ही हैं। ज्यादातर लोग गोमांस भी खाते हैं।

संयोग से हम राजधानी थिंपू के जिस होटल में ठहरे उसका रेस्टोरेंट शाकाहारी है। पर यहां कुछ शाकाहारी रेस्टोरेंट में अंडा भी पेश किया जाता है। होटल गासिल के आधार तल पर रिसेप्शन के साथ रेस्टोरेंट हैं। होटल का कुक भारतीय है। यहां पर आपको पंजाबी थाली भी खाने में मिल जाएगी। यहां शाकाहारी थाली 150 रुपये की है। इस थाली में चपाती, चावल, सब्जी, दाल, पापड़, मिठाई आदि सब कुछ है। अनादि को थाली खूब पसंद आई । पंजाबी थाली में तंदूरी रोटी भी मिल जाती है। गासिल खाना हमें इतना पसंद आया कि अगले दो दिन होटल में भूटान  में रुकने के बावजूद हम खाने यहीं आते रहे। होटल भूटान भी शाकाहारी है। पर उस थ्री स्टार होटल का रेस्टोरेंट महंगा है।
सुबह नास्ते में होटल गासिल में पराठे मिल जाते हैं। एक पराठा 50 रुपये का है जो नास्ते के लिए पर्याप्त है। भूटान के ज्यादातर होटल में शराब भी परोसी जाती है।
समोसा भी मिलता है – भूटान के सब्जी बाजार वाली सड़क पर घूमते हुए कुछ सस्ते रेस्टोरेंट नजर आए। पर किसी रेस्टोरेंट में खुले में कुछ रखा हुआ नहीं दिखाई दिया। दरवाजा खोलकर अंदर जाइए तो बैठकर कुछ खा पी  सकते हैं। इनमें सिर्फ एक वेज रिफ्रेशमेंट वाला है। पर कई दुकानों में समोसे मिल जाते हैं। ये समोसा सुबह बनाकर रख देते हैं। दिन भर लोग गर्म करके खाते रहते हैं।

थिंप में पराठा – थिंपू के नोरजिम लाम मुख्य सड़क हमारे ड्राईवर साहब हमें एक पराठे की दुकान पर ले गए। यहां सुबह दस बजे से रात नौ बजे तक पराठा और चाय मिलता है। यह शाकाहारी नास्ता घर है। यहां आप पराठा के अलावा चाउमिन खा सकते हैं। एक पराठा 40 रुपये का है। साथ में वे चटनी देते हैं। दो पराठा खा लें तो भरपेट भोजन हो जाता है। यह खाने के लिए थिंपू में किफायती जगह है। यह पराठे की दुकान होटल नोरलिंग बिल्डिंग के बेसमेंट में है। बेसमेंट कई नास्ता घर है पर इसमें एक ही शाकाहारी नास्ता घर है।


कहीं स्ट्रीट फूड नहीं – पूरे थिंपू शहर मे ठेले वाले खोमचे वाले दिखाई नहीं देते। जो भी खाने नास्ते की दुकाने हैं वह बंद दरवाजे के अंदर है। कहीं खुले मे खाने पीने की कोई चीज बिकती हुई नजर नहीं आती है। फुटपाथ पर खाने पीने के स्टाल न होने के कारण खाना पीना थोड़ा महंगा जरूर है, पर इससे स्वच्छता बनी रहती है। हमारे टैक्सी ड्राईवर बताते हैं कि जब दिन में उन्हें कहीं बाहर खाना होता है तो उनके भी 100 से 150 रुपये खर्च हो जाते हैं।  
सिटी होटल पारो का खाना –  पारो के सिटी होटल के भोजनालय में खाने का अनुभव भी काफी अच्छा रहा। हालांकि यह शाकाहारी नहीं है पर स्वच्छता का स्तर काफी अच्छा है। हमने यहां दो बार फ्राइड राइस तो एक बार बिरयानी और दाल आर्डर करके खाया। खाने पीने की दरें भी वाजिब हैं। वैसे पारो के सबसे किफायती होटल ऑल सीजन्स का भी अपना भोजनालय है।
पुनाखा और पारो के रास्ते में हमें लोबासा के में रेडीमेड पूरियां बिकती हुई दिखाई दीं। यह हमारे यहां के गोलगप्पे का बड़ा रूप है। लोग इसे खरीद लेते हैं और नास्ते में नमक और चटनी के साथ खाते हैं। आप शाकाहारी हैं तो बेकरी से पावरोटी, नमकीन, चावल के मीठे लड्डू ( मुरुंडा या लाई ) आदि  भी खरीद सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( BHUTAN VEG FOOD, PARO, THIMPU, PUNAKHA ) 


