Monday, April 23, 2018

ऐतिहासिक बाघ पुल से जयगांव की ओर

गंगटोक से वापसी के बाद हमारा भूटान जाने का कार्यक्रम है। इसके लिए बंगाल के जयगांव शहर पहुंचना है। हम टैक्सी से सिलिगुड़ी जाने के बजाय बाघ पुल पर ही उतर गए हैं। गंगटोक में ही हमें टैक्सी ड्राईवर मधुकर जी ने बताया था कि अगर आप भूटान के शहर फुंटशोलिंग, जयगांव बार्डर जाना जाहते हैं तो आपको गंगटोक से सिलिगुड़ी जाने की जरूरत नहीं है। आप लोग सिलिगुड़ी से 30 किलोमीटर पहले बाघ पुल पर ही उतर जाना। बाघ पुल नाम सुनकर हमलोग थोड़ा चौंके जरूर थे। इसलिए इस नाम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई थी।

मधुकर जी ने बताया था कि सिलिगुड़ी से जयगांव की तरफ जाने वाली सभी बसें इस पुल से होकर गुजरती हैं। यहीं से गाड़ी बदल लेने से आपका समय और पैसा दोनों बचेगा। और सचमुच हमारे दो घंटे की बचत हुई। साथ ही हमारे 200 से ज्यादा रुपये भी बच गए। गंगोटक से बाघ पुल बस का किराया 140 रुपये लगे। जबकि बाघ पुल से जयगांव का किराया 100 रुपये ही लगे।
1941 में बना बाघ पुल -   अब बात इस पुल की। बाघ पुल यानी कोरोनेशन ब्रिज। यह ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल है। इसे सेवक ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है। तीस्ता नदी पर बने इस पुल के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बाघ की प्रतिमाएं लगी हैं इसलिए इसे बाघ पुल कहते हैं। नेशनल हाईवे नंबर 31 पर बना यह पुल बंगाल के दार्जिलिंग और जलपाई गुड़ी जिले को जोड़ता है। यह बंगाल के दुआर्स इलाके का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है।   

भला बाघ पुल ही क्यों। आपको पता ही होगा कि बंगाल का बाघ से खास रिश्ता है। रायल बंगाल टाइगर की नस्ल बंगाल के जंगलों में ही निवास करती है। इस रिश्ते के कारण ही कदाचित इस पुल पर बाघों की विशाल प्रतिमा बनाई गई होगी। ब्रिटिश काल में बने कई पुल बड़े कलात्मक है। 

इंजीनयरिंग का अदभुत नमूना -  इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ था। किंग जार्ज पंचम और महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहण की याद में इस पुल को नाम मिला था कोरोनेशन ब्रिज। पुल 1941 में बन कर तैयार हुआ। इस आकर्षक पुल के निर्माण में तब 4 लाख रुपये का खर्च आया था। तब 1937 में बंगाल के गवर्नर जॉन एंडरसन ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। इस पुल का निर्माण मुंबई की कंपनी जेसी गैमन ने किया था। पुल को अगर आप दूर से देखें तो भी ये बड़ा कलात्मक नजर आता है।

बिना स्तंभों का पुल - इस पुल के निर्माण में किसी पिलर का इस्तेमाल नहीं किया गया है। तीस्ता नदी की तेज धारा के कारण ऐसा करना मुश्किल था। इसलिए इसमें आर्च इसतर बनाया गया है कि पुल का पूरा भार दोनों तरफ आ जाता है।  

स्थानीय लोग इसे कोरोनेशन ब्रिज न कहकर बाघ पुल ही कहते हैं। भारत सरकार ने बाघ पुल को हेरिटेज ब्रिज का दर्जा दिया हुआ है। बाघ पुल के सामने तीस्ता नदी पर रेलवे का भी पुल बना हुआ है।
बाघ पुल के पास ही सेवक में मां काली का भी एक प्रसिद्ध मंदिर है। अगर समय हो तो आप वहां दर्शन करने जा सकते हैं। जब आप सिलिगुड़ी से गंगटोक जा रहे होते हैं तो आपको ये पुल दाहिनी तरफ बाघ पुल दिखाई देता है। हालांकि तब आप इस पुल को पार नहीं करते। पर हमलोग तो आज के सफर में इस पुल से होकर गुजरने वाले हैं। 

अपनी बस के इंतजार के दौरान हमलोग बाघ पुल के फुटपाथ पर खड़े होकर चना जोर गरम खा रहे हैं। इसी बीच एक बस सिलिगुड़ी की तरफ से आकर बाघ पुल के बीचों बीच रुकी। हमारे जनाजोर गरम वाले ने कहा इस बस पर आपलोग चढ़ जाएं। पर ये बस जयगांव तक नहीं बल्कि बीरपाड़ा तक ही जा रही है। बस के कंडक्टर ने बताया कि बीरपाड़ा से जयगांव की बस मिल जाएगी। बस में जगह भी नहीं है। पर कंडक्टर महोदय भरोसा दिलाते हैं कि आगे जगह मिल जाएगी, तो हमलोग बस में बैठ जाते हैं। हमने अपना सामान बस की छत पर रखवा दिया है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmal.com 
     ( BAGH PUL, TEA GARDEN, TISTA RIVER, DARJEELING, ALIPUR DUAR ) 
(आगे पढ़ें - दुआर्स के चाय बगानों से होकर गुजरते हुए ) 
सेवक स्थित मां काली का मंदिर। 

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