Tuesday, April 17, 2018

लाचुंग घाटी की सुहनी सुबह - बर्फ की घाटी की ओर


लाचुंग घाटी में मैं सुबह पांच बजे ही जग गया। रात में अंधेरे में नींद अच्छी आ गई थी। अब धीरे-धीरे उजाला हो रहा है। घाटी की सुबह देखने के लिए मैं नदी के किनारे टहलने निकल पड़ा। बर्फ से ढकी चोटियां चमकती हुई नजर आ रही हैं। उन पर सूर्य की रोशनी पड़ने के साथ उनकी चमक और बढ़ जाती है। इससे पहाड़ों की चोटियां और सुंदर लगने लगी हैं। 



नदी के किनारे सुबह-सुबह एक भूटिया महिला टैक्सी का इंतजार कर रही है। लाचुंग इलाके में भूटिया जनजाति के लोग सबसे ज्यादा हैं। वह मेरा फोन लेकर कुछ नंबर मिलाती है। थोड़ी कोशिश करने के बाद उसकी टैक्सी वाले बात हो जाती है।  बात कराने के लिए उसने मुझे धन्यवाद कहा।  उस महिला ने कहा कि सुबह 4 बजे से ही आकर गंगटोक की तरफ जाने वाली टैक्सी का इंतजार कर रही है।



पहाड़ों पर सीमित गाड़ियां ही संचालित होती हैं, इसलिए यहां सार्वजनिक परिवहन से सफर करना भी कोई आसान काम नहीं होता। सुबह-सुबह मुझे लाचुंग वैली का जूनियर हाई स्कूल नजर आता है। नदी के किनारे बच्चों का एक प्राथमिक  विद्यालय  और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत बना सुंदर सा घर नजर आता है। 


स्कूल का भवन और सरकारी योजना के तहत बने छोटे से घर को देखकर लगता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लाचुंग घाटी के लोगों को भी मिला है।   ऐसा लगता है इन वादियों में रहने वाले लोग बड़े खुशनसीब होंगे।    इस खुशनुमा सुबह को देखकर लगता है कि इस घाटी में महीनों वक्त  गुजारना कितना सुखकर हो सकता है। 


कभी मौका मिला तो दुबारा इस घाटी में आने की कोशिश जरूर करूंगा। धीरे धीरे सूरज की लालिमा घाटी में नीचे उतरने लगी है। पूर्वोत्तर के इन इलाकों में दिल्ली की तुलना में सुबह जल्दी आती है। थोड़ी देर नदी के तट पर टहलने के बाद वापस अपने कमरे में आ जाता हूं।  इस बीच अनादि भी पूरी नींद ले चुके हैं। अनादि को जगाकर तैयार होने के लिए कहता हूं।


हमारे ड्राईवर साहब ने सुबह छह बजे हमें आगे के लिए निकलने का समय दे रखा है। इससे पहले हमलोग शौच, ब्रश आदि करके   तैयार हो गए हैं। इतनी ठंड में स्नान का   तो कोई मतलब ही नहीं था। बिजली नहीं होने  के कारण यहां गर्म पानी नहीं मिलने वाला  है। हालांकि कमरे गीजर लगा हुआ है। मतलब बिजली रहे तो आप  स्नान भी कर सकते हैं।


होटल के कैंटीन से बनी सुबह-सुबह चाय हमारा इंतजार कर रही है। इस बीच हमारी टैक्सी के सभी साथी भी समय  से तैयार हो गए हैं।  ड्राईवर साहब भी  टाइम के पूरे पाबंद हैं। हमारे चालक महोदय का व्यवहार भी काफी  दोस्ताना और उत्साहजनक है। यह सफर और  बेहतर बना देता है। तो सुबह छह बजे के थोड़ी देर बाद हमलोग चल पड़े हैं युमथांग वैली की ओर।  


-   विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( LACHUNG, YUMTHANG, VALLY OF FLOWERS, RHODODENDRON)  

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