Tuesday, May 22, 2018

चिमी लाखांग - लिंग पूजन की अनूठी परंपरा

थिंपू से पुनाखा आते समय पुनाखा से पहले लोबासा में सड़क से लगभग 1 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर यह लहखांग बौद्ध मंदिर एवं मठ स्थित है। पर हम यहां जा रहे हैं पुनाखा से वापसी के समय। शाम के 4 बज गए हैं। पर आज पुनाखा के दर्शनीय स्थलों को देखने की ललक में हम दोपहर का लंच भूल चुके हैं। लोबासा में एक होटल में रुकते हैं हमलोग पर वे बताते हैं कि खाने में कुछ नहीं है। अब हमारे ड्राईवर साहब गाड़ी को बायीं तरह मोड देते हैं। खेतों से होकर घाटियों के बीच सड़क चली जा रही है।


लोबासा गांव में जो भी घर बने हैं उनकी दीवारों में आकर्षक पेंटिंग बनी हैं। पर हम इन पेंटिंग में बड़े बड़े पुरुष जननांग देखते हैं। आखिर ऐसा क्यों। भूटान के इस क्षेत्र में पुरुष जननांग को सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए उसकी पेंटिंग बनी जाती है। इसमें यहां शरमाने जैसी कोई बात नहीं है। चिमी लाखांग से पहले गांव में दोनों तरफ कुछ आर्ट गैलरी हैं। यहां पर थंगक पेंटिंग खरीदी जा सकती है। इसके साथ ही यहां पर लकड़ी के बने हुए मानव लिंग बिक रहे हैं। ये मानव लिंग छोटे बड़े अलग अलग आकार के हैं। कुछ मानव लिंग चाबी के गुच्छे के साथ लगे हैं। फुटपाथ पर सामान बेच रही लड़कियां हमें कुछ खरीदने के लिए कहती हैं। पर हम नहीं खरीद पाते। हल्की बारिश शुरू हो गई है। तेज हवाएं भी चल रही हैं। पर इस सुहाने मौसम में हम चल पड़े हैं चिमी लाखांग की ओर। 


पार्किंग से आधा किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर तक जाना पड़ता है।  
चिमी लाखांग तक मुख्य सड़क से यहां तक आने के लिए पर्यटकों को पगडंडीनुमा रास्ते से हो कर गुजरना पड़ता है जो धान के खेतों के बीच से हो कर जाता है। ये रास्ता बड़ा ही मनोरम है। हल्की बारिश ने सफर का मजा और बढ़ा दिया है। यह बौद्ध मंदिर 15वीं सदी की बौद्ध भिक्षु लामा द्रुकपा कुअनले को समर्पित है। मंदिर में प्रार्थना चक्र घूमाने के बाद हमलोग आगे बढ़ते हैं।
मंदिर परिसर में पूजा हो रही है। हम भी जाकर प्रार्थना में बैठ जाते हैं। पांच मिनट बाद हम उठने वाले हैं। पर बौद्ध भिक्षु हमें मना करते हैं। तो हम बैठे रह जाते हैं। और पांच मिनट बाद भिक्षु एक बाल लामा की ओर इशारा करते हैं। वह हमें आशीर्वाद देने आता है। विशाल हथियार का स्पर्श और विशाल आकार के मानव लिंग का स्पर्श। दरअसल चिमी लाखांग की ये परंपरा है। यहां के आशीर्वाद से लोग मानते हैं कि पौरूष कायम रहता है।

