Wednesday, May 2, 2018

फुंटशोलिंग थिंपू मार्ग पर सबसे ऊंचा प्वाइंट - चापचा


फुंटशोलिंग से थिंपू के मार्ग पर अगला कस्बा आता है चापचा। यहां पहुंचने के साथ ही फुंटशोलिंग से 120 किलोमीटर दूर आ चुके हैं हमलोग। यानी आधे  से ज्यादा सफर पूरा हो चुका है। चापचा 8163 फीट की ऊंचाई पर थिंपू मार्ग का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इसलिए यहां ठंड सबसे ज्यादा लगती है। चापचा के आसपास के रास्ते भी अपेक्षाकृत खतरनाक हैं। यहां कई तीखे मोड़ आते हैं।  नदी के किनारे पहाड़ों को काटकर रास्ता बनाया गया है।




एक तरफ सुहानी सी दरिया जो इठलाती हुई बह रही है, दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़। बीच में गुजरती सर्पिली सड़क।  हम ही नहीं  रास्ते भी चल रहे हैं। इसी बीच अचानक मौसम ने करवट ली है। आसमान में बादल छा गए हैं और हल्की बारिश होने लगी है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी रोककर छत पर रखे हमारे लगेज को प्लास्टिक की शीट से ढक दिया। उन्हें हम सबके सामान की पूरी फिक्र है। इसके बाद फिर शुरू हुआ आगे का सफर।
 


चापचा के पास आखिरी चेकपोस्ट आया जहां हमारे परिमट की एक बार फिर चेकिंग और एंट्री हुई। इस परमिट दफ्तर में सारी अधिकारी महिलाएं  हैं।  उनकी सरकारी वर्दी  काफी आकर्षक है। हमलोग फिर आगे चल पड़े हैं। इसके बाद आया वत्सा। वत्सा से थिंपू 54 किलोमीटर रह गया है। शाम गहराने लगी है। अब हमलोग अब पहुंच गए दामाचू जहां से 36 किलोमीटर दूरी रह गई है थिंपू शहर की। दूरी घटने के साथ हमारा रोमांच बढ़ता जा रहा है।

थिंपू के मार्ग पर अगला पड़ाव चूजोम है। चूजोम में पारो चू और वांग चू नदियों का संगम है। यहां से एक रास्ता पारो और एक रास्ता हा ( चीन सीमा)  के लिए अलग होता है। इसलिए थिंपू के मार्ग पर चूजोम बड़ा जंक्शन है। यहां से थिंपू 28 किलोमीटर रह गया है। चौड़ी सड़क पर गाड़ी सरपट भाग रही है। शहर से 7 किलोमीटर पहले प्रवेश द्वार आया जिस पर लिखा है वेलकम टू थिंपू।




इसके आगे शहर शुरू हो गया।   एक विशाल हाथी की मूर्ति ने हमारा स्वागत किया।   परिवेश देखकर ही लग रहा है कि हम किसी साफ सुथरे शहर में प्रवेश कर रहे हैं।  शहर के बाहरी इलाके में नए नए भवनों का निर्माण जारी है। पर इन सबके डिजाइन में एक साम्यता दिखाई दे रही है।  शहर की सड़कें चौड़ी हैं।  नदी का पुल करके हमलोग शहर के ह्रदयस्थली की ओर पहुंच रहे हैं।


करीब छह घंटे का यह  सफर  बड़ा   मनभावन रहा।  अनादि को भी इस सफर में खूब मजा आया।  पर हमलोग अब थोड़े थक भी चुके हैं। हमारे टैक्सी ड्राईवर  हमें भूटान घूमने में किसी भी तरह की मदद के लिए  अपनी ओर से ऑफर करते हैं।  उन्होने कहा कि मैं टैक्सी दिला दूंगा। आप मुझे फोन करना। हमने उनका नंबर ले लिया है।  क्या पता हमें उनकी जरूरत ही पड़ जाए। 



शाम के छह बजे हमलोग भूटान की राजधानी थिंपू के क्लॉक टावर स्कावायर पहुंच चुके हैं।  टैक्सी  वाले को हमने  धन्यवाद कहा।  हमारा होटल गासिल सामने ही है। अपना सामान लेकर टहलते हुए ही हमलोग होटल के रिसेप्शन पर पहुंच गए।   यहां होटल के प्रोपराइटर सोनम दोरजी ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया, वेलकम टी के साथ। उनकी यह चाय हर  होटल में आने वाले के लिए निःशुल्क है। उसके बाद जो हमें कमरा आवंटित किया वह तीसरी मंजिल पर है। 


होटल में काम करने वाली 20 साल की बाला कर्मा हमारा सामान लेकर कमरे तक छोड़ने आई। कर्मा कामकाज में गजब फुर्तीली है। वह हमें साबुन, तौलिया देने के लिए तीन बार दौड़ती हुई तीन मंजिल तक सीढ़ियां चढ़कर उपर आई। पर किसी से कोई शिकायत नहीं। होटल के कमरे की खिड़कियां सड़क की ओर मुखातिब है। कमरे से शहर के घंटा घर स्क्वायर का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है।  रात का  भोजन गासिल होटल के डायनिंग हॉल में लेने के बाद हमलोग जल्द ही सो गए। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )

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