चिमी लाखांग बौद्ध मंदिर का निर्माण 1499 में हुआ था। द्रुपका कुअनले तिब्बती परंपरा के बौद्ध संत थे। वे पश्चिमी तिब्बत से इधर आए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे शराब और महिलाओं की निकटता पसंद करते थे। संत कुअनले ने कविताएं भी लिखी थीं। वे अपने को मुक्त विचारों का योगी कहते थे। उन्होंने माना कि उन्होंने सैकड़ो महिलाओं से संबंध बनाए थे। उनका मानना था कि इस तरह से वे उनकी मदद करते हैं। और यह सब आधात्याम की ओर प्रवृत होने का मार्ग है। वे कहते हैं मैं  शराब, औरत और गीतों के साथ आनंद मनाता हूं। कुअनले कहते हैं – एक युवा महिला प्रेम में आनंद पाती है। एक युवा पुरुष सेक्स में आनंद पाता है। एक बुजुर्ग आदमी अपनी स्मृतियों से आनंदित होता है।
चिमी लाखांग के दर्शन से लौटने के बाद शाम होने लगी है। आगे चलकर लोबासा बाजार में हमलोग एक रेस्टोरेंट में रुकते हैं। वहां पर कुछ वेज मोमोज और काफी का आर्डर करके बैठ जाते हैं। मोमोज थोड़े महंगे जरूर हैं पर उनका स्वाद काफी अच्छा है। थिंपू वापसी से पहले परमिट चेकपोस्ट पर हमारा पुनाखा वाला परमिट जमा करा लिया जाता है।  

-     ---   विद्युत प्रकाश मौर्य
  Email- vidyutp@gmail.com
(CHIMI LHAKHANG, LOBASA, PUNAKHA , LAMA DRUKPA KUNLEY  ) 

Sunday, May 20, 2018

गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी - भूटान के रोमियो जूलियट

पुनाखा में घूमते हुए हम अनायास ही एक प्रेम कहानी में प्रवेश कर गए। गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी वास्तव में भूटान के रोमियो जूलियट की कहानी है।


पुनाखा में हमारी नजर 700 साल पुराने एक मिट्टी के घर पर पड़ी। पुनाखा जोंग से गासा रोड पर एक किलोमीटर आगे नदी के किनारे ती मंजिला मिट्टी का घर दिखाई देता है। तो ये कहानी है गासी लामा सिंगी और चांगुल बूम गालिम की।

हमारे टैक्सी ड्राईवर हमें उस प्रेम कहानी में ले जाते हैं। गालिम पुनाखा के एक अमीर किसान की बेटी थी। नदी के किनारे मिट्टी का एक तीन मंजिला घर जीर्ण अवस्था में दिखाई देता है। अब भूटान सरकार द्वारा इस घर को हेरिटेज साइट का दर्जा दे दिया  गया है।  

यह भूटान की अमर प्रेम कहानी है,जो ज्यादातर भूटानी लोगों की जुबान पर रहती है। गालिम का जो तीन मंजिला घर है यह अपने समय के बड़े अमीर किसान का घर हुआ करता था। सिंगी कौन था। वह तिब्बत सीमा पर बसे गांव गासा के एक साधारण परिवार का युवक था।
पुनाखा में गालिम का पुस्तैनी घर 
तो गालिम और सिंगी में प्यार हो गया। यह एक अमीर और गरीब की प्रेम कहानी थी।कहते हैं गालिम बला की खूबसूरत थी। तो गालिम पर इस इलाके के जमींदार देब का दिल आ गया। उसने गालिम से विवाह करने की इच्छा अपने एक सहायक के समक्ष जताई। उस सहायक को गालिम और सिंगी के प्रेम के बारे में जानकारी थी। इसलिए उसने सिंगी को गालिम से दूर करने की साजिश रची। सिंगी को किसी काम से गासा भेज दिया गया। इसके बाद देब से गालिम से विवाह का प्रस्ताव उनके पिता को भेजा। एक बड़े जमींदार से विवाह का प्रस्ताव पाकर पिता खुश हुए क्योंकि उन्हें गालिम के प्रेम के बारे में पता नहीं था।


पर गालिम ने अपने पिता को सिंगी के प्रति अपने प्रेम की बात बताई। साथ ही इस राज का भी खुलासा किया कि वह गर्भवती है। यह सब कुछ पिता के लिए झकझोर देने वाला था। नाराज पिता ने गालिम को अपने घर से निकाल दिया। इसके बाद गालिम मोचू नदी के तट पर असहाय घूमती रही। इस दौरान वह सिंगी के प्रेम में विरह के गीत गा रही थी। साथ ही वह हर आते जाते लोगों को अपना संदेश गासा में सिंगी तक पहुंचाने के लिए आग्रह करती थी। पर अपने खराब सेहत और गर्भवती शरीर के कारण गालिम जल्द ही बीमार पड़ गई। कहते हैं कि गालिम के साथ संवेदना जताने के लिए मोचू नदी की धारा भी धीमी पड़ गई।
एक राहगीर ने गालिम की हालत देखने के बाद गासा जाकर सिंगी को उसका संदेश सुनाया। गालिम का यह हाल जानकर सिंगी दौडा दौड़ा पुनाखा की ओर चल पडा। पर उस रात गालिम ने एक बुरा सपना देखा। सिंगी के पुनाखा पहुंचने तक गालिम रोते रोते दम तोड़ चुकी थी। गालिम के पास पहुंचने के बाद सिंगी ने भी अपने आखिरी सांस ली। इस तरह दो प्रेमी इस दुनिया में नहीं मिल सके पर दूसरी दुनिया में मिलन के लिए कूच कर गए। 
पर गालिम और सिंगी की प्रेम की दास्तां सुनाता गालिम का घर आज भी अपनी जगह पर मौजूद है। वैसे कई सालों से यह घर खाली है। गालिम के परिवार से जुड़े अगली पीढ़ी के लोग अभी भी इस घर के आसपास के घरों में रहते हैं।  अब भूटान सरकार की योजना गालिम के इस घर को संग्रहालय में तब्दील करने की है। 

भूटान के प्रेमी युगल गालिम के घर को देखने आते हैं और यहां पर साथ जीने-मरने की कसमें खाते हैं।  गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी पर भूटान में दो बार फिल्में भी बन चुकी हैं। साल 2011 में बनी सिंग लेम नामक भूटानी फिल्म  सुपर हिट रही थी।

n विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( PUNAKHA, GALIM AND SINGI LOVE STORY, SING-LEM MOVIE 2011 ) 

Friday, May 18, 2018

मीठे पानी और बलखाती नदियों का देश- भूटान

पुनाखा में पो चू और मो चू नदियों का संगम 
पुनाखा में हमलोग सस्पेंसन ब्रिज देखने जा रहे हैं। वैसे तो भूटान में नदियों पर कई जगह झूला पुल बने हैं पर यह झूला पुल कुछ खास है इसलिए पुनाखा आने वाले सैलानी इस पुल को देखने जाते हैं। यह भूटान का सबसे लंबा सस्पेंस ब्रिज है। पोचू नदी पर बने इस पुल की लंबाई 180 मीटर है। इस पुल का इस्तेमाल स्थानीय लोग अपने गांव जाने के लिए शार्टकट के तौर पर करते हैं। पुल पर सिर्फ पैदल पार किया जा सकता है। पर पुल से नदी का बड़ा ही दिलकश नजारा दिखाई देता है। तो न सिर्फ विदेशी सैलानी बल्कि स्थानीय लोग भी इस पुल को देखने के लिए पहुंचते हैं।

सस्पेंसन ब्रिज के बिल्कुल पास तक टैक्सियां नहीं जाती। पुल से एक फर्लांग पहले पार्किंग में टैक्सी रुक जाती है। हमलोग पैदल चलकर पुल तक जाते हैं। झूलते पुल पर इस पार से उस पार जाना बड़ा रोमांचक है। पुल के उस पार पर्वत की चोटियां दिखाई देती हैं। यह पुल पो चू नदी पर है। हमारे अलावे भी कई लोग इस झूलते पुल का आनंद लेने आए हैं। दोपहर में पिकनिक सा वातावरण है।

मो चू और पो चू नदियां आगे बन जाती हैं संकोश - पुनाखा जोंग के पास ही पोचू और मोचू नदियों का संगम है। दरअसल भूटान की भाषा जोंखा में चू का मतलब नदी या पानी होता है। मो चू नदी भूटान और तिब्बत की सीमा पर गासा से निकलती है। भूटान में इसे मदर रिवर यानी स्त्रीलिंग मानते हैं। जबकि पो चू को पुरुष नदी माना जाता है। पुनाखा तक आने के बाद मो चू और पो चू नदियों का संगम हो जाता है। आगे इसमें दांग चू नदी का भी मिलन हो जाता है। इसके बाद इसका नाम पूना त्सांग चू हो जाता है। पूना त्सांग चू नदी कालिखोला में भारत के असम में प्रवेश कर जाती है। भारत में इसका नाम संकोश हो जाता है। संकोश नदी आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। पुनाखा आने वाले सैलानी पो चू और मो चू नदियों में रिवर राफ्टिंग का खूब मजा लेते हैं।

आमो चू बन जाती है तोरसा -  भूटान की एक ओर प्रमुख नदी आमो चू है जो भारत में आकर तोरसा नाम से जानी जाती है। फुंटशोलिंग, जयगांव जैसे शहर तोरसा नदी के किनारे हैं। आमो चू नदी तिब्बत के चुंबी घाटी से निकलती है। यह 113 किलोमीटर चीन में, 145 किलोमीटर भूटान में बहने के बाद भारत में प्रवेश करती है। बाद तोरसा नदी बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है जहां यह कालजानी नाम से जानी जाती है। वहीं इसका मिलन ब्रह्मपुत्र में हो जाता है। फुंटशोलिंग में आमो चू नदी में क्रोकोडाईल ब्रिडिंग सेंटर का निर्माण किया गया है।

थिंपू शहर और वांग चू (रैदक और दूधकुमार ) नदी – भूटान की राजधानी थिंपू वांग चू नदी के किनारे बसा है। हिमालय से निकलने वाले वांग चू नदी राजधानी थिंपू होती हुई आगे बढ़ती है। चूजोंग में इसमें पारो की ओर से आने वाली पारो चू नदी मिलती है। संगम के बाद यह नदी थिंपू –फुंटशोलिंग राजमार्ग के साथ साथ आगे चलती है। भूटान में चुखा में इस पर 336 मेगावाट का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट का निर्माण किया गया है। भारत में जलपाईगुड़ी जिले में प्रवेश के बाद इसका नाम रैदक हो जाता है। भारत में प्रवेश के समय इसकी चौड़ाई महज 90 मीटर है। बांग्लादेश में प्रवेश करने पर यह दूध कुमार के नाम से जानी जाती है। वांग चू (रैदक) का मिलन भी आगे ब्रह्मपुत्र में हो जाता है।

भूटान में इन सभी नदियों का जल जहां भी नजर डालते हैं सीसे की तरह साफ नजर आता है। पर थिंपू शहर में बस स्टैंड के पास शहर का कचरा इस नदी में मिलता है तो पानी मटमैले पीले रंग का हो जाता है। पर भूटान के ज्यादातर इलाकों में नदियों में प्रदूषण का असर नगण्य है। इसलिए पानी की स्वच्छता उत्तम श्रेणी की है।
चूजोंग में पारो और वांगचू नदी का संगम 
सचमुच हम कितने गरीब हैं... पारो जाते हुए हमारे टैक्सी ड्राईवर मुझसे सवाल पूछते हैं। सुना है तुम्हारे भारत में पानी जमीन के नीचे हैंडपंप से निकालते हैं। मैं कहता हूं, हां पर इसमें क्या अचरज की बात है। वे कहते हैं- हमारे यहां तो कहीं भी ऐसे हैंड पंप नहीं है। सभी जगह पहाड़ों से बहता हुआ स्प्रिंग वाटर (झरने का पानी) हमें सुलभ है। उनकी बात सुनकर मैं चौंक जाता हूं। तब ये एहसास होता है कि पानी के मोर्चे पर हम कितने गरीब हैं। हां वाकई गरीब ही तो हैं। 200 फीट की बोरिंग कराने के बाद भी तो वैसा पानी नहीं आता जो पीने लायक भी हो।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( PO CHU, MO CHU RIVER, WANG CHU, PARO CHU, SANKOSH , TORSA RIVER ) 

Wednesday, May 16, 2018

खुमसुम स्तूप मतलब भूटान का गोल्डेन टेंपल

पुनाखा जोंग के दर्शन के बाद हमलोग आगे निकल पड़े हैं गासा रोड पर। कोई 7 किलोमीटर जाने के बाद पोचू नदी पर रिवर राफ्टिंग प्वाइंट आता है। एक दल राफ्टिंग के लिए तैयार है। उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है। यहां राफ्टिंग का शुल्क 8 लोगों के लिए 8 हजार है। पर इन दिनों कम सैलानी होने के कारण 5 हजार में भी हो जा रहा है। पर हमें तो राफ्टिंग नहीं करना। हम चल रहे हैं खुमसुम यूली नामाग्लाय छोटेन जोंग की ओर। इसे स्थानीय लोग गोल्डेन टेंपल के नाम से भी जानते हैं क्योंकि इसके कलश में सोना मढ़ा गया है। ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस जोंग तक जाने के लिए 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।


टैक्सी ड्राईवर ने गाड़ी पार्किंग में लगाई। हमलोगों ने एक सुंदर सस्पेंसन ब्रिज से मोचू नदी पार किया और चल पड़े मंदिर की ओर। पहले 500 मीटर का रास्ता हरे भरे खेतों से होकर गुजरा। इसके बाद शुरू हुई चढ़ाई। आधी चढ़ाई के बाद क साईन बोर्ड नजर आया जिससे पता चला कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। करीब 45 मिनट की चढ़ाई के बाद हम मंदिर पहुंच गए हैं। यहां से मोचू नदी का नजारा बड़ा भव्य दिखाई दे रहा है।


खुमसुम छोटेन का निर्माण 2004 में कराया गया। यह येपाइसा गांव में स्थित है। यह एक नया बौद्ध स्तूप है। रानी मां आशी शेरिंग योंगदान वांगचुक द्वारा इस भव्य स्तूप का निर्माण कराया गया है। हरित परिसर में बना यह स्तूप तीन मंजिला है। जब हमलोग परिसर में पहुंचे हैं तो स्तूप बंद है, पर 10 मिनट के इंतजार के बाद खुल गया। परिसर में एक बोधि वृक्ष भी लगाया गया है। वृक्ष के नीचे ध्यानरत बुद्ध की प्रतिमा भी है।  

स्तूप की आंतरिक सज्जा शानदार है। इसे भूटान को बुरी आत्माओं के कहर से बचाने के निमित्त बनवाया गया है। स्तूप के अंदर तीनों मंजिलों पर अति सुंदर मूर्तियां बनी हैं।
स्तूप के परिसर में अलग अलग स्थलों से आए लामा दिखाई दे रहे हैं। कुछ विदेशी नागरिक भी स्तूप देखने आए हैं। वैसे पुनाखा आने वाले कम ही लोग इस स्तूप तक आते हैं। पर अगर आप ट्रैकिंग के शौकीन हैं तो यहां जरूर पहुंचे। पारो के टाइगर नेस्ट की तुलना में यहां की चढ़ाई काफी कम है। पर स्तूप की तीसरी मंजिल के चौबारे से चारों तरफ का नजारा बड़ा शानदार दिखाई देता है। इस स्तूप तक एक रोपवे का भी निर्माण कराया गया है। पर वह सिर्फ सामान ढुलाई के लिए है। 
वैसे  तो ऐसे स्थलों पर पदयात्रा करके आने का अपना अलग आनंद है। आप प्रदूषण मुक्त वातावरण में प्रकृति संग संवाद करते हुए बढ़ते है।
स्तूप तक चढाई की तुलना में उतरने में हमें काफी कम समय लगा। हमलोग लगभग दौड़ते हुए उतर गए। सड़क पर आने पर पता चला कि इस बीच ड्राईवर महोदय दोपहर का लंच कर चुके हैं। पर हम सुबह के नास्ते के बाद लगातार घूम रहे हैं, सिर्फ जूस पीकर और गाजर खाकर। राफ्टिंग वाला दल नदी में उतर चुका है। हम चल चुके हैं अगली मंजिल की ओर।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - लिखें - vidyutp@gmail.com 
(KHUMSUM YULLEY NAMAGYAL CHOTEN, YEPAISA PUNAKHA )



Monday, May 14, 2018

भूटान का शाही बौद्ध मठ – पुनाखा जोंग


दोचुला पास से चलने के बाद पुनाखा से पहले गुरुथांग नामक कस्बा आता है। यह मोचू नदी के किनारे है। भले पुनाखा भूटान की प्राचीन राजधानी थी, पर यहां शहर बाजार के नाम पर कुछ दिखाई नहीं देता। गुरुथांग बाजार से 5 किलोमीटर आगे जाने पर पोचू और मोचू नदियों के संगम पर पुनाखा जोंग दिखाई देता है। यह भूटान का शाही बौद्ध मठ है। जोंग नदी के उस पार है। जाने के लिए नदी पर पुराना लकड़ी का पुल बना हुआ है। यह पुल बड़ा ही सुंदर है। पुल से पानी में मछलियों को देखा जा सकता है।

जोंग में प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को 300 रुपये का टिकट लेना अनिवार्य है। अनादि को स्टूडेंट होने के नाम पर 150 रुपये का डिस्काउंट वाला टिकट मिल गया। छात्र डिस्काउंट के लिए आईडी कार्ड होना जरूरी है।
टिकट लेकर लकड़ी के सुंदर पुल को पार कर हम पुनाखा जोंग के परिसर में पहुंच गए हैं। कोई 20 सीढ़ियां चढ़ने के बाद मठ का विशाल प्रवेश द्वार है। दोनों तरफ दो विशाल धर्म चक्र और दीवारों पर बुद्ध के जीवन कथा से जुडी विशाल पेंटिंग।

इसके बाद हम विशाल आंगन में पहुंच गए हैं। टिकट चेक करने वाले हमें बताते हैं कि इस जोंग के आंतरिक हिस्से में तीन भाग हैं इसमें आप पूजा स्थल और बौद्ध भिक्षु निवास क्षेत्र में नहीं जा सकते। मुख्य मंदिर और उसके आंगन क्षेत्र में घूम सकते हैं।
पुनाखा जोंग का निर्माण 1637-38 में प्रथम रिनपोछे नागवांग नामग्याल द्वारा करवाया गया। यह भूटान का तीसरा सबसे पुराना और दूसरा सबसे बड़ा जोंग माना जाता है।
वास्तव में पुनाखा जोंग भूटान के राजघराने का प्रशासनिक केंद्र 1955 तक हुआ करता था। इसके बगल में ही भूटान का पुराना राजमहल स्थित है। 1955 में राजधानी थिंपू में जाने के बाद भी इस जोंग का महत्व बना हुआ है।
मुख्य मंदिर के अंदर गौतम बुद्ध आचार्य पद्म संभव और नागवांग नामग्याल की प्रतिमाएं हैं। बड़ी संख्या में थंगक पेंटिंग हैं। आंतरिक फोटोग्राफी निषेध है। पर मंदिर की सजावट भव्य है।
नागवांग नामाग्याल को बोरार्ड लामा के रूप में जाना जाता है। वह एक एक तिब्बती बौद्ध लामा थे। उन्हें एक राष्ट्र राज्य के रूप में भूटान के एकीकरण के लिए जाना जाता है। साल 1651 में पुनाखा में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस जोंग में उनकी कुछ स्मृतियां संरक्षित हैं।

पुनाखा जोंग में 400 बौद्ध भिक्षु रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या में  बाल लामा है। एक मंदिर के प्रभारी के तौर पर तैनात 13 साल के लामा से मेरी बात हुई। बताया कि उनके पिता पुलिस में हैं। कभी कभी मिलने आते हैं। उन्होंने मेरे बेटे अनादि से मिलने की इच्छा जताई। बाद में प्रसाद के तौर पर कई सामग्री दी। चाउमिन, केले, चिप्स और बिस्कुट। हमने उन्हे बुद्धा का आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लिया।
जिस समय हमलोग पुनाखा जोंग में पहुंचे है, भूटान के राजा की दादी यानी तीसरे राजा की पत्नी भी विशेष पूजा के लिए आई हैं। हमें उन्हें उनके दर्शन का सौभाग्य मिला। उनकी उम्र 100 साल के आसपास होगी। उनकी सुरक्षा में तैनात भूटान पुलिस के युवा वरिष्ठ अधिकारी से हमारी बात हुई। वे भारत के हैदराबाद में सरदार बल्लभभाई पटेल पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले चुके हैं। वहीं जहां भारत के सभी आईपीएस भी एक साल का प्रशिक्षण पाते हैं।


भूटान के हर राजा की शादी पुनाखा के जोंग में होती है। साल 2013 में भी जिग्मे खेशर की शाही शादी के लिए राजधानी थिंपू से 71 किलोमीटर दूर पुनाखा में 17वीं शताब्दी के एक किले को पहले दुल्हन की तरह सजाया गया। शाही शादी में करीब1500 लोग इक्ट्ठा हुए। शाही शादी में 100 बौद्ध भिक्षुओं की विशेष प्रार्थना के साथ आरंभ हुई। शादी सुबह चार बजे से शुरू होकर करीब दो घटे तक चली। शादी के बाद नरेश और महारानी ने किले के बाहर एक मैदान में जमा हजारों लोगों के साथ मिलकर नृत्य किया। शादी के जश्न में आए लोगों को भूटान की 20 घाटियों से आए 60 बेहतरीन रसोईयों के हाथों का बना हुआ पारंपरिक भूटानी भोजन परोसा गया।
--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PUNAKHA DZONG, BHUTAN ) 


Saturday, May 12, 2018

भूटान में 1998 में लोकतंत्र की बयार शुरू हुई

खूबसूरत देश भूटान में इंग्लैंड की तरह गणतंत्र और पारंपरिक राजतांत्रिक शासन पद्धति है। लंबे समय से राजा के शासन के बाद इस देश में 1998 में लोकतंत्र की बयार शुरू हुई। भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंगे वांगचुक ने देश में जनता का शासन लाने का फैसला किया। इसके लिए क्रमबद्ध तरीके से लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई। अब भूटान में डुअल सिस्टम ऑफ गवर्नमेंट चलता है। यहां लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री भी हैं लेकिन साथ ही देश का राजा भी होता है। 

जिग्मे सिंगे शासनकाल में ही भूटान में इंटरनेट और टेलीविजन को 1999 में ही इजाजत दी गई थी। 1970 में पहली बार किसी विदेशी पर्यटक को यहां आने की इजाजत दी गई थी। भूटान शासन के लिहाज से 20 जिलों में विभाजित है।
2001 में तत्कालीन नरेश जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने दैनिक कामकाज का दायित्व निर्वाचित मंत्रिपरिषद को सौंपा था। साल 2006 में अपने बेटे के पक्ष में गद्दी त्याग दी। चौथे भूटान नरेश ने ही देश को लोकतंत्र बनाने का फैसला किया। उन्हीं की पहल पर 2008 में चुनाव कराए गए।

भूटान की संसद यानी शोगडू में कुल 154 सीटे होती हैं। इसमे स्थानीय रूप से चुने गए प्रतिनिधि (105), धार्मिक प्रतिनिधि (12) और राजा द्वारा नामांकित प्रतिनिधि (37) होते हैं।

अब राजा भी हटाया जा सकता है - हालांकि भूटान में राजा का पद वंशानुगत चला आ रहा है लेकिन नए संविधान के मुताबिक भूटान के संसद शोगडू के दो तिहाई बहुमत द्वारा राजा को हटाया भी जा सकता है। भूटान का संविधान काफी प्रगतिशील है। इसमें देश में हमेशा 60 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र रखने का संकल्प लिया गया है। भूटान दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश भी है। मतलब ये जितना कार्बन डाईऑक्साइड बनाता है, उससे ज्यादा अवशोषित करता है।
2008 में पहला चुनाव - भूटान में पहले आम चुनाव 2008 में कराए गए थे। इसमें सिर्फ दो पार्टियों ने ही हिस्सा लिया था और राजशाही से संबंधित भूटान पीस एंड प्रॉसपैरिटी पार्टी (डीपीटी) चुनाव जीत गई थी। तब जिग्मे थिनले प्रधानमंत्री बनाए गए थे। वे 2013 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

2013 में दूसरा चुनाव - पर 2013 में दूसरा चुनाव विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रिटिक पार्टी ने जीता। इसके बाद भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे बनाए गए। वे कई बार भारत की यात्रा पर आ चुके हैं।

2018 में तीसरा चुनाव - 2018 भूटान का चुनावी साल है। देश में तीसरी बार चुनाव प्रक्रिया शुरू की गई। नेशनल काउंसिल के लिए 20 अप्रैल को वोट डाले गए। मार्च 2018 में जब हम भूटान की सड़कों पर घूम रहे थे, तो कई जगह लगे बोर्ड पर भूटान के चुनाव की जानकारी चस्पा की गई थी। साथ ही लोगों से वोट डालने की अपील की गई थी।

20 अप्रैल 2018 को भूटान नेशनल काउंसिल के लिए मतदान हुए।
4.32 लाख मतदाता थे कुल देश में। इसमें महिला मतदाता  51 फीसदी हैं (2,20,881) 
127 कुल उम्मीदवारों में महिला उम्मीदवार सिर्फ 6 चुनाव लड़ी। 19 मार्च पर्चा दाखिल करने की आखिरी तारीख थी।

88,915 मतदाता ऐसे हैं जो डाक से वोट डालने वाले रहे, इनमें  1,964 भूटान के मतदाता विदेश में थे।
2008 में 3.12 लाख, 2013 में 3.79 लाख मतदाता थे।
2,000 मतदाताओं के साथ गासा सबसे छोटा चुनाव क्षेत्र है।
05 पंजीकृत दल मैदान में – बीकेपी , डीसीटी , डीएनटी , पीडीपी, डीजीटी आदि। 2018 में भूटान हैपीनेस पार्टी मतलब डीजीटी भी मैदान में उतरी ।
 --- vidyutp@gmail.com
( BHUTAN, ELECTION , 2008, 2013, 2018 )